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बीजेपी के लगातार हमलों ने ‘छोटे चौधरी’ को बना दिया बड़ा 'बयानवीर'

जयंत चौधरी अपने पिता अजित सिंह और बीजेपी के बीच पैदा हुई खाई का खामियाजा भुगत रहे हैं. अजित सिंह 2001-2003 तक अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री रहे थे. लेकिन, 2004 में उन्होंने सपा के साथ गठबंधन करके लोकसभा का चुनाव लड़ा. 2009 में उन्होंने फिर बीजेपी के साथ गठबंधन किया. इसी चुनाव में जयंत पहली और आख़िरी बार लोकसभा चुनाव जीत थे. बाद में अजित सिंह यूपीए सरकार में शामिल हो गए थे. वो 2011 से 2014 तक नागरिक उड्डयन मंत्री रहे. राजनीतिक गलियारों में कहा जाता है कि अजित का दूसरी बार पाला बदलना बीजेपी को अखर गया था.

Source: News18Hindi Last updated on: February 3, 2022, 9:08 PM IST
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बीजेपी के लगातार हमलों ने ‘छोटे चौधरी’ को बना दिया बड़ा 'बयानवीर'
राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी की फाइल फोटो

वन्नी नहीं हूं जो पलट जऊंगा’ और ‘मुझे नहीं बनना हेमा मालिनी’ जैसे चुनावी डायलॉग उत्तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनावों के दौरान निकले हैं जयंत चौधरी के मुंह से. रातों रात हिट हुए ये डायलॉग गृहमंत्री अमित शाह के उन्हें समाजवादी पार्टी का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ आने के ऑफ़र के जवाब में आए हैं.


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘गर्मी शांत करने’ और ‘मई-जून में यूपी को शिमला बनाने’ वाले बयान के जवाब में भी जयंत ने उन्हें ठंड से बचने के लिए कंबल लपेट कर गोरखपुर जाने की सलाह दे डाली. जयंत के ये बयान एक सौम्य से दिखने वाले युवा नेता के आक्रामक राजनीतिज्ञ में बदलने की प्रक्रिया का हिस्सा लगते हैं.


बीजेपी की चुनौती

दरअसल गृहमंत्री अमित शाह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जीत को लेकर ज़्यादा चिंतित हैं. पहले और दूसरे चरण में जिन 113 सीटों पर चुनाव होना है, उनमें से पिछली बार 91 सीटें बीजेपी ने जीती थीं. पहले चरण वाली 58 में से 53 और दूसरे चरण वाली 55 में से 38 बीजेपी के खाते में गई थीं. बीजेपी के सामने पुराना प्रदर्शन दोहराने की चुनौती है.


मुज़फ्फरनगर दंगों से हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट-मुसलमान समीकरण ध्वस्त हो गए थे. मोदी लहर और हिंदुत्व के मुद्दों पर हुए विधानसभा चुनाव में ‘जाट बेल्ट’ या ‘हरित प्रदेश’ कहे जाने वाले इस इलाके में रालोद के बजाय बीजेपी का झंडा फहराया था. इस इस बार जयंत और अखिलेश के मेल से सियासी गणित बदला हुआ दिखता है, लिहाज़ा बीजेपी ने इस बार पूरी ताक़त झोक दी है.


बीजेपी के चक्रव्यूह में जयंत

बीजेपी के तमाम नेताओं के निशाने पर जयंत हैं. बीजेपी के बड़े नेताओं के चक्रव्यूह में फंसे जयंत अभिमन्यु की तरह इसे तोड़ने की कोशिशों में जुटे हुए हैं. महाभारत में तो कौरवों के रचे चक्रव्यूह में अभिमन्यु मारा गया था. क्या जयंत अपने बाप-दादा की राजनीतिक कर्मभूमि में बीजेपी के रचे चक्रव्यूह से खुद को और बाप-दादा से विरासत में मिली पार्टी को बचा पाएंगे, ये चुनावी नतीजे ही बताएंगे.


लेकिन, वोट डाले जाने तक मीडिया और सोशल मीडिया में बयानों का और ज़मीन पर वोटरों को अपने पाले में खींचने का दिलचस्प संघर्ष देखने को मिलेगा. अखिलेश के साथ मिल कर जयंत लगातार पश्चिमी उत्तर के दौरे पर हैं. कहीं प्रेस कांफ्रेस के ज़रिए तो कहीं जन संवाद और जन संपर्क अबियान के ज़रिए वो जाट-मुस्लिम एकता को बनाए रखने की जद्दोजहद कर रहे है. जानते हैं इसी से उनकी राजनीतिक विरासत बचेगी और उनका राजनीतिक करियर भी आगे बढ़ेगा.


जयंत का तल्ख लहजा, तीखे तेवर

जयंत समझ गए हैं कि जंग में विरोधी जिस हथियार से वार करे, पलटवार उससे ज्यादा धारदार हथियार से होना जाहिए. यही वजह से है कि बीजेपी नेताओं के बयानों का वो तुर्की-ब-तुर्की जवाब दे रहे हैं. उनके बयानों पर उनके चाहने वाले तालियां भी खूब पीट रहे हैं. अभी तक जयंत कम बोलने वाले और सौम्य स्वभाव के समझे जाते थे. लोकिन हाल ही में उनके बेबाक बयान हैरान करने वाले हैं. उनकी हाज़िर जबावी देखने लायक है. उनके तेवर तीखे होते जा रहे हैं.


बीजेपी को लेकर उनका लहजा तल्ख़ होता जा रहा है. राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि बीजेपी के तमाम नेताओं ने लगातार हमले करके जयंत को मुंह खोलने, तीखे तेवर अपनाने को मजबूर कर दिया है. बीजेपी की तरफ से ये दावा भी किया गया का 10 मार्च के बाद जयंत पाला बदल लेंगे. ऐसे में जयंत के लिए मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा जीतने लिए भी बीजेपी के खिलाफ आक्रामक होना ज़रूरी है.


मुसलमानों का भरोसा जीतने की चुनौती





मुसलमानों का भरोसा जीतना जयंत के लिए बेहद ज़रूरी है. उन्होंने भले ही कह दिया हो कि वो चवन्नी नहीं हैं जो पलट जाएंगे. उनकी पार्टी का इतिहास तो चुनाव के बाद पलटी मारने का रहा है. जयंत के चवन्नी वाले बयान के बाद केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेद्र प्रधान ने जयंत को ये इतिहास याद भी दिलाया है. उन्होंने ये भी याद दिलाया है कि जिस बीजेपी के नाम से वो नाक भौं सिकोड़ रहे हैं, उसी के साथ गठबंधन के चलते वो 2009 में मथुरा से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे.


अखिलेश ने इसलिए उनके साथ गठबंधन किया है कि वो जाट-मुस्लिम समीकरण को पुनर्जिवित करके पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी के विजय रथ को रोकेंगे. ऐसा भी मुमकिन है जब मुसलमानों का बड़ा धड़ा उनके गठबंधन को वोट दे. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुसलमान सपा-रालोद गठबंधन को तभी वोट देगा, जब जाट इस गठबंधन को एक तरफा वोट करेगा.


जाटों पर हिंदुत्व की राजनीति का कितना असर?

अखिलेश और जयंत की इस रणनीति की काट के लिए बीजेपी ने बड़े पमाने पर जाटों को टिकट दिया है. जाटों की प्रवृति नेतृत्व करने वाली रही है. ऐसी ख़बरें मिल रही हैं कि सपा-रालोद के जाट उम्मीदवार को जाटों का भरपूर वोट मिलेगा, लेकिन मुसलमान उम्मीदवार जाट उतने उत्साह से वोट नहीं देंगे. इसके बजाय वे बीजेपी के जाट को जिताएंगे.


इसका अहसास जयंत को भी है. शायद इसीलिए जिस मुजफ्फरनगर में दंगो से आई खाई पाटने की कोशिश की जा रही है. वहां छह में एक सीट पर भी गठबंधन ने मुस्लिम उम्मीदवार नहीं दिया है. इससे ज़िले के मुसलमानों में नाराज़गी बताई जा रही है. ख़बरे ऐसी भी मिल रहीं है कि कृषि कानूनों की वापसी और लगातार उठते हिंदू-मुस्लिम मुद्दों की वजह से जाटों के एक बड़े तबके पर फिर से हिंदुत्व का नारा हावी होने लगा है. मतदान से पहले इसे उतारना जयंत के लिए बड़ी चुनौती है.


नेतृत्व के लिए संघर्ष

दरअसल ये पहला चुनाव है जब जयंत रालोद का नेतृत्व कर रहे हैं. पिछले साल कोरोना संक्रमण के चलते चौधरी अजित सिंह की मौत के बाद उन्होंने बतौर रष्ट्रीय अध्यक्ष रालोद की कमान संभाली. इससे पहले वो अजित सिंह की छत्रछाया में ही सियासत कर रहे थे. 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद अजित सिंह ने जयंत को आगे बढ़ाना और स्वतंत्र रूप से पार्टी से जुड़े फैसले लेने शुरु करवा दिए थे.


2018 में हुए कैराना लेकसभा के साथ कई विधानसभा के उपचुनावों में जयंत ने पार्टी की अगुवाई की थी. उन्होंने मुज़फ्फरनगर के दंगाग्रस्त गांवों का सघन दौरा करके जाटों और मुसलमानों के बीच आई खाई को पाटने की कोशिश की थी. सपा की उम्मीदवार तबस्सुम हसन को अपनी पार्टी रालोद के निशान पर पर चुनाव लड़वाकर जितावाया. तब मायावती ने भी सपा-रालोद गठबंधन को समर्थन दिया था. कांग्रेस ने भी उम्मीदवार नहीं उतारा था. इस चुनाव से जयंत एक संघर्षशील नेता के रूप में उभरे थे.


क्या होगा चौघरी चरण सिंह की विरासत का?साल 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में आई मोदी नाम की दूसरी लहर में सारे गठबंधन और तमाम जिताऊ समीकरण धराशायी हो गए थे. उपचुनाव में दिखी जाट-मुस्लिम एकता के बावजूद दोनों चौधरी अपनी सीटें तक नहीं बचा पाए थे. तब अजित सिंह ने जयंत को चौधरी चरण सिंह विरासत सौंपते हुए बागपत से चुनाव लड़वाया था और वो ख़ुद चुनाव लड़ने मुजफ्फरनगर आ गए थे.


बागपत में जयंत को बीजेपी के सत्यपाल सिंह ने हराया था. 2014 में सत्यपाल ने यहां अजित सिंह को हराया था. मुजफ्फरनगर में अजित सिंह को बीजेपी के संजीव कुमार बालियान ने हराया था. 2014 में अजित बागपत सीट पर तीसरे स्थान पर रहे थे. ये जाटों के बीच अजित और जयंत की लगातार कम होती लोकप्रियता का सबूत है. अजित सिंह के दिवंगत होने के बाद अब चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी जयंत पर है. इसीलिए वो अपने भाषणों में पिता अजित सिंह के बजाय अपने दादा चौधरी चरण सिंह का बार-बार नाम लेते हैं.


रालोद का अस्तित्व बचाने की चुनौती

इस चुनाव में जयंत के सामने रालोद का वजूद बचाने की बड़ी चुनौती है. एक राजनीतिक पार्टी के बतौर रालोद का वजूद संकट में है. दरअसल दो लोकसभा चुनावों और एक विधानसभा चुनाव में लगातार हार के बाद रालोद का वजूद पूरी तरह ख़तरे में है. 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद ने 277 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए थे. तब वो सिर्फ छपरौली की सीट ही पाई थी. उसे 15,45811 वोट मिले थे.


ये कुल पड़े वोटों का सिर्फ 1.87% था.  इस वजह से रालोद की क्षेत्रीय पार्टी की भी मान्यता ख़त्म हो गई थी. क्षेत्रीय पार्टी की मान्यता बरकरार रखने के रालोद का विधानसभा सीटों की 3%  सीटें यानि कम से कम 13 सीटें या फिर कोई भी सीट जीते बगैर 8%  वोट हासिल करना जरूरी है. सपा से गठबंधन के ज़रिए जयंत ये लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं. इसीलिए वो गठबंधन में सिर्फ 36 सीटों पर लड़ने को राज़ी हुए हैं.


चौधरी परिवार की साख़ दांव पर

जयंत का ये क़दम बताता है कि वो अब एक परिपक्व राजनेता होने की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं. वैसे तो जयंत 2004 से ही राजनीति में सक्रिय हैं. हालांकि अजित सिंह उन्हें 2004 में ही लोकसभा चुनाव लड़वान चाहते थे. लेकिन तब नागरिकता विवाद के चलते वो चुनाव नहीं लड़ पाए थे. दरअसल जयंत अमेरीका के डल्लास में पैदा हुए थे.


लंदन के स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से उन्होंने राजनीति शास्त्र में स्नातक की डिग्री हासिल की है. पहला लोकसभा चुनाव उन्होंने 2009 में मथुरा से लड़ा था. लेकिन 2014 में वो इसी सीट से बीजपी की स्टार उम्मीदवार हेमा मालिनी से हार गए थे. उसके बाद 2019 में वो अपने बाप-दादा की परंपरागत लोकरसभा सीट बागपत से चुनाव हारे. लगातार हार का स्वाद चख रहे जयंत इस विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी का वजूद और अपनी साख़ बचाने क लिए संघर्ष कर रहे हैं.


खुन्नस का खामियाजा

दरअसल, जयंत चौधरी अपने पिता अजित सिंह और बीजेपी के बीच पैदा हुई खाई का खामियाजा भुगत रहे हैं. अजित सिंह 2001-2003 तक अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री रहे थे. लेकिन, 2004 में उन्होंने सपा के साथ गठबंधन करके लोकसभा का चुनाव लड़ा. 2009 में उन्होंने फिर बीजेपी के साथ गठबंधन किया. इसी चुनाव में जयंत पहली और आख़िरी बार लोकसभा चुनाव जीत थे.


बाद में, अजित सिंह यूपीए सरकार में शामिल हो गए थे. वो 2011 से 2014 तक नागरिक उड्डयन मंत्री रहे. राजनीतिक गलियारों में कहा जाता है कि अजित का दूसरी बार पाला बदलना बीजेपी को अखर गया था. 2014 के लोक सभा चुनाव में बीजेपी ने ठान लिया था कि अजित सिंह और जयंत चौधरी को किसी भी हाल में जीतने नहीं देना है. इसीलिए जयंत को हराने के लिए हेमा मालिनी को उनके खिलाफ उतारा गया. अजित सिंह को हराने के लिए मुंबई के पुलिस कमिशनर पद से इस्तीफा दिलवाकर सतपाल सिंह को उनके ख़िलाफ़ बागपत से उतारा गया. बीजेपी की रणनीति कामयाब रही.


इस चुनाव में बीजपी ध्रुवीकरण कराके एकबार फिर चौधरी को उनके बाप-दादा की राजनीकि कर्मभूमि पर पटकनी देना चाहती है. इसीलिए बीजेपी के तमाम छोटे-बड़े नेता जयंत चौधरी पर हमलावर हैं. जाटों का रुख़ बीजेपी की तरफ मोड़ने के लिए दिल्ली और हरियाणा के बीजेपी नेताओं ने भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में डेरा डाला हुआ है. सही मायनो में देखा जाए तो ये चुनाव जयंत के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है. इनमें जीत उनके ठहरे हुए राजनीतक करियर को नई दिशा देगी. लेकिन अगर वो कामयाब न हुए तो उनके बाप-दादा की राजनीतिक विरासत यहीं ख़त्म हो जागी.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
यूसुफ अंसारी

यूसुफ अंसारीवरिष्ठ पत्रकार

जाने-माने पत्रकार और राजनीति विश्लषेक. मुस्लिम और इस्लामी मामलों के विशेषज्ञ हैं. फिलहाल विभिन समाचार पत्र, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल्स के लिए स्तंत्र लेखन कर रहे हैं. पूर्व में ‘ज़ी न्यूज़’ के राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख एवं एसोसिएट एडीटर, ‘चैनवल वन न्यूज़’ के मैनेजिंग एडीटर, और ‘सनस्टार’ समाचार पत्र के राजनितिक संपादक रह चुके हैं.

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First published: February 3, 2022, 9:08 PM IST
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