सोली सोराबजी के निधन से संविधान के प्रकाश स्तंभ का अवसान

आजादी की लड़ाई में शामिल आधे से ज्यादा राजनेता वकील थे. आजादी के बाद संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और अभिव्यक्ति...

Source: News18Hindi Last updated on: April 30, 2021, 4:48 PM IST
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सोली सोराबजी के निधन से संविधान के प्रकाश स्तंभ का अवसान
अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकार के क्षेत्र में सोराबजी के योगदान को देखते हुए देश ने उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा.
आजादी की लड़ाई में शामिल आधे से ज्यादा राजनेता वकील थे. आजादी के बाद संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और अभिव्यक्ति की आजादी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बनी, जिसके लिए सोराबजी जैसे लोग सबसे बड़े संरक्षक बने. 68 साल की वकालत के अनुभव वाले सोली सोराबजी भारत में संविधान का पर्याय सा बन गए थे. कोरोना ने लाखों लोगों की बलि ले ली लेकिन सोराबजी का निधन संविधान के प्रकाश स्तंभ के बुझ जाने कैसा है.

देश में अन्य क्षेत्रों की तरह न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार बढ़ा है. लेकिन सोराबजी आखिरी समय तक नैतिक मूल्यों के साथ समझौता किये बगैर समाज और न्याय के हित में अपना योगदान देते रहे. भारत में संविधान की अलख जगाने वाले सोराबजी, मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा जैसे संजीदे मामलों में संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) की मदद के लिए भी हमेशा आगे रहे.

संसद, सरकार और सुप्रीम कोर्ट की लक्ष्मण रेखा तय करवाई-

संविधान बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट में सबसे ऐतिहासिक फैसला केशवानंद भारती मामले में सन 1973 में आया. 13 जजों के उस फैसले से देश की राजनीति के साथ संसदीय व्यवस्था की तकदीर भी बदल गयी. उस मुक़दमे में सीनियर एडवोकेट के तौर पर सोराबजी का बड़ा योगदान था. उस फैसले के बाद संविधान के बेसिक ढांचे का सिद्धांत लागू हुआ, जिससे सरकार, संसद और अदालतों की लक्ष्मण रेखा तय हुई. उनकी विद्वता और योगदान को देखते हुए इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी सरकार ने उन्हें देश का सॉलिसिटर जनरल बनाया. उसके बाद से बंबई की बजाय देश की राजधानी दिल्ली ही उनका केंद्र बन बन गयी. वीपी सिंह और फिर अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में वह देश के अटॉर्नी जनरल बने. मित्रों में सोली नाम से प्रख्यात सोराबजी व्यक्तिगत जीवन में बेहद विनम्र, मृदुभाषी और दयालु थे.
जजों को भी संविधान का पाठ पढ़ाया-

सुप्रीम कोर्ट के जजों के फैसले सांविधानिक तौर पर देश का क़ानून माने जाते हैं. लेकिन उन जजों को संविधान का पाठ पढ़ाने में सोराबजी ने बड़ी भूमिका निभाई. हरीश साल्वे जैसे कई सीनियर एडवोकेटस और जजों ने उनकी शागिर्दगी में वकालत सीखी. सोराबजी आखिरी समय तक संविधान और अदालतों में ही रमे रहे. उनकी बेटी जिया मोदी जो देश की सबसे ताकतवर लॉ फर्म की हेड है, उनको भी सोराबजी अदालत में बहस करते देखना चाहते थे. वो अपने बेटे को भी वकील बनाना चाहते थे. लेकिन बेटे जहाँगीर ने माँ की सुनकर डॉक्टर बनने की ठानी. देश के योग्यतम डॉक्टरों में शुमार होने के साथ जहाँगीर ने अपने पिता से बेहतरीन इंसान होने का उत्तराधिकार भी हासिल किया है.

अभिव्यक्ति की आज़ादी और मानवाधिकार के पैरोकार- अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकार के क्षेत्र में सोराबजी के योगदान को देखते हुए देश ने उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा. देश में सफल और योग्य लोगों की कमी नहीं है लेकिन सोराबजी के व्यक्तित्व में योग्यता, अनुभव और निडरता की त्रिवेणी का अद्भुत समागम था। अदालतों के साथ टीवी परिचर्चा में भी वो अपनी वजनदार बातों को बड़े सलीके से रखते थे. उनकी लिखी किताबें क़ानून के विद्यार्थियों के लिए बहुमूल्य दस्तावेज सरीखी हैं. शालीन व्यक्तित्व के धनी सोराबजी बड़े पदों से जुड़े रहने के बावजूद राजनीतिक प्रपंचों से दूर रहे. इसीलिए देश के सामने कठिन चुनौतियां आने पर वे निडरता से संविधान और अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात पूरे देश के सामने रख पाए. उनकी मासूम बुजुर्गियत की छाँव में संविधान के मूल्य सुरक्षित से महसूस होते थे. इसलिए उनके जाने से संविधान के एक बड़े प्रकाश स्तम्भ का अवसान हुआ सा लगता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
विराग गुप्ता

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 4 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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First published: April 30, 2021, 4:48 PM IST
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