Supreme Court: Live के साथ ट्रांसक्रिप्ट मिलने पर सुधरेगा तारीख पे तारीख का सिस्टम

आजादी की 75 वीं वर्षगांठ में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के सीधे प्रसारण से न्यायपालिका में नए युग की शुरुआत हुई है. कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट में मोबाइल फोन पर ले जाने पर भी प्रतिबंध था.सुप्रीम कोर्ट के अलावा देश में 25 हाईकोर्ट और जिला स्तर पर लगभग 21 हजार अदालतें हैं. सभी अदालतों में कार्यवाही का लिखित विवरण मिलना शुरु हो जाए तो तारीख पे तारीख का सिस्टम खत्म हो सकता है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 28, 2022, 10:06 am IST
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SC: Live के साथ ट्रांसक्रिप्ट मिलने पर सुधरेगा तारीख पे तारीख का सिस्टम
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के सीधे प्रसारण से नए युग की शुरुआत

देश की सभी अदालतों में लगभग 5 करोड़ मामले लंबित हैं. इनके जल्द निपटारे के लिए कानूनी, न्यायिक और प्रशासनिक सुधारों के अनेक मोर्चों पर काम करने की जरुरत है. न्याय होने के साथ दिखना भी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने चार साल पुराने न्यायिक फैसले में कहा था कि सीधा प्रसारण सूरज की रोशनी की तरह न्यायपालिका के बंद कमरो में सुधारों का उजाला ला सकता है.


आजादी की 75 वीं वर्षगांठ में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के सीधे प्रसारण से न्यायपालिका में नए युग की शुरुआत हुई है. कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट में मोबाइल फोन पर ले जाने पर भी प्रतिबंध था. कोलकाता हाईकोर्ट ने सन् 2015 में एक मामले की सुनवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग का आदेश दिया था. सेंटर फॉर अकाउंटेबिलिटी एंड सिस्टेमिक चेंज (CASCCASC), थिंक टैंक एवं अन्य पिटीशनर्स की याचिका पर सन् 2018 में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की बेंच ने फैसला देकर लाइव स्ट्रीमिंग का मार्ग प्रशस्त किया था.


कोरोना काल के लॉकडाउन में मुकदमों की सुनवाई ऑनलाइन तरीके से शुरु होने के बाद कई हाईकोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट में सीधे प्रसारण की शुरुआत हो गई है. संविधान पीठ में पांच जज होते हैं. पहले दिन तीन मामलों का सीधा प्रसारण हुआ. इन तीन संविधान पीठ की अदालतों में लगभग 8 लाख लोगों ने सीधे प्रसारण को यूट्यूब में देखा. चीफ जस्टिस कोर्ट में EWS आरक्षण मामले को 2.38 लाख, जस्टिस चन्द्रचूड़ की अदालत में दिल्ली में अधिकारियों पर क्षेत्राधिकार के विवाद को 3.97 लाख, जस्टिस कौल की अदालत में बार एग्जाम मामले को 96 हजार लोगों ने पहले दिन शाम तक देखा.


Live Streaming के कई संवैधानिक और तकनीकी पहलुओं को समझना जरूरी है.

संविधान के अनुच्छेद-19 के अधिकार और 51-ए के मौलिक कर्त्तव्य-भारत में अदालतें खुली हैं. जबकि संसद यानि लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही के अनेक विशेषाधिकार होते हैं. संसद की कार्यवाही का प्रसारण 1989 से शुरु हो गया और सुप्रीम कोर्ट को 30 साल इंतजार करना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट में 1990 से कम्प्यूटरीकरण की शुरुआत हुई और धीरे-धीरे देश की सभी अदालतें डिजिटल नेटवर्क से कनेक्ट हो गईं. अब लोगों को घर बैठे मुकदमे का स्टेटस और ऑनलाइन आदेश की कॉपी मिल सकती है. मुकदमेबाजी से जूझ रहे लोगों के साथ आम जनता को भी अपने अधिकारों के बारे में जानकारी होनी चाहिए. संविधान में नीति निदेशक सिद्धांतों के तहत इसे सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है. संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत अदालतों की कार्यवाही का विवरण मिलना जनता का मौलिक अधिकार है. इससे जागरुकता बढ़ने के साथ नागरिकों को मौलिक कर्तव्य पूरा करने की प्रेरणा मिलेगी जिसके बारे में संविधान के अनुच्छेद-51ए में प्रावधान किए गए हैं. इस लिहाज से सीधे प्रसारण की व्यवस्था सुधारों की दिशा में एक बड़ी न्यायिक छलांग है.


संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत न्याय का मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ 71 हजार मामले लंबित हैं लेकिन हाईकोर्ट और निचली अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं. फिल्मों में तारीख पे तारीख का डॉयलॉग अदालतों में आज भी कड़वा सच है. मुकद्मों से पारिवारिक विपन्नता बढ़ने के साथ देश की जीडीपी को भी बड़ा नुकसान होता है. पुलिस की चार्जशीट समय-सीमा के भीतर फाइल करने के बारे में कानून हैं लेकिन अदालतों में मुकद्मों के फैसले के बारे में कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है. मीडिया में चर्चित मामलों और कुछ अन्य मामलों में फास्ट ट्रैक अदालतों से जल्द फैसला हो जाता है लेकिन अन्य मामलों में कई पीढ़ी तक मुकद्मेबाजी चलती रहती है. सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसले दिए हैं जिसके अनुसार जल्द और समय पर न्याय मिलना लोगों का मौलिक अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर देश की अन्य अदालतों में भी कार्यवाही के प्रसारण का सिस्टम बने तो लोगों को मुकद्मे के स्टेटस की सही जानकारी मिलने से जल्द फैसले का सिस्टम भी बनेगा.


यू-ट्यूब से प्रसारण और कॉपीराइट

सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के अनुसार अदालती कार्यवाही के सीधे प्रसारण में कॉपीराइट का सरेंडर नहीं हो सकता. जबकि YouTube की शर्तों के अनुसार उन्हें प्रसारित सामग्री में अनेक कानूनी अधिकार हासिल हो जाते हैं. यह न्यायिक दृष्टि से गलत है और इसे ठीक करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को जल्द ही अपना प्लेटफार्म बनाने की जरुरत है. जिस तरीके से दूरदर्शन के माध्यम से यूजीसी के कार्यक्रम प्रसारित होते थे उसी तरीके से अदालती कार्यवाही के प्रसारण के दूरदर्शन या फिर संसद टीवी का सहयोग भी लिया जा सकता है.


सीधे प्रसारण के बारे में जजों और न्यायिक बिरादरी में अनेक संशय हैं. उनके अनुसार सीधे प्रसारण की क्लीपिंग्स का सोशल मीडिया में दुरुपयोग होने पर जजों पर अनुचित दबाव बढ़ सकता है. जजों के नाम पर फेक न्यूज और उन्हें ट्रोल करने से न्यायपालिका के प्रशासन में अनुचित हस्तक्षेप भी हो सकता है. न्यायिक परंपरा के अनुसार जज लोग अपनी बात को लिखित फैसले के माध्यम से व्यक्त करते हैं. लाइव स्ट्रीमिंग के बाद जजों के सही पक्ष और फैसले के न्यायिक पहलुओं पर पक्ष रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट को सोशल मीडिया की टीम बनाने पर विचार करना चाहिए.


अदालती कार्यवाही की ट्रांसक्रिप्ट मिलने पर सही न्यायिक क्रांंति होगी

विश्व के अनेक देशों में अदालती कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है. इनमें अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्राजील, जर्मनी और चीन प्रमुख हैं. भारत में सुप्रीम कोर्ट से पहले देश की कई राज्यों के हाईकोर्ट में कार्यवाही के सीधे प्रसारण की शुरुआत हो चुकी है. इनमें गुजरात, उड़ीसा, कर्नाटक, झारखण्ड, पटना और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट प्रमुख हैं. अमेरिका के अनेक राज्यों की अदालतों में कार्यवाही की वीडियो रिकॉडिंग और फोटोग्राफी की इजाजत नहीं मिलती. वहां पर जजों और वकीलों के बीच की बातचीत की ऑडियो रिकॉडिंग के आधार पर हर मामले की ट्रांसक्रिप्ट बन जाती है. उससे अदालतों की कार्यवाही की रिकॉडिंग होने के साथ जजों के काम में बाधा नहीं आती.


संविधान के अनुसार भारत में ओपन कोर्ट यानि खुली अदालतों की मान्यता है. इसलिए सभी स्तर पर तकनीकी के विकास और पारदर्शिता का प्रसार होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के अलावा देश में 25 हाईकोर्ट और जिला स्तर पर लगभग 21 हजार अदालतें हैं. इन सभी अदालतों में कार्यवाही का लिखित विवरण मिलना शुरु हो जाए तो तारीख पे तारीख का सिस्टम खत्म हो सकता है. ऐसा होने पर सही मायने में न्यायिक सुधारों के उजाले से पूरा देश जगमगाएगा.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विराग गुप्ता

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 6 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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First published: September 28, 2022, 10:06 am IST

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