हिन्दी सिनेमा के गानेः राम नाम जपना, पराया माल अपना

हिंदी फिल्मों के ऐसे गाने जो बने हैं पुरानी हिंदी फिल्म के गानों पर. पिताजी से जानकारी ली तो पता चला कि " गोरी है कलाइयां" असल में गीतकार सुधाकर शर्मा ने एक फिल्म "गोरी" के लिए लिखा था जिसे शंकर ने कंपोज़ किया था. ये गीत 26 अप्रैल 1987 को रिकॉर्ड होना था.

Source: News18Hindi Last updated on: August 11, 2020, 5:20 PM IST
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हिन्दी सिनेमा के गानेः राम नाम जपना, पराया माल अपना
कुछ कहता है ये सावन का एक दृश्य.
पिछले दिनों अभिनेता अमिताभ बच्चन, कोरोना के चलत, मुंबई के प्रसिद्ध नानावटी हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे. जैसा कि अक्सर होता है, एक म्यूजिक ऍप पर मैंने भी अमिताभ बच्चन के कुछ पॉप्युलर गानों को सुनने का प्रोग्राम बनाया. आज का का अर्जुन नाम की एक फिल्म का गाना इस फेहरिस्त में शामिल था. वैसे तो पूरी लिस्ट में एक से बढ़ कर एक गाने थे और जब ये गाना बजा तो मुझे ये गाना थोड़ा अजीब लगा - गोरी है कलाइयां, तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़िया. बप्पी लाहिरी का म्यूजिक, अनजान साहब के लिखे बोल, शब्बीर कुमार और लता मंगेशकर जी ने इसे गाया. फिल्म 1990 की थी, गाना दूरदर्शन और रेडियो पर खूब बजा करता था मगर मुझे कहीं खुटका सा हो रहा था.

फिल्म संगीत के कई जानकारों ने इस गाने के बारे में लिखा था कि ये गाना बप्पी लाहिरी का नहीं है. पिताजी से जानकारी ली तो पता चला कि " गोरी है कलाइयां" असल में गीतकार सुधाकर शर्मा ने एक फिल्म "गोरी" के लिए लिखा था जिसे शंकर ने कंपोज़ किया था. ये गीत 26 अप्रैल 1987 को रिकॉर्ड होना था. रिकॉर्डिंग स्टूडियो में गायिका कविता कृष्णमूर्ति, निर्देशक और गीतकार सुधाकर शर्मा, और सारे साजिंदे समय पर पहुँच गए थे और शंकर का इंतज़ार कर रहे थे. किस्मत की मार कुछ ऐसी थी कि सुबह सुबह, दिल का दौरा पड़ने से शंकर का निधन हो गया. उनके जोड़ीदार जयकिशन की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी. उस दिन ये गाना रिकॉर्ड नहीं हो पाया. शंकर के असिस्टेंट डेनियल ने बाद में ये गाना रिकॉर्ड किया था. फिल्म बन कर रिलीज़ होने में 5 साल लग गए और फिल्म के साथ ये संगीत भी गायब ही हो गया. वैसे 'गोरी है कलाइयां" की तर्ज़ और भी इस्तेमाल की गयी थी. बप्पी लाहिरी ने ही 1992 में फिल्म "गीत" में इस ट्यून को फिर से इस्तेमाल किया, "आप जो मेरे मीत न होते" में.

इस गाने के ओरिजिन की कहानी थोड़ी और पुरानी है. फ़िल्मकार राज खोसला ने 1971 में धर्मेंद्र और आशा पारेख को लेकर एक फिल्म बनाई थी "मेरा गाँव मेरा देश". फिल्म शोले की कहानी के बहुत सारे हिस्से इस फिल्म से मिलते जुलते थे जिसमें धर्मेंद्र का एक चोर का किरदार भी शामिल था. इस फिल्म में एक गीत था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल द्वारा संगीतबद्ध किया गए, आनंद बख्शी का लिखा हुआ और लता मंगेशकर का गाया हुआ - मार दिया जाए के छोड़ दिया जाए. हीरो को विलन ने एक खम्भे से बाँध रखा है और हीरोइन उसे छुड़ाने का जतन कर रही है. गीतकार आनंद बख्शी को सिकंदर और पोरस की लड़ाई याद आ गयी जिसमें सिकंदर अपने बंधी पोरस से पूछता है - तुम्हारे साथ क्या सलूक किया जाए? इसी को आधार बना कर ये गीत लिखा गया था. इस गीत की धुन पर गोरी है कलाइयां रचा गया था.

हिंदी फिल्म संगीत में ऐसे मौके तो बहुत बार आये हैं जब किसी विदेशी गाने को सुन कर फिल्म के प्रोड्यूसर या डायरेक्टर ने किसी धुन की नक़ल करने की मांग रखी हो. यहाँ तक कि सलिल चौधुरी से लेकर प्रीतम चक्रवर्ती तक, हिंदी फिल्मों में म्यूजिक डायरेक्टर ने कई बार पूरी की पूरी धुनें कॉपी की या उनसे इंस्पिरेशन ली है. ऐसा, हालाँकि, कम ही देखने को मिला है जब हिंदी फिल्म संगीतकार ने कोई पुरानी धुन उठा कर उसे नए रंग रूप में अपने नाम से प्रस्तुत कर दी हो. आज कुछ ऐसे गीतों की बात करते हैं जो म्यूजिक डायरेक्टर ने अपने ही किसी अग्रज की धुन उड़ा कर बना लिए.
1952 में एक फिल्म आयी थी "संगदिल". दिलीप कुमार ने फिल्म में कमाल का अभिनय किया था. इस फील के संगीतकार थे हिंदी फिल्मों के सबसे कठिन और सबसे गुस्सैल संगीतकार सज्जाद हुसैन साहब. उन्होंने इस फिल्म में एक गाना बनाया था - ये हवा ये रात ये चांदनी (तलत महमूद, राजेंद्र कृष्ण) और इसी धुन पर 1958 में मदन मोहन साहब ने एक गीत बनाया था - तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा (मोहम्मद रफ़ी)! खुद तलत मेहमूद से गाने गवाते थे और सज्जाद उन्हें ही गलत मेहमूद कहते थे. गरम दिमाग के सज्जाद ने एक कॉन्सर्ट में मदन मोहन को देख कर ज़ोर से कहा - आजकल तो परछाइयाँ भी घूमने फिरने लगी हैं. आर्मी में काम कर चुके मदन मोहन ने तपाक से जवाब दिया - मुझे तो आपसे बेहतर कोई संगीतकार मिला ही नहीं जिसकी मैं नक़ल कर सकूं. सज्जाद हुसैन पहली बार लाजवाब हो गए और खुले मुंह से मदन मोहन को देखते रह गए.

शंकर जयकिशन ने हैवी ऑर्केस्ट्रा के साथ कई गाने बना कर हिंदी संगीत को एक नया आयाम दिया है. उन्ही का एक गाना - किसी ने अपना बना के मुझको, (फिल्म पतिता, लता मंगेशकर) वर्षों बाद राजेश रोशन ने अपने भाई राजेश रोशन की फिल्म किशन कन्हैया में इस्तेमाल किया था - राधा बिना है किशन अकेला (मनहर उधास). वैसे राजेश रोशन साहब ने अपने पिता श्री रोशन और ग्रीक कंपोजर वांजलिस की धुनों को बड़े ही प्रेम से हिंदी फिल्मों में इस्तेमाल किया है. इसलिए उनके स्पिरेशन की कहानी में ये गाना बहुत ही छोटा सा उल्लेख पायेगा.

शंकर जयकिशन के फ़िल्मी करियर की शुरुआत राजकपूर के साथ हुई थी. राजकपूर साहब को म्यूजिक का शौक था, वो बहुत देशविदेश घूमते थे, वहां म्यूजिक सुनते थे, एलपी रिकॉर्ड ले कर आया करते थे, उनकी फिल्मों में कुछ गाने विदेशी गानों से प्रभावित थे. उन्हीं की एक फिल्म थी "सत्यम शिवम् सुंदरम" जिसमें लता जी ने पंडित नरेंद्र शर्मा जी के लिखे गीत पर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी संगीत निर्देशन में गाया था - यशोमति मैया से बोले नंदलाला. राज कपूर साहब ने ये धुन 1948 में सुनी थी जब वे निर्देशक महेश कौल की फिल्म गोपीनाथ में अभिनय कर रहे थे और फिल्म के संगीतकार नीनू मजूमदार और गायिका मीना कपूर (प्रसिद्ध फिल्म संगीतकार अनिल बिस्वास जी की धर्म पत्नी) ने सूरदास के लिखे हुए भजन "आयी गोरी राधिका" को रिकॉर्ड किया था. 30 साल बाद इस धुन को राज कपूर के कहने पर सत्यम शिवम् सुंदरम में लिया गया था.शम्मी कपूर की फिल्म बॉयफ्रेंड (1961) में मोहम्मद रफ़ी ने शंकर जयकिशन के गीत को आवाज़ दी थी - धीरे चल धीरे चल ऐ भीगी हवा. अब वर्षों बाद लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने इस धुन के मुखड़े को मिस्टर इंडिया (1987) में बड़े प्यार से इस्तेमाल किया - काटे नहीं कटते ये दिन ये रात (अलीशा चिनॉय). ऐसा नहीं है कि लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की धुनों को उड़ाया नहीं गया. 1964 में रिलीज़ हुई साइंस फिक्शन फिल्म मिस्टर एक्स इन बॉम्बे में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने एक बड़ा मशहूर गाना बनाया था - खूबसूरत हसीना, मेहजबीन जाने जां (किशोर कुमार) जो कि अनु मलिक साहब ने बड़े ही आराम से शाहरुख़ खान की फिल्म बाज़ीगर में इस्तेमाल किया था - ए मेरे हमसफ़र (विनोद राठौर, अलका याग्निक). इसी तरह से 1971 की फिल्म मेरा गाँव मेरा देस के गाने "कुछ कहता है ये सावन" (लता, रफ़ी) को 1987 में आरडी बर्मन ने बड़ी ही बेदर्दी से इस्तेमाल किया "किस कारण नैया डोली" (सुरेश वाडेकर, आशा भोसले). लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के ही एक और सुपरहिट गीत "यशोदा का नन्द लाला" (लता मंगेशकर, संजोग 1985) को आनंद मिलिंद ने एक बेहद ही विचित्र ढंग से प्रस्तुत किया फिल्म "होगी प्यार की जीत" (1999) के गाने - तेरे प्यार में मैं मर जावां (जसपिंदर नरूला, रूप कुमार राठौर). वैसे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की कई धुनों को बाद में अलग अलग संगीतकारों ने चुराया ऐसा कहा जा सकता है.

संगीतकार आरडी बर्मन ने कई बंगाली गानों की धुन रची थी, जिनको बाद में थोड़े हेर फेर के बाद वो हिंदी फिल्मों में भी इस्तेमाल करते थे. साथ उन्होंने अपने पिता, यानी एसडी बर्मन की भी कई धुनों को हिंदी फिल्मों में प्रयोग में किया था. एसडी बर्मन साहब को संगीत की गहन जानकार थे, और उनकी एक धुन इतनी सुन्दर थी की उनके समकालीन संगीतकारों ने भी बिना हिचक उस धुन पर गाने बना लिए. दादा बर्मन ने 1951 में फिल्म "नौजवान" में एक गीत रचा था - ठंडी हवाएं लहरा के आएं (लता मंगेशकर - साहिर लुधियानवी). इस गीत के माधुर्य से प्रभावित हो कर, दादा के समकालीन संगीतकार रोशन ने 1954 में फिल्म "चांदनी चौक" में गीत रचा - तेरा दिल कहाँ है (आशा - मजरूह सुल्तानपुरी). लेकिन दादा का गाना संगीतकार मदन मोहन को इतना भाया था कि उन्होंने 1964 में फिल्म "आपकी परछाइयाँ" फिल्म में इसका मुखड़ा इस्तेमाल किया - यही है तमन्ना, तेरे घर के सामने मेरी जान जाए. कहानी यहीं ख़तम नहीं हुई, संगीतकार रोशन साहब ने इसी धुन को फिर इस्तेमाल किया 1966 की फिल्म "ममता" में और लता मंगेशकर से गवाया मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा गाना - रहे न रहे हम, महका करेंगे.

अब पिताजी के गीत की इतनी प्रसिद्धि देख कर आरडी बर्मन ने इस धुन को आधार बना कर बनाये ये गीत. 1981 में आशा भोसले का गाया फिल्म "नरम गरम "का गाना - हमें रास्तों की ज़रुरत नहीं हैं. फिर इसी धुन का एक बार और इस्तेमाल हुआ 1983 में फिल्म "अगर तुम न होते" के गाने - हमें और जीने की चाहत न होती। बात और आगे बढ़ी तो 1985 आरडी ने इसी धुन पर बनाया एक और सुपर हिट गाना फिल्म "सागर' का - सागर किनारे, दिल ये पुकारे. आरडी बर्मन के संगीत साम्राज्य के 9 रत्नों में से एक बासु चक्रवर्ती साहब ने भी इस धुन के नोटेशन्स में थोड़ा हेर फेर कर 1992 की फिल्म नरगिस में जगजीत सिंह साहब से दो गाने गवाए था - कहा था जो तुमने और दूसरा गाना था दोनों के दिल हैं मजबूर प्यार के, और दोनों को ध्यान से सुनने से ओरिजिनल गीत की झलकी साफ़ सुनी जा सकती है.

जब आरडी बर्मन और किशोर कुमार मिल जाते हैं तो संगीत प्रेमियों की ज़िन्दगी में बहार आ जाती है. लेकिन उनका एक कोलैबोरेशन इतना धमाकेदार है कि ध्यान से सुनने पर लगता है कि इस म्यूजिकल मास्टर पीस की कल्पना तो किशोर कुमार जैसा अतरंगी दिमाग की कर सकता है, लेकिन आरडी बर्मन ने इस कल्पना को मूर्त रूप दिया तो गज़ब का सुपर हिट गाना बना. 1968 की सुपर हिट कॉमेडी फिल्म "पड़ोसन" का महा-मशहूर गाना - एक चतुर नार करके सिंगर. राजेंद्र कृष्ण जी ने इस गीत के बोल कैसे लिखे होंगे, ये भी अपने आप में एक रहस्य है. इस गाने में किशोर कुमार और मन्ना डे ने मिल कर जो धमाल मचाया है उसके पीछे छुपे हैं एक नहीं तीन तीन गाने. गीत का मुखड़ा यानि "एक चतुर नार बड़ी होशियार "ये मुखड़ा आया है किशोर कुमार के बड़े भाई अशोक कुमार द्वारा गाये "झूला" फिल्म के गीत "एक चतुर नार कर कर सिंगार" से. पड़ोसन के गाने में अगला हिस्सा है "कागा रे जा रे जा रे, जा के नाले में तू मुंह धो के आ रे". ये हिस्सा फिल्म "ज़िद्दी" के सुपर हिट गीत "चंदा रे जा रे जा रे" पर आधारित किया गया है. गायिका थी, लता मंगेशकर और संगीत था खेमचंद्र प्रकाश का. किशोर कुमार ने अपनी ज़िन्दगी का पहला प्लेबैक इसी फिल्म में दिया था "ये कौन आय" नाम के गाने में. और पड़ोसन के गाने का तीसरा और आखिरी हिस्सा "अरे देखी तेरी चतुराई, तुझे सुर की समझ नहीं आयी" 1939 की फिल्म संत तुलसीदास के एक गीत पर बैठाया गया है. विष्णुपंत पागनीस पर फिल्माया, पंडित इंद्र चंद्र द्वारा लिखा और ज्ञान दत्त के संगीत में बना ये गीत है - बन चले राम रघुराई, और संग जानकी माई. इस फिल्म में किशोर कुमार स्वयं एक संगीतकार विद्यापति उर्फ़ गुरु के रोल में थे. और उन्होंने अपना रोल अपने मामा शास्त्रीय संगीतकार धनञ्जय बनर्जी और संगीतकार खेमचंद्र प्रकाश से इंस्पायर हो कर बनाया था.यानी एक्टिंग और गेट अप में भी इंस्पिरेशन ली गयी थी. इसीलिए लगता है कि ये गाना संभवतः किशोर कुमार की वजह से जन्मा था और उन्हीं की कलाकारी इस गीत में देखने को मिली थी. रिकॉर्डिंग के टाइम किशोर ने बीच बीच में मस्ती करनी शुरू कर दी थी, जो उनके साथी गायक मन्ना डे को कंफ्यूज कर रही थी लेकिन आरडी के इशारे पर गाने की रिकॉर्डिंग जारी रही और ये एक धमाका गाना तैयार हुआ.

विदेशी गाने, विदेशी धुनें, यहाँ तक कि पाकिस्तान की ग़ज़लें, हमारे अपने देश के लोक गीत, पारम्परिक कम्पोज़िशन्स इस सब पर तो हिंदी फिल्मों में शुरुआत से गाने बनाये जाते रहे हैं. पारसी थिएटर हो या मराठी नाट्य संगीत, हिंदी फिल्म संगीत का मूल आधार रही हैं. शास्त्रीय संगीत और राग-रागिनी आधारित गीतों ने भी हिंदी फिल्म को कुछ अमर गीत दिए हैं और ये सिलसिला अभी तक जारी है। कई संगीतकारों के असिस्टेंट्स ट्यून बनाया करते हैं और संगीतकार के नाम से रिलीज़ होती हैं. कई बार नए नवेले संगीतकार अपनी धुनें सीनियर संगीतकारों को सुनाते हैं, जो इन धुनों का इस्तेमाल अपने नाम से कर लेते हैं. प्रथा बहुत पुरानी है, जल्द जाती हुई नज़र भी नहीं आती.
ब्लॉगर के बारे में
विप्लव गुप्ते

विप्लव गुप्तेलेखक

विप्लव कॉलेज के समय से ही पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. भारत में एफएम रेडियो की व्यवस्थित शुरुआत से जुड़े विप्लव ने करीब 18 साल रेडियो के रचनात्मक क्षेत्र को दिए हैं. न्यूयॉर्क फेस्टिवल में पिछले कई वर्षों से रेडियो की ग्रैंड जूरी भी रहे हैं! नौकरी के दौरान फिल्मों से विधिवत परिचय हुआ और तभी से देशी विदेशी फिल्में, वेब सीरीज, फिल्म संगीत जैसे विषयों पर लिखने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक जारी है.

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First published: August 11, 2020, 5:18 PM IST
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