डॉ. अंबेडकर जयंती- ''एक देश एक कागज'' के नियम से पर्यावरण संरक्षण हो

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2020 के आदेश से अधिकांश सुधारों को लागू कर दिया है. लेकिन अनेक प्रतिवेदनों के बावजूद हाईकोर्टस ने इसपर आधी अधूरी कार्रवाई की है. देश में सभी हाईकोर्ट का अपना अलग प्रशासनिक ढांचा है. इसलिए इस बारे में सुप्रीम कोर्ट से भी न्यायिक आदेश पारित होना मुश्किल है.

Source: News18Hindi Last updated on: April 14, 2021, 8:09 pm IST
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डॉ. अंबेडकर जयंती- ''एक देश एक कागज'' के नियम से पर्यावरण संरक्षण हो
अंग्रेजों के समय में अदालतों के लिए जो नियम, क़ानून और प्रोसीजर बने थे, उसमे से अधिकांश आप्रासंगिक हो गए हैं.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. अंबेडकर के मार्गदर्शन में 75 साल पहले जब भारत के संविधान को लिखने की तैयारी शुरू हुई, उस समय कंप्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट का नामोनिशान भी नहीं था। लेकिन अब कोरोना के प्रकोप और लॉकडाउन की बंदिशों की वजह से देश की अदालतों में तेज गति से डिजिटल क्रांति हो रही है. ई-कोर्टस के तीसरे दौर की सफलता के बाद 24 X 7 यानी हमेशा मुकदमों की डिजिटल फाइलिंग संभव हो सकेगी. इसके अलावा ई-पे, ई-सम्मन, ई-हियरिंग ई-जजमेंट के सिस्टम पर भी तेजी से काम चल रहा है. लॉकडाउन के दौरान जजों ने घर से ही मुकदमों की डिजिटल सुनवाई का ऐतिहासिक प्रयोग शुरू किया. यह देखा गया कि कोर्ट स्टाफ, वकील और जजों की परंपरागत समझ की वजह से अभी भी फाइलों के बगैर मुकदमों की प्रभावी सुनवाई मुमकिन नहीं हो रही. डिजिटल फाइलिंग का सिस्टम लागू होने के बावजूद अदालतों के रिकॉर्ड के लिए फाइलों का सिस्टम तो फिलहाल बरकरार ही रहने वाला है, इसलिए कागजों के सिस्टम में एकरूपता और सुधार जरूरी है.


मैन्युअल टाइपराइटर की वजह से कागज़ में एक तरफ प्रिंट का चलन

अंग्रेजों के समय में अदालतों के लिए जो नियम, क़ानून और प्रोसीजर बने थे, उसमे से अधिकांश आप्रासंगिक हो गए हैं. उनमे अब कृमिक सुधार की जरूरत है. 20 वीं शताब्दी में हाथ से लिख कर या फिर मैन्युअल टाइपराइटर से अर्जियां टाइप होती थीं. टाइप के समय कार्बन लगाकर उनकी कई कॉपी भी बना ली जाती थीं. कार्बन कॉपी की वजह से कागज़ में दोनों तरफ टाइप करना मुश्किल होता था, इसलिए अदालतों में कागज़ के एक तरफ प्रिंट का चलन शुरू हो गया.


A-4 कागज़ के इस्तेमाल से न्यायिक एकरूपता और सुधार

21वीं शताब्दी में डिजिटल क्रांति के बाद कंप्यूटर और प्रिंटर का जो नया सिस्टम शुरू हुआ है, उससे कागजों में दोनों तरफ प्रिंट लेना संभव है. थिंक टैंक सेंटर फॉर अकाउंटेबिलिटी एंड सिस्टमिक चेंज (CASC) संस्था ने लॉ स्टूडेंट्स के सहयोग से तीन साल पहले एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करके सुप्रीम कोर्ट और सभी हाईकोर्ट को विस्तृत प्रतिवेदन दिया. इसके अनुसार अदालतों में फाइल किये जा रहे मुकदमों के कागजों में दो तरह के सुधार करने से न्यायिक एकरूपता आने के साथ पर्यावरण संरक्षण भी हो सकेगा. अधिकांश अदालतों में थोडा बड़े साइज के कागज़ का इस्तेमाल होता है, जिसे लीगल पेपर कहते हैं. जबकि सरकार और आम लोग सामान्यतः A4 साइज के थोड़े छोटे साइज़ के कागज का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए देश की जिला अदालतों, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में A4 साइज़ के कागज का इस्तेमाल शुरू हो तो पूरे में ‘एक देश एक कागज’ का प्रचलन बढ़ेगा. इससे जनता, सरकार और अदालत से जुड़े सभी लोगों की सहूलियत बढ़ेगी.


21वीं शताब्दी में कागज़ में दोनों तरफ प्रिंट से पानी और पेड़ों का संरक्षण


A4 साइज के कागज में यदि दोनों तरफ प्रिंट लिया जाए और उसमें सही फॉन्ट और स्पेसिंग की जाए तो कागज़ के इस्तेमाल में बड़े पैमाने पर बचत हो सकती है. सीएएससी द्वारा केन्द्रीय क़ानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को दिए गए प्रतिवेदन के अनुसार इससे सालाना तौर पर औसतन 235 करोड़ कागजों की बचत हो सकेगी. एक कागज को बनाने में लगभग 10 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है, तो इस तरह से देश में 2355 करोड़ लीटर पानी बचाया जा सकेगा. एक पेड़ से लगभग 8333 कागज़ बनते हैं. इस तरह से पूरे देश में  हम सालाना 282765 पेड़ों की भी रक्षा कर सकेंगे. इससे पर्यावरण में 3.3 करोड़ किलो ऑक्सीजन की बढ़ोतरी और 62 लाख किलो कार्बन डाइऑक्साइड में कमी आएगी. इन सभी प्रयासों से देश में बड़े पैमाने पर कार्बन क्रेडिट का भी सृजन हो सकता है.


एकरूपता लागू करने के लिए सरकार को करनी होगी पहल


सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2020 के आदेश से अधिकांश सुधारों को लागू कर दिया है. लेकिन अनेक प्रतिवेदनों के बावजूद हाईकोर्टस ने इसपर आधी अधूरी कार्रवाई की है. देश में सभी हाईकोर्ट का अपना अलग प्रशासनिक ढांचा है. इसलिए इस बारे में सुप्रीम कोर्ट से भी न्यायिक आदेश पारित होना मुश्किल है. इस बारे में पूरे देश की हाईकोर्ट में बेवजह के अनेक मुक़दमे भी चल रहे हैं. इसलिए इस विषय पर केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय पहल करके सभी हाईकोर्ट को एडवाइजरी जारी करके यदि एकमत कर सके तो ‘एक देश एक कागज’ की अच्छी शुरुआत होने के साथ मुकदमों में कमी आएगी. ऐसे न्यायिक और प्रोसीजरल सुधारों से आम जनता को राहत मिलने के साथ पर्यावरण संरक्षण भी हो सकेगा. सरकार और अदालतें इस कागजी संकल्प को यथार्थ में बदलने का संकल्प लें तो डॉ. अंबेडकर की जयंती पर पूरे देश की सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विराग गुप्ता

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 6 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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First published: April 14, 2021, 8:09 pm IST

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