डीडीसी चुनावः कश्मीर में जम्हूरियत की जीत

डीडीसी चुनावों (DDC Elections) में 51.76 फ़ीसदी वोट पड़े. जम्मू (Jammu) के रियासी में सबसे ज़्यादा 74.62 प्रतिशत लोग वोट डालने निकले, जबकि आतंकवाद से प्रभावित पुलवामा ज़िले (Pulwama District) में सबसे कम 6.7 प्रतिशत लोगों ने वोट डाला.

Source: News18Hindi Last updated on: December 23, 2020, 9:48 AM IST
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डीडीसी चुनावः कश्मीर में जम्हूरियत की जीत
पिछले साल अगस्त में राज्य से अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने और इसे दो हिस्सों में बांट कर केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद जम्मू कश्मीर में यह पहला चुनाव हुआ है. फाइल फोटो
नई दिल्ली. जम्मू-कश्मीर में ज़िला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनावों में आख़िरकार बीजेपी ने जम्मू में अपना दबदबा क़ायम रखते हुए कश्मीर घाटी में भी कमल खिलाने में कामयाबी हासिल कर ली है. घाटी में बीजेपी ने तीन सीटें जीती हैं. कश्मीर घाटी में यूं तो स्थानीय पार्टियों के गुपकार गठबधंन ने दबदबा बरक़रार रखा है. लेकिन, यहां बीजेपी का खाता खुलना ज़्यादा महत्वपूर्ण है. इसे कश्मीर में जम्हूरियत की जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए.

कश्मीर घाटी में बीजेपी के कुछ सीटें जीत लेने से यह साफ़ ज़ाहिर हो गया है कि यहां के लोगों में अब बीजेपी को लेकर सोच बदलनी शुरू हो गई है. श्रीनगर के बीजेपी उम्मीदवार एजाज़ हुसैन ने जीत के बाद कहा कि घाटी के लोग विकास चाहते हैं. हमने गुपकार गठबंधन के उम्मीदवार के ख़िलाफ लड़ाई लड़ी. हमने बीजेपी की नीति और एजेंडे को लोगों के बीच पहुंचाया. नतीजा ये हुआ कि बीजेपी श्रीनगर की बलहामा सीट जीतने में कामयाब रही. बीजेपी की तरफ से चुनाव प्रभारी बनाकर भेजे गए सैयद शाहनवाज़ हुसैन इन नतीजों से बेहद ख़ुश हैं. उन्होंने कहा कि बीजेपी ने तीन सीटों से कश्मीर घाटी में अपना खाता खोला है. यह दर्शाता है कि कश्मीर घाटी के लोग विकास चाहते हैं.

दरअसल इन चुनावों में यह बात मायने नहीं रखती कि किस पार्टी ने कितनी सीटें जीती हैं. मायने यह रखता है कि जम्मू-कश्मीर के आम लोगों ने चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेकर जम्हूरियत में अपना विश्वास जताया है. पिछले साल अगस्त में राज्य से अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने और इसे दो हिस्सों में बांट कर केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद जम्मू कश्मीर में यह पहला चुनाव हुआ है. चुनाव की घोषणा के वक़्त कुछ संगठनों ने चुनाव बहिष्कार का ऐलान किया था. लेकिन स्थानीय पार्टियों ने चुनाव लड़ने का फैसला किया. लोगों ने भी चुनाव में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया.

घाटी के लोगों में जम्हूरियत यानि लोकतंत्र में यक़ीन का सुबूत यह है कि राज्य में 280 सीटों के लिए 2178 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे. बड़े पैमाने पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी क़िस्मत आज़माई. चुनाव आठ चरणों में शांतिपूर्ण ढंग से हुए. चुनावों में 51.76 फ़ीसदी वोट पड़े. जम्मू के रियासी में सबसे ज़्यादा 74.62 प्रतिशत लोग वोट डालने निकले, जबकि आतंकवाद से प्रभावित पुलवामा ज़िले में सबसे कम 6.7 प्रतिशत लोगों ने वोट डाला. स्थानीय निकायों के चुनाव में क़रीब 52 फ़ीसदी लोगों का वोट डालना लोकतंत्र में इनके विश्वास को ही दर्शाता है. इससे यह उम्मीद भी जगी है कि जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद यहां जम्हूरियत की जड़ें भविष्य में और भी मज़बूत होंगी.
चुनाव प्रचार के दौरान आखिर तक कश्मीर में डटे रहे बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन प्रदेश में शांतिपूर्ण माहौल में जमकर मतदान को लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं. उनका कहना है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत का सपना साकार हो गया है. उन्होंने साफ किया कि परिणाम साबित कर देंगे कि लोग पार्टी से काफी उम्मीदें रखते हैं. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र रैना ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया है. उनके अनुसार जनता ने आतंकियों और अलगाववादियों को नकार दिया है. लोगों का जोश भारतीय लोकतंत्र में विश्वास है.

शाहनवाज़ हुसैन की इस बात में दम नज़र आता है कि घाटी आज पूर्व प्रधानंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की नीति- इंसानियत, जम्हूरियत, कश्मीरियत पर आगे बढ़ती दिख रही है. बतौर प्रधानमंत्री वाजपेयी अपने कार्यकाल के आख़िर में कश्मीर के दौरे पर गए थे. दो दिन के अपने प्रवास के दौरान अटल बिहारी ने श्रीनगर एयरपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने के प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी थी. श्रीनगर एयरपोर्ट के इस मॉर्डनाइजेशन के दो फायदे थे. पहला- श्रीनगर एयरपोर्ट की क्षमता दोगुनी होती. दूसरा- श्रीनगर को पूरी दुनिया से सीधे जोड़ा जा सकता था. इससे पहले वाजपेयी कश्मीर तक रेल प्रोजेक्ट की शुरुआत कर चुके थे.

इस दौरे पर अटल बिहारी वाजपेयी ने जम्मू-कश्मीर में नेशनल हाइवे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट की शुरुआत की. इस प्रोजेक्ट से श्रीनगर को चार लेन के हाइवे के ज़रिए कन्याकुमारी से जोड़ा जाना था. इन दोनों प्रोजेक्ट्स के साथ जम्मू-कश्मीर पहुंचे वाजपेयी ने 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के गठबंधन से मुख्यमंत्री बने मुफ्ती मोहम्मद सईद को मुक्तकंठ से बधाई दी थी. साथ ही उन्होंने जम्मू-कश्मीर की जनता की चुनावों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने पर खुले दिल से तारीफ़ भी की थी. तब वाजपेयी ने कहा कि कश्मीर समस्या को बातचीत के जरिए सुलझा लिया जाएगा.बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी ने कहा कि बंदूक के दम पर किसी समस्या को हल नहीं किया जा सकता. वहीं कश्मीर समस्या को हल करने के नीति को शब्दों में रखते हुए अटल बिहारी ने कहा कि वह तीन सिद्धांत- इंसानियत (Humanism), जम्हूरियत (Democracy) और कश्मीरियत (हिंदू-मुस्लिम दोस्ती की परंपरा) पर चलते हुए इस समस्या को हल करने के पक्ष में हैं. वाजपेयी की इस नीति को जम्मू-कश्मीर में खूब सराहा गया था. अगर आज बीजेपी कश्मीर घाटी में अपना खाता खोलकर कमल खिलाने में कामयाब हुई तो ये मानने में किसी को गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि इस की ज़मीन वाजपेयी ने ही तैयार की थी.

वाजपेयी की कोशिशों का ही नतीजा रहा कि कश्मीर में बीजेपी को उसका झंडा उठाकर चलने वाले लोग मिले. 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पास जम्मू कश्मीर में 25 सीटें थीं और यह सभी जम्मू में थीं. कश्मीर में इसका खाता नहीं खुला था. हालांकि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी जम्मू और लद्दाख की सीटें जीतने में सफल रही थी. लेकिन, कश्मीर में कुछ खास नहीं कर पाई थी. आज हालात अलग हैं. कश्मीर में डीडीसी की 140 सीटों में से बीजेपी ने 80 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे. इनमें से उसने तीन सीटें जीतकर अपना परचम लहरा दिया है.

इसके लिए बीजेपी ने जीतोड़ मेहनत भी की. डीडीसी चुनाव में बीजेपी ने ज़ोरदार प्रचार अभियान छेड़ा. 19 केंद्रीय मंत्रियों और अन्य वरिष्ठ नेताओं को प्रचार में उतारा. इन नेताओं ने 450 से अधिक रैलियां प्रदेश में कीं. पार्टी के कश्मीर प्रभारी शाहनवाज हुसैन अंत तक जमे रहे और कश्‍मीर के हर ज़िले और हर ब्लॉक में पहुंचे. भले ही ज्‍यादातर पार्टी के दिग्‍गज जम्‍मू में प्रचार करते रहे, लेकिन पार्टी प्रभारी और चुनाव प्रभारी ने कश्‍मीर में भी अपने कार्यक्रम रखे. चुनाव जीतने के लिए हर मुमकिन करने का बीजेपी की कोशिशों का ही नतीजा है कि कश्मीर घाटी में उसने दमदार एंट्री मारी है.

दरअसल जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के ख़ात्‍मे के बाद हुआ यह पहला चुनाव बीजेपी और स्थानीय राजनीतिक दलों के लिए बहुत ही अहम था. स्थानीय पार्टियों के लिए जहां अस्तित्व बचाने की चुनौती थी, वहीं बीजेपी के लिए अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के अपने फ़ैसले पर जनता की मुहर लगवाने की चुनौती थी. विपक्ष को एकजुट होकर चुनाव में उतरना पड़ा. यही वजह है कि चुनाव प्रचार पूरी तरह बीजेपी बनाम अन्य हो गया. बीजेपी ने प्रचार में यह दिखाया कि वह कश्मीर में मज़बूती से उतर रही है. नियंत्रण रेखा से सटे दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में बीजेपी की रैलियों ने इन चुनावों को काफी रोचक बना दिया.

यह बीजेपी का ही डर था कि कश्मीर की मुख्य धारा की सात राजनीतिक पार्टियों ने गुपकर घोषणा पत्र गठबंधन (पीएजीडी) के बैनर तले चुनाव लड़ा. इनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भी शामिल हैं. शुरुआत में कांग्रेस भी इसका हिस्सा थी, जब बीजेपी ने इन दलों को ‘गुपकर गैंग' कहकर निशाना साधा तो कांग्रेस ने इससे दूरी बना ली. नतीजा यह रहा कि कांग्रेस न गठबंधन में शामिल रही और न ही अकेले अपनी मौजूदगी का अहसास करा पाई. जम्मू में तो उसने पहले ही बीजेपी के हाथों अपनी सियासी ज़मीन गंवा दी है. अब ख़तरा पैदा हो गया है कि कहीं कश्मीर में भी बीजेपी उसका जनाधार न हड़प ले.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने माना कि इस बार कश्मीर उनके एजेंडे में सबसे ऊपर था. विकास की उम्मीद पाले लोगों का बीजेपी को काफी समर्थन मिला है. अभी हम आंकड़ों में नहीं जाना चाहते, लेकिन निश्चित तौर पर डीडीसी चुनावों के परिणाम कश्मीर में बदलाव की नींव को और मजबूत करेंगे. साफ है कि बीजेपी अब एक-दो फ़ीसद वोट से ख़ुश नहीं होना चाहती बल्कि नए कश्मीर के निर्माण में अपनी भागीदारी साबित करना चाहती है. ख़ासकर शिया बहुल क्षेत्रों में बीजेपी की ख़ास तौर से नज़र है. देश भर में शिया समुदाय बीजेपी समर्थक माना जाता है. लिहाज़ा इसी के सहारे बीजेपी कश्मीर में भी अपना जनाधार बढ़ाने के बारे में सोच सकती है.

(लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
यूसुफ अंसारी

यूसुफ अंसारीवरिष्ठ पत्रकार

जाने-माने पत्रकार और राजनीति विश्लषेक. मुस्लिम और इस्लामी मामलों के विशेषज्ञ हैं. फिलहाल विभिन समाचार पत्र, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल्स के लिए स्तंत्र लेखन कर रहे हैं. पूर्व में ‘ज़ी न्यूज़’ के राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख एवं एसोसिएट एडीटर, ‘चैनवल वन न्यूज़’ के मैनेजिंग एडीटर, और ‘सनस्टार’ समाचार पत्र के राजनितिक संपादक रह चुके हैं.

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First published: December 22, 2020, 7:07 PM IST
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