हिजाब पर छिड़ी जंग के बीच समझिए इस्लाम क्या कहता है पर्दे के बारे में

कुरआन की इन आयतों के आधार पर अलग-अलग इमामों ने महिलाओं के लिए बुर्का, हिजाब या इसी तरह के अन्य पहनावे तय किए है. कुरआन के आदेशों से स्पष्ट है कि ये आदेश महिलाओं का सुरक्षा और उनका सम्मान बनाए रखने के मक़सद से दिए गए हैं. आधुनिक दौर में मुस्लिम समाज के भीतर से बुर्के और हिजाब को लेकर सवाल उठ रहे हैं. दुनिया में पढ़ी लिखी मुस्लिम महिलाएं बुर्के और हिजाब के खिलाफ़ मुहिम चला रही हैं. इस मुहिम को बड़े पमाने पर मुस्लिम पुरुषों का भई समर्थन मिल रहा है. भारतीय मुस्लिम समाज में पर्दे को लकर काफी खुलापन आया है. मुस्लिम लड़किया बुर्का या हिजाब पहने या नहीं ये उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए. ये उनका संवैधानिक अधिकार भी है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 8, 2022, 7:00 am IST
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हिजाब पर छिड़ी जंग के बीच समझिए इस्लाम क्या कहता है पर्दे के बारे में


र्नाटक में हिजाब पहनने वाली लड़कियों को स्कूल में प्रवेश देने से रोकने का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है. उडुपी जूनियर कॉलेज से शुरू हुआ ये विवाद ज़िले के दो और कॉलेजों के साथ ही शिवमोगा ज़िले के भद्रावती तक फैल गया है. उडुपी के स्कूल में हिजाब पहने धरने पर बैठीं छात्राओं के सामने भगवा शॉल पहने छात्रों के प्रदर्शन का मुक़ाबला कर्नाटक हाईकोर्ट तक पहुंच गया है. सरकार ने छात्राओं को हाईकोर्ट कोर्ट का फैसला आने तक स्कूलों की तय ड्रेस पहनकर ही स्कूल आने के निर्देश दिए हैं.


स्कूल प्रशासन जहां स्कूल की तय ड्रेस के साथ हिजाब पहनने की छूट नहीं देने पर अड़े हुए हैं, वहीं मुस्लिम छात्राएं और उनके अभिभावक संवैधानिक अधिकारों का हवाला देकर हिजाब पहनने की छूट मांग रहे हैं. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के सरस्वती पूजा के मौके पर किए गए ट्वीट के बाद ये राष्‍ट्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बन गया है. हिजाब विवाद में कूदते हुए राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ‘हिजाब को छात्राओं की शिक्षा में बाधक बनाकर हम भारत की बेटियों का भविष्य लूट रहे हैं. मां सरस्वती सभी को ज्ञान देती हैं. वह भेद नहीं करतीं.’


कर्नाटक के मंत्री सुनील कुमार कारकला ने हिजाब विवाद में महिलाओं की आज़ादी का सवाल उठाने वालों को आड़े हाथों लिया है. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार तीन तलाक ख़त्म कर मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ी है. जो लोग उनकी आजादी का सवाल उठा रहे हैं, वो मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी पर बोलें. सभी को एक सरकारी परिसर में समान सिस्टम का पालन करना चाहिए. हमारा यही मक़सद है. वहीं राज्य के शिक्षा मंत्री बीसी नागेश का कहना है कि छात्राएं पहले हिजाब नहीं पहनती थीं. यह विवाद बीते 20 दिनों में शुरू हुआ है. इसके विपरीत मुस्लिम छात्राओं का कहना है कि वो पहले से ही हिजाब पहन कर सकूल आती रही हैं.


बहरहाल मुस्लिम औरतों के पर्दे पर दुनिया भर में बहस छिड़ी हुई है. कहीं बुर्क पर पाबंदी लगा दी गई है तो कहीं हिजाब पर. कहीं नक़ाब लगाने की इजाज़त नहीं हैं. पिछले कई साल से भारत में भी मुस्लिम औरतों का पर्दा निशाने पर है. हिंदू संगठन अक्सर महिलाओं के बुर्का या हिजाब पहनने पर पाबंदी लगाने की मांग करते रहते है. अभी तक केंद्र सरकार या किसी राज्य सरकार ने ऐसी पाबंदी तो नहीं लगाई हैं. कर्नाटक के कुछ स्कूलों में ड्रेस के नाम पर इसे लेकर विवाद शुरू करना इसी एजेंडे को हवा देना है. आने वाले दिनो में कर्नाटक की तरह देश के बाक़ी राज्यों में भी इस तरह के विवाद खड़े हो सकते हैं.


ऐसे में ये जान लेना ज़रूरी हो जाता है कि इस्लाम में पर्दे महिलाओं को का क्या हुक्म दिया गया है? पर्दे को लेकर कुरआन और हदीसें क्या कहती है? पर्दे को लेकर मुस्लिम समाज कितना संवेदनशील है और हिजाब, नक़ाब और बुर्के में क्या फर्क है?


बुर्काः  बुर्के में महिला पूरी तरह से ढकी होती हैं. इसमें सिर से लेकर पांव तक पूरा शरीर ढका रहता है. आंखों के सामने एक जालीदार कपड़ा होता है, जिससे वे बाहर देख सकें. इसमें महिला के शरीर का कोई भी अंग दिखाई नहीं देता है. बुर्के का इस्तेमाल सऊदी अरब में होता है. वहां महिलाओं को अपने हाथों के पंजे तक दिखाने की इजाज़त नहीं है. इसके लिए उन्हें कपड़े के दस्ताने पहनने होते हैं. इसे पर्दे का सबसे सख़्त रूप माना जाता है.


हिजाबः हिजाब में एक कपड़ा होता है. इससे महिला अपना सिर और गर्दन ढके रहती है. इसमें महिला का चेहरा छिपता नहीं, बल्कि दिखता रहता है. हिजाब ईरान में पहना जाता है. इसे मूल रूप से मुस्लिम समाज के शिया समुदाय में पहना जाता है. खाड़ी देशों के शिया प्रधान इलाकों में हिजाब पहनने का चलन ज़्यादा है.


नकाबः महिला का चेहरा ढकने के जालीदार कपड़े को नक़ाब कहते हैं. इससे महिला बाहर की दुनिया देख सकती है, लेकिन नक़ाब उसके चेहरे को दुनिया से छिपाता है. लेकिन इसमें आंखों को ढका नहीं जाता है. यानी आंखे खुली रहती है. यह चेहरे पर बंधा होता है. इसके साथ एक तरह का कपड़ा होता है, जिसमें महिला सिर से लेकर पांव तक ढकी रहती है. आमतौर पर नक़ाब बुर्के का ही हिस्सा होता है. लेकिन कुछ जगहों पर अलग से भी नक़ाब पहना जाता है.


मुस्लिम महिलाओं के पर्दे के ये तीन ही मुख्य तरीक़े हैं. लेकिन, इनके अलावा अबाया, शायला, चिमार और अल अमीरा जैसी चीजें भी प्रचलन में आ गई हैं. तेज़ी बदलते दौर में इन्हें फैशनेबल भी बना दिया गया है. ये परंपरा और रिवाज या मान्यता के आधार पर तय होता है कि महिला क्या पहनती हैं. मुस्लिम समाज मुख्य तौर पर दो प्रमुख समुदायों में बंटा हुआ और सुन्नी और शिया. सुन्नी मुसलमानों में चार इमामों की मान्यता है. वहीं शियाओं में चार से लेकर 12 इमामों तक को माना जाता है. अलग-अलग फिरक़े में पर्दे को लेकर उनके इमामों की राय को तरजीह दी जाती है. ये चलन दुनिया भर में है.


भारत में सभी फिरकों के मुसलमान रहते हैं. इसलिए भारत में पर्दे के सभी तरीक़े चलन में हैं. स्कूल कॉलेजो में मुस्लिम लड़कियां बुर्का पहनकर भी जाती हैं और हिजाब पहनकर भी. वहीं बहुत सी मुस्लिम लड़कियां बग़ैर बुर्के और बग़ैर हिजाब के भी रहती हैं. कई बार परिवार की कई बार लड़कियों की निजी पसंद का मामला बन जाता है. कई बार देखा जाता है कि एक ही परिवार में दो बहनों में से एक बुर्का या हिजाब पहनती है तो दूसरी नहीं पहनती. कर्नाटक के स्कूलों में भी सभी मुस्लिम लड़कियां हिजाब नहीं पहनती हैं. कुछ पहनती हैं. कुछ नहीं पहनती. हिजाब नहीं पहनने वाली लड़कियों का हवाला देकर हिजाब पहनने वाली लड़कियों को हिजाब उतारने को नहीं कहा जा सकता.


दो साल पहले अंतरऱाष्ट्रीय ख्याती प्राप्त संगीतकार एआर रहमान ने नीता अंबानी संग अपनी तीन बेटियों का एक फोटो ट्वीटर पर साझा किया था. इसमें उनकी एक बेटी ख़तीज़ा पूरी तरह यानि सिर स पांव तक बुर्के में थी और बाक़ी दो बेटियां बग़ैर बुर्के के थीं. इसमें उन्होंने हैशटैग लगाया था #freedomofchoice यानि ‘चुनने की आज़ादी’. उन्होंने यही बताने की कोशिश की थी कि उन्होंने अपनी बेटियों अपनी पसंद से अपना पहनावा तय करने की आज़ादी दी है. तब एआर रहमान की ये पोस्ट सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी. इस पर चर्चा भी खूब हुई थी. इसका संदेश यही है कि जो लड़कियां बगैर बुर्के या हिजाब के रहना चाहें तो उन्हें रहने दिया जाए. जो लड़कियां बुर्का या हिजाब पहनना चाहती हैं तो उनके संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करते हुए उन्हें इसकी इजाज़त दी जाए.


कुरआन में महिलाओं को पर्दे का हुक्म दिया गया है. क़ुरआन की सूरः नूर और सूरः अहज़ाब में पर्दे की गाइडलाइन बताई गईं हैं. इसके अलावा क़ुरआन में हिजाब और जलाब शब्द का भी ज़िक्र है. हिजाब का मतलब छुपाना होता है. जलाब का मतलब पहने हुए कपड़े के ऊपर सिर ढंकने के लिए अलग से ओढ़ी जाने वाली चादर. क़ुरआन में महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा गया है कि अपने अंगों को छुपाकर रखें और अपना श्रृंगार या आभूषणों का दिखावा नहीं करें, “सिवाय उसके जो स्वभाविक रूप से नज़र आए.” इस्लामिक विचारक मौलाना मौदूदी अपनी किताब “पर्दा” में लिखते हैं- इंसान की प्रकृति में हया व लज्जा का जज्बा नेचुरल होता है. उसके जिस्म के कुछ हिस्से ऐसे हैं जिन्हें छिपाने की ख्वाहिश अल्लाह ने उसके स्वभाव में पैदा की है. यही स्वाभाविक ख्वाहिश है जिसने शुरू ही से इंसान को किसी न किसी तरह का लिबास पहनने पर मजबूर किया है.


ख़ास बात ये है कि जहां क़ुरआन में औरतों अपने जिस्म की नुमाइश नहीं करन का हुक्म दिया गया है. उससे पहले मर्दों को पराई औरतों को देखकर अपनी निगाहें नीची करने की हुक्म दिया गया है. क़ुरआन की सूरः नूर की आयत न. 30 में मुहम्मद साहब से मुस्लिम पुरुषों को हिदायत दन के लिए लिए कहा गया है, ‘ (हे नबी!)  ईमान वालों से कह दो कि अपनी आँखें नीची रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें. ये उनके लिए अधिक पवित्र है, वास्तव में, अल्लाह को सब पता है, जो कुछ वे कर रहे हैं.’


इससे अगली आयत में महिलाओं के लिए पर्दे का आदेश है. इसमें कहा गया है, ‘और ईमान वाली औरतों से कह दो कि अपनी आँखें नीची रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें और अपनी शोभा का प्रदर्शन न करें, सिवाय उसके जो प्रकट हो जाए तथा अपनी ओढ़नियाँ अपने वक्षस्थलों (सीनों) पर डाले रहें और अपनी शोभा का प्रदर्शन न करें, परन्तु अपने पतियों के लिए अथवा अपने पिताओं अथवा अपने ससुरों के लिए अथवा अपने पुत्रों अथवा अपने पति के पुत्रों के लिए अथवा अपने भाईयों अथवा भतीजों अथवा अपने भांजों के लिए अथवा अपनी स्त्रियों अथवा अपने दास-दासियों अथवा ऐसे धीन पुरुषों के लिए, जो किसी और प्रकार का प्रयोजन न रखते हों अथवा उन बच्चों के लिए, जो स्त्रियों की गुप्त बातें न जानते हों और अपने पैर धरती पर मारती हुई न चलें कि उसका ज्ञान हो जाए, जो शोभा उन्होंने छुपा रखी है और तुम सब मिलकर अल्लाह से क्षमा माँगो, हे ईमान वालो! ताकि तुम सफल हो जाओ’


इसके अलावा सूरः अहज़ाब की आयत न. 59 में कहा गया है, ‘हे नबी! अपनी पत्नियों, अपनी पुत्रियों और ईमान वालों की स्त्रियों से कह दो कि अपने ऊपर अपनी चादरें डाल लिया करें. ये अधिक समीप है कि वे पहचान ली जायें. फिर उन्हें दुःख न दिया जाए और अल्लाह अति क्षमि, दयावान है.’


कुरआन की इन आयतों के आधार पर अलग-अलग इमामों ने महिलाओं के लिए बुर्का, हिजाब या इसी तरह के अन्य पहनावे तय किए है. कुरआन के आदेशों से स्पष्ट है कि ये आदेश महिलाओं का सुरक्षा और उनका सम्मान बनाए रखने के मक़सद से दिए गए हैं. आधुनिक दौर में मुस्लिम समाज के भीतर से बुर्के और हिजाब को लेकर सवाल उठ रहे हैं. दुनिया में पढ़ी लिखी मुस्लिम महिलाएं बुर्के और हिजाब के खिलाफ़ मुहिम चला रही हैं. इस मुहिम को बड़े पमाने पर मुस्लिम पुरुषों का भई समर्थन मिल रहा है. भारतीय मुस्लिम समाज में पर्दे को लकर काफी खुलापन आया है. मुस्लिम लड़किया बुर्का या हिजाब पहने या नहीं ये उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए. ये उनका संवैधानिक अधिकार भी है. स्कूलों में ड्रेस कोड के नाम पर बुर्के या हिजाब के खिलाफ प्रोपगंडा चलाना उचित नहीं है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
यूसुफ अंसारी

यूसुफ अंसारीवरिष्ठ पत्रकार

जाने-माने पत्रकार और राजनीति विश्लषेक. मुस्लिम और इस्लामी मामलों के विशेषज्ञ हैं. फिलहाल विभिन समाचार पत्र, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल्स के लिए स्तंत्र लेखन कर रहे हैं. पूर्व में ‘ज़ी न्यूज़’ के राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख एवं एसोसिएट एडीटर, ‘चैनवल वन न्यूज़’ के मैनेजिंग एडीटर, और ‘सनस्टार’ समाचार पत्र के राजनितिक संपादक रह चुके हैं.

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First published: February 8, 2022, 7:00 am IST