World Puppetry Day: चहकती हैं, फुदकती हैं, जमाने की बातें करती हैं ये कठपुतलियां

World Puppetry Day: कठपुतलियों की इस नायाब दुनिया से वाबस्ता होना इस सच के आसपास पहुंचना था कि कौतुहल, जिज्ञासा और मनोरंजन के ताने-बाने में दरअसल मनुष्य अपने ही स्वप्न और यथार्थ की बनती-बिगड़ती और संवरती हुई दुनिया के अक़्स तलाशता है. कठपुतली इसी मनोविज्ञान की देशज कला है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 21, 2021, 9:54 AM IST
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World Puppetry Day: चहकती हैं, फुदकती हैं, जमाने की बातें करती हैं ये कठपुतलियां
आज विश्‍व कठपुतली दिवस मनाया जा रहा है. (File pic)
"इंसान एक पुतला है जिसकी डोर 'ऊपर वाले' के हाथों में है और कठपुतली की डोर कलाकारों के हाथों में. यूं जीवन और कला के रंगमंच में भला क्या फ़र्क है!" रंगीले राजस्थान की सरज़मीं से कठपुतली के हुनर में पारंगत हुए अजीत भाट बहुत सहज ढंग से जीवन के रंग दर्शन की व्याख्या करते हैं. भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में यह पुतुल समारोह का मंच था. अजीत सहित भारत के विभिन्न सूबों के कठपुतली कलाकार और विशेषज्ञ मुख़्तलिक कि़स्मों की पुरानी और नई शैलियों में रचे-बसे खेल-तमाशों के साथ आमंत्रित किए गए थे. कठपुतलियों की इस नायाब दुनिया से वाबस्ता होना इस सच के आसपास पहुंचना था कि कौतुहल, जिज्ञासा और मनोरंजन के ताने-बाने में दरअसल मनुष्य अपने ही स्वप्न और यथार्थ की बनती-बिगड़ती और संवरती हुई दुनिया के अक़्स तलाशता है. कठपुतली इसी मनोविज्ञान की देशज कला है.

पुतलों के ज़रिये रंगमंच पर कहानियों को देखने-सुनने की कला हज़ारों बरस पुरानी है. मनोरंजन का यह खेल-तमाशा दुनिया के अनेक मुल्कों में प्रचलित रहा है. भारत में इसकी परंपरा की शुरूआत लगभग डेढ़ हज़ार बरस पहले की मानी जाती है. अनेक संदर्भ ग्रंथों और किंवदंतियों में कठपुतली या गुडि़या के खेल का जि़क्र मिलता है. रंग-बिरंगी तहज़ीब और रवायतों के देश राजस्थान में कठपुतली कला के प्रति ख़ास कि़स्म का लगाव दिखाई देता है.

बहुत पीछे जाकर ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में महाकवि पाणिनी के अष्टाध्यायी ग्रंथ के पन्ने पलटें तो वहां 'पुतला' नाम से एक नाटक का जिक्र मिलता है.


इसका संदर्भ कठपुतली कला से कितना जुड़ा है कहना कठिन है लेकिन पुतले से आशय एक किरदार का ज़रूर है जो रंगमंच पर अपनी भाव-भंगिमाओं, देह गतियों और आकर्षक मुद्राओं के माध्यम से अभिव्यक्ति का मनोरंजक परिवेश रचता है. आगे जाकर यह पुतला लोक परंपरा में सामाजिक-सांस्कृतिक सम्प्रेषण का एक ऐसा ज़रिया बना जिसने बहुत सहजता से जनमानस में अपनी गहरी पैठ बनायी. भारत के सुदूर गांव-कस्बों से चलकर आज कठपुतली विश्वमंच पर अपनी अहमियत और शोहरत का उजाला बिखेर रही है.
निश्चय ही समय, सभ्यता, संसाधन, रूचि, परिष्कार और ज़रूरतों के चलते पुतलियों की दुनिया में भी परिवर्तन आया. लकड़ी या काठ से बनने वाले पुतलों के साथ ही छड़, चमड़े, कपड़े और छाया के माध्यम से पुतलों का एक नायाब संसार निर्मित हुआ. पौराणिक पात्रों या राजा-महाराजाओं की कहानियों के दायरों से निकलकर नई ईज़ाद हुई शैलियों में घटनाओं, प्रसंगों, कि़स्सों और विषयों के साथ सामाजिक जन-जागरण के एक नए अभियान की शुरूआत हुई. पुतलों की यह लुभावनी दुनिया दरअसल तहज़ीब और रवायतों का जीवंत दस्तावेज़ हैं जहां हम अपने ही जीवन और समय की आहटों से वाबस्ता होते हैं और निष्प्राण से पुतलों की देह-गतियों भाव-भंगिमाओं और संवादों में अपनी ही लौटती आवाज़ों का दिलचस्प मंज़र सामने पाते हैं. इसी क़ायनात की कुछ सुंदर छवियों को समेट लाती है कठपुतलियां.

करीब पचास सालों से कठपुतली कला से जुड़े उदयपुर के विलास जानवे कहते हैं कि इस कला के ज़रिये इंसान के हर जज़्बात को अभिव्यक्त किया जा सकता है. कहने की तकनीक भी बदल गयी है और विषय वस्तु में भी काफी परिवर्तन हुआ है. जानवे ने कठपुतली के कलात्मक संसार से जुड़े विविध पक्षों का गहराई से अध्ययन किया है. वे विदेशों में हो रहे प्रदर्शनों के हवाले से बताते हैं कि भारत के लोकांचलों या मेलों-उत्सवों में हम कठपुतली की जिस दुनिया को देखते रहे हैं, उससे बहुत आगे नई तकनीक का विस्तार विदेशों में देखने मिलता है. लाईट एंड साउंड का अद्भुत प्रयोग वहां कठपुतली के रंगमंच को नई तासीर देता है.

हालांकि भारत में भी काफी नवाचार हुआ है. पर अभी भी कठपुतली प्रदर्शन के आसपास एक देसी कि़स्म का खिंचाव है. ढोलक की थाप, कहानी गाता-सुनाता, परदे के पीछे से उठता गायकों का स्वर, रंग-बिरंगे परदे, लैला-मजनू के कि़स्से और कालबेलिया नृत्य पर कमर लचकाती नर्तकी.... यह सब जैसे कठपुतली का स्थायी भाव बन गये हैं. पर इस बीच नई तकनीक के आग्रह के साथ सयानी हुई नई पीढ़ी कठपुतली को नए कलेवर में अधिक आत्मसात करती है.कठपुतलियों की दुनिया निराली है और उनके हंसते-गाते, इठलाते रूप भी अनोखे हैं. सदियों पहले जब आज की तरह सिनेमा, टीवी और कम्प्यूटर का आविष्कार नहीं हुआ था तब रंग-बिरंगी, छैल-छबीली कठपुतलियां ही गांव-शहरों के मेलो-ठेलों, तमाशों और मंचों पर दुनिया भर की दास्तानें सुनाई देती थीं. इन्हें देखने हज़ारों लोगों का हुजूम उमड़ता था. ये कठपुतलियां अपने संग समेट कर लातीं अतीत की ढेर सारी यादें और अपने समय के नायाब किस्से. एक छोटा सा परदा और उसके पीछे इन कठपुतलियों की डोर थामे हुनरमंद हाथ. ढोलक की थाप उठती और इन्हें नचाने वाली उंगलियों का करतब शुरू हो जाता.

इन्हें शुरू करने वाले, ईजाद करने वाले पुरखे तो अब नहीं रहे मगर उनकी इस थाती को, उनके वजूद को हुनरमंद हाथों ने थामा और मनोरंजन का यह दिलचस्प कारवां वक्त का लंबा सफ़र पार करता मनोरंजन की देहरी पर दस्तक देता रहा है. राजस्थान, महाराष्ट्र, मालवा, मालाबार और सौराष्ट्र से लेकर बंगाल, आसाम तक इस पारंपरिक कला ने अपने पांव पसारे.

इस तारतम्य में पश्चिम बंगाल के सुदीप की सक्रियता अलग से ध्यान खींचती है. कोलकाता पश्चिम बंगाल में स्थापित डॉल्स थिएटर कठपुतली कला के मंचन को भारत ही नहीं सरहद पार के मुल्कों में भी एक नई पहचान और प्रसिद्धि देने वाला समूह है.

अपनी तीस बरस की सांस्कृतिक यात्रा में इस थिएटर ग्रुप ने कठपुतली कला को भारतीय परंपरा की चली आ रही शैली से हटकर नए विषय और तकनीक के संयोग से एक अभिनव स्वरूप में ढाला है.


डॉल्स थिएटर का इस तरह अद्वितीय प्रयोगों के साथ अवाम के बीच पहुंचने और प्रसिद्धि के नए शिखरों पर दस्तक देने की ज़मीन सुदीप गुप्ता जैसी रचनाधर्मी शख्सियत के पुरूषार्थ और कौशल ने बरसों की सोच-समझ तथा दक्षता से तैयार की है. एक लेखक, आकल्पक और कला निर्देशक के रूप में समान रूप से सक्रिय श्री सुदीप ने डॉल्स थिएटर के ज़रिए कठपुतली को मानवीय सरोकारों की अभिव्यक्ति और संवाद का एक खुला विस्तृत और बहुरंगी आकाश दिया है जहां कहानी, घटना, प्रसंग और संदेश पुतलों की ज़ुबानी जैसी सारी दुनिया को अपने दामन में समेट लेता है. यहां एक सिरे पर मनोरंजन है तो दूसरे सिरे पर विचार की रौशनी में अपने जीवन और समय को देखने का दिलचस्प नज़रिया भी. डॉल्स थिएटर ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, संगीत-नाटक अकादेमी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र दिल्ली, सहित भारत के लगभग सभी राज्यों की प्रमुख संस्थाओं तथा स्पेन, ईरान, इज़रायल, थाईलैंड, तुर्की और रूस जैसे मुल्कों के आमंत्रण पर अपनी प्रस्तुतियां दी हैं.

आज जमाना ज़रूर कुछ बदल गया है, मगर कठपुतलियां नहीं बदलीं. वे आज भी जिंदा हैं. चहकती हैं, फुदकती हैं, खूब बातें करती हैं. बस, उन्हें चाहिए आपकी दोस्ती. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: March 21, 2021, 9:54 AM IST
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