सोनू सूद पार्ट 1 : एटलस है ये आदमी

जोधा अकबर की शूटिंग पर सोनू (Sonu Sood) के साथ माताजी कर्ज़त गयी थी. उन्होंने सोनू को कहा भी था कि यहां से कहानी बदलने वाली है. फिर तीन दिन बाद वो वापस चली गईं और 10 दिन बाद उनके देहावसान की खबर आई, जिसने सोनू को तोड़ दिया.

Source: News18Hindi Last updated on: June 5, 2020, 6:57 PM IST
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सोनू सूद पार्ट 1 : एटलस है ये आदमी
सोनू सूद को आरपीएफ ने रोका था.
अगर बचपन से आप अपने पिता को लंगर में लोगों को खाना खिलाते देखते रहे हों या अपनी प्रोफेसर मां को बच्चों को बिना फीस लिए ट्यूशन देते हुए देख रहे हों... तो ये बात तो कन्फर्म है कि आपके संस्कार उसी तरह के होंगे. करीब 40 साल बाद आपके पास एक अवसर आता है अपने संस्कारों का परिचय देने का तो वो भी आप शांति से करते हैं... ऐसी बात आपके साथ है तो यकीनन आपका नाम सोनू शक्ति सूद है.

ग्रीक माइथोलॉजी में एटलस नाम का एक बड़ा ही बलशाली चरित्र गढ़ा गया है. कहते हैं कि पृथ्वी के पश्चिमी भाग में खड़े इस आदमी ने पूरा आसमान अपने कंधे के सहारे उठा रखा है. अब ऐसा ही एक बलशाली चरित्र भारत के पश्चिमी शहर मुंबई में मौजूद है और मुश्किलों का आसमान इसने अपने कंधे पर उठा लिया है ताकि दूर शहरों से आए मज़दूर चैन से अपने घर लौट सकें. यकीनन आप सिर्फ और सिर्फ सोनू सूद हो सकते हैं.

सोनू की दरियादिली के किस्से उनके न चाहते हुए भी मशहूर हो गए और मीडिया ने उन्हें हीरो बना दिया. पंजाबी होने के बावजूद सोनू एक शर्मीले इंसान हैं. वैसे हर इंटरव्यू और फंक्शन में लोग उन्हें अपनी टीशर्ट उठा कर बॉडी दिखाने को कहते हैं, सोनू दिखाते भी हैं... लेकिन उनकी असहज मुस्कान सब बयान कर देती है. सलमान खान और शाहरुख़ खान दोनों को ही सोनू की बॉडी से रश्क है. हैप्पी न्यू ईयर की शूटिंग में तो शाहरुख़ ने कह दिया था कि सोनू को देख कर उन्हें फिट रहने की, बॉडी बनाने के लिए डबल मेहनत करनी पड़ती है. दबंग की शूटिंग में सोनू का कसा हुआ शरीर देख कर सलमान शर्मिंदा होते रहते थे.


सोनू के बारे में उनके मित्रों से जो पता चलता है वो एक ऐसे आदमी की कहानी है जो दिल से मोगा, पंजाब में रहता है. ट्रेन से स्टेशन पर आता है, उसका कोई दोस्त उसे लेने आ जाता है और वो फिर सोनू के पुश्तैनी घर पहुंच जाते हैं. पिताजी (अब नहीं हैं) शक्ति सूद साहब बॉम्बे क्लॉथ हाउस नाम की अपनी कपड़े की दूकान पर होते हैं! सोनू उनसे पैरी पौना करने और दुकान के पुराने साथियों से मिलने स्कूटर पर ही चल पड़ता है. इस बात का उसे कोई ख्याल ही नहीं है कि वो अब "सोनू सूद" फिल्म स्टार है. पुराने लोगों से मिलते मिलाते, दुकान के कर्मचारियों को तोहफे देने की पुरानी आदत.


सोनू ने मोगा में अपना पुश्तैनी घर ठीक तो करवा लिया मगर अब वहां पिताजी नहीं मिलते. माता जी के देहांत के बाद पिताजी स्वयं को अपने बिज़नेस में व्यस्त रखने की कोशिश करते थे. फिर 2014 में उनके लिए सोनू ने पूरे घर को नया बनवा दिया था. एक एक ईंट से लेकर फर्नीचर तक. 20 करोड़ रुपये लगा दिए थे. आज पूरा शहर, सोनू का घर देखने और दिखाने आता है. उनके जन्मदिन और उनकी बरसी पर सोनू अपने जज़्बात काबू नहीं कर पाते हैं. कभी कभी पापा के भेजे हुए मनी ऑर्डर की फोटो सबके साथ शेयर करते हैं, कभी उनके लिखे हुए लेटर. पिताजी का दिल कैसा था इसका एक नमूना सोनू ने बताया था कि जब सोनू नागपुर पढ़ने जा रहे थे, पिताजी उन्हें छोड़ने दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आये थे. अपनी जेब में रखा एक-एक रुपया उन्होंने सोनू के हाथ में रख दिया, बगैर सोचे कि वापस मोगा जाने का इंतज़ाम कैसे होगा.

पिताजी की याद में सोनू एक खास चैरिटी चलाते आ रहे हैं - शक्ति अन्नदानम। हर दिन इस चैरिटी की वजह से कई गरीब और भूखे लोगों को खाना खिलाया जाता रहा है. पलायन के इस दौर में ये संख्या 50000 लोग प्रतिदिन हो गई है. सोनू ने आजतक इस बात के लिए किसी अन्य स्टार से मदद नहीं मांगी. सोनू की एक बचपन की मित्र हैं नीति गोयल, जो मुंबई में चार मशहूर रेस्त्रॉं की मालकिन हैं. उनकी मदद से सोनू इन सभी लोगों को खाना खिला पाते हैं. नीति खुद "खाना चाहिए" इनिशिएटिव के साथ जुड़ कर मुंबई में रोज़ाना एक लाख लोगों को खाना खिलाती रही हैं. मुंबई के कुछ रेलवे स्टेशन पर नीति की टीम मुफ्त खाने के पैकेट डिस्ट्रीब्यूट करती हैं.
सोनू के जीवन में उनकी माताजी श्रीमती सरोज सूद से मिले संस्कारों का एक अलग योगदान है. वो डीएम कॉलेज में प्रोफेसर थीं. उनके यहां छात्र छात्राएं ट्यूशन के लिए आते थे. उन्होंने स्टूडेंट्स से कभी एक रुपया नहीं लिया. घर का काम एक बार लेट हो जाता था लेकिन स्टूडेंट की क्लास रोज़ाना टाइम पर लगती थी. सोनू ने एक्टर बनने की अपनी इच्छा अपनी माताजी को बताई थी. उनका जवाब था कि अगर यही इच्छा है तो ज़रूर, लेकिन इस काम में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए. सोनू जब घर से बाहर निकले पढ़ने के लिए, एक्टिंग में करियर बनाने के लिए, इस दौरान उनकी माताजी उन्हें लगातार चिट्ठियां लिखती रहीं. सोनू की ज़िन्दगी की सबसे बेशकीमती चीज़ है वो चिट्ठियां. फ़ोन कॉल के रिकॉर्ड नहीं होते सोनू, ये चिट्ठियां आगे भी रहेंगी., ये कह कर मां उन्हें चिट्ठियां लिखती थी और सोनू उसका जवाब देते थे. माताजी का सपना था कि सोनू जब सफल हो जाएं तो कार लेकर माताजी को रिसीव करने आएं. सोनू ने अपनी फिल्मों की कमाई से, एक सेकंड हैंड मारुति जेन खरीदी थी. सोनू ड्राइव नहीं कर सकते थे, तो एक ड्राइवर का जुगाड़ किया और माता जी को लेने गए. मां का एक सपना पूरा करना सोनू को आज भी बहुत ख़ुशी देता है!

जोधा अकबर की शूटिंग पर सोनू के साथ माताजी कर्ज़त गयी थी. उन्होंने सोनू को कहा भी था कि यहां से कहानी बदलने वाली है. फिर तीन दिन बाद वो वापस चली गईं और 10 दिन बाद उनके देहावसान की खबर आई, जिसने सोनू को तोड़ दिया. सोनू फिल्में ही छोड़ने वाले थे मगर पिताजी ने उनका हौसला बढ़ाया और मां के सपने की याद दिलाई. सोनू थोड़े दिन बाद ऑस्ट्रेलिया चले गए फिल्म सिंह इज़ किंग की शूटिंग के लिए, जहां वो हर रात शूटिंग ख़त्म होने के बाद अकेले में रोते थे. कई बार माताजी का कोई स्टूडेंट पढ़ने नहीं आता था तो सोनू को उस स्टूडेंट के घर भेजा जाता था ये देखने के लिए कि वो आया क्यों नहीं. माताजी ने ट्यूशन के पैसे नहीं लिए तो सोनू को देश भर में उनके पढ़ाए हुए स्टूडेंट आज भी मिल जाते हैं जो उनको ससम्मान याद करते हैं. सोनू आज भी उम्मीद करते है कि मां कहीं से आएंगी और "मेरा बेटा" कह कर उन्हें आवाज़ लगाएंगी.

माताजी के देहावसान के बाद सोनू को श्मशान वैराग्य हो गया था और भगवान् से भरोसा उठा गया था. सोनू अब फिर से स्पिरिचुअल हो गए हैं. सोनू के करीबी मित्र बताते हैं कि आज भी सोनू कई बार माता जी की चिट्ठियां पढ़ते हैं और स्वर्गीय माताजी को याद करते हैं. हर साल 13 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि के दिन सोनू मोगा में होते हैं, माताजी के नाम के लंगर में खाना खिला रहे होते हैं, आर्थिक रूप से कमज़ोर बच्चों की फीस और पढाई के खर्चे का इंतज़ाम कर रहे होते हैं और मां को याद कर के अकेले में रोते हैं.

(दो पार्ट की सीरीज का यह पहला पार्ट है)
ब्लॉगर के बारे में
विप्लव गुप्ते

विप्लव गुप्तेलेखक

विप्लव कॉलेज के समय से ही पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. भारत में एफएम रेडियो की व्यवस्थित शुरुआत से जुड़े विप्लव ने करीब 18 साल रेडियो के रचनात्मक क्षेत्र को दिए हैं. न्यूयॉर्क फेस्टिवल में पिछले कई वर्षों से रेडियो की ग्रैंड जूरी भी रहे हैं! नौकरी के दौरान फिल्मों से विधिवत परिचय हुआ और तभी से देशी विदेशी फिल्में, वेब सीरीज, फिल्म संगीत जैसे विषयों पर लिखने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक जारी है.

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First published: June 5, 2020, 11:07 AM IST
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