विश्व रंगमंच दिवस: कभी न थकने वाला कारवां

समाज से सीधे आंख मिलाकर बात करने का एकमात्र ज़रिया नाटक ही है जिसे तत्काल समाज अपनी प्रतिक्रिया भी लौटाता है. नाटक एक ऐसा दर्पण है जिसमें हमारे समय के अंधेरे उजालों के अक्स बहुत साफ नुमाया होते हैं. ऐसा ईमानदार आईना, जो सच्ची राहों पर चलना सिखाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 27, 2021, 11:31 AM IST
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विश्व रंगमंच दिवस: कभी न थकने वाला कारवां
27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस के रूप में मनाया जाता है.
मौका और मंज़र तो कुछ ऐसा है कि सरहदों तक फैली दुनिया का रंगमंच सकते में है. पहले सी आज़ाद सरगर्मियां अब नदारद है. कहीं प्रेक्षागृहों में सन्नाटा पसरा है, तो कहीं दबी हुई कसकों से फूटता आधा-अधूरा उत्साह. तमाम निर्देशों और बंदिशों के बीच कलाकार और दर्शक बस यह इशारा कर रहे हैं कि रंगमंच पर नाटक की सांसें अभी बाकी है. मरे नहीं है उसके ख़्वाब. इंसानियत की आवाज़ों को जज़्ब करता वह हर हाल में जि़ंदा रहेगा. महामारी ने दुश्वारियों का पहाड़ सा खड़ा कर दिया है. कला के परिसरों में भी अवसाद गहराया है लेकिन रंगमंच की चौखट पर चैन की तलाश लिए बांवरे कि़रदारों की धड़कनें मानों ये कहती हैं- "मंजि़ल मिले, न मिले इसका ग़म नहीं/मंजि़ल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है". विश्व रंगमंच दिवस (27 मार्च) इस दफा जिन मुश्किलातों के बीच आया है उस मुहूर्त में साहस और उम्मीद को बटोरने और सफ़र जारी रखने की शुभकामना ही दी जा सकती है.

समाज से सीधे आंख मिलाकर बात करने का एकमात्र ज़रिया नाटक ही है जिसे तत्काल समाज अपनी प्रतिक्रिया भी लौटाता है. नाटक एक ऐसा दर्पण है जिसमें हमारे समय के अंधेरे उजालों के अक्स बहुत साफ नुमाया होते हैं. ऐसा ईमानदार आईना, जो सच्ची राहों पर चलना सिखाता है. यही खासियत उसे दुनिया से जोड़ती है और जि़म्मेदार भी बनाती है. तभी तो हमने अपने समय में रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर पीएल देशपाण्डे, विजय तेंदुलकर, बादल सरकार, इब्राहिम अल्काज़ी, सफदर हाशमी, हबीब तनवीर, बीवी. कारंत, पणिक्कर, नीलम मानसिंह चौधरी, छाया गांगुली, रतन थियाम, एमके रैना, बंसी कौल, नादिरा बब्बर और वामन केन्द्रे जैसे जीवट और जुझारू रंगकर्मियों को विश्वरंगमंच पर स्थापित होते देखा है.

दरअसल जीवन और रंगमंच के चेहरे में कोई फ़र्क नहीं हैं और दोनों को ही दृश्य तथा भाषा की परिधियों में सिमटकर समझना सदा एक अधूरा रहा है, लेकिन उसके रहस्यों, कौतुहलों और जिज्ञासाओं से गुजरना और उससे एक प्रीतिकर रिश्ता बनाने की ललक सदा से रही है. यही वजह है कि समाज को रंगमंच की और रंगमंच को समाज की जरूरत बनी रहती है. यह अनटूटी और आत्मीय परस्परता ही दोनों के अस्तित्व को बचाए हुए है. तमाम जद्दोजहद के बाद भी जि़द और जीजिविषा बाक़ी है.

रंगमंच का क्षेत्र, उसकी व्याप्ति और प्रभाव बड़ी ही सघन और गहरी पैठ लिए होते हैं. वह व्यक्ति के समूचे जीवन को, उसकी कार्यवाहियों को, आंसू और मुस्कुराहटों को अपने समय की तमाम हलचलों को, स्थान तथा समय की स्वाधीन चेतना में घेरता है. प्रेक्षकों के बीच स्वाभाविक अंतर्क्रिया की संभावना टटोलता है. रंगमंच के खुले फलक पर नाटक अपनी इसी संभावना के कारण सदा गतिशील रहा है.
दुनिया में जो कुछ भी घट रहा है, नाटक के दायरे से बाहर नहीं, इसीलिए संसार को एक सूत्र में बांधने की कुव्वत आखि़रकार नाटक में ही है. वहां विचार और कला के लेन-देन का खुला व्यापार है. उसकी इसी लोकतांत्रिक ताक़त का तक़ाजा है कि वह (नाटक) एकांतिक साधना में भरोसा नहीं करता. समूह से उसका विचार अँखुआता है, समूह में खिलता है और समूह को ही समर्पित होता है. कालिदास ने नाटक को 'चाक्षुष यज्ञ' कहा है. यानि आंख जो देखती है, शब्द उसका अनुमोदन करते हैं और इस प्रकार नाटक का शब्दिक रूप और रंगमंच पर गढ़ा स्थूल बिंब जीवन की एक जीती-जागती तस्वीर खड़ी कर देते हैं. यहीं पर विचार और मनोरंजन के बीच एक दिलचस्प पुल का काम नाटक करता है. उसी दिलचस्पी के साथ जुड़े होते हैं नेपथ्य से लेकर मंच तक कई प्रकट और ओझल किरदार जिनकी प्रतिभा, पुरूषार्थ और परिश्रम से नाटक अंततः एक जीवंत तस्वीर और तासीर में तब्दील होता है.

इस विपरीत समय में जब रूपहले परदे की रंगत, टीवी चैनलों की झिलमिलाहट और तमाम तकनीकी-सेटेलाइट उपकरणों की सरसराहट ने हमारी संवेदनाओं को अपनी मुठ्ठी में कैदकर लिया है. पल भर में जहां हो, जैसे हो, की हालात में हथेली पर मनमाफिक अवतरित करने की दावेदारी हो, तब रात-दिन रेशा-रेशा खटते हुए पथरीली राहों से गुजरने वाले कि़रदारों की फितरत बेमानी लग सकती है. लेकिन इसी बीहड़ में नाटक अपने होने और होते रहने के हौसले हारा नहीं है. उत्तर आधुनिकता के चंगुल से उसने अपना दामन काफी हद तक बचाए रखा है और नई चुनौतियों से आंख-मिलाते हुए उसके क़दम आगे बढ़ रहे हैं. कारंतजी ठीक कहते थे- 'नाटक कभी मरता नहीं, कभी-कभी सो ज़रूर जाता है.'

यह दौर मीडिया की महिमा का है. होड़ का है; रिझाने का है. वर्चस्व का है. और इन सबके केन्द्र में है-अवाम. समाज से रिश्ता बनाने और उसे अपने समय, जीवन और तमाम सरोकारों के प्रति सजग-संवादी बनाए रखने के अनेक नए इज़ाद हो चुके ज़रियों पर लंबी जिरह की गुंजाइश है, ऐसे में नाटक या रंगमंच जैसे अत्यंत आदिम या पारंपरिक माध्यम की उपयोगिता को या उसकी भूमिका को अथवा उसकी बनती-बिगड़ती या बदलती तस्वीर पर भी विमर्श की जगह तो बनती ही है.
सवाल ये है कि जनता का यह माध्यम आज कितना प्रतिबद्ध और दायित्व से भरा रहा गया है? थोड़ा पीछे जाकर पड़ताल करें. भारतीय नाट्य सृजन और उनके मंचन की परंपरा से हमारा जीवन-दर्शन जुदा नहीं रहा. हमारे जीवन का सौन्दर्य बोध और लीला का संसार पूरी तरह रंगमंच पर मुखरित होता रहा है. भारतीय रंग परंपरा में यह तत्व आज भी बुनियादी खासियत बना हुआ है. नाट्य शास्त्र के रचनाकार आचार्य भरतमुनि ने नाट्य को कलाओं का समग्र अनुभव कहा है. संस्कृत नाटक और उनके प्रदर्शन की परंपरा से लेकर आज वैश्विक प्रभावों के साथ मंचित हो रहे आधुनिक भारतीय नाटकों के प्रयोग तक कलाओं की रचनात्मक नातेदारी या कहे जरूरी लेन-देन को लक्ष्य किया जा सकता है. निश्चय ही यह आग्रह इसलिए बरकरार है कि नाटक की कसौटी अंततः उसका मंचन है जो सीधे जनता के बीच जाकर उसकी आवाज़ में आवाज़ मिलाता है. एक ऐसा माध्यम जो कलाकारों के लिए इम्तिहान है और उसके सैकड़ोंझ़ारों लाखों (दर्शक) परीक्षक हैं. जाहिर है कि उसकी साज-सँवर और अभिव्यक्ति के मानक लोक की अदालत में ही तय होते रहे हैं. लोक संस्कृति के अध्येता डॉ. कपिल तिवारी कहते हैं- "लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय रंग सर्जना से आज उसका लोक पूरी तरह जुड़ नहीं पाया है, जितना प्रभावी यह माध्यम है, जितनी महिमा इसकी गायी जाती है उतनी गहरी पैठ आज नाटक अपने समाज में बना नहीं पाया है. मराठी, बांग्ला और कुछ हद तक दक्षिण को भी शामिल करें तो इनकी तुलना में हिन्दी रंगमंच बेहद पिछड़ा और सर्जना के स्तर पर उदासीन दिखाई देता है." ये सच है कि दर्शकों केा बहुत नियमित और गुणवत्तापूर्ण नाटक देने की कोशिशों पर पाला पड़ गया है. नए रंगकर्मियों की आमद सिर्फ नाटक को सीढ़ी बनाकर सिनेमा और टी.वी. के सपने पूरे करने तक सिमट गई है. नाटक या तो प्रोजेक्ट ओरिएंटेड हो गए हैं या राजनीति की भाषा बोलने लगे हैं, ऐसे में जनता का विश्वास और जल्दबाजी में हुए रंगकर्म से सृजन की सुगंध दोनों ही काफूर हो रहे हैं.

काबिल-ए-ग़ौर है कि हिन्दी समाज अधिकांशतः लोकप्रिय माध्यमों में जीने वाला समाज है. हिन्दी फिल्में और टी.वी. धारावाहिक हिन्दी समाज को अपने मनारंजन की गिरफ्त में लिए है. ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में अभी पारंपरिक कलारूप और लीला के विविध रूपों की ही प्रतिष्ठा है. देश के अनेक क्षेत्रों में मंडलियाँ छोटे शहरों-कस्बों और गाँवों में आज भी लीला प्रदर्शन करती है. पारंपरिक लोकनाट्यों के प्रदर्शनों में भी लोक समाज की गहरी रुचि है. यह जीवंत कला परंपरा है. इन कलारूपों तथा इनसे जुड़े कलाकारों का भी बहुत सम्मान है. विडंबना आधुनिक रंगकर्म की है. जो शहरी क्षेत्र हैं या महानगर है, रंग आन्दोलन अधिकांश यहीं तक सीमित हैं. दूसरा, आधुनिक रंगकर्म का कोई रिश्ता अभी भी आधुनिक समाज से बन नहीं पाया है. ऐसी स्थिति में रंगमंच की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए लम्बी यात्रा करनी होगी. लेखकों, निर्देशकों और अभिनेताओं को मिलकर जनता की रूह में बसी उस सच्ची रसिकता की टोह लेने की दरकार है जो उसे बार-बार नाटकों के करीब लाने को विवश करें.

तमाम विपरीतताओं के बावजूद नाटक जीवित है. कलाकारों के भीतर कसक बाकी है जो उसे चैन से बैठने नहीं देती. अपने सपनों से उलझने और जीवन के शाश्वत सवालों के जवाब आखिरकार नाटक में ही मुमकिन है. जावेद अख़्तर के लफ़्ज़ों में आओ, चल के नया सूरज खोजें/और न मिलें तो किरण-किरण जमा करें/सोयी है जो सुबह उसे फिर से जगाएँ/और एक नया सूरज बनाएँ".
........शो मस्ट गो ऑन!

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: March 27, 2021, 11:30 AM IST
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