Opinion: मजदूर पूरे देश के हैं, उन्हें सभी मिलकर बचाएं

भारत सरकार और डब्ल्यूएचओ (WHO) ने अब यह मान लिया है कि हमें अब कोरोना के साथ रहने का अभ्यास डालना होगा. इसलिए स्वस्थ दिख रहे लोगों को पुलिसिया डंडे के जोर पर शेल्टर होम या क्वारंटाइन सेंटर (Quarantine Center) भेजने की बजाय उन्हें सरकारी बसों से घर भेजा जाना चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: May 15, 2020, 8:00 pm IST
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Opinion: मजदूर पूरे देश के हैं, उन्हें सभी मिलकर बचाएं
भारत सरकार और डब्ल्यूएचओ ने अब यह मान लिया है कि हमें अब कोरोना के साथ रहने का अभ्यास डालना होगा (फाइल फोटो)
देश के तमाम शहरों से गांवों की ओर भाग रहे गरीब-बेबस मजदूरों (Labours) को सीख की बजाय पूरे देश का सहारा चाहिए. आत्मनिर्भर भारत (Aatmanirbhar Bharat) के इन भावी निर्माताओं को बचाने के लिए समाज की मानवीय और सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी है. कोरोना से दो महीने की लड़ाई में सरकारें भी अब थक गयीं हैं. अब टेस्टिंग (Testing), इलाज़ और उपचार के लिए न ही अस्पताल बचे हैं और न ही डॉक्टर.



भारत सरकार और डब्ल्यूएचओ (WHO) ने अब यह मान लिया है कि हमें अब कोरोना के साथ रहने का अभ्यास डालना होगा. इसलिए स्वस्थ दिख रहे लोगों को पुलिसिया डंडे के जोर पर शेल्टर होम या क्वारंटाइन सेंटर (Quarantine Center) भेजने की बजाय उन्हें सरकारी बसों से घर भेजा जाना चाहिए.



राज्यों में बैरियर और पुलिस उत्पीड़न दोनों ख़त्म हो

देश में लगभग 4 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं. इनमे से लगभग एक करोड़ मजदूरों ने घर वापसी के लिए औपचारिक रजिस्ट्रेशन कराया है. रेलवे (Railways) द्वारा शुरू की गयी 806 विशेष ट्रेनों के माध्यम से अभी तक सिर्फ 10 लाख लोग ही अपने घर वापस लौट सके हैं. भारत में ट्रेनों के साथ भारतीयों को वापस लाने के लिए विदेशों से हवाई जहाज भी चलने लगे हैं. संविधान के अनुसार लोगों को पूरे भारत में आने जाने की आजादी है तो फिर गरीब मजदूरों को किस वजह से राजस्थान और अन्य राज्यों की सीमा पर रोका जा रहा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने एनसीआर में हरियाणा के बॉर्डर को बंद करने पर नाराजगी जाहिर की है. आपाधापी में पैदल, साइकिल और ट्रकों से घर लौट रहे निरीह मजदूरों का पुलिस द्वारा चालान और उत्पीडन करना अमानवीय होने के साथ आपराधिक भी है. भारतीय संविधान के तहत मजदूरों को भोजन, स्वास्थ्य और सुरक्षित घर वापस जाने का अधिकार है.



राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) ने भी मजदूरों की दुर्दशा की बढ़ती ख़बरों को देखते हुए नोटिस जारी किया है. तपती गर्मी के दिनों में हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा कर रहे मजदूरों को बचाने के लिए सभी सरकारों, अदालतों और समाज ने प्रभावी प्रयास यदि नहीं किये तो फिर कानून का शासन और संवैधानिक व्यवस्था बेमानी ही हो जाएगी.



लॉकडाउन की त्रासदी से गरीबों को बचाने के लिए समाज भी आगे आये

भद्र समाज से कई जगहों पर यह बात आ रही है कि मजदूर बेवजह भाग कर सबको हैरान कर रहे हैं. सरकारें भी बड़े दावे करके मजदूरों से यथास्थान ठहरने की अपील कर रही हैं. विदेशों से वापस आने वाले भारतीय तो किसी तकलीफ में नहीं थे, फिर भी वे लाखों रूपए खर्च करके विशेष विमान से अपने प्रियजनों के पास वापस चले आये. उसी तरह से हम सबको इन मजदूरों के मनोभाव और असुरक्षा को समझने की जरूरत है. आजीविका ख़त्म होने के बाद बीमारी का डर और परिवारजनों के पास पहुंचने की ललक की वजह से ये मजदूर आपाधापी में भाग रहे हैं. इंदौर (Indore) नाके में मजदूरों को राहत देने के लिए कुछ संस्थाओं ने नेक प्रयास किए हैं. अब पूरे देश के में सभी गांव, कस्बों और शहरों में सभी लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार आगे आयें तो मजदूरों को कुछ राहत मिलेगी.



बोरवेल में गिरे बच्चों की तर्ज़ पर मजदूरों को भी बचाने का राष्ट्रीय अभियान शुरू हो

देश के ग्रामीण इलाकों के बोरवेलों में गिर गए छोटे बच्चों को बचाने के लिए अनेक बार पुलिस और सेना का बचाव अभियान शुरू हो जाता है. राज्यों में खाली खड़ी बसों से मजदूरों को सुरक्षित गंतव्य तक पंहुचाने के बाद उन्हें केंद्र सरकार द्वारा घोषित पैकेज से नगद राहत भी मिलनी चाहिए. सड़कों में भटक रहे लाखों मजदूरों के दर्द से पूरा देश कराह रहा है. प्रवासी मजदूर (Migrant Labours) किसी एक राज्य के नहीं, बल्कि पूरे देश के नागरिक हैं. कोरोना के आंकड़ों को दबाने के लिए राज्यों द्वारा मजदूरों के साथ की जा रही ठेलमठेली और ज्यादती क़ानून सम्मत नहीं है. कोरोना के खिलाफ लड़ रहे शहीद लोगों को 1 करोड़ तक की मदद मिल रही है. दुर्घटना में मरने वालों को सरकार 5 लाख का मुआवजा देती है. इसका 10 फ़ीसदी यानी 50 हज़ार रुपये की मदद केंद्र सरकार के आर्थिक पैकेज से इन गरीब मजदूर परिवारों को यदि मिल जाय तो देश को आत्मनिर्भर बनाने के अभियान को सफल बनाने में बहुत ताकत मिलेगी.



(लेखक @viraggupta सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)



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(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विराग गुप्ता

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 6 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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First published: May 15, 2020, 8:00 pm IST
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