संस्कृति के सुंदर छंद रच गया 'लोकरंग'

यह गतिविधि बाज़ार की महिमा के युग में देसी ढंग से लड़ी जाने वाली एक सांस्कृतिक लड़ाई भर नहीं है, बल्कि विवेकशील ढंग से अपनी लोक परंपरा से सृजनात्मक रिश्ता बनाने की जगह है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 4, 2021, 10:09 AM IST
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संस्कृति के सुंदर छंद रच गया 'लोकरंग'
भोपाल में हुआ लोकरंग. (Pic-विनय उपाध्‍याय)

मिट्टी की महक और उसकी महिमा को मुखरित करती कलाओं की एक सुनहरी दुनिया जब मनुष्यता के आसपास अपने अर्थ खोलती है तो जीवन में उत्सव लौट आता है. इस उत्सव के आसपास कामनाएं अपना ठौर तलाशती हैं. बुझापन काफूर होता है. समय मुस्कुरा उठता है. ‘लोकरंग’ के आंगन में इसी इन्द्रधनुष का सतरंगी सैलाब उमड़ आता है. भारतीय गणतंत्र के नाम लोक संस्कृति परंपरा के उजाले में प्रकट होती फिर इस बात का यकीन पुख्ता करती हैं कि प्रकृति और संस्कृति की आपसदारी में ही जीवन का उत्कर्ष है. 26 से 30 जनवरी तक भोपाल में आयोजित होने वाला यह 36वां ‘लोकरंग’ एक लंबी खामोशी और अवसाद को छांटता ‘नवगति, नवलय, ताल छंद नव’ का सनातन संदेश दे गया. मप्र शासन के संस्कृति महकमे के संयोजन में हुए विराट समागम में देश-देशांतर की कलाएं अपनी चहक-महक लिए मन छूता मंजर रचती रहीं.


यहां आकर आंख और मन अटक जाते हैं. जिंदगी की भूली-बिसरी छवियां नए-नए रूप धरकर सामने आती हैं. जीवन का संगीत भीतर तक बज उठता है और पांव में उठी थिरकन उल्लास जगाने लगती है. ‘लोकरंग’ की शक्ल में अब हर साल शैल-शिखरों की नगरी भोपाल के फलक पर यही सब नमूदार होता है. यह जलसा उस प्रतिज्ञा और पुरूषार्थ का प्रतीक है जिसमें सामूहिकता, सहकार और सौहार्द का लोकतंत्र जीवंत हो उठता हैं. यही वजह है कि ‘लोकरंग’ सिर्फ पांच दिनों का रस्मी आयोजन भर नहीं है, वह संस्कृति का एक महाअनुष्ठान बन चुका है. 35 बरस बीत गए.


यह सोचते एक हरी सी याद उस पगडंडी से जा मिलती है जहां कुछ जनजातीय और लोक कलाकारों तथा शिल्पकारों ने अपनी आमद दर्ज़ करते हुए इस उत्सव का आगाज किया था.

दिलचस्प यह कि अनेक पायदान तय करता यह उत्सव परिकल्पना, विस्तार और संयोजन का मानक मंच बन गया. इस बीच राजनैतिक और प्रशासनिक सत्ताएं बदलती रही. उनकी हठधर्मिता ने बहुत कुछ जोड़ा-घटाया, पर ‘लोकरंग’ की आत्मा पर खरोंच नहीं आयी. इस बार कोराना का साया भी कहीं इर्द-गिर्द मंडराता रहा. लेकिन अपनी गुजि़श्ता यादों के महकते मंज़रों को थामता ‘लोकरंग’ सबको अपनी आगोश में बुलाता रहा.


‘लोकरंग’ दरअसल इक्कीसवीं सदी की चौख़ट पर एक ऐसा सांस्कृतिक समागम है, जिसमें भारत की जनपदीय कलाओं की असल तस्वीर उभरकर सामने आती है. यह लोक संस्कृति के वजूद को एक ऐसे बाज़ारू दौर में देखने-परखने की पहल है, जब हमारी आकांक्षाओं पर पराई मान्यताओं का मुलम्मा हैं, लेकिन ‘उत्सव’ में उमड़ता जनसैलाब इस धारणा को ध्वस्त करता रहा है. जैसे अपनी ही गुमशुदा तासीर और तस्वीर को पहचानने, उसके साथ बिरमने सारी क़ायनात एक ज़मीन पर इकठ्ठा हो जाती है.


यहां ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष सच्चा लगने लगता है. लोक कलाओं की हैसियत पता चलती है कि अपने बहुआयामी स्वभाव के बावजूद उनकी प्रवृत्ति सामुदायिक है. उनमें मानवीय संवेदना की अजस्त्र धारा प्रवाहित होती हैं और समय के हर मुकाम पर वे आदमी को उसके आदिम सत्य का आईना दिखा सकती हैं. मानचित्र पर भारत चाहे जितने भी सूबों-सरहदों में बंटा हो, लेकिन यहाँ की बहुरंगी संस्कृति एकता, आपसदारी और अमन का ही पैगाम देती हैं. ज़रा आश्चर्य ही होता है कि अपनी-अपनी स्थानिकता में क़ैद रहने वाली लोक कलाएँ जब अपने जनपद की सीमा लांघती हैं तो वे सारे जगत की हो जाती हैं. वजह सिर्फ यही कि लोक कलाओं के भीतर सदा ही हरी-भरी मनुष्यता मुस्कुराती रहती हैं.


यह उत्सवी रौनक साबित करती है कि लोक संस्कृति एक सनातन प्रवाह है, एक अंतर्धारा है जो मानवीय जीवन के साथ समय की हर धड़कन से अपना रूहानी रिश्ता बनाती है.

लोक संस्कृति को लोक पैदा करता है, लोक ही उसकी हिफाजत करता है और आने वाली पीढि़यों को विरासत की तरह सौंप देता है. दरअसल लोक संस्कृति का सार इंसानी दुनियां को बेहतर गढ़ना है. इस संस्कृति के साथ जुड़ी होती है विभिन्न कलाएं जो एक परंपरा में अपना रूप गढ़ती हैं. उनमें जीवन की सुंदरता समाई होती हैं. लहक-महक भरे अनूठे अहसास इन कलाओं के दामन में धड़कते हैं. यानी अपने समय की आहटों को जज्ब करती ये लोक कलाएं लोक, आस्था, लोक श्रद्धा और लोक चेतना की मुखर अभिव्यक्ति बन जाती है.


हैरत और दिलचस्पी का पहलू यह है कि एक राज्य की लोक संस्कृति समूची दुनिया के लिए एक सुपरिचित तथ्य की तरह प्रकट होती है. अपने जनपदीय दायरों से बाहर निकलकर विराट समाज की लोक रूचि में शामिल होने की इस कूबत की वजह है उनका खुला हृदय, फैली बाहें और आत्मीयता का लहराता आंचल. इस आयोजन की अवधारणा साधना और सिद्धि की ऐसी ही चमत्कारी किन्तु सहज कला प्रस्तुतियों के दर्शन-प्रदर्शन पर आधारित थीं.


जब हम लोक जीवन से साक्षात्कार करते हैं तो उसकी जीवंतता हमें किसी ऐतिहासिक अनुभव की ओर ले जाती है. इस अनुभव के साथ हमारे सामने आती है स्मृतियां, विश्वास, परंपराएं और वे सारे संदर्भ जिनमें हमारे सामुदायिक जीवन व्यवहार और विकास यात्रा के चिन्ह छिपे हैं. जिनमें हमारे जीवन का लालित्य बोध छिपा है. वह इतना अंतरंगी और गहरा है कि कोई बाहरी आक्रमण हमारे इस सुंदर और आदिम दुनिया को नष्ट नहीं कर पाता.


इस बार ‘लोकरंग’ का विन्यास गत वर्षों की तुलना में कुछ सिमट सा ज़रूर था लेकिन उसकी बुनियादी आकांक्षा जनजातीय और लोक कलाओं के उसी गहरे अनुराग में रची-बसी थी. इस दुनिया-ए-फानी को अलविदा कह चुके प्रख्यात भील चित्रकार पेमा फत्या और गोंड चित्रकार कला बाई श्याम के चित्रांकन की प्रदर्शनी ‘प्रणति’ से गुजरना आदिम स्मृतियों के रंगों की खुश्बुओं से गुजरना था. ‘बोध’ के अंतर्गत बुंदेली संस्कृति के सुंदर सोपानों को बधाई, स्वांग, नौरता, राई, अखाड़ा जैसे नृत्यों में देखना भला-सा था, तो ‘तारतम्य’ में भील जनजातीय समुदाय की उन्मुक्त-अल्हड़ छवियों के छन्द उनकी सांस्कृतिक यात्रा की कहानी सुनाते रहे. इस सिलसिले में जुड़ीं धनगिरिजा (महाराष्ट्र), छपेली (उत्तरांचल), गोटीपुआ (उड़ीसा), पंथी (छत्तीसगढ़), ढोलुकुनीता (कर्नाटक), भवई-सपेरा (राजस्थान), और चरकुला-मयूर (उत्तरप्रदेश) सहित सुदूर राज्यों की नृत्यमय थिरकन. सरहद पार से ईरान के कलाकारों ने ‘लोकरंग’ के मंच पर दस्तक दी तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का विश्वास गहरा गया. उधर मुक्ताकाश में फैला शिल्प मेला हस्त कारीगरी के अनूठे कौशल से तैयार कलात्मक कृतियों से आगंतुकों को लुभाता रहा.


दरअसल यह गतिविधि बाज़ार की महिमा के युग में देसी ढंग से लड़ी जाने वाली एक सांस्कृतिक लड़ाई भर नहीं है, बल्कि विवेकशील ढंग से अपनी लोक परंपरा से सृजनात्मक रिश्ता बनाने की जगह है. यहां  आकर हमारी स्मृतियां जागती हैं, बुझापन काफूर होता है. अपनी स्वाभाविकता में लौटने की पुकार उठती है. ‘लोकरंग’ की ज़रूरत हर दौर में बनी रहेगी. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: February 4, 2021, 10:09 AM IST
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