बिहार में जातिगत जनगणना को रोकने से सुप्रीम कोर्ट का इंकार-आगे क्या होगा?

बिहार सरकार (Bihar Government) ने जातिगत जनगणना की शुरुआत करके 2024 के आम चुनावों का एजेंडा सेट कर दिया. बिहार सरकार का कहना है कि सरकारी योजनाओं के सफल क्रियान्यवन के लिए उन्हें सामाजिक, आर्थिक सर्वे और आंकड़ों को इकठ्ठा करने का अधिकार है. इसलिए बिहार की जातिगत जनगणना को अदालती आदेश से रोक पाना मुश्किल ही होगा.

Source: News18Hindi Last updated on: January 20, 2023, 7:10 pm IST
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बिहार में जातिगत जनगणना को रोकने से सुप्रीम कोर्ट का इंकार-आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में जातिगत जनगणना को रोकने से इंकार कर दिया है. (फाइल फोटो)

नये साल की शुरुआत में बिहार सरकार (Bihar Government) ने जातिगत जनगणना की शुरुआत करके 2024 के आम चुनावों का एजेंडा सेट कर दिया. इसको चुनौती देने वाली सभी PIL को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इन्हें राजनीति प्रेरित बताया. जजों ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे इस मामले में पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं. इस फैसले के बाद अन्य राज्यों में भी जातिगत जनगणना शुरू करने का सियासी दबाव बन सकता है.


UN के आंकड़ों के अनुसार भारत की आबादी 1.41 अरब हो गई है. इस साल 2023 में भारत चीन से बड़ी आबादी वाला देश बन रहा है. बिहार भारत की तीसरी सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है. बिहार के युवा जयप्रकाश नारायण (JP) की सम्पूर्ण क्रान्ति में अगुआ रहे हैं. उसके बाद परिवर्तन लाने में विफल नेताओं ने बिहार और दूसरे राज्यों की जनता को मंडल और कमण्डल के दायरे में बांध दिया. संविधान में जाति और धर्म के नाम पर भेदभाव की मनाही है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों के बाद जाति ही अब पिछड़ेपन का आधार बन गई है. बिहार सरकार का कहना है कि सरकारी योजनाओं के सफल क्रियान्यवन के लिए उन्हें सामाजिक, आर्थिक सर्वे और आंकड़ों को इकठ्ठा करने का अधिकार है. इसलिए बिहार की जातिगत जनगणना को अदालती आदेश से रोक पाना मुश्किल ही होगा.


जनगणना में विलम्ब से राज्यों में जातिगत गणना की होड़

चुनावी रेवड़ियां हों या फिर जाति-धर्म की राजनीति. गैर-कानूनी होने के बावजूद इन मुद्दों पर वोट हासिल करने की होड़ में अधिकांश पार्टियां भेड़चाल में शामिल हो जाती हैं. संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार जनगणना का विषय केन्द्र सरकार के अधीन आता है. सन् 2011 के बाद हुए जातिगत सर्वे और सामाजिक, आर्थिक आंकड़ों को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया. अंग्रेजों के समय से हर 10 साल में केन्द्रीय स्तर पर भारत में जनगणना हो रही है. लेकिन 2021 में होने वाली जनगणना अभी तक नहीं हुई. जनगणना और NPRNPR बनाने में लाखों कर्मचारियों की ड्यूटी के साथ 25 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च और एक साल का समय लग सकता है. इसलिए केन्द्रीय स्तर पर जनगणना का काम अगले साल 2024 के आम चुनावों के बाद ही सम्भव दिखता है.


आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं करने से सरकारी धन की बर्बादी

2011 में सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना हुई थी, उसके आंकड़ों को सार्वजनिक करने से केन्द्र सरकार ने इंकार कर दिया है. संसद में दिये गये बयान और सुप्रीम कोर्ट में दिये गये हलफनामे के अनुसार वह रिपोर्ट गलतियों से भरी होने के साथ अनुपयोगी भी है. सरकार के अनुसार 1931 में हुई जनगणना में कुल जातियों की संख्या 4147 बताई गई थी. जबकि 2011 में हुई केंद्रीय जातिगत जनगणना के अनुसार देश में 46 लाख से ज्यादा जातियां हैं. रोहिणी आयोग के अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार ओबीसी की 2633 जातियां हैं. सनद रहे कि केन्द्रीय जनगणना का काम भी राज्य सरकार के कर्मचारियों के माध्यम से होता है. केन्द्र-राज्य और विभिन्न आयोगों की रिपोर्टों में इतने बड़े फासले से जनगणना से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ जाती है. बिहार के पहले कनार्टक में भी 2015 में जातिगत जनगणना हुई थी, जिसके आंकड़ें सार्वजनिक नहीं हुए. अरबों रुपये खर्च करने के बाद आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं करने का रिवाज सार्वजनिक धन की बर्बादी है.


समान नागरिक संहिता और जातिगत जनगणना जैसे मामलों से संघीय अराजकता

संविधान के अनुच्छेद-44 के अनुसार समान नागरिक संहिता यानि यूनिफार्म सिविल कोड पर कानून बनाने की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है. UCC पर केन्द्रीय कानून की जरुरत के बारे में केन्द्र सरकार ने संसद में बयान देने के साथ अदालत में हलफनामा भी दिया है. इसके बावजूद उत्तराखंड जैसे अनेक राज्यों में चुनावी लाभ के लिए समान नागरिक संहिता बनाने के लिए सरकारों ने समिति का गठन कर दिया. इन मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाते हुए कहा कि किसी भी कानून को बनाने के लिए समिति या आयोग गठन करने के लिए राज्य सरकार के पास अधिकार है. यूसीसी से जुड़े अनेक मामले संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार समवर्ती और राज्यों की सूची में शामिल हैं. आरक्षण से जुड़े मामलों और ट्रिपल टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को लागू करने के लिए भी जातिगत आंकड़े जरुरी हैं इसलिए बिहार के इस कदम पर अदालतों से रोक लगना मुश्किल है. संघीय व्यवस्था में कानून निर्माण पर ऐसी गफलत होने पर राज्यों में जातिगत जनगणना के बढ़ते चलन को रोकना मुश्किल है.


जातिगत जनगणना और अल्पसंख्यकों का मामला

आम चुनावों के पहले केन्द्र और राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरियों में भर्ती कर रही हैं. जाति व्यवस्था हिन्दू धर्म का मर्ज है इसलिए अन्य धर्मों के लोगों को एससी/एसटी और ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिलता. सुप्रीम कोर्ट की मुहर के बाद मुस्लिम और अन्य धर्म के गरीब लोग EWS आरक्षण के दायरे में आ गये हैं. राष्ट्रीय स्तर की बजाए राज्यों और जिला स्तर पर अल्पसंख्यकों को नोटिफाई करने का मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. बिहार में जातिगत सर्वेक्षण कराने का फैसला जून 2022 में हुआ था जिस पर भाजपा नेताओं ने भी सहमति दी है. 7 जनवरी से शुरु इस सर्वे के पहले चरण को 31 मई 2023 तक पूरा करने का लक्ष्य है. दूसरे चरण में जाति, उपजाति और सामाजिक, आर्थिक स्थिति से जुड़ी जानकारियाँ हासिल की जायेंगी. इन आंकड़ों के सामने आने के बाद आरक्षण का दायरा 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ाने के साथ, अल्पसंख्यकों को भी इसके दायरे में लाने की मांग बढ़ सकती है.


गरीबी, असमानता, सामाजिक न्याय और जनसांख्यिकी लाभ

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के एक चौथाई गरीब भारत में रहते हैं. ऑक्सफेम की नवीनतम रिपोर्ट से भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता की तस्वीर सामने आ रही है. सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए आर्थिक नीतियों में बदलाव के साथ गर्वनेंस को बेहतर करने की जरुरत है. इसकी बजाए जातिगत जनगणना में जोर देने से विभाजक शक्तियाँ प्रबल होने और गरीबी, असमानता का संकट बढ़ने से भारत जनसांख्यिकी लाभ (Demographic Dividend) से वंचित हो सकता है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विराग गुप्ता

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 6 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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First published: January 20, 2023, 7:10 pm IST