विश्व कला दिवसः मनुष्यता का उद्घोष हैं कलाएं

"दिवस" के निमित्त इन सवालों से गुजरना बहुत स्वाभाविक लगता है. दरअसल प्रयोग, प्रगति और प्रसिद्धि के इस दौर में कलाओं का दामन भी बेअसर नहीं रहा. नवता के नाम पर चकाचौंध ने कलाओं को घेर लिया तो प्रयोग के नाम पर निरर्थक रचनाशीलता फैशन में पैबस्त होकर बाजार के चौराहे पर खड़ी हो गयी.

Source: News18Hindi Last updated on: April 15, 2021, 5:04 pm IST
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विश्व कला दिवसः मनुष्यता का उद्घोष हैं कलाएं
महामारी के संकट जब सारी दुनिया पर छाया है, तब उसकी भूमिका क्या है? क्या कलाओं का वजूद भी आहत हुआ है?

हरी- हरी वसुंधरा पे नीला-नीला ये गगन, ये कौन चत्रकार है !


बरसों पहले पंडित भारत व्यास के लिखे और रेडियो पर अक्सर बजते रहे इस गीत पर आज अचानक फिर मन ठिठक गया है. आज यानि पंद्रह अप्रेल को विश्व कला दिवस है. सारी कायनात में यह सन्देश पहुंचाने का मुहूर्त कि इस संसार को जिस अदृश्य शक्ति ने रचा है, वह किसी चितेरे के चित्त में उठी कलात्मक हिलोर की ही सुन्दर परिणति है. निगाह धरती से आसमान तक जाती है और इस जीवन की धड़कनो को सुनती है तो सारा मंज़र एक दिव्य लीला की अनुभूति बन जाता है.


यहीं से रूप, रस, रंग और गंध की नेमत को समेटते हुए मनुष्य ने अपने अहसासों का नायाब मरकज़ खोजा. कला की चहक-महक में जीवन जैसे एक प्रर्थना बन गया. साधना की नयी रहें खुलीं. खरोचों और खुशियों कोअपने एकांत में सहलाना मुमकिन हुआ. यूं, जीवन की प्रवक्ता बन गयीं एक दिन कलाएं.

संस्कृत के एक सुभाषित के सन्दर्भ लेकर कहें तो साहित्य, संगीत और कलाओं से विहीन मनुष्य पशु के सामान है. आशय यह कि सृजन कि साधना या उसके अस्वाद में रमना हमारी मनुष्यता को पुकारना है.


उस आदिम संवेदना के पास लौटना है जो हमें उदार, सहिष्णु और प्रेम से सराबोर करती हुई सबके मंगल की कामना से भर देती है. विश्वकला दिवस इसी मंशा को मूर्त करने की एक रचनात्मक पहल है. दुनिया को एक बार फिर यह सन्देश देने की कोशिश कि हमारे तमाम मानवीय सरोकार बुनियादी तौर पर अपनी अलहदा सी पहचान के बावजूद समता, ममता और एकता की, वरना कसौटी पर ही सार्थक है वरना उनका कोइ औचित्य नहीं.


यानि स्वान्तः सुख के लिए किया गया यह रचनात्मक उद्यम अंततः सामाजिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष के लिए है. लेकिन सृजन का यहकाशिकार हुआ है? मार्ग कठिन साधना की मांग करता है. प्रेमशंकर शुक्ल की एक कविता यहां मौजू है – “अपने आकार और आत्मा के लिए / कलाए. बहुत मेहनत हो गयी मांगती हैं/जैसे अपनी सुगंध को अकार देने मेंं/अपना फूलपन बचाते हुए /फूल को जूझना होता है दिन-रात/रचनाकार की कल्पनाशीलता के पसीना /रचना के आलोक में ही/अपने नमक और नमीं के साथ/दिखता है.”


यहां यह देखा जाना बहुत ज़रूरी है कि हमारे वक्ती दौर में कलाओं के विश्व पटल पर जो कुछ भी हो रहा है , वह अपने मकसद में कितना नया, रोचक और अर्थपूर्ण है? अपने समय कि प्रवत्तियों और चुनौतियों के बीच उसकी सम्वादी ताकत कितनी गहरी है? महामारी के संकट जब सारी दुनिया पर छाया है, तब उसकी भूमिका क्या है? क्या कलाओं का वजूद भी आहत हुआ है?


“दिवस” के निमित्त इन सवालों से गुजरना बहुत स्वाभाविक लगता है. दरअसल प्रयोग, प्रगति और प्रसिद्धि के इस दौर में कलाओं का दामन भी बेअसर नहीं रहा. नवता के नाम पर चकाचौंध ने कलाओं को घेर लिया तो प्रयोग के नाम पर निरर्थक रचनाशीलता फैशन में पैबस्त होकर बाजार के चौराहे पर खड़ी हो गयी. पूंजी का ग्रहण लगा. एक निरुद्देध्य , भावहीन चेहरा कलाओं का इस तरह सामने आया , लेकिन यह उथला कलाबोध सच्चे रसिक के गले कभी न उतर सका. एक कथित अभिजात्य कला प्रेमी बिरादरी से दूर इनकी चाहत सदा सिमटी रही, कला के सच्चे गुणग्राहकों ने लोकरस में पगी परम्परा से प्रेरित आधुनिकता को ही स्वीकारा. कला की दीर्घाएं और सभागार इस बात की गवाही देते रहे हैं कि मानवीय संवेगों को धारण करने वाला सृजन ही सार्वकालिक है. जिस कला में अखिल विश्व को बाँध लेने की शक्ति है, वही कालजयी है.


कहीं पढ़ा था कि कला मनुष्य की आज़ादी का उत्सव है. कल्पना की उड़ान भरते हुए वह अपने सतरंगी आसमान में दूर तक फ़ैल जाती है, इसलिए वह कालातीत होती है. उसके निशान कभी भी धूसर नहीं पड़ते. अभिव्यक्ति की इस सांस्कृतिक धरोहर के आसपास ठहरकर फिर यह यकीन गहरा होता है कि कला ही जीवन है और जीवन ही कला.

दोनों स्वयं प्रकाशी हैं. दोनों साधना हैं. तपस्या के ताप में किसी सच की तलाश है. यहां आंसू और अवसाद भी आनंद में बदल जाते हैं और कला की कश्ती में बैठकर जीवन के महासागर को पार किया जा सकता है.


हमारी ऋषि परंपरा ने कला को ईश्वर की आराधना कहा. इंसानी उसूलों का उद्घोष मानकर इन कलाओं का बहुरंगी संसार रचने वाले चितेरों ने यह साबित किया कि स्वर, शब्द, रंग, लय, गति, अभिनय और मुद्राओं में इस जीवन और जगत के हर देखे-अनदेखे को सिरजने की आकुलता को आकार दिया जा सकता है. और इस तरह एक प्रति संसार रचा जा सकता है. कलाओं की यह दुनिया मानवीयता के दरीचे खोलती है. एक ऐसे मानस की रचना करती है जो अमन और आपासदारी का जगत व्यापी संदेश लिए सरहदों के फासले पूरती है.


अंततः मनुष्यता का हाथ थामती है. दिलचस्प यह कि दायरों से दूर होकर देखिए तो जनजातीय लोक और नगर कलाओं तक यह अंतर्धारा बहुत साफ़ बहती नज़र आती है. इनकी परस्परता एक ऐसा सांस्कृतिक परिवेश रचती है जहां लालित्य और सौंदर्यबोध एक परंपरा में अपना रूप गढ़ते हैं. कहीं कोई गीत, कोई छंद सुर-ताल से हमजोली कर रहा है. कहीं देह की भाषा उसके मर्म को नाटक में अभिव्यक्त कर रही है. कहीं कोई कथा उपन्यास और नाटक रंगमंच पर अभिनय की छवियों में साकार हो रहे हैं.

कहीं रंग-रेखाओं और मूर्ति-शिल्पों में कोई भावमय लगन चित्त में उठे किसी स्मृति बिम्ब को पा लेने की कसक से भरी है. आपाधापी भरी बोझिल और बेस्वाद होती जा रही दुनिया आखिरकार थक-हार कर कलाओं की छांव में कि सुस्ताना चाहती है. यही वजह है कि सांस्कृतिक बहुरंगों से आत्मीय नातेदारी का तार बंधा है.


हमारी दार्शनिक परंपरा ने कला के आदर्श को सत्यम्, शिवम् और सुंदरम् के सूत्र से जोड़ते हुए उसकी पवित्रता पर मोहर लगायी. कलाओं के वजूद और उसने असर की गहराइयों को समझने की राह दिखाई. कला का प्रयोजन भी साफ़ तौर पर उजागर हुआ कि अंततः उसकी रचनात्मक ईमानदारी अपनी पवित्र साधना में चेतना के उस अंश की खोज है जो रचनाकार और रसिक के बीच आनंद का आत्मालाप बना सके. हज़ारों बरसों का सांस्कृतिक अतीत इस बात की गवाही देता है कि अंधेरा कितना भी घना हो कला की किरणों का निर्झर हमेशा बहता रहा “चट्टानों में कठिन थी राह, नदी गाती हुई चल दी. बहुत खामोश था जंगल, नदी गाती हुई चल दी.”


(ये लेखक के निजी विचार हैं.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: April 15, 2021, 5:04 pm IST
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