सांस्कृतिक यज्ञ है ‘यक्षगान’

यक्षगान परंपरा का पवित्र प्रवाह है जो जनमानस की भ्रांतियों का प्रक्षालन करता उन्हें मानवीय प्रवृत्तियों से न केवल परिचित कराता है बल्कि संघर्ष के लिए प्रेरणाएँ जगाता हुआ मुक्ति के नए द्वार भी खोलता है. स्मृतियों की महान संपदा और संस्कृति की हिफाज़त करते हुए भारत के दक्षिणी तट पर बसे कर्नाटक राज्य की जिन परंपराओं पर वहाँ की पीढ़ियों को गर्व रहा है, यक्षगान उनमें अग्रणी है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 24, 2020, 2:50 PM IST
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सांस्कृतिक यज्ञ है ‘यक्षगान’
PTI Photo by Shailendra
अतीत के पन्नों पर इंसानी उसूलों की बेमिसाल दास्तानों का बेशकीमती दस्तावेज़ है- यक्षगान. कला के रंगमंच पर रौशन होती एक ऐसी दुनिया, जहाँ शब्द, रंग, दृश्य और ध्वनियों के साथ बहते हुए भूली-बिसरी कहानियों-क़िस्सों और यादों में भीगना भला-सा लगता है. अपनी लुभावनी रूप-छवियों और पेशकश के निराले रंग-ढंग ने यक्षगान को शोहरत और कामयाबी के जिस मुकाम पर पहुँचाया है, बेशक यह सब उसकी सदियों पुरानी महान विरासत का नतीजा है.

यहाँ कलाओं की समग्रता में रंगमंच पर जैसे एक महास्वप्न साकार होता है. यक्षगान एक सांस्कृतिक यक्ष है. अनुष्ठान है. मनुष्यता की शाश्वत पुकार है. गीत, संगीत, नृत्य, अभिनय और संवाद का ऐसा मणिकांचन संयोग, जिसके एक सिरे पर विचार हैं, निष्कर्ष हैं, सबक हैं तो दूसरे सिरे पर लोकरंजन का लहराता आँचल. बुझे, बेचैन और हताश मन यहाँ राहत की सौगात पाते हैं.

 प्रस्तुति एक दिव्य अनुभव में बदल जाती है
यक्षगान परंपरा का पवित्र प्रवाह है जो जनमानस की भ्रांतियों का प्रक्षालन करता उन्हें मानवीय प्रवृत्तियों से न केवल परिचित कराता है बल्कि संघर्ष के लिए प्रेरणाएँ जगाता हुआ मुक्ति के नए द्वार भी खोलता है. स्मृतियों की महान संपदा और संस्कृति की हिफाज़त करते हुए भारत के दक्षिणी तट पर बसे कर्नाटक राज्य की जिन परंपराओं पर वहाँ की पीढ़ियों को गर्व रहा है, यक्षगान उनमें अग्रणी है. नाट्य शैली में रच-बस कर यह परंपरा हमेशा नई कौंध, नया कौतुहल जगाती समय के हर पड़ाव पर अपने भरे-पूरे वजूद की गवाही देती रही है. यक्षगान का इतिहास शताब्दियों पुराना है. पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी में भक्ति आंदोलन के दौरान इस परंपरा ने अपनी आँखें खोलीं. यह उजास इतना प्रखर और प्रभावी था कि लोक की आत्मा में बहुत गहरे तक उतरा.
वैष्णवी अनुराग में डूबा काव्य, राग-ताल की शुद्धतम बंदिशों में निखरा संगीत और नृत्य, चित्त को लुभाती रूप सज्जा और वेशभूषा तथा सधा-पारदर्शी अभिनय यक्षगान के रंगपटल पर लोकरूचि का ऐसा सम्मोहन जगाते रहे हैं कि पूरी प्रस्तुति एक दिव्य अनुभव में बदल जाती है.


याद आती है एक प्रस्तुति जिसमें महाभारत का बहुचर्चित चक्रव्यूह प्रसंग पांडवों और कौरवों के बीच एक घृणित षडयंत्र और विजय की गाथा है. कुरूक्षेत्र में भीष्म को पराजित करने के बाद कौरव सेना की ओर से द्रोण, अर्जुन के सामने चक्रव्यूह को भेदने की चुनौती देते हैं. सहयोगी के रूप में अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु प्रकट होता है जिसने अपनी माँ के गर्भ में चक्रव्यूह तोड़ने की तकनीक सीख ली थी. युद्ध के मैदान में वह इसी कौशल का परिचय देने की ज़िद करता है. वह चक्रव्यूह के छः चक्रों को पार करने में सफल भी होता है. इस दौरान दुर्योधन के पुत्र का वह वध भी करता है. इससे कुपित होकर दुर्योधन सात महारथियों के साथ मिलकर युद्ध के नियमों की अवहेलना करते हुए अभिमन्यु का वध करते हैं. सातवाँ और अंतिम चक्र भेदने से अभिमन्यु वंचित रह जाता है. अपने ही परिवार की एक संतान के प्राण हरते हुए कौरव शर्मिंदा होकर अपने शिविर में लौट जाते हैं.

यक्षगान का सुगढ़, अलंकृत और सदा लुभाता  रंगमंचकर्नाटक के लोक समुदाय ने यक्षगान को अनुष्ठान की तरह स्वीकार किया. अतीत के पन्ने पलटते हुए मालूम होता है कि द्वापर की कृष्ण लीलाओं से लेकर पौराणिक प्रसंगों तथा चरित्रों का बखान करते हुए पन्द्रह से बीस कलाकारों की मंडलियाँ गाँव-गाँव जाकर आध्यात्मिक संदेश देती. इस अभियान में हर वर्ग के युवा, प्रौढ़ और बुजुर्ग भी शरीक होते. इस समूह में संगीतकार भी होते. मद्दल, पुंगी, चंडा और हारमोनियम की संगत में भक्ति पदों को गाते हुए कला मंडलियाँ एक गाँव से दूसरे गाँव प्रवास करती. मंच, कभी खेत-खलिहान और बागान तो कभी घर का दालान भी होता. समय की किसी बंधी-बंधाई आवृत्ति से परे यक्षगान का रस रात-रात भर बरसता. इस रस में छंद-कविता का कोमल भाव, राग-ताल का माधुर्य, रूप-सिंगार का निखार और कहानियों में बोल-उठते क़िरदार, रसिक-दर्शकों को उस धरातल पर ले जाते जहाँ यक्षगान सात्विक अनुष्ठान की गरिमा लिए एक कलात्मक रूपक में ढल जाता. ग़ौर करने की बात यह है कि यक्षगान की गरिमा सदियों के सफ़र में ज़रा भी धूसर नहीं पड़ी, बल्कि हर वक़्ती दौर में नई उर्जा और उत्साह से भरकर अपने होने की गवाही देता रही.

यक्षगान का सुगढ़, अलंकृत और सदा लुभाता यह रंगमंच, गहरे तप, पुरूषार्थ और प्रतिबद्धता का परिणाम है. यह सामूहिक प्रयत्नों की रचनात्मक उपलब्धि हैं जिसमें निश्चय ही उन पुरखों की साधना का संयोग है जिन्होंने भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का बीजा रोपण किया और समाज के लिए उसका सार्थक प्रयोग किया. ‘यक्षगान’ की रंगभूमि पर तपस्या का यह ताप आज भी अनुभव होता है.


यक्षगान की यात्रा 
नेपथ्य से लेकर मंच तक हर कलाकार अपनी भूमिका में दक्ष होता है. यह सामथ्र्य गहरी संलग्नता, अभ्यास और परंपरा के प्रति गहरे मान से अर्जित होता है. यहाँ सब कुछ रचनात्मक आपसदारी और समझ के बीच मुमकिन होता है. मंच की कार्यवाहियों के दौरान कथानक और क़िरदार में घटना-प्रसंगों के अनुकूल नेपथ्य से उठता संगीत हो, मंच सामग्री का प्रबंध हो या फिर वेशभूषा और श्रृंगार ही क्यों न हो. अपने दायित्वों के प्रति पूरी निष्ठा से कलाकारों का समूह अपनी-अपनी जगह सक्रिय रहता है. यह संगीत नाटक आख्यान का गान है जो मात्रिक छंद और आंतरिक लय का निर्वाह करते कथा-काव्य में किसी महत्वपूर्ण संदेश का उद्घोष होता है. देह-गतियाँ और भाव-भंगिमाएँ सम्प्रेषण को सहज बना देती है. यही वजह है कि यक्षगान दक्षिण की राज्य सीमाओं से बाहर भी बेहद लोकप्रिय है.

यक्षगान की प्रस्तुति का आस्वाद और अवलोकन करते हुए पहली ही नज़र में पात्रों की आकर्षक वेशभूषा और रूप सज्जा मन को लुभाती है. कलाकारों को यह स्वरूप धारण करने में तीन से चार घंटे लग जाते हैं. चेहरे पर प्राकृतिक रंगों का लेपन किया जाता है. चटख रंगों के ही परिधान और पारंपरिक आभूषण तथा लकड़ी, थर्मोकोल, धातुओं, शीशे के रंगीन टुकड़ों तथा पत्थरों से निर्मित मुकुट पूरी सज-धज को और भी भव्यता प्रदान करते हैं. इस बनक के साथ जब क़िरदार मंच पर नुमाया होते हैं तो एक अलग देश-काल वहाँ निर्मित हो जाता है.


यक्षगान की यात्रा को देखें तो सदियों के अंतराल में जाने कितने आक्रमणों अथवा चाहे-अनचाहे सांस्कृतिक संकटों से भारत की अस्मिता घिरती दिखाई दी लेकिन इस शैली ने अपना मूल चरित्र नहीं बदला. पीढ़ियाँ बदलती रहीं और विरासत को सच्चा उत्तराधिकार मिलता रहा. यही वजह है कि यक्षगान का रंगपटल कभी भी सन्नाटे या संकोच का शिकार नहीं हुआ. उसकी लोक में गहरी उपस्थिति का प्रमाण यह है कि आज भी यक्षगान की सभा के आस-पास हज़ारों का हुजूम उमड़ पड़ता है. न केवल दक्षिण प्रांत कर्नाटक, बल्कि भारत के दीगर राज्यों और विदेशी मंचों पर भी यक्षगान का पारंपरिक वैभव देखने ख़ासा कौतुहल बना हुआ है. इस शैली का प्रयोग उसकी स्वतंत्र प्रस्तुतियों के अलावा अन्य प्रदर्शनकारी कलाओं में भी होने लगा है.

यह सांस्कृतिक आपसदारी सिर्फ कलाओं के बीच नहीं, बल्कि मनुष्य की भावात्मक अंतरंगता में विद्यमान जीवन के लालित्य और सौन्दर्यबोध के बीच एक गुपचुप संवाद भी है.
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: September 24, 2020, 2:46 PM IST
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