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विश्व हिन्दी दिवसः ओ मेरी भाषा, मैं लौटता हूं तुममें

हिन्दी की भाषायी समृद्धि और उसके वजूद पर स्वाभिमान छलकता है. अफसोस इस बात का भी होता है कि विश्वमंच पर हिन्दी की हुंकार भरने वाला हिन्दुस्तान 'हिंग्लिश' के सामने नतमस्तक क्यों है?

Source: News18Hindi Last updated on: January 10, 2021, 9:16 AM IST
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विश्व हिन्दी दिवसः ओ मेरी भाषा, मैं लौटता हूं तुममें
हिन्दी की हरी-भरी विरासत के आसपास उसके भूमंडलीकरण का स्वप्न गढ़ते हुए दस जनवरी का जो मुहूर्त 'दिवस' के नाम पर मुकर्रर हुआ, वह विमर्श के नए शिखरों की ओर ले जाता है.
हिन्दी की हरी-भरी विरासत के आसपास उसके भूमंडलीकरण का स्वप्न गढ़ते हुए दस जनवरी का जो मुहूर्त 'दिवस' के नाम पर मुकर्रर हुआ, वह विमर्श के नए शिखरों की ओर ले जाता है. पलटकर देखें तो 8 जून 2005 को भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने विश्व हिन्दी सम्मेलन समन्वय समिति की बैठक में विश्व हिन्दी दिवस मनाने के प्रस्ताव पर हामी भरी. ग़ौर करने की बात यह कि 1975 में नागपुर में आयोजित पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन दस जनवरी को ही शुरू हुआ था. बाद के बरसों में यह तारीख़ मौके़ और दस्तूर के लिहाज़ से प्रवासी भारतीयों के लिए भी सुविधाजनक हो गयी.

बहरहाल 'दिवस' के बहाने हिन्दी की महिमा को गाना, पोथियों के पन्ने पलटना, क़लम के कि़रदारों को याद करना, किसी कविता की ज़मीन से उठती मनुष्यता भी पवित्र गंध को महसूस करना सुख देता है. निगाह सरहद पार के मुल्कों पर जाती है तो हिन्दी के प्रति वहाँ जिज्ञासा, प्रेम और अध्ययन की बढ़ती रूचियों को देखकर सुखद विस्मय होता है. गर्व और विश्वास गहरा होता है कि सदियों में फली-फूली हिन्दी की ध्वजा सारी दुनिया की हवाओं में लहरा रही है. यूँ हिन्दी की भाषायी समृद्धि और उसके वजूद पर स्वाभिमान छलकता है. अफसोस इस बात का भी होता है कि विश्वमंच पर हिन्दी की हुंकार भरने वाला हिन्दुस्तान 'हिंग्लिश' के सामने नतमस्तक क्यों है?

इस विसंगति से परे हिन्दी के आक्षितिज फैले संसार को देखें तो लगता है कि भाषा का भी एक देहराग होता है. उसकी भी भंगिमा होती है. हाव-भाव होते हैं. उसकी भी आवाज़ें हैं. हमारी सभ्यता ने अपनी लंबी यात्रा में इसकी परवरिश की. भाषा को पत्थर की मूरत नहीं, बल्कि अष्टधातु की प्रतिमा के रूप में गढ़ा. वह हर युग में गलती-ढलती और पिघलती रही. मानों अपना दामन पसारकर कहती हो- ‘मैं ज्ञानियों की भी हूँ. पोथियों से दूर कबीरों की भी हूँ. मेरा मरकज़ महल भी है और झोपड़ी भी मेरा बसेरा है. मैं हर सीने में धड़क सकती हूँ. अपना हृदय खोलिए, फैलाइए अपनी बाहें.... बस.’

भाषा में आदमी की तमीज़ को तौलती हिन्दी के क्रांतिवीर कवि धूमिल की इस कविता से गुज़रते हुए भाषा के रिश्ते पर सोच के नए कपाट खुलते हैं- ‘कविता क्या है? क्या यह व्यक्तित्व बनाने की/चरित्र चमकाने की/खाने-कमाने की चीज़ है. ना भाई ना/कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है’.
कविता के विश्व पर विहंगम दृष्टि डालते हुए भाषा के सरोकार अपनी रचनात्मकता में दिलचस्प हो उठते हैं. गये बरस जब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ने साहित्य और कलाओं का अंतरराष्ट्रीय समारोह 'विश्वरंग' आयोजित किया तो दुनिया के तीस देशों के प्रतिनिधियों की चौक़ाने वाली शिरकत रही. विश्वरंग के आंगन में हिन्दी की चहक-महक से भरे परदेसी पाहुनों की दस्तक इस अर्थ में निराली थी कि उनके ओठों पर कबीर, तुलसी, टैगोर और निराला से लेकर नीरज तक ऐसे अनेक शब्द-शिल्पियों का जि़क्र तैर रहा था जिन्हें हमने अपनी थाती मानकर पीढि़यों का साहित्यिक संस्कार किया. रशिया की इगोर सीड, इज़राइल के गेनाद्य श्लोम्पर, साउथ अफ्रीका की लेबो मशीले और तिब्बत के तेंजिम तसन्डू जैसे दो दर्जन से भी अधिक लेखक-शोधार्थी इस प्रसंग पर प्रसन्न थे कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं को केन्द्र में रखकर दुनिया का सबसे बड़ा उत्सव रचा जा रहा है और इस बहाने एक बार फिर इंसानी आपसदारी का एक वैश्विक मंच तैयार हो रहा है.

इस मौक़े पर इन प्रवासियों को एक महत्वपूर्ण सौगात मिली ‘कविता का विश्वरंग’. दो खंडों में प्रकाशित यह दस्तावेज़ विदेशी कवियों की उन कविताओं का हिन्दी अनुवाद था जो प्रथम विश्वयुद्ध के बाद लिखी गयीं और बाद के रचनाकारों के ज़रिए अपने अलग-अलग सरोकारों तक शब्द और स्मृति में रूपांतरित होती रहीं. हिन्दी के बहुमान्य लेखक संतोष चौबे ने इस संकलन की परिकल्पना की और इस प्रकल्प को साकार किया कवि-आलोचक अनुवादक लीलाधर मंडलोई, यादवेन्द्र और राकी गर्ग ने.

इस संग्रह में सभी महादेशों को प्रतिनिधित्व दिया गया. एशिया से भारत, तुर्की, अरब, ईरान और चीन, यूरोप से स्वीडन और पोलैंड, अमेरिका और दक्षिण अमेरिका से, अफ्रीका और कैरीबियन तथा ऑस्ट्रेलिया से प्रतिनिधि रचनाकारों ने जगह पायी है. इनमें नोबल पुरस्कार विजेता हैं, राजनीतिक चेतना के प्रमुख स्वर हैं. स्त्री के पक्ष में सशक्त आवाज़ें हैं और मनुष्यता के पक्ष में खड़ी होती कविता है. दिलचस्प है कि तमाम क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद कविता की केन्द्रीय ध्वनि प्रेम, प्रकृति और मनुष्य को बचाए रखने की पुरज़ोर पुकार है.हिन्दी में विश्व कविता को अनुवाद के ज़रिये नयी प्रतिष्ठा प्रदान करने के अभियान पर निकले यादवेन्द्र के अनुसार अनुवाद के काम को हमें गंभीरता से देखने और बरतने की ज़रूरत है. हिन्दी और दीगर भाषाओं के साहित्य के आदान-प्रदान के एक नए विश्व की रचना करनी होगी. संकलन का तजुर्बा साझा करते हुए वे कहते हैं कि कुछ साल पहले यूनेस्को ने विश्व कविता दिवस मनाने की जरूरत समझी तो अपने नीति वक्तव्य में कहा कि कविता मनुष्यता की सांस्कृतिक व भाषायी अभिव्यक्ति और पहचान का सर्वश्रेष्ठ और शुद्धतम रूप है... कविता हमारी समानधर्मी मनुष्यता और साझा मूल्यों की भाषा बोलती है. कोई अचरज नहीं कि मामूली से मामूली कोई कविता जरूरत पड़ने पर संवाद और शांति का उत्प्रेरक बन जाए. ज़ाहिर है कविता कभी सीमित सन्दर्भों में टारगेट ऑडिएंस या पक्ष-विपक्ष को मुख़ातिब नहीं होती, यह व्यापक विश्व समुदाय के साथ आँख से आँख मिला कर संवाद क्षमता रखती है. यही कारण है कि भारत की बांग्ला भाषा में लिखी जाने वाली कविता विश्व की प्रेम कविता बन जाती है. अमेरिकी अश्वेतों के दमन और संघर्ष को व्यक्त करने वाली कविता भारत के दलित-दमित समुदाय का प्रेरणा स्रोत बन जाती है, फिलिस्तीनियों की जलावतनी बहुतेरे समाजों को अपना अनुभव लगने लगती है, ईरानी स्त्रियों के बराबरी के संघर्ष से सम्पूर्ण विश्व की आधी आबादी ख़ुद को जोड़ कर देखने लगती है, अफ्रीकी सैनिक तानाशाहियाँ किसी न किसी रूप में दुनिया के अनेक हिस्सों में उपस्थित दिखने लगती हैं... ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जहाँ भौगोलिक और भाषायी सीमाएँ पूरी तरह से अर्थहीन समझ आने लगें. माया एंजेलो ने यह महसूस करते हुए ही लिखा- ‘किसी भी देश में हों हम एक दूसरे के समान ज़्यादा हैं, अलग अलग कम.’

इस तारतम्य में संतोष चौबे जोड़ते हैं कि सभ्यता के विकास ने जो ऊपरी चकाचौंध पैदा की है उसके ठीक बीचों बीच रहते हुये भी कवि को एहसास है कि उसका मुल्क अपनी सबसे खूनी रातों में दूर से कुछ ऐसे जगमगाता है कि परदेसियों की आँखें चुंधिया जायें पर वही जानता है कि उसके भीतर रहने वालों का वहाँ रोज़ ब रोज़ दम घुटता है, कि भारी सीसे जैसी है जुल्मत की हवा जिसके नीचे वह हलाकान है पर फिर भी, उसे उम्मीद है कि इंसान ही इंसानों को बदहाली से खुशहाली की जानिब ले जायेंगे.’

बढ़ती हुई धार्मिक और वैचारिक असहिष्णुता के बीच कविता हमें याद दिलाती है कि एक शब्द ने दूसरे शब्द का समूल नाश कर दिया हैं कि एक किताब ने जारी किए हैं दूसरी किताब को जला डालने के आदेश, कि भाषा की हिंसा से बनाई गई एक सुबह ने लोगों की सुबह के मायने बदल दिये हैं.


सभ्यता विमर्श में वह मनुष्यता और जीवन के साथ खड़ा नज़र आता है. डार्विन के विकासवाद और निर्बलों पर बलवानों की विजय में वह अंततः विनाश ही देखता है और कम से कम किस्से-कहानियों में ही सही, आशा की किरण खोजता है, जहाँ फिर से मिल जायेंगे प्रेमी, परिवारों में होगा मेल मिलाप, आपसी संदेह मिट जायेंगे, वफादारी फिर पुरस्कृत होगी, सुख-समृद्धि लौटेगी, लालच पर अंकुश लगेगा तथा भले लोगों का नाम फिर से उज्जवल होगा.

वह मानता है कि स्मृतियाँ भाषा में ही जीवित रहती हैं और भाषा का मरना उन स्मृतियों और अनुभूतियों का मरना भी है. नौजवानों के पास बचे ही नहीं हैं ज़्यादा शब्द ओर बचे खुचे शब्दों से जुड़ी तमाम चीज़ें भी, अब एक-एक कर गुम हो रही हैं. बच्चे उन मुहावरों को अब नहीं दुराहते जिन्हें घड़ी-घड़ी, गुज़र गये उनके माँ-बाप, दुहराते थे. न जाने किसने उन्हें ये घुट्टी पिला दी कि हर बात को नए ढंग से कहने का ही चलन है आज और इसी तरह से उन्हें मिलेगी प्रशंसा. शब्द आखिर इसीलिये तो बने थे कि बता सकें हमें आंखों देखे दृश्यों के बारे में और संभावित परिवर्तनों के बारे में. पर इस सबसे अनजान हम हर बात पर कहते हैं- शुक्रिया. अस्पतालों के चक्कर लगा कर लौटने के बाद हम कहते हैं शुक्रिया, लूट खसोट करने के बाद कहते हैं शुक्रिया, युद्ध को याद करें तो शुक्रिया, दरवाज़े पर खड़े पुलिस वाले दिखे तो शुक्रिया, अफसरों और धनाढ्यों के सामने शुक्रिया और कटते हुये जंगलों और दम तोड़ते जानवरों को देखते हुए भी शुक्रिया. दैत्य की मानिंद जैसे-जैसे हमें निगलते जा रहे हैं शहर, वैसे-वैसे बदहवासी में हम कहते जा रहे हैं शुक्रिया.

असल में बात बहुत सीधी सी थी जिसे हम भूल गये हैं. ‘शक्ति होती है मौन, पेड़ कहते हैं मुझसे और गहराई भी, कहती हैं जड़ें और पवित्रता भी, कहता है अन्न. पेड़ ने कभी नहीं कहा मैं सबसे ऊँचा हूँ. जड़ ने कभी नहीं कहा मैं बहुत गहराई से आयी हूँ और रोटी कभी नहीं बोली दुनिया में क्या है मुझसे अच्छा.’ अगर हम ये मौन आवाज़ें सुनें तो पायेंगे कि ‘गुलाब के दिल में जो खज़ाना है वही तुम्हारे दिल में भी है. उसको वैसे ही लुटाओ जैसे सबके बीच लुटा देता है गुलाब, तब तुम्हारा दर्द सबका हो जायेगा.’

इन आवाज़ों से गुज़रते हुए हिन्दी के कवि केदारनाथ सिंह की कविता को याद करना मौजूं लगता है- ‘जब चुप रहते-रहते अकड़ जाती है मेरी जीभ/दुखने लगती है मेरी आत्मा/ओ मेरी भाषा/मैं लौटता हूँ तुममें’

हिन्दी का दिवस या उत्सव मनाते हुए उसके आसपास लौटने और शब्द की अंतर्ध्वनियों में मनुष्य के होने की कामना बची रहेगी. आमीन...
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विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: January 10, 2021, 9:16 AM IST
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