लिव इन और समलैंगिक पार्टनर्स के अधिकारों पर राय दे विधि आयोग

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार सबसे बड़ा मानवाधिकार है, जिसके तहत समलैंगिक अधिकारों को भी मान्यता मिलनी चाहिए. समान लिंग के दो लोगों की शादी को वैधता के लिए अप्रैल 2022 में लोकसभा में प्राइवेट बिल पेश किया था, जो पास नहीं हो सका. इसलिए ऐसे किसी भी निर्णय पर अमल के लिए संसद से कानूनी बदलाव करना जरुरी होगा.

Source: News18Hindi Last updated on: November 30, 2022, 10:51 am IST
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लिव इन और समलैंगिक पार्टनर्स के अधिकारों पर राय दे विधि आयोग
स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 की लिंग निरपेक्ष व्याख्या भी होनी चाहिए.

समलैंगिक जोड़ों की शादी को मान्यता देने की दो याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करके सरकार से जवाब मांगा है. नाल्सा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के फैसले से लैंगिक आधार पर भेदभाव को असंवैधानिक करार दिया था. अगस्त 2017 में पुटुस्वामी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेसी के दायरे में यौन रुझान, व्यक्तिगत घनिष्ठता, पारिवारिक जीवन, शादी और प्रजनन आदि के अधिकारों को मान्यता दी थी. उस फैसले के आधार पर सितम्बर 2018 में नवतेज सिंह जौहर के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा-377 की व्याख्या करते हुए समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया.


उस फैसले में जजों ने कहा कि अंग्रेजों के समय बनाए गए 158 साल पुराने कानून के कारण एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर) समुदाय के लोगों को तिरस्कार का सामना करना पड़ा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार सबसे बड़ा मानवाधिकार है, जिसके तहत समलैंगिक अधिकारों को भी पूरी मान्यता मिलनी चाहिए.


शादी के मामलों से जुड़े कानूनी विवादों पर विधि आयोग राय दे

सुप्रीम कोर्ट में फाइल दोनों पिटीशंस में याचिकाकर्त्ता कई सालों से कपल के तौर पर साथ रह रहे हैं. द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 120 देशों में समलैंगिकता को अपराध नहीं माना जाता. लेकिन सिर्फ 32 देशों में समलैंगिक विवाह को कानून या फिर अदालती फैसलों से मान्यता मिली है. यमन, ईरान जैसे 13 देशों में समलैंगिक सम्बंधों को अपराध मानते हुए मौत की सजा का प्रावधान है. दुनिया में पहली बार नीदरलैंड ने सन् 2001 में समलैंगिंक शादी को अनुमति देने के लिए कानून बनाया था. अमेरिका में समलैंगिंक सम्बन्धों की इजाजत 2003 में मिली और शादी के लिए कानून 2015 में बनाया गया. भारत में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के बाद से ही समलैंगिक शादी की मान्यता के मामले ने जोर पकड़ लिया है.


भारत में लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष जबकि लड़कों के लिए 21 वर्ष है. इसे एक समान करने पर कानूनी बहस चल रही है. मुस्लिम लड़कियों के लिए पर्सनल लॉ की बजाए कानून के अनुसार 18 साल की न्यूनतम उम्र करने पर भी हाईकोर्टों के अलग-अलग फैसलों पर विवाद चल रहे हैं. समलैंगिक जोड़ों की शादी के मामलों से विवाह के कानून पर चल रहे विवादों का दायरा और बढ़ गया है. विधि आयोग के नए चेयरमैन की नियुक्ति के बाद समान नागरिक संहिता के राष्ट्रीय मसौदे की बात हो रही है. उसके साथ शादी से जुड़े कानूनी विवाद के मसलों पर भी विधि आयोग की राय लेने की जरूरत है.


समलैंगिक जोड़ों की अदालत से मांग

भारत में विभिन्न धर्मों में शादी की वैधता के लिए कई तरह के कानून हैं. हिंदू, जैन, बौद्ध और सिक्ख धर्म के लोगों के लिए हिंदू विवाह अधिनियम-1955 है जबकि ईसाईयों के लिए क्रिश्चयन मैरिज एक्ट-1872 है. इसी तरह मुस्लिम अपने धार्मिक कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत शादी करते हैं. इन सभी कानूनों के अनुसार सिर्फ पुरुष और महिला के बीच शादी हो सकती है. केरल और दिल्ली समेत कई हाईकोर्टों में इस बारे में 9 याचिकायें लम्बित हैं. सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के बाद ऐसे सभी मामलों की सुनवाई एक साथ होगी.


दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ऐसी याचिकाओं का विरोध किया था. सरकार के अनुसार भारत में कानून और परंपरा के अनुसार सिर्फ जैविक पुरुष और जैविक महिला के बीच विवाह की अनुमति है. विवाह से जुड़े हुए सभी कानूनों के तहत स्पाउस का मतलब पति और पत्नी हैं. सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि ऐसे मामलों में सुनवाई की कोई एजेंसी नहीं है. अधिकांश समलैंगिंक जोड़े कई सालों से साथ रह रहे हैं और मैरिज सर्टिफिकेट के बगैर कोई बड़ा नुकसान नहीं हो रहा. लेकिन याचिकाकर्त्ताओं के अनुसार उनकी शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं होने से उन्हें 15 तरह के कानूनी अधिकारों का लाभ नहीं मिल पा रहा है. इनमें उत्तराधिकार, सरोगेसी, गोद लेने, बैंक खाते, टैक्स लाभ, ग्रेचुएटी, पासपोर्ट, सम्पत्ति के अधिकार जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं.


याचिकाकर्त्ताओं के अनुसार स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत क्षेत्र, जाति और धर्म के दायरे से बाहर शादी हो सकती है. तो फिर इस कानून की लिंग निरपेक्ष व्याख्या भी होनी चाहिए जिससे की समलैंगिक जोड़ों की शादी की कानूनी रजिस्ट्रेशन हो सके.


विवाह कानूनों में बदलाव के लिए संसद के पास संवैधानिक शक्ति

भारत में लिव-इन रिश्तों को अदालती फैसलों से अप्रत्यक्ष तौर पर कानूनी मान्यता मिल गई है. ऐसे रिश्तों का कानून के तहत शादी का रजिस्ट्रेशन हो सकता है. उसके बावजूद लिव-इन-पार्टनर बगैर मैरिज सर्टिफिकेट के सारे अधिकार हासिल कर रहे हैं. तो फिर लिव-इन की तर्ज पर समलैंगिक जोड़े भी अपने कानूनी अधिकारों को हासिल कर सकते हैं. भारत के संविधान में शक्तियों का विभाजन है. इसके अनुसार मौलिक अधिकार के उल्लघंन या अन्य विसंगतियों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट किसी कानून को आंशिक या पूरे तौर पर रद्द कर सकती है. इसलिए समलैंगिकता को अनापराधिक बनाने पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोई संवैधानिक सवाल नहीं खड़े हुए.


इसी तरीके से आईटी एक्ट की धारा-66 ए को भी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था. लेकिन नया कानून बनाने या पुराने कानून में बदलाव करने की शक्ति सिर्फ संसद के पास है. स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत समान लिंग के दो लोगों की शादी को वैधता प्रदान करने के लिए अप्रैल 2022 में एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में प्राइवेट बिल पेश किया था, जो सदन में पास नहीं हो सका. इसलिए विवाह कानून को लिंग निरपेक्ष करने के नये कानून के बारे में सुप्रीम कोर्ट सरकार को निर्देश जारी कर भी दे तो भी उस पर अमल के लिए संसद से कानूनी बदलाव करना जरुरी होगा.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विराग गुप्ता

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 6 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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First published: November 30, 2022, 10:51 am IST

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