बेवजह और बेतुका है कोरोना वैक्सीन पर फ़तवा

सवाल यह है कि जो मुस्लिम संगठन वैक्सीन की जांच का करके ये बताने का दावा रहे हैं कि क्या मुसलमानों के लिए इसका इस्तेमाल जायज़ है या नहीं, जांच करेंगें कैसे. क्या उनके पास यह जांचने का कोई तरीक़ा हैं कि वैक्सीन में पोर्क जिलेटिन का इस्तेमाल हुआ है या नहीं.

Source: News18Hindi Last updated on: December 24, 2020, 5:37 PM IST
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बेवजह और बेतुका है कोरोना वैक्सीन पर फ़तवा
ब्रिटेन के वायरस के ज्यादा फैलने की संभावना है. उन्होंने कहा कि इसी के चलते वहां संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
देश में अगले महीने से कोरोना वैक्सीन लगनी शुरू होनी है. उससे पहले मुस्लिम समुदाय के कोरोना वैक्सीन के हलाल या हराम होने के सवाल पर बहस छिड़ गई है. मुंबई की रज़ा अकादमी के मौलाना सईद नूरी ने कहा कि पहले वे चेक करेंगे कि वैक्सीन हलाल है या नहीं. उनकी मंजूरी के बाद ही मुसलमान इस दवा को लगवाने के लिए आगे आएं. रज़ा अकादमी के इस क़दम की कई उलेमा और मुस्लिम संगठनों ने मुख़ालफ़त करते हुए कहा है कि बग़ैर किसी विवाद में पड़े मुसलमानों को बैख़ाफ़ और बैहिचक कोरोना वैक्सान लगवाने के लिए आगे आना चाहिए.

सबसे पहले देखते हैं कि रज़ा अकादमी किस आधार पर कोरोने वैक्सीन को हलाल और हराम के फेर मे फंसा रही है. अकादमी से जुड़े मौलाना सईद नूरी ने बाक़ायदा एक वीडियो बयान जारी करके सरकार से अपील की है, ‘भारत सरकार से हमाकी गुज़ारिश है कि वो चीन में बनी कोरोना वैक्सीन न मंगाए क्योंकि इसमें सुअऱ की चर्बी का इस्तेमाल किया गया है.किसी दूसरे देश में बनी वैक्सीन या अपने देश में बनी वैक्सीन के कंटेट भी हमारे उलेमा किराम को दिखाए जाएं ताकि हम भी आशवस्त होकर ये ऐलान कर सकें कि इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.’

हालांकि रज़ा अकादमी ने ये ख़ुलासा नहीं किया है कि उसने स्वतः संज्ञान लेकर कोरोना वैक्सीन पर ये फ़तवा यानि अपनी राय ज़ाहिर की है या किसी के पूछे गए सवाल का जवाब दिया है. बयान से ऐसा लगता है कि ये स्वतः संज्ञान लेकर दिया गया है. क्योंकि इसमें किसी सवाल का ज़िक्र नहीं किया गया है. रज़ा अकादमी हर मामले पर फ़तवा जारी करने में आगे रहती है. पिछले कुछ साल में बात-बात पर फ़तवे जारी करने के मामले मे उसकी ख़ास पहचान बनी है. इसे लेकर मुस्लिम समाज में भी उसकी आलोचना होती रही है. कई बार उसे अपनी ग़ल्ती को लिए माफ़ी भी मांगनी पड़ी है.

वैक्सीन आने के बाद से ही मुसलमानों के बीच उठे सवाल
हालांकि जब से कोरोना वैक्सीन आने की सगबुगाहट हुई है तभी से दुनियाभर के मुसलमानों के बीच इसके हलाल या हराम होने पर सवाल उठ रहे हैं. ऐसे ही सवाल पोलियो की दवाई और ख़सरा के टीके को लेकर भी उठे थे. हर दवाई या टीके पर उठते रहे हैं. पिछले कुछ दशकों में ये देखा गया है कि हर नई दवाई या टीका सामने आने के बाद उसमें सुअर की चर्बी के इस्तेमाल के नाम पर पहले इसे हराम बताया जाता है. फिर कुछ उलेमा इसके समर्थन में आगे आकर कहते हैं कि जान बचाने करे लिए इसके इस्तेमाल में कोई हर्ज नहीं है. इस तरह मुसलमानों के लिए हराम चीज़ के हलाल होने में कई साल लग जाते हैं.

आज कोरोना को लेकर भी दुनियाभर के मौलाना-मुफ्तियों में असमंजस बना हुआ है कि क्या यह दवा हलाल विधि से बनी है या हराम तरीके से. यदि यह दवा सुअर के मांस से बनी है तो क्या क़ुरआन के तहत इसे लगवाना जायज़ होगा या नहीं? इस बहस पर इस्लामिक स्कॉलर अतीक़ुर्रहमान रहमान का कहना है कि, 'अल्ला ताला ने जान बचाने के लिए हराम की चीजों के इस्तेमाल की इजाजत दी है. उनका मानना है, 'मुस्लिम धर्म गुरूओं का काम समाज को जागरूक करना है. इसलिए इस काम में यानि कोरोना वैक्सीन लगाने के अभभियान में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए.'

लखनऊ के मौलाना ख़ालिद रशीद फिरंगी महली ने अपने समुदाय के लोगों से किसी अफ़वाह में आने के बजाए बेफ़िक्र होकर वैक्सीन लगवाने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि जान की हिफाजत सबसे बड़ी चीज है इसलिए सभी सामान्य तरीके से वैक्सीन लगवाएं. वैक्सीन को पार्टी या लीडर या राजनीति के चश्मे से देखना सरासर ग़लत है. इसी साल वजूद मे आए मुस्लिम बुद्धिजीवियों के थिंक टैंक इंपार के चैयरमैन डॉ एम जे ख़ान भी कहते हैं कि मुसलमानों को किसी अकादमी या किसी मज़हबी संगठन के फ़तवे के चक्कर में पड़कर कोरोना से लड़ी जा रही लड़ाई को कमज़ोर नहीं करना चाहिए. कोरोना वैक्सीन मौजूदा और आने वाली पीढ़ियों को बचाने के लिए है.पूरी दुनिया में चल रही है इस बात पर बहस
ग़ौरतलब है कि ये बहस सिर्फ़ भारत में ही नहीं चल रही है. पूरी मुस्लिम दुनिया इसकी चपेट में है. सबसे ज़्यादा मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेश्या में भी इस पर बवाल मचा हुआ है. राष्‍ट्रपति जोको विडोडो ने कोरोना वैक्‍सीन को लेकर जल्‍दबाज़ी को हक़ में नहीं हैं. वहां पहले साल 10 करोड़ से अधिक लोगों को टीका लगाने का वादा किया था, लेकिन अभ बड़ी चुनौती बता रहे हैं. राष्‍ट्रपति ने कहा कि टीकाकरण के पहले वो यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वैक्लीन पूरी तरह हलाल है. इसकी ग़ौरतलब है कि 2018 में इंडोनेशिया उलेमा काउंसिल ने एक फ़तवा जारी कर खसरे के टीके को हराम घोषित किया था.

दरअसल क़ुरआन में मुसलमानों को कुछ चीज़ों को खाने से सख़्ती से मना किया गया है यानि उन्हें हराम क़रार दिया गया है. सूरः अल बक़रा की आयत न. 173 में कहा गया है, ‘उसने तो केवल मुर्दार (मरा हुआ जानवर), ख़ून, सुअर का मांस और ऐसा जानवा जिसे अल्लाह के अलावा किसी और के नाम पर ज़िबह किया गया हो. इस पर जो बहुत मजबूर और विवश हो जाए, वह अवज्ञा करने वाला न हो और सीमा से आगे बढ़ने वाला न हो तो उस पर कोई गुनाह नहीं. बेशक अल्लाह दयावान और माफ़ करनेवाला है.’

क़ुरआन की इसी आयत को आधार बनाकर रज़ा अकादमी ने कोरोना वैक्सीन को हराम क़रार दिया है. वहीं इसी के आधार पर संयुक्त अरब अमीरात के शीर्ष इस्लामी निकाय ने इसे जायज़ करार दे दिया है . यूएई फ़तवा काउंसिल ने कोरोना वायरस टीकों में पोर्क (सुअर के मांस) के जिलेटिन का इस्तेमाल होने पर भी इसे मुसलमानों के लिये जायज़ करार दिया है. काउंसिल के अध्यक्ष शेख़ अब्दुल्ला बिन बय्या ने कहा कि अगर कोई और विकल्प नहीं है तो कोरोना वायरस टीकों को इस्लामी पाबंदियों से अलग रखा जा सकता है क्योंकि पहली प्राथमिकता 'मनुष्य का जीवन बचाना है.

प्रामाणिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं तथ्य
काउंसिल ने कहा कि इस मामले में पोर्क-जिलेटिन को दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाना है न कि भोजन के तौर पर. ऐसे में मुसलमान कोरोना वैक्सीन को आराम से लगवा सकते हैं. बताया जा रहा है कि टीकों में सामान्य तौर पर पोर्क जिलेटिन का इस्तेमाल होता है. इससे उन मुस्लिमों की चिंता बढ़ गई है जो पोर्क से बने उत्पादों के प्रयोग को 'हराम' मानते हैं. इस सोच के उलेमा ने चॉकलेट, चिप्स, पिज्जा, बर्गर और कई ऐसे उत्पादों को हराम क़रार दे रखा है जिनमें सुअऱ की चर्बी के इस्तेमाल का शक है. कई मुस्लिम देशों में इन पर पाबंदी भी लगी हुई है.

हालांकि कोरोना वैक्सीन के मामले में अभी तक यह बात प्रामाणिक रूप से सामने नहीं आई है कि इसमें सुअर के मांस या चर्बी का इस्तेमाल हुआ है. किसी फार्मा कंपनी या मेडिकल एक्सपर्ट ने इसकी पुष्टि नहीं की है. फिर भी इसमें पोर्क जिलेटिन के इस्तेमाल की चर्चा दुनिया भर में हैं. मेडिकल साइंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब किसी पशु से एंटीबाड़ी लेकर वैक्सीन बनाई जाती है तो उसे वेक्टर वैक्सीन कहा जाता है. लेकिन कोरोना के मामले में ऐसा कुछ भी नही है. स्वदेशी कोरोना वैक्सीन भारत बायोटेक के साथ रिसर्च करने वाले शोधकर्ता डॉक्टर चन्द्रशेखर गिल्लूरकर का कहना है कि सुअर और कोरोना वैक्सीन का कोई संबंध नही है.

सवाल यह है कि जो मुस्लिम संगठन वैक्सीन की जांच का करके ये बताने का दावा रहे हैं कि क्या मुसलमानों के लिए इसका इस्तेमाल जायज़ है या नहीं, जांच करेंगें कैसे. क्या उनके पास यह जांचने का कोई तरीक़ा हैं कि वैक्सीन में पोर्क जिलेटिन का इस्तेमाल हुआ है या नहीं. क्या दुनिया की किसी इस्लामी विश्वविद्यालय में ऐसी कोई लैब बनाई गई है जो इस बात की पुष्टि कर सके कि वैकसीन इस्लामी तरीक़े से बनाई गई या नहीं. अगर उलेमा को इस बात की इतनी ही चिंता है तो उन्हें हायतोबा मचाने के बजाए इस्लामी शिक्षा केंद्रों में ऐसे अनुसंधान केंद्र खोलने चाहिए जहां इस्लामी तरीक़े से दवाईयां, वैक्सीन और इंजेक्शन वगैरह बनाए जा सकें. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
यूसुफ अंसारी

यूसुफ अंसारीवरिष्ठ पत्रकार

जाने-माने पत्रकार और राजनीति विश्लषेक. मुस्लिम और इस्लामी मामलों के विशेषज्ञ हैं. फिलहाल विभिन समाचार पत्र, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल्स के लिए स्तंत्र लेखन कर रहे हैं. पूर्व में ‘ज़ी न्यूज़’ के राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख एवं एसोसिएट एडीटर, ‘चैनवल वन न्यूज़’ के मैनेजिंग एडीटर, और ‘सनस्टार’ समाचार पत्र के राजनितिक संपादक रह चुके हैं.

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First published: December 24, 2020, 3:49 PM IST
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