यूपी में 100 सीटों पर चुनाव लड़कर किसे फ़ायदा पहुंचाएंगे ओवैसी

आख़िर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने के पीछे असदुद्दीन ओवैसी का एजेंडा क्या है? मूल रूप से असदुद्दीन ओवैसी हर राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले दो मुद्दे मुख्य रूप से उठाते हैं. पहला विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या में बढ़ोतरी और सत्ता में उनकी वाजिब हिस्सेदारी.

Source: News18Hindi Last updated on: June 28, 2021, 5:52 PM IST
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यूपी में 100 सीटों पर चुनाव लड़कर किसे फ़ायदा पहुंचाएंगे ओवैसी
मुसलमानों की विधानसभा और संसद में हनुमान की और सत्ता में हिस्सेदारी के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अच्छे प्रयोग किए हैं.
ल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने रविवार को उत्तर प्रदेश में 100 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव समाज पार्टी के साथ गठबंधन में है. उन्होंने ऐलान किया है कि इसके अलावा किसी अन्‍य पार्टी से गठबंधन की बात नहीं हुई है. असदुद्दीन ओवैसी के इस ऐलान के बाद यह सवाल उठना लाज़मी है कि उत्तर प्रदेश में वो किसकी पालकी ढोएंगे और किसके जनाज़े को कंधा देंगे.

क्या है एजेंडा
सबसे पहले इस पर चर्चा होनी चाहिए कि आख़िर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने के पीछे असदुद्दीन ओवैसी का एजेंडा क्या है? मूल रूप से असदुद्दीन ओवैसी हर राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले दो मुद्दे मुख्य रूप से उठाते हैं. पहला विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या में बढ़ोतरी और सत्ता में उनकी वाजिब हिस्सेदारी. ज़ाहिर है कि उत्तर प्रदेश में भी वह इसी एजेंडे के तहत चुनाव लड़ने के लिए दम ठोक रहे हैं. इस मुद्दे पर उन्हें प्रदेश के मुस्लिम समुदाय का कितना समर्थन मिलेगा, यह कह पाना बहुत जल्दबाजी होगी. क्योंकि, उत्तर प्रदेश विधानसभा में 2017 से पहले तक मुस्लिम विधायकों की संख्या और सत्ता में उनकी हिस्सेदारी ठीक-ठाक रही है.

हर पार्टी में मज़बूत मुस्लिम नेतृत्व
उत्तर प्रदेश में करीब-करीब हर पार्टी में मुसलमानों का मजबूत नेतृत्व रहा है. यहां सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में सलमान खुर्शीद दो बार पार्टी के अध्यक्ष रहे. 1998 में उनके नेतृत्व में लोकसभा का चुनाव लड़ा गया, तो 2007 का विधानसभा चुनाव भी उन्‍हीं के नेतृत्व में लड़ा गया. इनके अलावा, मोहसिना किदवई, जियाउर रहमान अंसारी और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान जैसे क़द्दावर नेता और बड़े चेहरे संसद में मुसलमानों की नुमाइंदगी और रहनुमाई करते रहे हैं. कई बार लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या 10 से ज्‍यादा रही है. उत्‍तर प्रदेश से चुने गए सांसदों की केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी अच्‍छी हिस्सा रही हैं. लिहाज़ा, यह नहीं कहा जा सकता कि उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को संसद और विधानसभा में नुमाइंदगी और सत्ता में वाजिब हिस्सेदारी नहीं मिली है.

सपा-बसपा के प्रयोग
सत्ता में हिस्सेदारी के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने कुछ प्रयोग किए हैं. 1990 के बाद से इन दोनों पार्टियों का ही सत्ता से लंबा नाता रहा है. समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह के बाद सबसे क़द्दावर नेता आज़म ख़ान रहे. अहमद हसन को भी आज़म ख़ान के बराबर की ही तवज्जो दी गई. वहीं, बीएसपी में मायावती के बाद सबसे मज़बूत नेता नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और उनके बाद में चौधरी मुनक़ाद अली रहे. समाजवादी पार्टी सत्ता में रही तो आज़म ख़ान 5-6 बड़े मंत्रालयों के साथ सबसे मज़बूत मंत्री रहे. बीएसपी सत्ता में रही तो नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी लगभग इतनी ही ताक़त से मुस्लिम समाज की नुमाइंदगी और सत्ता में हिस्सेदारी भी करते रहे.विधानसभा में नुमाइंदगी
2022 के विधानसभा चुनाव में मुसलमानों की नुमाइंदगी एक बड़ा मुद्दा हो सकता है. मौजूदा विधानसभा में अब तक के सबसे कम सिर्फ़ 25 मुस्लिम विधायक हैं. मुस्लिम विधायकों की यह हिस्सेदारी 6% से भी कम है. उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 18.5 फ़ीसदी है. इस हिसाब से, 403 सदस्यों वाली विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 74-75 होनी चाहिए. आजादी के बाद, किसी भी विधानसभा में इतने मुस्लिम विधायक नहीं जीते हैं. 2012 के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 67 मुस्लिम विधायक जीते थे. बाद में, उपचुनाव में एक और विधायक जीता. इस तरह, पिछली विधानसभा में कुल 68 मुस्लिम विधायक थे. विधानसभा में इनकी हिस्‍सेदारी करीब 17 फीसदी थी.

बीजेपी बढ़ी, मुस्लिम विधायक घटे
2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 47 सीटों से 312 सीटों पर पहुंच गई और अपने सहयोगी दलों के साथ उसने कुल मिलाकर 325 सीटें जीती. बीजेपी की इस बढ़ोतरी की वजह से विधानसभा में मुसलमानों की संख्या 65% कम हो गई. 2012 में सिर्फ 24 ही मुस्लिम विधायक जीत पाए थे. 2007 में 14% हिस्सेदारी के साथ 56 मुस्लिम विधायक जीते थे. 2002 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम विधायकों के हिस्सेदारी 11.7 थी. इससे पहले 1991 में जब बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ चुनाव जीतकर सत्ता में आई थी, तब आजादी के बाद मुस्लिम विधायकों की हिस्सेदारी सबसे कम 4% थी.

ओवैसी के हक़ में नहीं समीकरण
पिछले पांच विधानसभा चुनाव के नतीजों के विश्लेषण से यह बात सामने आती है कि जब-जब बीजेपी की ताक़त विधानसभा में बढ़ी है, तब-तब मुस्लिम विधायकों की संख्या कम हुई है. जब-जब समाजवादी पार्टी या बीएसपी चुनाव जीती है, तो मुस्लिम विधायकों की संख्या भी बढ़ी है. इनकी सरकारों में मुसलमानों को हिस्सेदारी भी मिली है. इस हिसाब से देखा जाए तो असदुद्दीन ओवैसी के लिए विधानसभा चुनाव में कुछ खास गुंजाइश नहीं दिखती है. असदुद्दीन ओवैसी न तो विधानसभा में मुसलमानों की नुमाइंदगी ही बढ़ाने की स्थिति में है और ना ही उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी दिलाने की स्थिति में हैैं. लिहाजा, चुनाव में उनकी हालत बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी हो सकती है.

बंगाल से नहीं सीखा सबक़
लगता है असदुद्दीन ओवैसी ने पश्चिम बंगाल में हुई अपनी पार्टी की दुर्गति से कोई सबक़ नहीं सीखा है. पिछले साल, बिहार विधानसभा में चुनाव में 5 सीटें जीतने के बाद ओवैसी ने पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में बड़े ज़ोर-शोर से चुनाव लड़ने का ऐलान किया था. दोनों ही राज्यों में, उन्होंने तभी से तैयारियां शुरू कर दी थी. पश्चिम बंगाल चुनाव में उनका सपना चकनाचूर हो गया. वहां पहले ओवैसी ने फ़ुरफुरा शरीफ़ दरगाह के सज्जादा नशीं मौलाना अब्बास सिद्दीकी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था. लेकिन बाद में, मौलाना ने अपनी अलग पार्टी बना ली. असदुद्दीन ओवैसी ने अकेले 6 सीटों पर चुनाव लड़ा. उनके सभी उम्मीदवारों की ज़मानत जप्त हो गई. 4 सीटों पर टीएमसी के मुस्लिम उम्मीदवार जीते. किसी भी सीट पर ओवैसी की पार्टी का उम्मीदवार 5000 वोट भी हासिल नहीं कर पाया.

बीजेपी की मदद का आरोप
2014 से असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद के बाहर अपनी पार्टी को चुनाव लड़ाना शुरू किया. तभी से उन पर बीजेपी को मदद पहुंचाने का आरोप लग रहा है. पिछले साल हुए बिहार के विधानसभा चुनाव में यह आरोप पुख़ता तरीक़े से लगा. ऐसा माना जाता है कि बिहार में उनके 24 सीटों पर चुनाव लड़ने से आरजेडी और कांग्रेस के महागठबंधन को काफ़ी नुक़सान हुआ. असदुद्दीन ओवैसी सिर्फ 5 सीट जीतने में कामयाब रहे. लेकिन, उनकी मौजूदगी की वजह से बीजेपी को करीब 20 से 25 सीटों का फ़ायदा और महागठबंधन को इतनी सीटों का नुक़सान हुआ. 2014 और 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी असदुद्दीन ओवैसी पर बीजेपी-शिव सेना गठबंधन को मदद पहुंचाने का आरोप लगा था.

क्या है हक़ीक़त
आरोप अपनी जगह हैं और हकीकत अपनी जगह. बिहार बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करने से यह बात सामने आती है कि जो सीटें ओवैसी की पार्टी ने जीती हैं, उनके अलावा बाक़ी सीटों पर उनकी पार्टी को बहुत कम वोट मिले हैं. उनकी पार्टी अगर चुनावी मैदान में नहीं होती, तो उन वोटों से महागठबंधन को कोई खास फ़यदा होने वाला नहीं था. ठीक यही स्थिति महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की भी है. लेकिन राजनीति में अंकगणित ही सब कुछ नहीं होता. असदुद्दीन ओवैसी की चुनाव मैदान में मौजूदगी का मनोवैज्ञानिक फ़ायदा बीजेपी को पहुंचता है. ओवैसी की सभाओं में जुटने वाली मुसलमानों की भीड़ को देखकर बीजेपी की विचारधारा से प्रभावित लोग ना चाहते हुए भी बीजेपी की तरफ खिसक जाते हैं. इससे बीजेपी के वोटों में निश्चित तौर पर इज़ाफ़ा होता है.

क्या बीजेपी के एजेंट हैं ओवैसी?
मुस्लिम समाज में यह बात बड़े पैमाने पर उठती है कि क्या असदुद्दीन ओवैसी बीजेपी के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं? हालांकि इस बात से ओवैसी और उनके समर्थक पूरी तरह इनकार करते हैं. लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषक और प्रेक्षक पुख्ता तौर पर इसे सही मानते हैं. इस दावे को बीजेपी सांसद साक्षी महाराज के बयान से बल मिला है. इसी साल जनवरी में जब असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में बड़ी रैली करके मुलायम सिंह और उनके परिवार पर मुसलमानों को धोखा देने का आरोप लगाते हुए निशाना साधा था. तब, बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने कहा था कि ओवैसी बीजेपी के मित्र हैं. जैसे उन्होंने बिहार में बीजेपी को फायदा पहुंचाया है, ठीक उसी तरह पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भी फायदा पहुंचाएंगे. साक्षी महाराज के इस बयान के बाद ओवैसी पर बीजेपी का एजेंट होने का आरोप और पुख्ता हो गया है. इसे छुटकारा पाना ओवैसी के लिए अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है.

यूपी में पहले भी हो चुके हैं प्रयोग
विधानसभा में मुसलमानों की नुमाइंदगी और सत्ता में हिस्सेदारी के नाम पर असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में जो प्रयोग करना चाहते हैं, वैसे प्रयोग उत्तर प्रदेश में पहले भी कई बार हो चुके हैं. 1967 में अंबेडकरवादी विचारधारा से प्रभावित डॉक्टर जलील फरीदी ने मुस्लिम मजलिस नाम से पार्टी बनाई थी. चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले लोकदल के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था. तब उन्हें 12 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. लेकिन बाद में, मुस्लिम मजलिस ताश के पत्तों की तरह बिखर कर रह गई. 1995 में जब मायावती ने अपने सरकार में शिक्षा मंत्री रहे डॉक्टर मसूद को बाहर का रास्ता दिखाया, तो उन्होंने असद खान के साथ मिलकर नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी बनाई. उन दोनों का इरादा मुस्लिम वोटों को एकजुट करके उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर करने का था. कई चुनाव लड़ने के बाद वह महज़ एक सांसद और एक विधायक ही जिता पाए. वक्त के साथ डॉक्टर मशहूर कई पार्टियों में होते हुए गुमनामी के अंधेरों में खो गए हैं, जबकि अरशद ख़ान समाजवादी पार्टी में महासचिव के तौर पर काम कर रहे हैं.

पीस पार्टी का भी था जलवा
नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के बाद 2008 में पीस पार्टी वजूद में आई. 2009 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद विधानसभा के दो उपचुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद इस पार्टी ने जलवा बिखेरना शुरू किया. 2012 के विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी का ज़बरदस्त जलवा था. यह पहला मौका था कि जब किसी मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टी के पीछे कई पूर्व आईएएस और आईपीएस अधिकारी भी राजनीति में कूद पड़े थे. लग रहा था कि ये पार्टी प्रदेश की सियासत में लंबी पारी खेलेगी. 2012 में इसने 4 विधानसभा सीटें जीती. 3 सीटों पर नंबर दो रही और सभी 25 सीटों पर अच्छे वोट भी हासिल किए. लेकिन 2017 का चुनाव आते-आते इसका भी वही हाल हुआ, जो मुस्लिम मजलिस और नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी का हुआ था.

पुराने रास्ते पर ओवैसी
एक अमेरिकी चिंतक ने कहा है कि अगर आप कोई काम ठीक उसी तरह करते हो, जैसे आप से पहले लोगों ने किया है, तो यक़ीन जानिए आपको वही नतीजे मिलेंगे, जो आपसे पहले लोगों को मिले हैं. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में असदुद्दीन ओवैसी भी उन्हीं तौर-तरीक़ों के साथ उतर रहे हैं. उनसे पहले डॉक्टर जलील फ़रीदी, डॉक्टर मसूद और डॉक्टर अयूब उतरे थे. लिहाज़ा ओवैसी का भी वही हश्र होना तय है, जो इन लोगों का हुआ है. 2012 के चुनाव में पीस पार्टी का अपना दल के साथ गठबंधन था. असदुद्दीन ओवैसी ने अति पिछड़ों की बात करने वाले राजभर के साथ गठबंधन किया है. यह गठबंधन अगर 5-10 सीटें जीत भी जाता है, तो इससे प्रदेश की राजनीति पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

दरअसल, उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे असदुद्दीन ओवैसी और उनके राजनीति का भविष्य भी तय करेंगे. बिहार विधानसभा चुनाव में 5 सीटें जीतने के बाद देशभर में असदुद्दीन ओवैसी का राजनीतिक कद बढ़ा था. पूरे देश भर के मुसलमानों का नेता और मसीहा माना जाने लगा था. लेकिन, पश्चिम बंगाल के चुनाव उनकी पार्टी की हुई दुर्गति ने उनके इस बढ़ते हुए क़द को रोक दिया है. अगर, ओवैसी उत्तर प्रदेश में बिहार वाला प्रदर्शन दोहराते हैं, तो अगले एक-दो चुनाव में उनकी पार्टी अपनी भूमिका निभाएगी. लेकिन, अगर पश्चिम बंगाल वाला प्रदर्शन दोहराते हैं, तो फिर उनकी राजनीति हैदराबाद तक ही सिमट कर रह जाएगी.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
यूसुफ अंसारी

यूसुफ अंसारीवरिष्ठ पत्रकार

जाने-माने पत्रकार और राजनीति विश्लषेक. मुस्लिम और इस्लामी मामलों के विशेषज्ञ हैं. फिलहाल विभिन समाचार पत्र, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल्स के लिए स्तंत्र लेखन कर रहे हैं. पूर्व में ‘ज़ी न्यूज़’ के राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख एवं एसोसिएट एडीटर, ‘चैनवल वन न्यूज़’ के मैनेजिंग एडीटर, और ‘सनस्टार’ समाचार पत्र के राजनितिक संपादक रह चुके हैं.

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First published: June 28, 2021, 5:37 PM IST
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