सिर्फ सख्त कानून नहीं, शिक्षा और जागरूकता भी जरूरी है जनसंख्या नियंत्रण के लिए

उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण क़ानून का मसौदा तैयार करके आम लोगों से इस पर राय मांगी हैं. आयोग ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर इस मसौदे को अपलोड़ कर दिया है. लोगों 19 जुलाई तक आपत्तियां व सुझाव देने को कहा है. लोगों की राय सामने आने पर योगी सरकार इसे लागू करने पर आख़िरी फैसला करेगी.

Source: News18Hindi Last updated on: July 11, 2021, 5:08 PM IST
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सिर्फ सख्त कानून नहीं, शिक्षा और जागरूकता भी जरूरी है जनसंख्या नियंत्रण के लिए


त्तर प्रदेश सरकार ने अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या दिवस के मौके पर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण क़ानून लागू करने का ऐलान करके इस मुद्दे पर बहस को एक नया आयाम दे दिया है. इसे 6 महीने बाद प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है. उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है. यहां शुरू हुई बहस अंततः देशव्यापी बहस का रूप लेगी, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

प्रस्तावित कानून के प्रावधान
उत्तर प्रदेश के राज्य विधि आयोग ने सिफ़ारिश की है कि एक बच्चे की नीति अपनाने वाले माता-पिता को कई तरह की सुविधाएं दी जाएं. वहीं, दो से अधिक बच्चों के माता-पिता को सरकारी नौकरी के अधिकार से वंचित किया जाए. साथ ही, उन पर स्थानीय निकाय, ज़िला पंचायत और ग्राम पंचायत के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई जाए.
इसके अलावा, तीसरा बच्चा होने पर परिवार को सरकार से मिलने वाली सब्सिडी बंद किए जाने और सरकारी नौकरी कर रहे लोगों को प्रोन्नति से वंचित करने का प्रस्ताव रखा गया है. ये सभी प्रस्ताव जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करके नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है. आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित पाठ्यक्रम स्कूलों में पढ़ाए जाने का सुझाव भी दिया है.

एक बच्चे पर राहत
प्रस्तावित कानून एक बच्चे की नीति अपनाने वालों को कई तरह की राहत देता है. इसके तहत जो माता-पिता पहला बच्चा पैदा होने के बाद नसबंदी या आपरेशन करा लेंगे, उन्हें कई तरह की सुविधाएं दी जाएंगी. पहला बच्चा लड़का होने पर 80 हजार रुपये और लड़की होने पर एक लाख रुपये की विशेष प्रोत्साहन राशि दी जाएगी.
ऐसे माता-पिता की बेटी उच्च शिक्षा तक नि:शुल्क पढ़ाई कर सकेगी. जबकि पुत्र को 20 वर्ष तक नि:शुल्क शिक्षा मिलेगी. इसके अलावा उन्हें नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा और सरकारी नौकरी होने की स्थिति में सेवाकाल में दो इंक्रीमेंट भी दिए जाएंगे.


जनता से मांगी है राय
उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण क़ानून का मसौदा तैयार करके आम लोगों से इस पर राय मांगी हैं. आयोग ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर इस मसौदे को अपलोड़ कर दिया है. लोगों 19 जुलाई तक आपत्तियां व सुझाव देने को कहा है. लोगों की राय सामने आने पर योगी सरकार इसे लागू करने पर आख़िरी फैसला करेगी.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मूड इसे विधानसभा चुनाव से पहले लागू करने का लगता है. हालांकि योगी सरकार इस कानून को हाल ही में हुए जिला पंचायत और ग्राम पंचायत के चुनाव से पहले लागू करना चाहती थी, लेकिन किसी वजह से टाल दिया था.

दूसरे राज्यों के क़ानूनों से प्रेरित
उत्तर प्रदेश का यह प्रस्तावित कानून देश के 9 राज्यों में पहले से ही लागू इसी तरह के कानूनों से प्रेरित है. उनका अध्ययन करके ही इसका मसौदा तैयार किया गया है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में ऐसा क़ानून पहले से मौजूद है. 2 साल पहले असम ने भी क़ानून बनाया था, लेकिन इसे 2021 से लागू करने का ऐलान किया था.

अब, असम में इसे अमलीजामा पहनाने की तैयारियां चल रही हैं. हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्वास शर्मा ने 150 मुस्लिम धर्मगुरुओं से इस मुद्दे पर चर्चा करके उनके एतराज़ को दूर करने की कोशिश की है. उनका दावा है कि मुस्लिम धर्मगुरु इस बार उनकी इस बात से सहमत हैं कि ये क़ानून किसी धर्म विशेष के लोगों को परेशान करने की नीयत से नहीं लाया जा रहा है.

पंजाब ने भी 2018 में ऐसा ही क़ानून बनाने का ऐलान किया था. लेकिन उस पर कोई प्रगति नहीं हो पाई. अलबत्ता हरियाणा में कानून ज़रूर बना था, लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. मामला अभी विचाराधीन है.


कितने कारगर हैं ये कानून
अभी तक किसी भी राज्य में इस बात की कोई संस्थागत समीक्षा नहीं की गई है कि इन कानूनों से जनसंख्या नियंत्रण के मकसद में कितनी कामयाबी हासिल हुई है. लेकिन, राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की दर को देखते हुए लगता नहीं कि उसे कोई ज्यादा फायदा हुआ है. सबसे पहले साल 2000 में राजस्थान सरकार ने ऐसा कानून लागू किया था.

लेकिन, 2018 में उसे इस कानून को लचीला बनाना पड़ा. क्योंकि इससे बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगाने में यह क़ानून का पूरी तरह नाकाम रहा. राज्य के लोगों और खासकर सरकारी कर्मचारियों में इस कानून का जबरदस्त विरोध था. लिहाजा वसुंधरा राजे सरकार ने 2018 में इस कानून के कई प्रावधानों को ख़त्म कर दिया. ऐसा ही कुछ मध्यप्रदेश में भी हुआ. वहां भी लोगों के एतराज को देखते हुए कानून के कई प्रावधानों को बदला गया.

अन्य देशों के उदाहरण
सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण चीन का है. चीन ने 1979 में सख्त कानून बनाते हुए एक बच्चे की नीति लागू की थी. देश में करीब 35 साल यह नीति रही. इसने कई तरह की समस्याएं खड़ी कर दीं. 2016 में चीन को नीति बदल कर दो बच्चों की अनुमति देनी पड़ी. इसके बावजूद भी समस्याएं खत्म नहीं हुई, तो हाल ही में चीन ने अपने लोगों को 3 बच्चे पैदा करने की छूट दे दी है.

चीन के अलावा, ईरान, सिंगापुर, वियतनाम, ब्रिटेन, और हांगकांग सहित कई अन्य देशों ने भी दो बच्चों की नीति को लागू किया. लेकिन बाद में, उन्हें इस नीति को बदलना पड़ा. क्योंकि, इससे उम्मीद के मुताबिक कामयाबी नहीं मिली सामाजिक समस्याएं अलग से खड़ी हो गईं.


क्या कहता है तजुर्बा
कई देशों और देश के कई राज्यों का तजुर्बा यह कहता है कि सख्त कानून से लोगों में ख़ौफ़ पैदा करके उन्हें कम बच्चे पैदा करने पर मजबूर तो किया जा सकता है, लेकिन यह बहती हुई जनसंख्या का स्थाई समाधान नहीं है. स्थाई समाधान लोगों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए बढ़ती जनसंख्या के नुक़सान और संसाधनों की कमी के प्रति जागरूक करके ही प्रेरित किया जा सकता है.

शिक्षा ही इसका स्थायी समाधान दे सकती है. दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले माता-पिता को दंडित करना, उन्हें और उनके तीसरे बच्चे को सुविधाओं से वंचित करना नैतिक रूप से क़तई उचित नहीं लगता.

समाज में आई है काफ़ी जागरूकता
जनसंख्या नियंत्रण को लेकर समाज में पिछले कुछ दशकों में काफी जागरूकता आई है. 1975 में देश में इमरजेंसी लागू करने के बाद जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने नसबंदी कानून को जबरन लागू कराने की कोशिश की थी, तब पूरे देश में इसका विरोध हुआ था. ख़ासकर मुस्लिम समुदाय ने इस मुहिम का विरोध किया था.

लेकिन, आज मुस्लिम समुदाय और देश के बाक़ी समुदायों के बीच जनसंख्या वृद्धि की दर में ज्यादा फ़र्क़ नहीं है. यही वजह है कि क़रीब 10 राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए बने कानूनों का मुस्लिम समाज की तरफ से कोई ख़ास विरोध नहीं हुआ. उत्तर प्रदेश में भी अभी तक किसी मुस्लिम संगठन ने इस प्रस्तावित कानून का विरोध नहीं किया है.


पीढ़ी दर पीढ़ी बदलाव
सामाजिक सोच में बदलाव एक झटके से नहीं होता. पीढ़ी दर पीढ़ी बदलाव आता है. इसमें व्यक्तिगत उदाहरण से समझाता हूं. मेरे दादा के छह बच्चे थे. तीन बेटे और तीन बेटियां. हम चार भाई बहन हुए. तीन भाई और एक बहन. हम तीन भाइयों के सिर्फ दो-दो बच्चे हैं. एक बेटा और एक बेटी. बगैर किसी नसबंदी बगैर किसी ऑपरेशन के तीन पीढ़ियों में खुद ब खुद दो बच्चों की नीति लागू हो गई. बगैर किसी दबाव के.

सिर्फ़ शिक्षा और जागरूकता की वजह से. मैं अपने रिश्तेदारों और दोस्तों पर नजर डालता हूं तो पाता हूं कि ज्यादातर के दो ही बच्चे हैं. बगैर क़ानून के ही लोगों ने स्वेच्छा से दो बच्चों की नीति अपना ली है.

तीसरे बच्चे की चाह
कुछ उदाहरण ऐसे ज़रूर है जहां तीन बच्चे हैं. इसकी ख़ास वजह है. यह वजह बड़ी दिलचस्प है. तीसरा बच्चा कहीं बेटी की चाह में हुआ, तो कहीं बेटे की चाह में. कुछ के यहां दो बेटों के बाद एक बेटी है. कुछ के यहां दो बेटियों के बाद एक बेटा है. कुछ के तीन बेटे हैं और कुछ के तीन बेटियां हैं. यह इसलिए हुआ कि किसी को लगा कि दो बेटों के बाद एक बेटी होना ज़रूरी है, इसलिए तीसरा बच्चा पैदा किया.

किसी को लगा कर दो बेटियों के बाद एक बेटा होना ज़रूरी है. इसलिए तीसरा बच्चा पैदा किया. कहीं मुराद पूरी हुई, कहीं नहीं हो पाई. मेरे कई ऐसे हिंदू मित्र भी हैं, जिन्होंने बेटे और बेटी की चाह में तीसरा बच्चा पैदा किया. अगर कुछ लोगों ने लिंगानुपात को ध्यान में रखकर तीसरा बच्चा पैदा करते हैं, तो क्या इसे अपराध मान लिया जाए? ऐसा सोचना ही मूर्खता है.

केंद्रीय कानून बनाने की भी मांग
पिछले कई साल से जनसंख्या नियंत्रण को लेकर केंद्रीय कानून बनाने की भी मांग हो रही है. 2018 में बीजेपी के 125 सांसदों ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर मांग की थी कि वो सरकार को जनसंख्या नियंत्रण पर केंद्रीय कानून बनाने के लिए कहें. उसके बाद, लोकसभा और राज्यसभा में कई सांसदों ने प्राइवेट मेंबर बिल भी पेश किया है.

इन सभी 2 से ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों का मताधिकार छीनने, उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाने और सरकारी नौकरी और पहले से नौकरी कर रहे लोगों को प्रोन्नति से वंचित करने के प्रावधान रखे गए हैं. साथ ही तीसरे बच्चे को भी तमाम सुविधाओं से वंचित करने के प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं.


सिविल सोसाइटी का पुरजोर विरोध
जनसंख्या नियंत्रण पर केंद्रीय कानून बनाने को लेकर सिविल सोसाइटी का पुरजोर विरोध है. बीजेपी सांसदों की तरफ़ से राष्ट्रपति को भेजे गए ज्ञापन का विरोध करते हुए सिविल सोसाइटी के करीब 200 गणमान्य व्यक्तियों ने कई बुनियादी सवाल उठाए थे. इनका कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में भारत के जनसंख्या नीति की काफी प्रशंसा हुई है, क्योंकि भारत में 1991 से लेकर 2011 तक जनसंख्या नियंत्रण का काम बखूबी अंजाम दिया गया है.

जनसंख्या वृद्धि की दर 2.2 % फिरती है और इसे 1.8 लाने का लक्ष्य है, जो कि जल्द ही हासिल किया जा सकता है. इनका तर्क यह भी है कि तीसरे बच्चे को सुविधाओं से वंचित करना बच्चों के सार्वभौमिक अधिकारों पर कुठाराघात है. बाल अधिकारों पर हुए अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर भारत ने दस्तखत किए हैं और यह बात की गारंटी देता है कि भारत बच्चों के साथ किसी किसी भी आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं करेगा.

एक बार पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से आपसी बातचीत में कुछ पत्रकारों ने सवाल किया कि दो बच्चों की नीति पर आपकी क्या राय है? कलाम साहब ने मुस्कुराते हुए कहा मैं इस पर क्या राय दे सकता हूं, मैं तो खुद अपने माता-पिता की चौथी संतान हूं. खैर, मुद्दे पर लौटते हैं. जनसंख्या पर नियंत्रण और लिंगानुपात में संतुलन बनाए रखने के लिए कानून से थोड़ा बहुत तात्कालिक फ़ायदा हो सकता है. लेकिन इसके लिए क़ानून से ज्यादा लोगों में जागरूकता की ज़रूरत है. शिक्षा की जरूरत है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
यूसुफ अंसारी

यूसुफ अंसारीवरिष्ठ पत्रकार

जाने-माने पत्रकार और राजनीति विश्लषेक. मुस्लिम और इस्लामी मामलों के विशेषज्ञ हैं. फिलहाल विभिन समाचार पत्र, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल्स के लिए स्तंत्र लेखन कर रहे हैं. पूर्व में ‘ज़ी न्यूज़’ के राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख एवं एसोसिएट एडीटर, ‘चैनवल वन न्यूज़’ के मैनेजिंग एडीटर, और ‘सनस्टार’ समाचार पत्र के राजनितिक संपादक रह चुके हैं.

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First published: July 11, 2021, 5:08 PM IST
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