विश्व पर्यावरण दिवस स्पेशल: लोक के आलोक में पर्यावरण

प्रकृति को जीने वाले लोक की हिमायत करते हुए विकास के आधुनिक मॉडल पर बेबाकी से कटाक्ष करते हैं- विकास की आधुनिक पश्चिमी परिकल्पना और क्षेत्र में गांव हैं कहां? वे उससे छूटे हुए और बाहर हैं. शहरी विकास के प्रभाव पड़े हैं, गांव पर. उपभोक्ता बाज़ार का विस्तार किया है हमने गांव में, आधुनिकीकरण नहीं. चीजें पहुंच रहीं हैं वहां, जो समर्थ हैं वे खरीद रहे हैं, उपयोग कर रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: June 5, 2021, 5:10 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
विश्व पर्यावरण दिवस स्पेशल: लोक के आलोक में पर्यावरण
आधुनिक फैशन के कपड़े पहनने से क्या कोई आधुनिक हो जाता है? आधुनिक होना चेतना और विचार से होता है फिर उसके आचरण से भी.
"वृक्ष का दान नदी के उपकार, धरती की ममता, सूरज की गरमी, चन्द्रमा की शीतलता, पक्षियों की परस्परता, पशुओं की ताक़त, बादलों का बरसकर मिट जाना, हवा का प्राण-प्राण में बहना, अग्नि का ताप और उजाला तथा आकाश का रोज़ रात को मोतियों भरा थाल लेकर जगमगाना....." ये सब वो घटनाएं हैं जो एक सुंदर लय में बंधकर सृष्टि का रूपक रचती हैं.

जीवन, प्रकृति और संस्कृति की इसी परस्परता ने मनुष्य को एक ऐसे पर्यावरण में जीने के मंत्र दिये जो हज़ारों बरसों की यात्रा में उसका संबल बने रहे. 'पर्यावरण दिवस' के निमित्त इस अनमोल थाती के आसपास ठहरकर जब हम सोचते हैं तो भीतर सवाल कौंधता है- "क्या आधुनिक विकास के साथ समय में फैली धुंध के चेहरे पर अब भी वही इबारत उभरी है जो "सर्वे भवन्तु सुखिनं, सर्वे संतु निरामया" की पवित्र कामना का उद्घोष करती रही है? क्या आज दुनिया का मानचित्र हमें वैसा ही दिखाई देता है जो हमारे पुरखों ने धरती, जल, आकाश, वायु और अग्नि की हमजोली में एक स्वस्थ, ख़ुशहाल और सुखी जीवन की तरह हमें सौंपा था?" दुर्भाग्य से हमारे पास इन सवालों के मुकम्मल जवाब नहीं हैं. यह शापित समय हमारी ही नदानियों, बेफिक्रियों, भूलों और स्वार्थों का नतीजा है. लेकिन हमारा लोक जीवन आज भी अपनी स्मृतियों को जब गाता है तो धरती से उठती सौंधी गंध पर निहाल हो उठने को मन करता है.

"क्या मुझमें नमीं के नाम पर कुछ भी न रहा? बहते दरिया के नाम पर कुछ भी न रहा?"..... ऐसा नहीं. अहमन्यता को त्यागकर ज़रा लोक के पास चलें. देखें कि समरसता की कसौटी पर उसने जीवन, प्रकृति और संस्कृति के कितने सुहाने छंद रचे हैं. प्रसिद्ध ललित निबंधकार डा. श्रीराम परिहार कहते हैं- धन्य है ईश्वर, जिसने धरती-आकाश सिरजा. तीन लोक, चौदह भुवन और पाताल बनाये. प्रकृति को रचा. मनुष्य जन्मा. मनुष्य की दृष्टि को विस्तार दिया. हृदय दिया. हृदय को भावनाओं से भर दिया. मस्तिष्क दिया. बुद्धि दी. साथ में विवेक दिया. विचारों का ताना-बाना दिया. सोच-समझ दी. हास-रूदन दिया. आलोक से जगमगाती संवेदना दी. संवेदना की संगिनी करुणा दी. वाणी को गान दिया. गान राग से, रस से, प्राणों से भर गया. यह वाक का वासंती उत्सव था. दृष्टि जहां तक पहुंची, लोक को उसकी पूरी सुन्दरता के साथ नयनों की डिबिया में बंद कर लिया.

मनुष्य ने अपने मानुष भाव का प्रकृति के साहचर्य में विस्तार किया और भावों के आकाश के नीचे व्यक्ति, समाज, देश, अंतरिक्ष, पाताल, पशु, पक्षी, लता, तरु, तृण, वन, पर्वत, नदी, नद, सर, सरिता, सूर्य, चन्द्र, बूंद, समुद्र, बादल, बिजली सबको बुलाकर उनसे आत्मीय संवाद करने लगा. वह विशिष्ट से सामान्य बन गया. वह सबमें घुल गया. वह मनुष्य से लोक बन गया.
उसके गान लोकप्रिय हो गये. मनुष्य ने धरती पर नंगे पाँव चलते हुए अनुभव किया कि यह भूमि बहुत पुण्यमयी और रसवंती है. इसका पृथ्वीलोक बहुत सुन्दर है. घुप्प अँधेरे का माथा चूमता हुआ चन्द्रमा झकझकाट हो जाता है. आकाश की कंदरा से निकलकर सूरज चमचमाता है. सुख-दु:ख दोनों यहां साथ खेलते हैं. मनुष्य ने अपनी समझ से पाया कि पसीना टपकता है, तो कर्म गौरव पाता है. पांव चलते हैं, तो दिशाओं की दूरियां कम हो जाती हैं. सारा संसार अपना लगने लगता है. करुणा रोती है, तो लोक-मंगल की अभिलाषा पुष्ट होती है. उल्लास हृदय में अट नहीं पाता, तो कंठ से राग फूटता है. लोक उसी गीत-नदी के तट पर अहोरात्र कर्मरत रहता है.
लोक बार-बार अपनी वाणी में इस दिव्य अनुभव को पुकार लगाता है. सृष्टि को प्रभु के वरदान के रूप में स्वीकार कर उसके प्रति उदार और कृतज्ञ भाव से भरा-भरा रहता है.

लोक इसीलिए अपने पुण्य-पर्वों में धरती, आकाश, वायु, जल, अग्नि को प्राथमिकता अलग-अलग घडि़यों में पूजता है. उनका आह्वान करता है. इसी तरह समाज के प्रत्येक वर्ग की सहभागिता उनके कर्मों या उनके द्वारा गढ़ी गयी वस्तुओं की उपस्थिति से ही लोक अनुष्ठान को पूर्ण करती है. प्रत्येक घर-गांव का लोक-देवता किसी तीर्थ या देवालय स्थित देव के समान ही लोकमन की आराधना का आराध्य है. वहीं लोक-देवता लोक के घर-गृहस्थी-दुनियादारी से निपजे सुख-दुःख का प्रत्यक्षदर्शी, सुखदाता, दुःखकर्ता और मंगलकर्ता है. सारे अनुष्ठानों में पावनता गोबर लिपी धरती पर ही आमंत्रित होती है. गाय का गोबर, गाय का दूध, गाय के दूध का दही, दही का घी, खेत से उपजा अन्न लोक संस्कृति के कदली खम्भ हैं. गाय माता इसी महत्ता से लोक-जीवन और लोक-संस्कृति की पोषक है.

लोक संस्कृति के प्रकाण्ड अध्येता और हाल ही पद्मश्री अलंकरण के लिए चयनित डॉ. कपिल तिवारी लोक की अपने सहज लेकिन जीवन के प्रति गूढ़ ज्ञान से भरी परंपरा को महान निधि की तरह स्वीकारते हैं. वे प्रकृति को जीने वाले लोक की हिमायत करते हुए विकास के आधुनिक मॉडल पर बेबाकी से कटाक्ष करते हैं- विकास की आधुनिक पश्चिमी परिकल्पना और क्षेत्र में गांव हैं कहां? वे उससे छूटे हुए और बाहर हैं. शहरी विकास के प्रभाव पड़े हैं, गांव पर. उपभोक्ता बाज़ार का विस्तार किया है हमने गांव में, आधुनिकीकरण नहीं. चीजें पहुंच रहीं हैं वहां, जो समर्थ हैं वे खरीद रहे हैं, उपयोग कर रहे हैं. मैं इसे आधुनिकीकरण के क्षेत्र से बाहर रखा गया समाज कहता हूँ, आप कहते हैं आधुनिकता का असर पड़ रहा है. समय और जीवन, जीवन की परम्परा कोई ठहरी हुई स्थिर चीज़ नहीं है. ग्रामीण क्षेत्रों में भी जीवन बदलता है, समय बदलता है, ढंग बदलते हैं. भारतीय लोक अपनी प्रकृति और विरासत को हर परिवर्तन के साथ ढाल लेता है और उसे गतिशील रखता है. उसकी जिजीविषा और रचने की क्षमता अकूत है. वह जीवन से शिकायत नहीं करता.
आधुनिक फैशन के कपड़े पहनने से क्या कोई आधुनिक हो जाता है? आधुनिक होना चेतना और विचार से होता है फिर उसके आचरण से भी. मैं आधुनिक कपड़े पहने हजारों पिछड़े दिमाग, सामंती और मध्यकाल में रहने वाले लोगों को देखता हूं.
कपड़े बदले चेतना नहीं, भाषा बदली विचार नहीं, समय बदला मानस नहीं, जीवन बदला समझ नहीं. इस आधुनिकता पर आपने कभी सोचा है? अपनी परम्परा और सांस्कृतिक मूलाधारों से कटा हुआ, व्यक्ति आधुनिक नहीं है. हमें आधुनिकता चाहिये नकलचीपन नहीं, हमें आधुनिक चाहिये. पश्चिम का गुलाम नहीं जो आज अभिजन भद्र गर्व से जीता है.

भारत ने अपने लोक की आधुनिकता पर विचार ही कहां किया है? हम तो मान लेते हैं जो ग्रामीण है वह भदेस है, पिछड़ा है, पारम्परिक है, अंधविश्वासी है, सामंती है, मूढ धार्मिक है, अशिक्षित है, अवैज्ञानिक है, रूढि़यों से चिपटा है और मध्यकालीन अंधकार युग में है. हमें उसे शिक्षा और आधुनिक वैज्ञानिक समझ देना है. क्या अपने जनजातीय और ग्रामीण लोक समाजों के साथ यही व्यवहार नहीं हो रहा है? क्या हम इन सभी लोगों के प्रति दूसरी श्रेणी के नागरिक का व्यवहार नहीं करते हैं? उधार के आधुनिक, लोक समाजों को भी अपनी ही तरह का आधुनिक बनाना चाहते है. भारतीय अभिजन और शिक्षित मध्यवर्ग इनके विकास की योजनाएं बनाता है- उधम करता रहता है कि ये सभी लोग किसी प्रकार देश की मुख्यधारा में आ जायें. मुख्यधारा वह है जिसमें ये हैं. दूसरों को उसमें आना चाहिये. विकास यह है जो इन्होंने पश्चिम से सीख लिया है जो पश्चिम के लिए ठीक है, हमारे लिये वही पर्याप्त है. ये एक जनजातीय और ग्रामीण व्यक्ति से पूछना तक जरूरी नहीं समझते कि उसकी दृष्टि में विकास क्या है? विकास की उसकी प्राथमिकताएँ क्या है? ये भारतीय समाज का विकास तय करते हैं, जीवन की मुख्यधारा तय करते हैं और इनकी मुख्यधारा को पश्चिम यूरोपीय देश और अमेरिका तय करते हैं. केवल प्रकृति का पर्यावरण आज असंतुलित नहीं हुआ है, मानव प्रकृति में भी पर्यावरण गड़बड़ा गया है. अब सर्जना और प्रकृति के संबंध में चले आते संबंध, अर्थात् प्रकृति की प्रेरणा से रचना का संबंध टूट गया है, क्योंकि मनुष्य प्रकृति के साथ परस्परता, साहचर्य और सम्मान के भाव और संबंध के बजाय प्रकृति से लड़ने और प्रकृति को जीतने के उन्माद से भर गया है. ऐसी स्थिति में प्रकृति देने वाली शक्ति के बजाय अपने स्वार्थ के लिए दोहन करने की चीज़ में बदल जाती है.

कितनी खूबसूरत बात है कि लोक जीवन, पर्यावरण को अपने परिवार, समाज और पूरे जीवन के अंतरंग तथा बहिरंग का हिस्सा मानता रहा है. उसके मूल्य, विश्वास, आस्था, श्रद्धा और सांस्कृतिक परंपराओं में प्रकृति तथा पर्यावरण से उसके गहरे रिश्तों के सुरीले साक्ष्य मिलते हैं. भारत के तमाम जनपदीय गीतों में सूरज, चाँद, आसमान, बादल, पंछी, धरती समंदर, नदी, वनस्पति, पशु-पक्षी और जंगलों से आत्मीय संवाद हैं. कालिदास के 'ऋतु संहार' से लेकर भूपेन हजारिका के असमिया गीत- "ओ गंगा बहती हो क्यों" और तुलसी की रामचरित मानस के किष्किंधा काण्ड के पावस वर्णन से लेकर निमाड़ी गीत "रिमझिम रिमझिम मेहुरो बरसे सावन महीनों आयो जी" तक सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना पर्यावरण के संदेशों से सुगंधित है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: June 5, 2021, 5:10 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर