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कांग्रेस की रीढ़ की हड्डी और राजनीति के हर मर्ज की दवा थे अहमद पटेल

पार्टी में सबकी ज़ुबान पर एक ही सवाल है वह यह कि जब पार्टी का संकटमोचक ही नहीं रहा तो संकटों की भूल भुलैया में फंसी कांग्रेस को बाहर निकलने का रास्ता अब कौन दिखाएगा?

Source: News18Hindi Last updated on: November 25, 2020, 12:59 PM IST
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कांग्रेस की रीढ़ की हड्डी और राजनीति के हर मर्ज की दवा थे अहमद पटेल
अहमद पटेल कोरोना वायरस से संक्रमित थे.
नई दिल्ली. 71 साल की उम्र में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल (Ahmed Patel) का इस दुनिया से रुख्सत होना न सिर्फ कांग्रेस के लिए एक झटका है बल्कि पूरी भारतीय राजनीति में एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में तो नामुमकिन सी लगती है. जादुई और चुंबकीय व्यक्तित्व के धनी अहमद पटेल को जहां सोनिया गांधी के नेतृत्व में कई वर्षों से वनवास झेल रही कांग्रेस को 2004 सत्ता में लाने का श्रेय जाता है, वहीं 2014 के बाद लगातार हताशा और निराशा के दौर से गुजर रही कांग्रेस को 2017 में अपना राज्यसभा का चुनाव जीतकर यह विश्वास जगाने का श्रेय भी जाता है कि अगर ढंग से लड़ाई लड़ी जाए तो जीता भी जा सकता है.

लगातार दो दशक तक कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) के राजनीतिक सचिव रहे अहमद पटेल को पार्टी में कई नेताओं ने ठिकाने लगाने की कोशिश की, लेकिन वह उन्हें एक इंच भी उनकी जगह से हिला नहीं पाए और एक अदृश्य से कोरोना वायरस से अहमद पटेल जिंदगी की जंग हार गए. करीब 3 हफ्ते से कोरोना से जंग के दौरान तीन अस्पतालों में उनका इलाज चला, लेकिन फेफड़ों में इन्फेक्शन इतना ज्यादा फैल चुका था कि तमाम जद्दोजहद के बावजूद डॉक्टर उसे रोक नहीं पाए और आखिरकार पार्टी और नेतृत्व के प्रति वफादारी और बेजोड़ प्रबंधन क्षमता के धनी नेता को दुनिया से रुखसत होना पड़ा.

6 साल पहले सत्ता से बाहर होने के बाद से लगातार संकटों से जूझ रही कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा संकट पैदा हो गया है. पार्टी में सबकी ज़ुबान पर एक ही सवाल है वह यह कि जब पार्टी का संकटमोचक ही नहीं रहा तो संकटों की भूल भुलैया में फंसी कांग्रेस को बाहर निकलने का रास्ता अब कौन दिखाएगा? कांग्रेस के पिछले दो दशक का इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस किसी बड़े संकट में फंसी है उस संकट से बाहर निकालने में अहमद पटेल ने अहमद भूमिका निभाई है. खतरा चाहे बाहर से हो या पार्टी के अंदर से, अहमद पटेल के पास हर हर ताले की चाबी रही. जब-जब बीजेपी ने कांग्रेस के विधायकों को तोड़कर कांग्रेस की सरकारों को गिराने की कोशिश की तब अहमद पटेल पार्टी विधायकों को रोकने के लिए आगे आए और अदालत में कपिल सिब्बल और मनु अभिषेक मनु सिंघवी जैसे दिग्गजों को खड़ा करके बीजेपी की कोशिशों को कई बार नाकाम किया.

1996 में सत्ता से बाहर होने के बाद जब कांग्रेस राजनीतिक वनवास झेल रही थी. तब देश में गठबंधन की राजनीति स्थाई रूप ले चुकी थी संयुक्त मोर्चा की दो सरकारें कांग्रेस के समर्थन से ही चली थीं और कांग्रेस के समर्थन वापस लेने से गिरी भी थीं. उसके बाद अटल बिहारी वाजपेई ने गठबंधन की लगातार दो सरकारें चलाईं, लेकिन कांग्रेस 'एकला चलो रे' यानी लोकसभा में अकेले ही चुनाव लड़ने की जिद पर अड़ी थी.
सोनिया गांधी का राजनीतिक सचिव बनने के बाद 2003 में अहमद पटेल ने सोनिया गांधी को यह समझाया कि मौजूदा हालात में कांग्रेस का अकेले सत्ता में वापसी करना नामुमकिन है. लिहाजा कांग्रेस को भी गठबंधन की राजनीति करनी चाहिए. क्षेत्रीय दलों के साथ लोकसभा का चुनाव लड़ कर ही कांग्रेस सत्ता में वापसी कर सकती है. इसके लिए कांग्रेस की नीति में बदलाव जरूरी था. लिहाजा 2003 में अहमद पटेल की पहल पर शिमला में चिंतन शिविर बुलाया गया. इसी में 'एकला चलो रे' की नीति को पलट कर गठबंधन की राजनीति की शुरुआत की गई. अहमद पटेल की कोशिशों से ही 2004 में कांग्रेस बड़ा गठबंधन बनाने में कामयाब रही. इसी से उसकी सत्ता में वापसी हुई.

अहमद पटेल की कुशल प्रबंधन क्षमता का बेहतरीन नमूना विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़कर गए शरद पवार को फिर से कांग्रेस के साथ जोड़ना रहा है. 1999 में शरद पवार (Sharad Pawar) सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर पार्टी छोड़ गए थे. उसी साल महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में कांग्रेस और एनसीपी का गठबंधन हुआ. सरकार बनी मुख्यमंत्री कांग्रेस का बना और उपमुख्यमंत्री एनसीपी का और इस गठबंधन है महाराष्ट्र में 15 साल राज किया. यह गठबंधन अहमद पटेल की कोशिशों की बदौलत ही बन पाया. इसके लिए अहमद पटेल ने इसके लिए शरद पवार के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों का इस्तेमाल किया था और इसी बदौलत शरद पवार 2004 में कांग्रेस के साथ गठबंधन करके लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए भी राजी हुए. भारतीय राजनीति में यह कारनामा चुंबक के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को मिलाने जैसा था.

2014 में नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही अहमद पटेल उनके और गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) के निशाने पर रहे हैं. अहमद पटेल पर इनकम टैक्स, सीबीआई, ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों का शिकंजा लगातार करता जा रहा है. कई घोटालों में उनका नाम बार-बार लिया जाता है. लेकिन अभी तक किसी मामले में उन पर दोष साबित नहीं हो पाया है.यह भी कहा जाता है कि अमित शाह की अहमद पटेल से निजी खुन्नस है. क्योंकि शाह मानते हैं कि उन्हें जेल भिजवाने के पीछे पटेल का ही हाथ था. वो अहमद पटेल से हर हालत में बदला लेना चाहते हैं. 2017 में अहमद पटेल को उनका राज्यसभा चुनाव हराने के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने एड़ी चोटी का जोर लगाया था. कांग्रेस के कई विधायकों को खरीदा. उनके इस्तीफे कराए गए. इनकम टैक्स के छापे डलवाए गए. लेकिन सारी ताकत झोंकने के बावजूद अहमद पटेल अपना चुनाव जीतने में कामयाब रहे. मोदी-शाह की जोड़ी को मुंह की खानी पड़ी. यह एक ऐसा चुनाव था जिसमें हमें पटेल ने साबित किया कि अगर कांग्रेस चुनाव को गंभीरता से ले तो जीत भी सकती है.

हालांकि इसके कुछ महीनों बाद हुए गुजरात विधानसभा चुनाव कांग्रेस हार गई थी. लेकिन अगले साल मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत के पीछे अहमद पटेल की ही रणनीति और कार्य योजना थी. कमलनाथ (Kamalnath) मध्य प्रदेश में कमलनाथ और राजस्थान में गहलोत को मुख्यमंत्री बनाए जाने के पीछे भी हमें पटेल की बड़ी भूमिका थी और इसी से खफा होकर राहुल गांधी और उनकी टीम ने लोकसभा चुनाव में हमें पटेल को लगभग किनारे कर दिया इसका नतीजा यह हुआ कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पूरी तरह मुंह की खानी पड़ी.

कहा जाता है कि राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और उनकी टीम के लोग अहमद पटेल को पसंद नहीं करते यही वजह है कि राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद से अगर पटेल को राजनीति में ही हाशिए पर धकेलने की कोशिश से शुरू हुई, लेकिन सोनिया गांधी उनकी ढाल बनकर खड़ी हो गई. बताया जाता है कि उन्होंने साफ साफ कह दिया था कि पार्टी में नंबर दो की भूमिका का हर हाल में अहमद पटेल ही निभाएंगे. इसलिए सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को अध्यक्ष पद सौंपने के बाद अहमद पटेल को पार्टी का कोषाध्यक्ष बनवा दिया. पार्टी के संविधान के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष के बाद नंबर दो की पोजीशन कोषाध्यक्ष कि ही होती है. इस तरह सोनिया गांधी ने अहमद पटेल को पार्टी और उनके प्रति वफादारी का बड़ा इनाम दिया था.

इसका बदला अहमद पटेल ने सोनिया गांधी को दोबारा अंतरिम अध्यक्ष बनवा कर चुकाया. जब राहुल गांधी इस बात पर बजिद थे कि उनकी मां, उन्हें और प्रियंका गांधी को छोड़कर किसी और को पार्टी का अध्यक्ष चुना जाए तब अहमद पटेल थे, जिन्होंने पार्टी को एकजुट रखने के लिए सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनवाया.

अहमद पटेल यूं तो कांग्रेस में पिछले 20 साल से शीर्ष पर रहे. लेकिन 10 साल का वह दौर जब कांग्रेस सत्ता में थी उस वक्त सत्ता के शीर्ष पर अहमद पटेल थे. उनकी मर्जी के बिना पार्टी और सरकार में पत्ता तक नहीं हिलता था. लेकिन इसके बावजूद घमंड उनके आसपास से भी होकर नहीं गुजरा. जब उनके घर 24 घंटे मिलने वालों की लंबी कतारें लगी रहती थी. रात को 12:00 और 2:00 बजे भी वह लोगों से उसी गर्मजोशी और खुशमिजाजी से मिलते थे जितनी गर्मजोशी और खुशमिजाजी से लोगों से सुबह मिला करते थे. पार्टी के काम के लिए हमें अहमल पटेल चौबीसों घंटे हाजिर थे.

कांग्रेस कवर करने वाले उन पत्रकारों को जिनके साथ उनका सीधा ताल्लुक था एक फोन कॉल पर हमेशा अवेलेबल रहते थे. उनकी सादगी कि भारतीय राजनीति में मिसाल दी जाती है. कभी उन्होंने किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं की. सत्ता के शिखर पर रहते हुए अपने किसी बेटे, बेटी या किसी नजदीकी रिश्तेदार को पार्टी में कोई पद पर या टिकट दिलाने की कोशिश नहीं की. शायद यही वजह थी कि वह दो दशक तक सोनिया गांधी के सबसे भरोसेमंद विश्वास पात्र बने रहे. इसीलिए कहा जाता है अहमद पटेल कांग्रेस की रीढ़ थे. अब जबकि कोरोना ने इस रीढ़ को लील लिया है तो कांग्रेस के सामने कई सवाल हैं. सबसे अहम यह कि कांग्रेस आने वाले चुनाव में खड़ी कैसे होगी ? दूसरा यह कि पार्टी में अब अहमद पटेल की जगह कौन भरेगा?

एक बेजोड़ और बेमिसाल नेता के निधन पर उनको दिल की गहराइयों से से श्रद्धांजलि और नमन.
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First published: November 25, 2020, 12:59 PM IST
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