मंत्रियों के पीए को 2 साल में पेंशन देने वाले केरल मॉडल पर क्यों उठे सवाल?

सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव बालकृष्णन ने इस मामले को मोड़ते हुए राज्यपाल की भूमिका और अधिकारों पर सवाल खड़े कर दिए. उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था 1994 से कांग्रेस सरकार के समय से चली आ रही है, जिसे रोका नहीं जाएगा. उनके अनुसार बड़ी कंपनियों के प्रेसिडेंट के पर्सनल स्टाफ को बड़ा वेतन, पेंशन और अन्य सुविधाएं मिलती हैं, इसलिए मंत्रियों की कार्यकुशलता बढाने के लिए निजी स्टाफ को पेंशन देना जरूरी है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 25, 2022, 10:20 am IST
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मंत्रियों के पीए को 2 साल में पेंशन देने वाले केरल मॉडल पर क्यों उठे सवाल?

केरल में मुख्यमंत्री, मंत्री, नेता विपक्ष और चीफ व्हिप के निजी स्टाफ को दो साल की नौकरी के बाद पेंशन देने के रिवाज पर राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की आपत्ति के बाद राजनीतिक भूचाल सा आ गया है. केरल विधानसभा में राज्यपाल वापस जाओ के नारे लगाए गए. कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 155 के तहत राज्यपालों की नियुक्ति के पहले राज्य सरकारों से परामर्श करना चाहिए.


उसके अनुसार राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पारित होने पर राज्यपालों को वापस बुलाने का नियम बनना चाहिए. सन 1967 तक केंद्र और राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार होती थी, इसलिए राज्यपालों के साथ मुख्यमंत्री के विवाद नहीं होते थे. लेकिन अब राज्यपालों के साथ सरकारों के विवाद का ट्रेंड खूब बढ़ गया है. लेकिन केरल के वर्तमान विवाद में सियासत से ज्यादा सरकारी खजाने को चूना लगाने के अनेक पहलू हैं.


1959 के नियम से भर्ती और 1994 के संशोधन से पेंशन

सन 1959 में केरल पर्सनल स्टाफ सर्विस वेज रूल्स बने थे. उसके तहत मुख्यमंत्री, मंत्रियों, नेता विपक्ष और चीफ व्हिप को निजी स्टाफ नियुक्त करने की अनुमति मिल गई थी. ऐसे लोगों को लाखों रूपये मासिक की सैलरी मिलती है. सन 1994 में कांग्रेस की करुणाकरण सरकार ने 10 साल पहले यानी 1984 से पेंशन देने की व्यवस्था कर दी. जिन लोगों ने 30 साल की पूरी नौकरी कंप्लीट कर ली है, उन्हें 83400 की पूरी पेंशन मिल रही है.


लेकिन, जिन लोगों ने सिर्फ दो साल एक दिन की नौकरी की है उन्हें, न्यूनतम 3550 रूपये की पेंशन मिल रही है. मंत्रियों को 30 लोगों का पर्सनल स्टाफ रखने की इजाजत है, लेकिन हर दो साल बाद नया स्टाफ रखने से हजारों लोगों को इस पेंशन स्कीम का फायदा मिल रहा है.


गलत और गैरकानूनी पेंशन

केरल की कम्युनिस्ट सरकार का दावा है कि पर्सनल स्टाफ की संख्या को घटाकर 30 से 25 कर दिया गया है. लेकिन 2 साल के अंतराल के बाद नए लोगों की नियुक्ति से यह संख्या दुगनी हो जाती है. ऐसे लोगों को सालाना रिवीजन, डीए, ग्रेच्युटी और कई भत्तों का लाभ मिलता है. ऐसी पेंशन की वजह से राज्य सरकार के खजाने पर सालाना 8 करोड़ से ज्यादा का बोझ पड़ता है. केरल में पेंशन पाने के लिए राज्य सरकार के कर्मचारियों को न्यूनतम 10 साल की नौकरी करना जरूरी है.


निजी स्टाफ की पेंशन के लिए पे रिवीजन कमीशन ने न्यूनतम 5 साल का कार्यकाल निर्धारित करने की बात कही है. उसके बावजूद केरल में मंत्री के निजी स्टाफ अगर 18 साल की उम्र में नियुक्त हो जाय तो 20 साल की उम्र में वह आजीवन पेंशन का हकदार हो जाता है.


सरकार और पार्टी की दलील

राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने चीफ सेक्रेटरी से जानकारी हासिल करने के बाद इस मामले पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है. संविधान के अनुसार राज्यपाल को पेंशन रोकने का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन उनकी दर्ज कराई लिखित आपत्ति पर मंत्रिमंडल को इसे जारी रखने या रद्द करने का निर्णय लेना होगा. अगर राज्य सरकार इसे जारी रखने का निर्णय ले भी ले तो इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है. क्योंकि यह पेंशन सरकारी नियम से दी जा रही है, जबकि इसके लिए विधानसभा से कानून बनना चाहिए.


सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव बालकृष्णन ने इस मामले को मोड़ते हुए राज्यपाल की भूमिका और अधिकारों पर सवाल खड़े कर दिए. उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था 1994 से कांग्रेस सरकार के समय से चली आ रही है, जिसे रोका नहीं जाएगा. उनके अनुसार बड़ी कंपनियों के प्रेसिडेंट के पर्सनल स्टाफ को बड़ा वेतन, पेंशन और अन्य सुविधाएं मिलती हैं, इसलिए मंत्रियों की कार्यकुशलता बढाने के लिए निजी स्टाफ को पेंशन देना जरूरी है.


राज्यपाल के साथ विवाद को बढ़ाकर मुद्दे को भटकाने की कोशिश

नई सरकार के गठन, बर्खास्तगी और नियुक्तियों के मामले में राज्य सरकारों और गवर्नर के बीच विवादों का लंबा इतिहास है. उसी तर्ज़ पर केरल में राज्यपाल की उठाई जायज आपत्ति को सियासी मोड़ दिया जा रहा है. केरल सरकार ने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजकर मांग की है, जिसके अनुसार राज्य की विधानसभा को गवर्नर को रिकॉल करने का अधिकार होना चाहिए. उनके अनुसार अनुच्छेद 155 के तहत राज्यपाल की नियुक्ति के पहले केंद्र सरकार को राज्य सरकार के साथ परामर्श करना चाहिए.


राज्यपाल के बारे में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के कानून के अनुसार भारत के संविधान में व्यवस्था बनी थी. फेडरल सिस्टम में राज्यपालों की जरूरत है या नहीं, इस पर संविधान सभा में लंबी बहस के बाद संवैधानिक व्यवस्था सेटल हो चुकी है. स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में केरल मॉडल की देश विदेश में तारीफ होती है. लेकिन मंत्रियों के निजी स्टाफ के नाम पर पार्टी वर्करों को सरकारी खजाने से दो साल की नौकरी के बाद पेंशन देना किसी भी लिहाज़ से सही नहीं है.


आम लोगों को जब नौकरी नहीं मिल रही तो फिर मंत्रियों के निजी स्टाफ को पेंशन देने का केरल मॉडल नैतिकता, क़ानून और संविधान तीनों लिहाज से गलत है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विराग गुप्ता

विराग गुप्ताएडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट

लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान तथा साइबर कानून के जानकार हैं. राष्ट्रीय समाचार पत्र और पत्रिकाओं में नियमित लेखन के साथ टीवी डिबेट्स का भी नियमित हिस्सा रहते हैं. कानून, साहित्य, इतिहास और बच्चों से संबंधित इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पिछले 6 वर्ष से लगातार विधि लेखन हेतु सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा संविधान दिवस पर सम्मानित हो चुके हैं. ट्विटर- @viraggupta.

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First published: February 25, 2022, 10:20 am IST
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