क्या अब भी किसी ‘एंग्रीमैन’ की तलाश में है बॉलीवुड... ?

बीते कुछ महीनों में फिल्म इंडस्ट्री पर कई तरह के आरोप लगाए गये, जिन्हें लेकर बॉलीवुड की चुप्पी अखरती है. कुछ खेद पत्र, वीडियो संदेश, अदालत का नोटिस और बॉलीवुड स्ट्राइट बैक का हैशटैग. क्या यह किसी लंबी लड़ाई की आहट है? या खुद पर लगे आरोपों का जवाब देने का कोई नया तरीका.

Source: News18Hindi Last updated on: October 27, 2020, 2:39 PM IST
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क्या अब भी किसी ‘एंग्रीमैन’ की तलाश में है बॉलीवुड... ?
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अपनी फिल्म ‘आग’ (2007) के हश्र के बाद भी राम गोपाल वर्मा बॉलीवुड से इतना हताश नहीं हुए थे, जितने कि इन दिनों दिख रहे हैं. कारण है बालीवुड के दामन पर पड़े बदनामी के छींटें, जो अब गहरे दाग बन गये हैं. हैरत होती है देखकर कि हमले बॉलीवुड पर हो रहे हैं और जवाब राम गोपाल वर्मा दे रहे हैं, जबकि बिरादरी के लोग हैं कि उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहे हैं.

निःशब्द मोड में चले जाएं रामू
इस आस में कि कोई ‘तूफान’ आएगा, ऐसा लगता है कि रामू अपने ट्वीट्स के जरिये कुभंकरणों को जगाने की कोशिश कर रहे हैं. जिनसे उनके तार नहीं जुड़ते, उन्हें भी वह टैग करते हैं. हालांकि थोड़ी मशक्कत के बाद फिल्म बिरादरी की तरफ से डेढ़ पन्ने एक का बयान आया, लेकिन उसमें एकजुटता का फील गुड फैक्टर नदारद था. याचना स्वर से समृद्ध इस पत्र में आत्मविश्वास, गौरव और मान-सम्मान की गैर मौजूदगी ही शायद रामू को बहुत खल गयी, जिस पर उनकी प्रतिक्रया आयी ‘Too Late and Too Thanda’.
कहीं वो इस दौर का कोई ‘एंग्रीमैन’ तो नहीं ढूंढ रहे हैं, जिसके तेवर ‘सरकार’ की तरह हों. ऐसा ना हो कि बॉलीवुड की उदासीनता से आजिज़ आ वह आने वाले दिनों में कहीं ‘निःशब्द’ मोड में न चले जाएं.
लम्बी लड़ाई या बचाव का नया तरीका
बीते कुछ महीनों में फिल्म इंडस्ट्री पर कई तरह के आरोप लगाए गये, जिन्हें लेकर बॉलीवुड की चुप्पी अखरती है . कुछ खेद पत्र, वीडियो संदेश, अदालत का नोटिस और बॉलीवुड स्ट्राइट बैक का हैशटैग. क्या यह किसी लंबी लड़ाई की आहट है? या खुद पर लगे आरोपों का जवाब देने का कोई नया तरीका.

ऐसा लगता है कि बॉलीवुड खुद के लिए ही मजबूती से लड़ने के मूड में नहीं है. कमरों में बैठकर महज प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देना ‘सामूहिक कदम’ कम, पीआर की कसरत ज्यादा लगती है. शुरूआती कदम के रूप में यह ऐसा करना कुछ हद तक ठीक हो सकता है, लेकिन क्या सारा जोर केवल सोशल मीडिया और अदालत का दरवाजा खटखटाने पर ही लगाना चाहिये.थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो नामचीन सितारों के ऐसे ढेरों एक्सक्लूसिव इंटरव्यूज याद आते हैं, जिनसे गपशप के बाजार में भूचाल आ जाता था. तो अब क्या समझा जाए कि एकदम खास कहे जाने वाले वो साक्षात्कार क्या केवल अपनी छवि चमकाने, प्रचार या सनसनी फैलाने के लिए दिये जाते थे? या हमें इंतजार करना चाहिये अगली किसी टेडएक्स मीट का, जिसमें लीडरशिप, संघर्ष और सत्य पर व्याख्यान देने के लिए कोई फिल्म सिलेब्रिटी आमंत्रित की जाएगी, जो ये बताएगी कि मन में बैर पालने वालों के मुंह कैसे बंद किए जाते हैं. असल में झुके कंधों और बुझे मन से ‘अस्मिता’ बचाने आगे आये योद्धाओं को इस मुश्किल समय में अपने ही मोहल्ले के किसी अनुभवी बुर्जुग की घुट्टी की ज्यादा जरूरत है.

तब के स्टार्स और अब के बयान बहादुर
हालांकि इस मसले कई आवाजें हैं, जो कायदे से जवाब देने में पीछे नहीं रही हैं. लेकिन क्या उनमें से किसी के मन में यह सवाल नहीं आया होगा कि ऐसा करने से उनका करियर खतरे में पड़ सकता है. ऐसे में थोड़ी हैरत तो जरूर होती है कि ‘स्ट्राइक बैक’ के नाम पर एकजुट दिखने वाली यह मंडली, क्या उसी बिरादरी से है ताल्लुक रखती है जो 34 साल पहले अपने ‘अस्तित्व’ की लड़ाई के लिए बिना किसी ‘एंग्रीमैन’ का इंतजार किये तब की महाराष्ट्र सरकार के सामने मोर्चे पर बैठ गयी थी.

ये बात है सन 1986 की है. अक्तूबर का ही महिना चल रहा था, जब विशेष टैक्स के मसले पर पूरी फिल्म इंडस्ट्री सड़कों पर उतर आयी थी. खबरों की पुरानी कतरनें बताती हैं कि तब निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा ने कहा था – ‘हमने अब से पहले अपने लिए कभी ऐसा आंदोलन नहीं किया है. लेकिन अब जंग शुरू हो चुकी है.’ एकजुटता का यह आह्वान उस एक्शन कमेटी के तत्वावधान में किया गया था, जो तब के तब ही बनी थी. ऑल इंडिया फिल्म प्रोड्यूर्स काउंसिल के अध्यक्ष मनमोहन देसाई ने कहा था – ‘अब ये लड़ाई जीने और मरने की है’. बी. आर. चोपड़ा और व्ही. शांताराम जैसे दिग्गज फिल्मकार भी मोर्चे में शामिल थे और पहली बार सांसद बने सुनील दत्त साहब (बच्चन जी की अनुपस्थिति में), सरकार के नुमाइंदों तक अपनी बात पहुंचाने में जुटे हुए थे.

तब केवल प्रेस विज्ञप्तियों पर भरोसा करने बजाए पूरे आत्मविश्वास के साथ मीडिया से भी बात की जा रही थी. बताते हैं कि हालात को लेकर दत्त साहब ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को एक टेलिग्राम भी भेजा था. इधर, आंदोलन का असर फिल्म इंडस्ट्री के कामगारों पर पड़ता देख उनके लिए सहायता राशि जुटाने का अभियान भी चलाया गया. मोर्चे के लिए राज साहब, दिलीप कुमार, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, फिरोज खान, अमजद खान, महमूद, हेमा मालिनी, स्मिता पाटिल, जीनत अमान, माधुरी दीक्षित तक सब सड़कों पर उतर आये थे. देव आनंद, राजेश खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती, जितेन्द्र, शशि कपूर, शबाना आजमी, दादा कोंडके, राज बब्बर सहित फिल्म सितारों की एक लंबी लिस्ट थी, मोर्चे में शामिल होने वालों में. जिसको जैसा आया, वैसा मंच से बोल गया. इसकी एक छोटी सी झलकी यू-ट्यूब पर देखी जा सकती है. हालांकि इंडस्ट्री की गुटबाजी और लोगों का आपसी मन मुटाव तब भी सामने आया था. क्योंकि आंदोलन के बावजूद इंडस्ट्री के हाथ कुछ खास नहीं आया था. लेकिन खटास इतनी नहीं थी कि अपनों के लिए ही जहर बन जाती.

कुछ तो लिहाज करो माथुर साहब
ये बताने की जरूरत नहीं है कि कब कब इंडस्ट्री की एकजुटता, राष्ट्र की मजबूती का आधार भी बनी है. पर मौजूदा संकट के बीच खिलाड़ी कुमार का वीडियो संदेश ‘याचना स्वर’ से ज्यादा प्रतीत नहीं होता. वो आत्मचिंतन की बात कर रहे हैं, माहौल में नकारात्मकता की बात कर रहे हैं. वह कहना तो बहुत कुछ चाहते हैं, लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि क्या कहें, किससे कहें. हो सकता है कि बाकी कुछ कलाकार भी ऐसी ही कशमकश में हों. देखा जाए तो वह जो कहना चाहते थे, अपनी सहूलियत से उन्होंने कह दिया. लेकिन ये बात वो लोगों की आंखों में आंखे डालकर कहते तो बात कुछ और होती. वैसे ही जैसे उन्होंने जिरह के दौरान कहा था - - ‘कुछ तो लिहाज करो माथुर साहब....’

शायद इससे ज्यादा जोश तो कोलड्रिंक के उस विज्ञापन से आ जाता है, जिसकी पंचलाइन अब एक मुहावरा बन गयी है . दरअसल, आज मायानगरी तरह-तरह के आरोपों के जो दंश छेल रही है, उनसे छुटकारा पाने के लिए खुद की एकजुटता, साहस और संकल्प की जरूरत है, जो की-बोर्ड पर चटर-पटर करके हासिल होनी मुश्किल है.

नए दौर में लिखेंगे मिलकर नई कहानी
नब्बे के दशक की शुरूआत में जब देश के कुछ हिस्सों में नफरत और अशांति के बादल छाए हुए थे, तब फिल्म कलाकारों द्वारा प्रेम, शांति, भाईचारे और राष्ट्रीय सदभावना के प्रचार के लिए एक बेहद शानदार वीडियो जारी किया गया था. प्यार की गंगा बहे, देश में एका रहे... गीत में न केवल बॉलीवुड बल्कि दक्षिण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के कलाकारों भी थे. रजनीकांत, ऋषि कपूर, जैकी श्राफ, नसीरुद्दीन शाह, चिरंजीवी, आमिर खान सरीखे सितारों के साथ यह वीडियो शोमैन सुभाष घई ने बनाया था, जिसमें संगीत दिया था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने और बोल थे जावेद अख्तर के. इसी साल गर्मियों में ये वीडियो एक बार फिर से चर्चा में आया और देखते ही देखते ट्रेंड करने लगा.

साल 2002 में कुछ कुछ ऐसा ही एक वीडियो नफरत मिटाने के संदेश के साथ जारी किया गया था, जिसमें बच्चन साहब के साथ क्रिकेट खिलाड़ी, संगीत और कला जगत के लोग भी थे. इंडियन ब्राडकास्टिंग फाउंडेशन के सहयोग से इस वीडियो को रोहेना गेरा (तब रोहन सिप्पी की पत्नी थीं) ने बनाया था. तो साल 2009 में वितरकों और निर्माताओं के विवाद में अपनी अनबन को एक तरफ रख शाहरुख और आमिर एक मंच पर साथ आ गये थे. विडियो सन्देश और कोर्ट कचहरी से इतर ऐसे कुछ प्रयास क्या फिर से नहीं किए जाने चाहिये?
ब्लॉगर के बारे में
विशाल ठाकुर

विशाल ठाकुरफिल्म समीक्षक, पत्रकार

दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. अलग-अलग अखबारों में फिल्म समीक्षक रहने के बाद अब स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं.

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First published: October 27, 2020, 2:36 PM IST
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