World Music Day: सुर के बिना जीवन सूना

जयपुर के मशहूर ग़ज़ल गायक अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन ने आप बीती साझा करते हुए कहा था- "हम दोनों भाइयों को भी अपने बेटे-बेटी की मौत का कहर झेलना पड़ा. हमने सुरों की उंगली थामी और फिर जि़ंदगी की राह पर क़दम बढ़ाए...". यादें मौसिकी में बदल गयीं.

Source: News18Hindi Last updated on: June 21, 2021, 11:39 AM IST
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World Music Day: सुर के बिना जीवन सूना
इस वर्ष के वर्ल्ड म्यूजिक डे साथ पंडित रविशंकर का जन्म शताब्दी वर्ष भी जुड़ रहा है.


विश्व संगीत दिवस के बहाने जब दुनिया के सांगीतिक परिदृश्य पर हमारी निगाहें जाती हैं, तो भारतीय संगीत की विश्वजनीन स्वीकृति और लोकप्रियता पर एक बार फिर फ़क्र होता है. दरअसल हमारा संगीत- जीवन, प्रकृति और संस्कृति की परस्परता में मनुष्यता को पुकारता है. वह एक यूनिवर्सल ट्रुथ है. सात सुरों की गुरुता और गंभीरता को हमारे संगीत मनीषियों ने बरसों की साधना और चिंतन के बाद समझा. उनके दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्षों के साथ जीवन की आंतरिक लय को जांचा-परखा और एक सुरम्य राग परंपरा की विरासत अपने आने वाली नस्लों को सौंपी.

इस सुरीली सम्पदा के आसपास भाव और रास का ऐसा सागर उमड़ा कि संगीत, सुर-ताल और लयकारी के सुन्दर तानेबाने के साथ आत्मा की औषधि बन गया. उसकी इसी खासियत और अहमियत का परिचय लिए जब समंदर पार के मुल्कों में हमारे संगीतकारों ने प्रवेश किया तो भौतिक सुखों के उथले आनंद में गाफिल परदेसियों की बुझी हुई रूहों को जैसे कोई मरहम मिल गया. न तो ये अलहदा से स्वर थे, न उनकी ऊर्जा अलग थी लेकिन उनकी गहराई में मौजूद नाद को अपनी आत्मा में पा लेने की साधना और शैली का असर ही कुछ ऐसा है कि तमाम बेचैनियों और अशांति के गुबार को पोंछकर एक पवित्र कि प्रतिष्ठा वहां संभव हुई.

संगीत की विधाएं और श्रोताओं का आकर्षण
दस्तस्वेज़ बताते हैं कि ध्रुपद को डगर घराने के वंशजों ने बहुत पहले अमेरिका जाकर अपनी तान का तिलिस्म जगा दिया था. बाद के बरसों में पंडित रविशंकर, उस्ताद अली अकबर खां, अल्लारखा, अमजद अली, ज़ाकिर हुसैन, पंडित जसराज और अनेक संगीतकारों ने भारतीय संगीत कि ध्वजा विदेशों में फहराई. संयोग ही है कि इस वर्ष के वर्ल्ड म्यूजिक डे साथ पंडित रविशंकर का जन्म शताब्दी वर्ष भी जुड़ रहा है. उनके योगदान को कई तरह से याद किया जा रहा है.

सिर्फ शास्त्रीय संगीत ही नहीं संगीत की अन्य विधाओं के प्रति भी विलायत के संगीत प्रेमियों में ख़ासा आकर्षण है. यहाँ का लोक संगीत, सूफी संगीत और फिल्म संगीत भी घनी चाहत के साथ दुनिया भर में सुना जा सकता है. भारतीय संगीत के विभिन्न आयामों पर शोध, अध्ययन और सृजन की नयी दिशाएं खुली हैं.


सुखद आश्चर्य होता है कि अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की वरिष्ठ शोधार्थी लिंडा हेस कबीर कि पारम्परिक लोक गायिकी पर शोध करने भारत आती हैं और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल में लम्बा प्रवास करती हैं. संगीत के इतिहास के पृष्ठ पलटें तो मंदिरों में प्रार्थना कि विधियों के साथ प्रयोग में लाये गए स्वरों के इस माध्यम को बाद के बरसों में राज दरबारों में नया पोषण मिला. संगीत प्रेमी राजाओं और शासकों ने कलाकारों को पनाह दी. उनका मान बढ़ाया और इस तरह संगीत भी नए प्रयोगों के साथ फला -फूला. तानसेन जैसा विलक्षण गायक कला के कद्रदान अकबर के राजदरबार नवरत्नों में शामिल किया गया. फिर अलग-अलग इलाकों-शहरों और संगीत इस तरह अमरबेल की तरह फैलता गया.आकाशवाणी के साथ संगीत का सफर
बीसवीं सदी के चालीस के दशक में भारत में आकाशवाणी का आगमन हुआ तो अनेक संगीतकार रेडियो से जुड़ गए.  पंडित ओंकारनाथ ठाकुर से लेकर उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खां तक अनेक नाम गिनाये जा सकते हैं. ये नयी तकनीक का ज़माना था अहन से सात सुरों को उड़ान के नए पंख मिले. एक विस्मयकारी नए विश्व का उद्घाटन हुआ. ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स कस्सेट्स, सीडी और अब बेशुमार डिजिटल मीडियम ने तो जैसे संगीत कि दुनिया में क्रांति ही कर दी है. संगीत विषय ही ऐसा है कि हर श्रोता या रसिक को अपनी तरह से सम्मोहित करता है. अनेक फिल्में संगीत की कथाओं का आधार लेकर बनीं जिनमें संगीत 'सम्राट तानसेन' और 'बैजू बावरा' से लेकर 'कटियार काळजात घुसली' तक दर्जनों शीर्षक हैं.  टीवी पर संगीत के रिअलिटी शोज़ की गिनती नहीं है.

साहित्यकारों की कलम भी संगीत से अछूती नहीं रही है. निराला, महादेवी जैसे छायावादी कवियों से लेकर अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल और हेमंत देवलेकर जैसे आधुनिक रचनाकारों की अनेक कविताओं में सरगम की अनुगूंजों के अलौकिक अहसास गहरे तक रचे-बसे हैं.


अभी चार बरस पहले हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार संतोष चौबे का उपन्यास 'जलतरंग' ख़ासा चर्चा में आया. भारतीय शास्त्रीय संगीत की यात्रा में लय होते जीवन के आरोह-अवरोह को बड़ी ही खूबसूरती से उन्होंने नयी बहस के साथ इस कृति में चित्रित किया है. भारतीय ज्ञानपीठ से छापकर आयी यह किताब दरअसल संगीत और शोर के बीच ठहरे जीवन के द्वन्द का दस्तावेज़ है. बहरहाल सच्चे संगीत की कसौटी यही है कि वह आत्मा के आसान पर उस भाव की प्रतिष्ठा करे जो मनुष्यता के उत्कर्ष की पवित्र कामनाओं से भरा हो.

संगीत और दिव्‍य अनुभूतियों का शिखर
स्वर के साथ एक अविरल, अंतहीन, अटूट सिलसिला जो उनकी आत्मा में लयबद्ध होता, उन्हें दिव्य अनुभूतियों के शिखर पर ले जाता. वे राग-स्वरों से रिश्ता बनाती संवेदनाओं की अतल गहराइयों में उतरतीं. उस परमतत्व की तलाश करती जहाँ अहंकार और विकार की मलिनता का प्रक्षालन संगीत के पावन स्वरों से होता. संगीत उनके लिए ईश्वर था और रंगशाला एक मंदिर की तरह जहाँ वे स्वर की जोत जलाकर विराट को पुकारती. इच्छा होती कि सुर से आगे निकल जाऊँ!

संगीत विदुषी, गान सरस्वती किशोरी आमोणकर की साधना का सच यही था. उन्हें इस वक़्त याद करने का प्रयोजन उनकी जन्म और महाप्रयाण की तारीख़ों से परे एक ऐसा शुभ प्रसंग है, जब सारी दुनिया सात सुरों के आसपास मानवीय करूणा और कल्याण की कामना लिए प्रार्थना के पवित्र भावों से गूँज उठती है.


विश्व संगीत दिवस (21 जून) के निमित्त किशोरी आमोणकर की स्मृति संगीत के उस ज्ञान-ध्यान से भी जुड़ने को विवश करती हैंं, जहाँ सतही दिल-बहलावे से उपर सात सुरों की महिमा के कुछ अलहदा से मानवीय अर्थ हैं. तालीम और तपस्या का ही प्रताप है कि संगीत में स्वर की उस उर्जा को हासिल करना साधकों के लिए  मुमकिन हो सका है जहाँ प्रकृति के कण-कण को महसूसा जा सकता है. घर्षण, मिश्रण और प्रदूषण के इस दौर में जब सारी दुनिया बेसुरे समय और कोलाहल के बीहड़ में जीने को अभिशप्त है, संगीत की मीठी अनुगूँज और गतिमय स्वर लहरियों का धड़कन बनकर धमनियों में उतर जाना कितना सुखकर है.

आत्मसमर्पण की गहरी अनुभूतियों में डूबे साधक
संगीत के वज़ूद और उसकी अपार शक्ति पर कुछ कहना समंदर को अंजुरि में समेटने की तरह है. लेकिन तल्लीनता और आत्मसमर्पण की गहरी अनुभूतियों में डूबे साधकों की सुनें तो अनहद का रास्ता आनंद के शिखरों की ओर खुल सकता है. इन शिखरों पर हमारी ख़ुद से पहचान होती है. किशोरी अमोणकर ने एक साक्षात्कार में यही तो कहा था- "मैं स्वर के ज़रिये अपनी आत्मा के रहस्य को बूझने का जतन करती हूँ. वो आत्मा जिसका नाता ब्रह्म से है. जब तक देह है, सुर हमारा है. हमारी मृत्यु के बाद भी वह इस संसार में रहेगा. सन्नाटा मेरे जीवन में है ही नहीं क्योंकि सन्नाटे का भी सुर है और सुर हमेशा मेरे पास है".

संगीत के आध्यात्मिक चिंतन को व्यवहार से जोड़कर देखें तो सारा जगत स्वर, लय और ताल से आन्दोलित होता दिखाई देता है. सारा अस्तित्व एक निश्चित आरोह-अवरोह में बंधा है. दरकार बस उसे सुनने और रूह से उसका राब्ता जोड़ने की है.


इंग्लैण्ड की एक प्रयोगशाला है-दिलाबार. वहाँ संगीत को लेकर कई आश्चर्यजक प्रयोग किये गये. बताते हैं कि स्वरों के कुछ विशेष प्रभावों से वहाँ बेमौसम फूल चटखने लगते हैं. फलों से डालियाँ झूलने लगती हैं. वृक्ष दोगुनी गति से बढ़ने लगते हैं. यही नहीं, माँ के गर्भ में बच्चा परिपुष्ट होने लगता है. संगीत का असर ऐसा कि धातु को सुरों के संपर्क में लाएं तो जंग नहीं लगती. दरहकीक़त संगीत के स्वर में सम्मोहन है. जब आदमी की ताक़त कमज़ोर पड़ने लगती है तो स्वर को पुकारा जाता है और धमनियों में खून दौड़ने लगता है. यही वजह है कि स्वर को हमारे यहाँ इबादत का सबसे सुगम ज़रिया माना गया है.

और बेटे की जुदाई की यादें मौसिकी में बदल गयीं...
कैंसर पीडि़तों का दर्द कम करने के लिए वाइसेस ऑफ हॉस्पिसेस नामक अंतरराष्ट्रीय संगठन पेलिएटिव केअर दिवस पर संगीत सभा का आयोजन करता है. एक दफा इस महफिल में शिरकत करने आए जयपुर के मशहूर ग़ज़ल गायक अहमद हुसैन-मोहम्मद हुसैन ने आप बीती साझा करते हुए कहा था- "हम दोनों भाइयों को भी अपने बेटे-बेटी की मौत का कहर झेलना पड़ा. हमने सुरों की उंगली थामी और फिर जि़ंदगी की राह पर क़दम बढ़ाए...". यादें मौसिकी में बदल गयीं.

अनुभव कहता है कि पूजा से कई गुना प्रभावशाली ध्यान है. ध्यान से कई गुना प्रभावशाली जप है और जप से कई गुना महिमाशाली गान है. अचानक कोई सुर लग जाता है और जीवन गुनगुना उठता है. सरहदों के फासले संगीत के दामन में सिमट आते हैं. सरगम की सचाई तो यही है कि रूह गाती है और रूह ही सुनती है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: June 21, 2021, 11:57 AM IST
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