रज़ा शताब्दी वर्ष: सौ की संधि पर शून्य का चितेरा

भारत हमेशा उनकी कला और दिल के करीब रहा. उनके प्रमुख चित्र अधिकतर तेल या एक्रेलिक में बने परिदृश्य हैं जिनमें रंगों का अत्यधिक प्रयोग किया गया है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 15, 2021, 8:34 PM IST
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रज़ा शताब्दी वर्ष: सौ की संधि पर शून्य का चितेरा
भारत हमेशा सैयद हैदर रजा की कला और दिल के करीब रहा.
लगभग आधी सदी तक फ्रांस में अपना जीवन गुज़ारने वाले सैयद हैदर रज़ा की कुछ साल पहले ही अपने वतन (भारत) वापसी हुई थी. वे दिल्ली में बस गये थे. काया थकी, पर चौरानवे की उम्र के आखि़री लम्हों तक रंग और कूची की सोहबत न छूटी थी. यक़ीनन मन के केनवास पर किसी स्मृति चित्र को उकेरते हुए ही उन्होंने अंतिम सांस ली होगी. जीवित होते तो रज़ा उम्र का सैकड़ा पार कर रहे होते. यह साल उनकी शताब्दी की घोषणा है.

नर्मदा के किनारे म.प्र. के मंडला जिले की सरहद में बसा बबरिया देहात रज़ा की जन्मभूमि है. 22 फरवरी 1922 को इसी बुंदेली माटी में हैदर ने पहली किलकारी भरी. अपने साधारण परिवार की सीमित आमदनी और संसाधनों के बीच रज़ा का लड़कपन बीता. लेकिन जीवन को तरतीब से जीने के जो सबक अपने वालिद और गुरू से उन्हें मिले, ताउम्र रज़ा उन्हें सिर- आंखों थामे दुनिया की उड़ान भरते रहे. उम्र के एक मुकाम पर रज़ा ने अपने गांव की चौहद्दी लांघी. मुंबई गए और वहां से दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कला से आंख मिलाते फ्रांस (पेरिस) की ओर रूख किया लेकिन बबरिया, मंडला, दमोह की मटियारी यादें सदा सीने से चिपकी रहीं.

सेंट्रल प्रॉविंस में मंडला के डिप्टी रेंजर रहे सैयद मोहम्मद रज़ा के इस होनहार बेटे ने 12 साल की उम्र में ही कूची थाम ली थी. बबरिया के स्कूल में ब्लेकबोर्ड पर चाक से बिंदु बनाए जाने के बाद उसे दिनभर देखने की शिक्षक से मिली सजा ने उन्हें अमूर्त (बिंदु चित्रकारी) का बड़ा नाम बनने के बीज बो दिए.

भारत हमेशा उनकी कला और दिल के करीब रहा. उनके प्रमुख चित्र अधिकतर तेल या एक्रेलिक में बने परिदृश्य हैं जिनमें रंगों का अत्यधिक प्रयोग किया गया है. इन चित्रों में भारतीय ब्रह्माण्ड विज्ञान के साथ-साथ दर्शन के चिन्ह भी दिखाई देते हैं. रज़ा को 1981 में पद्मश्री तथा 2007 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. 10 जून 2010 को वे भारत के सबसे महंगे आधुनिक कलाकार बन गए जब क्रिस्टी की नीलामी में 'सौराष्ट्र' नामक एक चित्र 34,86,965 डॉलर में बिका था.
वे हर साल वसंत में खूशबूदार मौसम की तरह भारत की धरती पर नमूदार होते. अपनी सरज़मी की धूल को माथे पर लगाने गांव जाते. नर्मदा का सुरम्य किनारा और बुंदेलखंड का सौंधा अहसास जीकर रज़ा की धमनियों का रक्त गाढ़ा हो जाता. जाते-लौटते वे भोपाल रूकते. नए कवि-चित्रकारों से मिलते. उनकी पीठ पर शाबासी की मोहर लगाते. हम उम्रों से गपियाते और अपनी नई-पुरानी कलाकृतियों में कौंधते रंगों के रहस्यों पर चर्चा करते. भोपाल से उनकी मैत्री अंत तक कायम रही. बड़े-छोटे सभी आयु के कलाकार-साहित्यकार उनकी दोस्ती में बिंधे रहे. अपनी कलाकृतियों की बिक्री से कमाई पूंजी का एक हिस्सा उन्होंने म.प्र. कला परिषद में जमा किया और युवा कविता तथा चित्रकला के लिए रजा पुरस्कार की स्थापना की. कला के मरकज़ भारत भवन में उनकी अनेक चित्रकृतियां संग्रहित हैं.

....क़रीब चौबीस बरस पहले की यह एक सर्द सुबह थी. फरवरी का महीना. रज़ा अपना जन्मदिन मनाने भारत आए थे. भोपाल के हॉटल जहांनुमा में मेरी उनसे हुई बातचीत में जैसे पूरा जीवन ही खिलखिला उठा था. बचपन की स्मृतियों से लेकर फ्रांस तक का सफर किया. अपनी कला के गूढ़ रहस्यों में समाये जीवन बोध से लेकर मौजूदा दौर की बनती-बिगड़ती सांस्कृतिक तस्वीर पर उनकी चिंताओं से बावस्ता होने का वह दुर्लभ अवसर था.

रज़ा का मानना था कि दस-बारह साल की जि़ंदगी में लगता है जैसे लाइफ इज़ स्टाप्ड आउट. बाद में हम इस बात को भूल जाते हैं. मगर फिर अगर सालों बाद हम अपने बचपन की ओर जाएं तो ऐसा लगता है कि जो कुछ भी इस समय हुआ है, सारी जिंदगी वहीं ठहरी लगती है. जो भी चित्र मैंने बनाए हैं, उसी बचपन का क्रिस्टलाइजेशन है, या उसका नतीजा है. बिन्दु से सिंधु या अंधरे से उजाले की ओर खुलते रज़ा के चित्र आत्मा का यही तो आलाप हैं.रज़ा बताते कि बम्बई से मुझे डर लगता था मैं तो दमोह से बाहर गया ही नहीं था और बम्बई में आया देखा बड़ी-बड़ी बिल्डिंग है. जब पेरिस में गया तो, उस वक्त सत्ताईस बरस की उम्र थी कॉन्फिडेन्स कुछ बढ़ गया था और पेरिस मुझे बहुत पसंद आया. हमेशा पेरिस के अपने कमरे में ऐसा ही लगता है मुझे कि मैं देश में हूं. मैं कहीं नहीं गया. मैं हमेशा कहता हूं कि मैं यहीं रह रहा हूं. मानिये, मैं कहीं नहीं गया. इट टेक्स एट अवर टू फ्लाई ओवर. इट इज एक्सट्रीमली शॉर्ट. मगर दि इमेज एण्ड वेल्यूस ऑफ इण्डिया इन माई हार्ट, आई एम वर्किंग. देश में कई लोग इन चीजों को भूल भी जाते हैं.

रज़ा का मानना था कि आजकल के भारतीय कलाकार युवा या हमारी पीढ़ी के यह देखें कि भारतीय कला एक ऐसे स्तर पर पहुंच गयी है कि जहां पर वह स्वतंत्र है. अब हम लोग इंटरनेशनल कांसेप्ट की कॉपी नहीं कर रहे है. उसके प्रिंसिपल को समझकर हम कुछ नयी बात करना चाहता हैं. विश्वास कीजिये कि जो महत्वपूर्ण चित्रकार हैं आजकल भारत के, वे इतना सुन्दर काम कर रहे हैं जो कि दुनिया के किसी भी बड़ी म्युजियम में प्रदर्शित किये जा सकते हैं, गर्व से. अब जो खोज हो रही है कुछ दिशा में, कुछ सेक्टर्स में वह यही है अध्यात्मिक खोज. मानिये यह मार्ग बहुत ही कठिन हैं. हमारे विद्वान हिमालय की ओर जाते थे दुनिया को छोड़कर और वहां पर या तो मेडिटेशन करते थे या पूजा करते थे या लिखते थे. उसी प्रकार से हो सकता है कि आजकल इस डायरेक्शन में, इस दिशा में कुछ काम किया जाये हालांकि इस दिशा में भारत में शुरूआत हुई है. मैं कहूंगा इस बारे में. मेरे मित्र गायतोण्डे बहुत ही महत्वपूर्ण चित्रकार हैं और उन्होंने इस दिशा में काम किया है. दूसरी ओर अन्य चित्रकार काम कर रहे हैं जो नसरीन मोहम्मदी ने काम किया है, युसुफ कर रहे हैं. सीमा घुरैया से मिला, चित्र देखा, सुन्दर चित्र है. उनकी निजी आध्यात्मिक खोज है ऐसा मुझे लगता है कि यह काम हो रहा है और मैंने खुद ऐसी कोशिश की है पिछले साल अधिकतर मैंने ब्लैक एण्ड व्हाइट, व्हाइट एण्ड ऑफ व्हाइट चित्र बनाये हैं. एक बिन्दु भी, प्योर श्वेत बिन्दु जिसको कि यहां मैंने शान्ति कहा है या शान्ति बिन्दु कहा है, मैं यह नहीं सोच रहा हूं कि ये बिकेंगे या न बिकेंगे, किसको पसंद आयेंगे, इस दिशा में काम हो रहा है. और अगर मुझे शब्दों पर काबू होता तो मैं इसके अलावा, चित्रों के अलावा उसके बारे में कुछ कह सकता.

रज़ा कहते कि मेरे ख्याल से चित्रकार या कवि हमारे आज के कठिन समय के बारे में बहुत कुछ सोच सकते हैं. मेरे ख्याल से वो इसके लिए पूरी ओर से समर्थ हैं आज कल तीन प्रश्न होते हैं-यूरोप से देखा जाए. वहां पर पहला ऑब्सेशन है, पैसा. दूसरा है पॉवर और तीसरा है सेक्स. ये तीन मोटीवेशन्स हैं जिससे सत्यानाश हो रहा हैं जो अध्यात्मिक खोज थी वह पीछे रह गई है. जो आइडियालिज्म है, वह भी पीछे रहा गया है. यूरोप में नहीं, यहां भी हो रहा है. मगर भाग्य से कुछ लोग हैं जो उसके बारे में सोच रहे हैं, काम कर रहे हैं और आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए मैं यही कहूंगा कि कुछ चित्रकार मैं भी उनमें से हूं, जो अध्यात्मिक खोज को सबसे अधिक महत्व दे रहे हैं.

देश की मिट्टी से दूर रहा, महक से नहीं
प्रख्यात चित्रकार सचिदा नागदेव चालीस साल पुरानी यादें साझा करते हुए बताते कि मेरी और मेरे चित्रकार दोस्त सुरेश चौधरी की आर्ट एग्जीबिशन जहांगीर आर्ट गैलरी में चल रही थी. अचानक गेट से ही रजा साहब और उनकी पत्नी आते दिखे. वे मेरे गुरू और भीमबैठका की खोज करने वाले विष्णु श्रीधर वाकणकर के घनिष्ठ मित्र भी थे. उन्होंने एग्जीबिशन देखी. फिर हमसे बात की. हमने कहा-रज़ा सर आप मुंबई आते हो वापस चलते जाते हो, भोपाल में कला को लेकर काफी गतिविधियां चल रही हैं. आएंगे तो नए कलाकारों को मार्गदर्शन मिलेगा. उन्होंने तपाक से कहा कि आप बुलाओगे तो हम आ जाएंगे भाई. तभी हमने कहा-हम आपको अभी आमंत्रित करते हैं. यह जानकारी भोपाल कला परिषद में अशोक वाजपेयी को दी, जो उस वक्त कला परिषद के सचिव थे. एक महीने बाद ही रजा साहब भोपाल आए. कला परिषद में उनका लेक्चर हुआ और कविता पाठ भी. यह उनकी भोपाल में पहली यात्रा थी और मध्यप्रदेश से दोबारा जुड़ने की भी. फिर उनका अक्सर भोपाल आना-जाना लगा रहा. उनकी एग्जीबिशन जब कला परिषद में होनी थी, तब हम रात को उनकी पेंटिंग के फ्रेम तैयार करने में जुटे थे. एग्जीबिशन के बाद वे मेरे घर गए. हमारा भीमबैठका जाने का प्लान हुआ. हमने उनसे पूछा कि क्या खाएंगे? उन्होंने कहा कि पेरिस में पूड़ी-सब्जी बहुत मिस करता हूं. उनके लिए पूडी-भाजी बनाकर हम भीमबैठका पहुंचे. वहां उन्होंने कविताएं सुनाई और मैंने गाना. उन्होंने कहा कि मैं इस मिट्टी से दूर रहा, लेकिन उसकी महक से नहीं. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: March 15, 2021, 8:32 PM IST
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