जब बंदूक नसीब नहीं थी, तब इस क्रांतिकारी ने किया था 300 बमों का इंतजाम, उड़ जाती ब्रिटिश आर्मी, लेकिन..!

विष्णु शर्मा

First published: July 5, 2016, 11:57 AM IST | Updated: July 5, 2016, 11:57 AM IST
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जब बंदूक नसीब नहीं थी, तब इस क्रांतिकारी ने किया था 300 बमों का इंतजाम, उड़ जाती ब्रिटिश आर्मी, लेकिन..!
2015 में जब विष्णु गणेश पिंगले नाम के एक शहीद की शहादत के सौ साल महाराष्ट्र के एक गांव के...

2015 में जब विष्णु गणेश पिंगले नाम के एक शहीद की शहादत के सौ साल महाराष्ट्र के एक गांव के लोग मना रहे थे, तो देश भर की मीडिया को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी, ना ही शायद किसी सरकार या पॉलटिकल पार्टी को। काश पिंगले सौ साल बाद की ये हकीकत जान पाते तो अमेरिका में अपना शानदार कैरियर छोड़कर अपने मातृभूमि को आजाद करवाने की खातिर अपनी जान देने यहां नहीं आते।

दरअसल, उस दौर में जब एक-एक पिस्टल को हमारे क्रांतिकारी तरस रहे थे, पिंगले ने अमेरिका से आकर 300 बमों का इंतजाम किया, यहां तक कि गिरफ्तारी के वक्त उनके पास जो 18 बमों का जखीरा पकड़ा गया था, उसके बारे में पुलिस का बयान था कि वो सेना की एक रेजीमेंट को उड़ाने के लिए काफी था।

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ये वो दौर था जब गांधी, नेहरू जैसे भविष्य के तमाम बड़े कांग्रेसी नेता जो अच्छे परिवारों से ताल्लुक रखते थे, विदेशों में बैरिस्टर आदि की पढ़ाई पढ़ रहे थे, या पढ़ने के बाद शांतिपूर्वक अंग्रेजों की नीतियों का विरोध कर रहे थे। गांधीजी उन दिनों साउथ अफ्रीका में एक केस लड़ने गए थे और वहां एक आंदोलन से जुड़ गए थे।

बड़े परिवारों के बच्चों के लिए विदेश में पढ़ाई और कांग्रेस आदि संगठनों से जुड़कर कभी अंग्रेजों का विरोध करना तो कभी कुछ मामलों में सरकार को लॉलीपॉप सुधारों का साथ देना एक फैशन बन गया था। ऐसे में दो सम्पन्न किसान परिवारों के बच्चे अमेरिका में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पहुंचे, एक थे करतार सिंह सराभा जो पंजाब के कपूरथला से ताल्लुक रखते थे, तो दूसरे थे विष्णु गणेश पिंगले, जो महाराष्ट्र में पुणे के पास तालेगांव ढमढेरे के थे। अपने भाई बहनों में सबसे छोटे विष्णु को काफी स्नेह मिला था। उनके पास अच्छी जिंदगी गुजारने का विकल्प खुला था, बस अंग्रेजी हुकूमत को चैलेंज नहीं करना था।

लेकिन अपने देशवासियों की हालत उनसे नहीं देखी जा रही थी, शुरूआत में ही वो पढ़ाई के दौरान वीर सावरकर के ग्रुप अभिनव भारत से जुड़ गए और अंग्रेजों के विरोध में काम करने लगे। युवाओं के एक समूह में वो अंग्रेजी राज से छुटकारा पाने की योजना बनाने लगे। बचपन से ही पढ़ाकू विष्णु ने अमेरिकी क्रांति को गहराई से पढ़ा था, वो भी अमेरिका की तरह अपने देश को आजाद देखना चाहता था। स्वदेशी आंदोलन से जुड़े, अपनी एक स्वदेशी लूम भी शुरू की। लेकिन मन में कुछ और ही चल रहा था, इसलिए कुछ महीनों के लिए पिंगले ने साधुवेश में भारत भ्रमण भी किया। बाद में उसने सोचा क्यों ना अमेरिका ही चला जाए, वहां से देश को आजाद करवाने के लिए कुछ मदद मिल सकती है।

अमेरिका जाने की योजना विष्णु पिंगले के अलावा बस उसके एक बड़े भाई को मालूम थी, भाई ने भी सोचा कि यहां लड़कों के साथ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ने से बेहतर तो अमेरिका में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने का विकल्प ज्यादा बेहतर है। 1911 में विष्णु गणेश पिंगले एक जापानी जहाज तोरामारू से अमेरिका की सिएटल यूनीवर्सिटी जा पहुंचे, मेकेनिकल इंजीनियरिंग के एक कॉलेज में एडमीशन भी ले लिया। उन्हीं दिनों करतार सिंह सराभा भी अमेरिका पहुंचे, इंजीनियरिंग करने। लेकिन करतार को पोर्ट पर उतरते ही भारतीय होने के नाते जिस भेदभाव से सामना हुआ, उससे करतार को पहली बार पता चला कि उनका देश गुलाम है।

सम्पन्नता में पले बढ़े करतार सिंह ने कसम खा ली कि देश की गुलामी की जंजीरों को किसी भी तरह तोड़ना है, विष्णु पिंगले और करतार सिंह सराभा दोनों का मिशन एक था, मंजिल एक थी, तो उस कठिन सफर को साथ में तय करने की ही योजना बना ली। लेकिन अमेरिका में रहकर कैसे भारत को आजाद किया जाए, इसके लिए भारत तो जाना होगा। उस वक्त गांधी का भी उदय नहीं हुआ था, सो आंदोलनों से आजादी के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। उनको लगा कि विदेशी मदद से सशस्त्र क्रांति ही एकमात्र रास्ता है और ये पिंगले का ये आइडिया था कि लड़ भी वही सकते हैं, जिन्हें लड़ना आता है। आम जनता नहीं लड़ेगी, बल्कि अंग्रेजी फौज में शामिल भारतीय फौजियों को अपनी योजना में क्रांति के लिए, विद्रोह के लिए शामिल करना होगा। ठीक वैसा विद्रोह जैसा 1857 में हुआ था।

दरअसल, उस वक्त सैनफ्रांसिस्को भारतीय क्रांतिकारियों का गढ़ बना हुआ था, इंडिया हाउस के जरिए सारी गतिविधियां चलती थीं। उसी इंडिया हाउस में विष्णु गणेश पिंगले और करतार सिंह सराभा को ठिकाना मिला और विदेशी जमीन पर दिग्गज देशभक्तों का सानिध्य भी।

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लाला हरदयाल, सोहन सिंह भाखना, तारकनाथ दास, करतार सिंह सराभा और भारत के क्रांतिकारियों से आपसी संपर्क से ये तय किया गया कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ही अगर भारत की छावनियों में 1857 जैसा विद्रोह किया जाए तो देश आजाद किया जा सकता है, क्योंकि अंग्रेजी फौजें दुनिया भर में अलग-अलग जगहों पर युद्ध लड़ने में व्यस्त हैं। इसके लिए हजारों पंजाबियों ने मातृभूमि की खातिर गदर के लिए भारत जाने की ठान ली, कई जत्थे निकल भी गए। रास बिहारी बोस, बाघा जतिन और सचिन सान्याल से हथियारों के इंतजाम के लिए मदद मांगी गई।

करतार सिंह सराभा और विष्णु गणेश पिंगले भी भारत के लिए निकले, अक्टूबर 2014 में। पिंगले बाघा जतिन के सहयोगी सत्येन भूषण सेन के साथ चीन में रुक गए, टहल सिंह जैसे गदर समर्थकों से मिलने के लिए, वहां वो चीनी नेता सन यात सेन से भी मिले, लेकिन वो ब्रिटिश सरकार से सम्बध खराब नहीं करना चाहते थे। सत्येन ने करतार और पिंगले दोनों को कोलकाता में बाघा जतिन से मिलवाया, जतिन ने उन्हें बनारस में रास बिहारी बोसे से मिलने भेज दिया। जहां उनकी मुलाकात सचिन सान्याल से भी हुई

बंदी जीवन में ही सचीन्द्रनाथ सान्याल ने पिंगले की काफी तारीफ की है, बताया है कि अमेरिका जाने से पहले वो साधू हो गए थे और पूरे देश में भ्रमण किया, देश की हालत उनसे देखी नहीं जाती थी, अमेरिकी क्रांति से प्रभावित थे, तो वही एक रास्ता उन्हें दिखता था। वो मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए अमेरिका चले गए। पूरा देश घूमने के चलते उन्हें पंजाबी अच्छी आती थी, तभी गदर क्रांति वालों के करीब आ गए, हमारा पंजाब से नाता कट सा गया था, ऐसे में पिंगले आए, बलिष्ठ देह के स्वामी, आंखों में ओज था।

सान्याल के मुताबिक वो बम गोलों के बारे में सबसे पूछताछ कर रहे थे कि कैसे मिल सकते हैं। सचिन के मुताबिक उनसे मिलकर लगा कि वो बंगाल को पंजाब से जोड़ लेंगे। एक दिन मनुष्य का आदर्श जीवन कैसा हो, इस बात पर पिंगले और सान्याल की बहस छिड़ गई, तो पिंगले ने गीता के एक-एक श्लोक से उदाहरण दिए, सान्याल दंग रह गए, वो उन्हें अमेरिका से आया विलायती रंग में रंगा कोई बाबू समझ रहे थे

पिंगले कहते थे कि जितने ज्यादा से ज्यादा बम गोले आप हमें पंजाब के लिए दिलवा सकते हैं, दिलवा दीजिए। सचिन सान्याल ने समझाया एक बम बनाने में करीब 16 रुपए का खर्च आता है, आपको पैसों का इंतजाम करना होगा। पिंगले जब सचिन सान्याल को लेकर पंजाब पहुंचे तो पता करतार सिंह, मूला सिंह जैसे कुछ कार्यकर्ताओं से मुलाकात हुई। करतार ने वाकई में काफी मदद की, उनको बमों के लिए उस जमाने में पांच सौ रुपए इकट्ठे करके दिए, जबकि मूला सिंह बेईमान निकला, संगठन के लिए जमा पैसों के साथ भी उसने हेराफेरी कर दी।

लेकिन काम रुका नहीं, रासबिहारी बोस ने भी पंजाब का दौरा किया और 21 फरवरी की तारीख गदर के लिए तय कर दी। लेकिन उससे पहले ही 23वी कैवलरी के सिपाही बलवंत सिंह के भाई गद्दार कृपाल सिंह ने सीआईडी को खबर कर दी, अमेरिका से लौटा कृपाल उन्हीं का जासूस था। कई लोग गिरफ्तार हो गए, रास बिहारी ने विद्रोह की तारीख 21 की बजाय 19 फरवरी कर दी। लेकिन तब तक अंग्रेज एक्शन में आ चुके थे।

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रास बिहारी बचकर निकल गए और उनके शुभचिंतकों में उन्हें जापान भेज दिया। फीरोजपुर, लाहौर और आगरा की छावनियों में समय से पहले ही विद्रोह दबा दिया गया। एक बार तो पिंगले भी करतार के साथ बचकर निकल गए, लेकिन उससे गलत संदेश जाता तो उन्होंने योजना को पूरा करने की ठानी। पिंगले को मेरठ छावनी में विद्रोह की जिम्मेदारी दी गई थी।

लेकिन विष्णु पिंगले को नादिर खान नामक एक व्यक्ति ने गिरफ्तार करवा दिया। मुसलमान हवलदार नादिर खां ने गद्दारी की थी, ये 18 शक्तिशाली बम लेकर मेरठ आए थे, नादिर खां ने इसकी सूचना अंग्रेजों को दे दी और 23 मार्च 1915 को पिंगले पकड़े गए। नादिर पंगले की वो सहयोगी जिस पर उन्हें काफी भरोसा था, तभी वो उसे लेकर बनारस गए थे और एक बंगाली से 300 बम लेकर आए थे, ठीक वैसा बम जो लार्ड हॉर्डिंग पर फेंका गया था, बाकी सभी बम अलग-अलग शहरों के क्रांतिकारियों को भेज दिए गए और केवल अठारह बम लेकर नादिर के साथ पिंगले मेरठ पहुंचे, लेकिन नादिर गद्दार साबित हुआ। करतार सिंह सराभा भी गिरफ्तार हो चुके थे। पुलिस चीफ विल्किंसन की रिपोर्ट के मुताबिक पिंगले के बम इतने शक्तिशाली थे कि पूरी मेरठ रेजीमेंट को उड़ा सकते थे।

जब विष्णु की मां सरस्वती को उसकी गिरफ्तारी की खबर लगी तो उसी बेटे केशव के साथ मेरठ आई, जिसको बताकर वो अमेरिका निकल गया था। मेरठ पहुंचकर संगीनों के साए में विष्णु से मुलाकात हुई तो मां के पैर छूकर वो बोला, “मां, फालतू में वकीलों को पैसे मत दे देना, ये लोग हमें फांसी देने वाले हैं।“ मां का कलेजा मां का होता है, ये सुनते ही आंसू फूट पड़े, बोली—मेरे बेटे, तुझे मौत का डर नहीं लगता? तब पिंगले का जवाब था, -“मां..मातृभूमि को स्वतंत्र कराने की उत्कट इच्छा है, यही मेरी अंतिम इच्छा है। इस जन्म में मातृभूमि का कर्ज चुका लूं, अगले जन्म में फिर तेरे पेट से जन्म लूंगा और तेरा कर्ज चुकाऊंगा।“

जब 16 नवंबर 1915 को पिंगले को लाहौर की सेंट्रल जेल में लाया गया और फांसी के प्लेटफॉर्म पर खड़े करके उससे पूछा गया कि आप आखिरी इच्छा के तौर पर कुछ कहना चाहते हैं? पिंगले ने कहा, मैं 2 मिनट के लिए प्रार्थना करना चाहता हूं, उसके हाथ खोल दिए गए।

पिंगले ने दोनों हाथ जोड़कर आकाश की तरफ देखा और कहा, “भगवान तुम जानते हो कि हमारे मन में क्या है, अब ये तुम्हारे ऊपर है कि हमारे पवित्र काम की रक्षा करो, जिसके लिए हम अपने जीवन का बलिदान कर रहे हैं। हमारी इच्छा देश को आजाद करने की है।“ उसके बाद जैसे ही जल्लाद ने उसके गले में फांसी का फंदा डालना चाहा, पिंगले ने रोक दिया और कहा, मैं खुद अपने गले में इसे डालूंगा, अपने खुद के हाथों से भारत की विजय का ये हार पहनूंगा”, मौत का वो फंदा डालकर पिंगले ने तेजी से नारा लगाया—‘भारत माता की जय’ और अगले ही पल पिंगले का शरीर हवा में झूल रहा था।

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पिंगले उस पीढ़ी के क्रांतिकारी थे, जिन्होंने भगत सिंह, आजाद आदि के लिए आधारशिला रखी, क्रांति की जमीन तैयार की। सचिन सान्याल ने तो भगत सिंह और आजाद दोनों क्रांतिकारियों के मेंटर के तौर पर काम किया। लेकिन नई पीढ़ी के आगे क्रांति की नींव के पत्थरों को भुला दिया गया और आज की पीढ़ी में विष्णु गणेश पिंगले, करतार सिंह सराभा, रास बिहारी बोस, बाघा जतिन और सचिन सान्याल जैसे उन क्रांतिकारियों को लेकर कोई चर्चा ही नहीं होती, जो अगली पीढ़ियों का भविष्य सुधारने के लिए अपने भविष्य को अंधे कुंए में झोंककर अपनी जान पर खेल गए।

(इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं , एवं आईबीएन खबर डॉट कॉम इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी आईबीएन खबर डॉट कॉम स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया  blogibnkhabar@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें।)

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