मैं अयोध्या

मैं अयोध्या

सरयू के किनारे बसी अयोध्या 1992 के बाद से हर 6 दिसंबर को जागती है. इस तारीख को अब यूं तो 26 साल हो गए हैं पर उसकी यादें और ज़ख़्म आज भी हरे हैं. क्योंकि अयोध्या का मतलब धर्म और राजनीति दोनों ही है. भारत का निकट भविष्य शायद अयोध्या को ही तय करना है.

बाबर, तुम अयोध्या गए थे या नहीं?

Om prakashOm prakash | Hindi.News18.com @prakashnw18

Published: December 5, 2018

मशहूर उपन्यासकार कमलेश्वर की रचना ‘कितने पाकिस्तान’ का मुख्य किरदार अदीब ‘समय की अदालत’ लगा रहा है. इसमें अयोध्या और राम मंदिर पर बाबर के बयान दर्ज किए गए हैं. ये बयान कुछ यूं शुरू होता है-

अदालत में जब बाबर हाज़िर हुआ तो थका हुआ और नाराज था. क़ब्र से निकलकर आने में उसे बहुत तकलीफ़ हुई थी. अदालत ने कहा..

सारे झगड़े की जड़ तुम हो. न तुम राम मंदिर मिसमार (नष्ट) करते न ये झगड़े होते.....

मेरा अल्लाह और तारीख गवाह है... मैंने कोई मंदिर मिसमार नहीं किया और न हिंदुस्तान में कोई मस्जिद अपने नाम से कभी बनवाई. इस्लाम तो हिंदुस्तान में मेरे पहुंचने से पहले मौजूद था...क्या इब्राहीम लोदी खुद मुसलमान नहीं था जो आगरा की गद्दी पर बैठा हुआ था....

-सीधे-सीधे अपनी बाबरी मस्जिद का किस्सा बताओ!

-मैंने कहा न! आगरा मेरी राजधानी थी. अब सोचिए, उस वक़्त हिंदुओं के कृष्ण को भगवान और अवतार मंजूर किया जा चुका था. उनका जन्मस्थान मथुरा में था.. अगर मुझे तोड़ना ही था तो मैं कृष्ण का जन्मस्थान न तोड़ता? भागा-भागा अयोध्या तक जाके राम का जन्मस्थान क्यों तोड़ता?

-लेकिन दुनिया तो कहती है कि अयोध्या के राम मंदिर को तुमने 1528 में गिरवाया और अपने सूबेदार मीर बाक़ी को तुमने आदेश दिया कि उस जगह मस्जिद बनवा दी जाए.... तुम्हारी डायरी ‘बाबरनामा’ के साढ़े पांच महीनों यानी 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 तक के दिनों के पन्ने क्यों गायब हैं?

-उसके बारे में मैं क्या कह सकता हूं!

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-तुम्हें बताना पड़ेगा, क्योंकि 2 अप्रैल को तुम अवध में अयोध्या के ऊपरी जंगलों में शिकार खेल रहे थे. उसके बाद के पन्ने गायब हैं. फिर तुम ‘बाबरनामा’ के मुताबिक़ 18 सितंबर 1528 को आगरा में दरबार लगाए बैठे हो. इस बीच तुम कहां थे. क्योंकि अंग्रेज़ गजेटियर लेखक एचआर नेविल ने यह साफ़-साफ़ लिखा है कि 1528 की गर्मियों, यानी अप्रैल और अगस्त के बीच तुम अयोध्या पहुंचे. वहां तुम एक हफ़्ते रुके और तुमने प्राचीन राम मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया और वहां मस्जिद तामीर करवाई. जिसे बाबरी मस्जिद का नाम दिया गया!

-यह सरासर गलत है! बाबर बोला- मैं क़ब्र में लेटा-लेटा इन सदियों को गुज़रते देखता रहा हूं. सन 1849 तक या कहिए कि 1850 तक तो सब ठीकठाक चला लेकिन 1857 के बाद सल्तनते बरतानिया की नीति बदलनी शुरू हुई...

-बाबर ठीक कह रहे हैं. ए. फ़्यूहरर (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के डायरेक्टर) ने बीच में टोका. हमारी पॉलिसीज़ बदलीं और तब यह तय किया गया कि हिंदू और मुसलमान जो 1857 में एक हुए थे, इन्हें अलग-अलग रखा जाए...नहीं तो अंग्रेज़ी हुक़ूमत चलने नहीं पाएगी. इसीलिए मैंने बाबरी मस्जिद पर लगा इब्राहीम लोदी का जो शिलालेख पढ़ा था, उसे जानबूझकर मिटाया गया..लेकिन मैंने उसका जो अनुवाद किया था वह आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की फ़ाइलों में पड़ा रह गया. उसे नष्ट करने का खयाल किसी को नहीं आया.

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इसी के साथ ‘बाबरनामा’ के वो पन्ने ग़ायब किए गए जो इस बात का सबूत देते हैं कि बाबर अवध में गया तो ज़रूर पर कभी अयोध्या नहीं गया.. और उसके बाद हमारी अंग्रेज़ कौम ने और खासतौर से एचआर नेविल ने जो फ़ैज़ाबाद गजेटियर तैयार किया, उसने शैतानी से यह दर्ज किया कि बाबर अयोध्या में एक हफ़्ते ठहरा और इसी ने प्राचीन राम मंदिर को मिसमार (नष्ट) किया...

यह तो हुई ‘कितने पाकिस्तान’ की बात. अयोध्या का सच इतिहास के कई टुकड़ों में बिखरा हुआ है.

दावे और सच!

पानीपत में इब्राहीम लोदी की हार के बाद बाबर ने अपने सूबेदार मीर बाक़ी ताशकंदी को अवध का इंचार्ज बनाया और ख़ुद ग्वालियर जीतने निकल गया. ‘फ़ैज़ाबाद: सांस्कृतिक गजेटियर’ में प्रो. नीतू सिंह ने यह लिखा है. इसमें उन्होंने दावा किया है कि बाक़ी ने अयोध्या में 1528 में एक मस्जिद बनवाई...

इतिहासकार इरफ़ान हबीब ‘मेडिवल अयोध्या (अवध), डाउन टु द मुग़ल ऑक्युपेशन’ में कहते हैं कि बाबर उस साल अयोध्या में घुसा ही नहीं था- “पानीपत की जीत के बाद बाबर ने पूर्वी प्रांतों को क़ाबू करना शुरू किया. उसने फारमुली वंश के शेख बायज़िद को अवध का गवर्नर बनाया. बायज़िद ने जब बग़ावती तेवर दिखाए तो बाबर ने 28 मार्च 1528 को अवध (अयोध्या) से क़रीब 5-8 मील पहले अपना कैंप लगाया. बाबर के सिपाहियों ने बायज़िद को सरयू से पीछे खदेड़ दिया, जहां वह डेरा डाले था. ख़ुद बाबर ने अयोध्या में दाखिल होने का ज़िक्र नहीं किया है..”

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इतिहासकार रामशरण शर्मा 'सांप्रदायिक इतिहास और राम की अयोध्या' में लिखते हैं “एक भित्तिचित्र में यह दर्शाया गया है कि किस तरह बाबर के सैनिक राम के इस कल्पित मंदिर को ध्वस्त कर रहे हैं और हिंदुओं का क़त्लेआम कर रहे हैं. इस भित्ति चित्र के नीचे लिखा है कि बाबर के सिपाहियों ने अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करते समय 75 हजार हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया और उनके रक्त को गारे की तरह इस्तेमाल कर बाबरी मस्जिद खड़ी की...यह प्रचार उतना ही झूठा है जितना यह विचार कि बाबर ने राम मंदिर को ध्वस्त किया और उसकी जगह पर बाबरी मस्जिद बनवाई.”

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पूर्व आइपीएस किशोर कुणाल 'अयोध्या रीविज़िटेड' में लिखते हैं कि 1813 में शिलालेख में हेरफेर किया था. तभी से ये बात चल रही है कि बाबर के कहने पर मीर बाक़ी ने मस्जिद बनवाई थी. कुणाल इस शिलालेख को फ़र्ज़ी बताते हैं. उनके अनुसार, 'मंदिर को 1528 में नहीं, बल्कि 1660 में अयोध्या में औरंगजेब के गवर्नर फ़िदाई ख़ान ने गिरवाया था.'

बाबरी मस्जिद परिसर का ताला खोलने का आदेश देने वाले फ़ैज़ाबाद के ज़िला जज (1986) केएम पांडे ने अपनी किताब ‘वॉयस ऑफ कॉन्शस’ में लिखा- “मंदिर के भीतर और बाहर पत्थरों पर जो बातें उकेरी गई हैं, उससे यह बात पुख्ता होती है कि बाबर ने अयोध्या का दौरा किया था और मंदिर का ध्वंस किया था. मंदिर के ही अवशेषों का इस्तेमाल कर मस्जिद का निर्माण किया गया. इसे बनाने की तारीख और जिस मीर बाक़ी ने उसके आदेशों का पालन किया, वे सभी चीजें इन पत्थरों पर साफ़ तौर पर लिखी गई हैं.”

जॉन लेडेन (ब्रिटिश लेखक) ने 1819 में ‘मैमोयर्स ऑफ़ ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर, एंपरर ऑफ़ हिंदुस्तान’में दावा किया- "28 मार्च 1528 को बाबर ने अयोध्या के क़रीब डेरा डाला." जबकि ब्रिटिश इतिहासकार विलियम अर्सकाइन ने 1854 में दो वॉल्यूम में छपी अपनी किताब ‘अ हिस्ट्री ऑफ इंडिया अंडर द टू फ़र्स्ट सॉवरेन्स ऑफ़ द हाउस ऑफ़ तैमूर, बाबर एंड हुमायूं’ में लिखा कि बाबर अयोध्या में एक पखवाड़े तक रहा और वह वहां पर इमारतें बनाने की गतिविधियों में शामिल था.

असल में जो हुआ

1853 में अयोध्या में मंदिर और मस्जिद को लेकर फ़साद हुआ. तब अयोध्या, अवध के नवाब वाज़िद अली शाह के शासन में आती थी. उस वक़्त हिंदू धर्म को मानने वाले निर्मोही पंथ के लोगों ने दावा किया था कि मंदिर को तोड़कर यहां पर बाबर के समय मस्जिद बनवाई गई थी.

1859 में अंग्रेज़ी हुकूमत ने मस्जिद के आसपास तार लगवा दिए और दोनों समुदायों के पूजा स्थल को अलग-अलग कर दिया. मुस्लिमों को अंदर की जगह दी गई, हिंदुओं को बाहर की.

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मगर इस झगड़े के बाद पहली बार 1885 में मामला अदालत पहुंचा. महंत रघुबर दास ने फ़ैज़ाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद के पास राम मंदिर के निर्माण की इजाज़त के लिए अपील दायर की.

इसके बाद 1949 में 22 और 23 दिसंबर की आधी रात मस्जिद के अंदर कथित तौर पर चोरी-छिपे रामलला की मूर्तियां रख दी गईं. अयोध्या में शोर मच गया कि जन्मभूमि में भगवान प्रकट हुए हैं.

मौक़े पर तैनात कांस्टेबल के हवाले से लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट में लिखा गया है कि इस घटना की सूचना कांस्टेबल माता प्रसाद ने थाना इंचार्ज राम दुबे को दी. ‘50-60 लोगों का एक समूह परिसर का ताला तोड़कर, दीवारों और सीढ़ियों को फांदकर अंदर घुस आया और श्रीराम की प्रतिमा स्थापित कर दी. साथ ही उन्होंने पीले और गेरुआ रंग में श्रीराम लिख दिया.’

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राजनीति की अयोध्या

‘युद्ध में अयोध्या’ नामक अपनी पुस्तक में वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा लिखते हैं, “मेरा निष्कर्ष है कि इस पूरे विवाद और आंदोलन के पीछे कांग्रेस मज़बूती से रही. कांग्रेस की नीति आज़ादी के बाद से ही मंदिर समर्थक की रही...विभाजन की त्रासदी के बाद देश में जो सांप्रदायिक हालात थे उसके आगे तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने घुटने टेके. मूर्तियों की पूजा-अर्चना शुरू हुई.”

मस्जिद में रामलला के ‘प्रकट’ होने को लेकर ‘संवेद’ पत्रिका ने जनवरी 2016 के ‘समाजवाद और आचार्य नरेंद्र देव’ विशेषांक में लिखा है.

“सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के बतौर आचार्य नरेंद्र देव फ़ैज़ाबाद सीट से 1948 का उपचुनाव लड़ रहे थे. कांग्रेस ने बाबा राघव दास नामक साधु को उम्मीदवार बनाया, जो मूलत: पुणे (महाराष्ट्र) के थे. कांग्रेस ने आचार्य नरेंद्र देव को नास्तिक बताया. पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी चुनाव प्रचार में आचार्य की नास्तिकता का सवाल उठाया था.”

“राघवदास बाबा ने स्वयं घर-घर जाकर तुलसी की माला बांटी. अंततः साधु जीत गया और एक संघर्षशील समाजवादी हार गया. आज़ाद भारत में धर्मनिरपेक्षता पर कट्टर हिन्दुत्व की यह पहली जीत थी. इस जीत के बाद ही 1949 में बाबरी मस्जिद में रामलला प्रकट हुए. क्या इसे हिन्दुत्व की जीत का जश्न मानें? जब गोविन्द वल्लभ पन्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री हों, रामभक्त साधु राघवदास फ़ैज़ाबाद के विधायक हों तो बाबरी मस्जिद में राम के प्रकट होने का इससे अच्छा मौका और क्या हो सकता था?”

मुसलमानों ने इसका विरोध किया. दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया. फिर सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया.

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डीएम लोकसभा पहुँचा, ड्राइवर विधानसभा

‘युद्ध में अयोध्या’ किताब में हेमंत शर्मा ने मूर्ति से जुड़ी एक दिलचस्प घटना का ज़िक्र किया है.

"केरल के अलप्पी के रहने वाले केके नायर 1930 बैच के आईसीएस अफ़सर थे. फ़ैज़ाबाद के ज़िलाधिकारी रहते इन्हीं के कार्यकाल में बाबरी ढांचे में मूर्तियां रखी गईं या यों कहें इन्होंने रखवाई थीं. बाबरी मामले से जुड़े आधुनिक भारत के वे ऐसे शख्स हैं जिनके कार्यकाल में इस मामले में सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट आया और देश के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर इसका दूरगामी असर पड़ा.”

"नायर 1 जून 1949 को फ़ैज़ाबाद के कलेक्टर बने. 23 दिसंबर 1949 को जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में स्थापित हुईं तो उस वक्त के पीएम जवाहरलाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से फौरन मूर्तियां हटवाने को कहा. उत्तर प्रदेश सरकार ने मूर्तियां हटवाने का आदेश दिया, लेकिन ज़िला मजिस्ट्रेट नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई.”

“जब नेहरू ने दोबारा मूर्तियां हटाने को कहा तो केकेके नायर ने सरकार को लिखा कि मूर्तियां हटाने से पहले मुझे हटाया जाए. देश के सांप्रदायिक माहौल को देखते हुए सरकार पीछे हट गई. डीएम नायर ने 1952 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली. चौथी लोकसभा के लिए वे उत्तर प्रदेश की बहराइच सीट से जनसंघ के टिकट पर लोकसभा पहुंचे. इस इलाके में नायर हिंदुत्व के इतने बड़े प्रतीक बन गए कि उनकी पत्नी शकुंतला नायर भी कैसरगंज से तीन बार जनसंघ के टिकट पर लोकसभा पहुंचीं. उनका ड्राइवर भी उत्तर प्रदेश विधानसभा का सदस्य बना."

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संकल्प लिया, ताला खुला

विश्व हिंदू परिषद की वेबसाइट पर लिखा है “ताले को खुलवाने का संकल्प 8 अप्रैल 1984 को विज्ञान भवन दिल्ली में लिया गया. यही सभा प्रथम धर्मसंसद कहलाई. श्रीराम जानकी रथों के माध्यम से व्यापक जन जागरण हुआ. 1984 में ही वीएचपी ने राम जन्मस्थल को 'आज़ाद' करवाकर वहां मंदिर निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. फ़ैज़ाबाद के ज़िला न्यायाधीश केएम पांडे ने 1 फरवरी 1986 को ताला खोलने का आदेश दिया.”

विवादित स्थल का ताला खुलवाने का आदेश देने वाले जज केएम पांडे के साथ काम करने वाले तत्कालीन सीजेएम सीडी राय एक दिलचस्प किस्सा बताते हैं.

“अयोध्या में ज़िला न्यायाधीश की कुर्सी संभालने के बाद केएम पांडे रामलला के दर्शन करने गए थे. दर्शन के बाद जब जज साहब निकले तो उन्होंने बाहर खड़े एक साधु से रामलला के बंद दरवाज़े के बारे में पूछा. साधु का जवाब जज साहब को परेशान करने वाला था. साधु ने रामलला के बंद दरवाज़े के पीछे अदालत और राजनेताओं को ज़िम्मेदार बताया. जज साहब के कुछ बोलने पर उस साधु ने जज साहब को विवादित स्थल का दरवाज़ा खोलने की चुनौती दे डाली. ज़िला जज पांडे को ललकारते हुए उस साधु ने कहा कि हिम्मत है तो इस मामले में अपना फ़ैसला सुना दो.”

राय के मुताबिक “उस साधु की बात ने जज साहब को अंदर तक झकझोर दिया और उन्होंने तय किया कि वह जल्द से जल्द इस मामले की सुनवाई पूरी करेंगे और हुआ भी यही. इस मामले में जज साहब ने अपनी सुनवाई क़रीब 1 महीने में पूरी कर ली और 1 फरवरी 1986 को ताला खोलने का फ़ैसला सुना दिया.'

ताला खोलने पर मुस्लिम समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई. फलस्वरूप फरवरी में ही बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनी और मुस्लिम समुदाय ने भी विश्व हिंदू परिषद की तरह आंदोलन का रास्ता पकड़ लिया.

ताला खुलने के बाद दोनों पक्षों में समझौते की कोशिशें भी हुईं, लेकिन ये कोशिशें कामयाब नहीं हो पाईं. इस बीच 1989 में आम चुनाव की आहट के बीच वीएचपी ने अयोध्या में मंदिर आंदोलन की धार तेज कर दी. आंदोलन के पीछे अब बीजेपी भी आ चुकी थी.

राजीव गांधी सरकार में हुआ शिलान्यास

अक्‍टूबर 1989 में राजीव गांधी ने फैजाबाद से अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की. अपने भाषण में उन्होंने ‘रामराज्‍य’ का जिक्र किया. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राम मंदिर को लेकर लगातार बन रहे राजनीतिक दवाब के बीच राजीव नहीं चाहते थे कि उनकी हिंदू विरोधी छवि बने. इसलिए नवंबर 1989 में राजीव गांधी सरकार ने हिंदू संगठनों को विवादित स्थल के पास राम मंदिर शिलान्यास की इजाजत दे दी. माना जाता है कांग्रेस सरकार का ये फैसला शाहबानों केस के बाद नाराज हिंदू वोटबैंक को लुभाने के लिए था. लेकिन कांग्रेस का दांव उल्टा पड़ता गया. बीजेपी मंदिर आंदोलन को हाईजैक कर चुकी थी.

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दलित ने रखी आधारशिला

9 नवंबर, 1989 को वीएचपी ने शिलान्‍यास कार्यक्रम आयोजित किया. साधु-संतों और बड़ी राजनैतिक हस्तियों के बीच इस समारोह के लिए वीएचपी ने सहरसा (बिहार) के एक दलित कामेश्वर चौपाल को अयोध्‍या में राम मंदिर के शिलान्‍यास का पहला पत्‍थर रखने के लिए चुना गया. जब अयोध्या में राम मंदिर के बनाने के लिए संघर्ष चल रहा था. तब वीएचपी के आह्वान पर लाखों लोग ईंट को लेकर अयोध्या पहुंच रहे थे. इसी में कामेश्वर चौपाल भी थे. उस वक्त चौपाल संघ में संयुक्त बिहार के सह सचिव थे.

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रथयात्रा के संयोग– 1990

जून 1989 में बीजेपी ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू किया. इससे मंदिर आंदोलन को नया जीवन मिला. लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथयात्रा निकाली.

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर के मुताबिक आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से राम रथयात्रा शुरू की. आडवाणी को 23 अक्टूबर 1990 को समस्तीपुर में जिस अफ़सर ने गिरफ़्तार किया, वह आरके सिंह अब बीजेपी में हैं. मगर सिर्फ़ यही संयोग नहीं. जिस आईएएस अफ़सर अफ़ज़ल अमानुल्लाह ने आडवाणी को गिरफ़्तार करने से इनकार किया था, वह सैयद शहाबुद्दीन के दामाद हैं. शहाबुद्दीन तब बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक थे. अमानुल्लाह तब धनबाद के डीसी थे. आडवाणी का ‘रथ चालक' यानी ड्राइवर एक मुस्लिम था. एक मिनी बस को रथ का रूप दिया गया था.

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मंडल अस्त्र तो मंदिर ब्रह्मास्त्र

आडवाणी की गिरफ़्तारी के कारण बीजेपी ने वीपी सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. सरकार गिर गई. वीपी सरकार के मंडल अस्त्र के ख़िलाफ़ बीजेपी का मंदिर ब्रह्मास्त्र था. वीपी सिंह के कांग्रेस के सहयोग से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने.

एक बार आडवाणी ने पत्रकारों से कहा भी था कि अगर मंडल आरक्षण न लागू होता तो हमारा मंदिर आंदोलन भी न होता. एक अन्य मौके पर आडवाणी ने कहा था कि अगर उन्हें पता होता कि बाबरी मस्जिद ध्वस्त कर दी जाएगी तो वह 1992 में अयोध्या जाते ही नहीं.

रथयात्रा के चरण

रथयात्रा का पहला चरण 14 अक्टूबर को पूरा हुआ. आडवाणी दिल्ली पहुंचे. प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने 18 अक्टूबर को ज्योति बसु को दिल्ली बुलाया. बसु ने आडवाणी से बात की और रथयात्रा स्थगित करने का आग्रह किया. आडवाणी ने बसु की सलाह ठुकरा दी.

19 अक्टूबर को आडवाणी धनबाद रवाना हुए जहां से उन्होंने दूसरा चरण शुरू किया. अयोध्या पहुंचकर वह 30 अक्टूबर को राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण शुरू कराना चाहते थे.

तब बिहार के मुख्यमंत्री लालूप्रसाद ने धनबाद के डीसी अफ़ज़ल अमानुल्लाह को निर्देश दिया कि वे आडवाणी को वहीं गिरफ्तार कर लें. प्रशासन ने राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तारी वारंट तैयार करके अफ़सरों को सौंप दिया पर अमानुल्लाह ने गिरफ़्तार करने से इनकार कर दिया.

अमानुल्लाह को लगा था कि उनके इस क़दम से ग़लत संदेश जा सकता है और समाज में तनाव बढ़ेगा. उधर, लालू प्रसाद यह संदेश देना चाहते थे कि उन्होंने ‘सांप्रदायिक आडवाणी’ का रथ बिहार में नहीं घुसने दिया. रथयात्री लालकृष्ण आडवाणी को 23 अक्टूबर 1990 को समस्तीपुर में जिस अफसर ने गिरफ्तार किया था, वह आर.के सिंह अब बीजेपी के सांसद और मंत्री हैं. आडवाणी की गिरफ़्तारी हुई तो यूपी का सांप्रदायिक माहौल बिगड़ गया और दंगे भड़क गए.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने ‘अयोध्या का चश्मदीद’ में लिखा "एक वक्त ऐसा लगा कि अयोध्या केवल इस्तेमाल के लिए बनी है. वह कभी विश्व हिंदू परिषद के हाथ का खिलौना है तो कभी राजीव गांधी के लिए वोटबैंक की चाबी. वीपी सिंह ने भी इसके ज़रिए अपना जनाधार पुख्ता करने की कोशिश की तो चंद्रशेखर ने भी अपनी चार महीने की सरकार में अयोध्या को लेकर खूब हाथ आज़माया. चंद्रशेखर ने सिर्फ चार महीने में दोनों पक्षों की छह बैठकें इस सवाल पर कराईं कि वहां मंदिर था या मस्जिद"

कट्टरवाद के बीच उदारवाद की बयार

1990 के दशक में एक तरफ मंदिर मुद्दे पर पर उथल-पुथल थी तो दूसरी तरफ़ वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में देश उदारीकरण की राह पर जा रहा था. 1989 से 1999 के बीच गठबंधन और अल्पमत सरकारें आ रही थीं और जा रही थीं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार के मुताबिक “मंडल-कमंडल की लड़ाई सिर्फ राम मंदिर और आरक्षण की लड़ाई नहीं थी. यह वो दौर था जब देश की जनता को मंडल-कमंडल में उलझाकर धीरे से उदारवाद यानी नई आर्थिक नीतियों को धीरे से लागू कर दिया गया. अगर ये लड़ाई नहीं होती तो उदारवाद की नीतियों का यहां विरोध हुआ होता और वे शायद इतनी आसानी से लागू न हो पातीं.”

1992 से पहले

24 मई 1990 को हरिद्वार में हिंदू सम्मेलन हुआ. जिसमें संतों ने घोषणा की कि देवोत्थान एकादशी 30 अक्टूबर 1990 को मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा शुरू करेंगे.

वरिष्ठ पत्रकार मृत्युंजय कुमार झा के मुताबिक जून 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी हुई, जिसमें राम मंदिर बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ. इसे रामजन्म भूमि आंदोलन का नाम दिया गया. 25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से रथयात्रा शुरू की. योजना थी कि आडवाणी का रथ 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में उसी दिन प्रवेश करे, जिस दिन विश्व हिंदू परिषद ने कारसेवा का एलान किया था.

उधर, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार ने तय किया था कि कारसेवा नहीं करने देंगे. फिर भी हज़ारों लोग सुरक्षा व्यवस्था को भेदकर 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंच गए. पुलिस ने लाठी भी भांजी, पर क़रीब 100 कारसेवक फावड़े और औज़ार लेकर बाबरी मस्जिद के गुंबद पर चढ़ गए. वहां भगवा फहराया. इसके बाद दंगे भड़क गए. पुलिस ने फायरिंग की जिसमें 15 लोग मारे गए. विश्व हिंदू परिषद का दावा था कि 50 से ज़्यादा लोग मारे गए.

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ढांचा गिरने से पहले

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने लिखा है "नवंबर के पूरे महीने बैठकों का दौर चलता रहा. इन बैठकों में अयोध्या आंदोलन से जुड़े अलग-अलग नेता और पीवी नरसिम्हा राव सरकार के मंत्री शामिल रहे. ऐसा कोई दिन नहीं बीता जब शीर्ष स्तर पर बात न हुई हो. पर नतीजा वही ढाक के तीन पात. 2 नवंबर 1992 को मुबई में केंद्रीय मंत्री शरद पंवार और पीआर कुमार मंगलम की आरएसएस नेता राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) और मोरोपंत पिंगले से बात हुई. बैठक में भैरोसिंह शेखावत भी शामिल थे. 6 नवंबर को पीएम नरसिम्हा राव और बीजेपी नेता चिन्मयानंद से बात हुई, जो बेनतीजा रही.”

“12 नवंबर को नरसिम्हा राव और लालकृष्ण आडवाणी की फिर बैठक हुई. 18 नवंबर को भी आडवाणी पीएम से मिले. 19 नवंबर को नरसिम्हा राव और कल्याण सिंह की दिल्ली में बैठक हुई. 25 नवंबर को राव ने दिल्ली बुलाकर महंत परमहंस रामचंद्र दास से बात की. 30 नवंबर को राव की नानाजी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बैठक हुई. बैठक में प्रतीकात्मक कारसेवा की सहमति बनी. तय हुआ कि कारसेवा तो होगी पर अदालती झंझटों से बचते हुए. 3 दिसंबर 1992 को राव और आरएसएस नेता राजेंद्र सिंह फिर मिले."

6 दिसंबर का दिन

बीबीसी पत्रकार मार्क टुली उस दिन अयोध्या में मौजूद थे. वह बताते हैं – ‘‘लगभग 15 हज़ार लोगों की भीड़ अचानक आगे बढ़ी और उसने मस्जिद को बचाने के लिए बना पुलिस घेरा तोड़ते हुए मस्जिद के बुर्ज़ पर चढ़ाई कर दी और पल भर में उसे तोड़ने का काम शुरू हो गया. मैंने देखा कि अंतिम घेरा टूट चुका था और ऊपर से बरसाए जा रहे पत्थरों से बचने के लिए पुलिसकर्मी लकड़ी की बनी ढाल से अपने सिर बचाते हुए पीछे हट रहे थे.

एक पुलिस अधिकारी बाक़ी पुलिसकर्मियों को किनारे धकियाते हुए वहां से पहले बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था. तब मुझे अहसास हुआ कि मैं एक ऐतिहासिक घटना का गवाह बन गया हूँ और ये घटना थी- आज़ादी के बाद हिंदू राष्ट्रवादियों की अहम जीत और धर्मनिरपेक्षतावाद को करारा झटका.”

कर्फ़्यू और आशंकाएं

वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया एक महीने की रिपोर्टिंग पर फ़ैज़ाबाद में थे. उनके मुताबिक़ “बाबरी विध्वंस के अगले दिन पूरे देश में कर्फ्यू का माहौल था. कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया था. एक बड़ा तबक़ा अचंभित और डरा हुआ था. लोग अनहोनी से आशंकित थे. कई दिन तक तनाव कायम रहा.”

अख़बारों के मुताबिक़ पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी तनाव देखने को मिला. 7 दिसंबर को पाकिस्तान में 30 हिंदू मंदिर तोड़े जाने की घटना की रिपोर्ट न्यूयार्क टाइम्स ने लिखी थी.

चार राज्यों की सरकार एक साथ हुई बर्खास्त

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफ़ेसर सुबोध कुमार के मुताबिक़, “बाबरी विध्वंस के बाद पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई. विरोध में प्रदर्शन हुए. दंगे शुरू हो गए. इसे देखते हुए नरसिम्हा राव सरकार ने क़ानून व्यवस्‍था के मुद्दे पर यूपी की कल्याण सिंह सरकार, हिमाचल प्रदेश की शांता कुमार, राजस्‍थान की भैरों सिंह शेखावत और एमपी की सुंदर लाल पटवा सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करवा दिया.”

दंगों का सिलसिला

राम मंदिर आंदोलन ने कई बड़े दंगों की नीव रखी. हिंदू-मुस्लिमों में टेंशन 30 अक्टूबर 1990 को ही शुरू हो गई थी जब कारसेवकों ने मस्जिद पर चढ़कर गुंबद तोड़ा और वहां भगवा फहराया. इसकी प्रतिक्रिया में कई शहरों में दंगे हुए. इसके बाद 6 दिसंबर 1992 की घटना ने तो दोनों समुदायों के बीच नफरत और बढ़ा दी. जिससे दंगे हुए और हज़ारों लोग मारे गए.

1990 में दंगे

हैदराबाद में 134 लोगों की मौत हो गई. अलीगढ़ में 11, गोंडा में 42, बिजनौर में 40 और कानपुर में 20 की मौत हुई.

1992 और उसके बाद दंगे

सूरत में 150 लोगों की मौत हुई. कर्नाटक में 73, जयपुर में 28, कोलकाता में 35 और भोपाल में 142 लोग दंगों में मारे गए. 12 मार्च 1993 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई एक के बाद एक 13 बम धमाके हुए. जिसमें 257 लोगों की मौत हुई और करीब डेढ़ हजार लोग घायल हुए. बंगलुरु में 1994 में दंगा हुआ जिसमें 30 लोग मारे गए.

साल 2002 में कारसेवक साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन से अयोध्या से गुजरात लौट रहे थे. इसी बीच गोधरा में कुछ असामाजिक तत्वों ने इस ट्रेन की कई बोगियों को जला दिया. इस घटना में 59 कारसेवकों की मौत हो गई. बाद में प्रतिकार के रूप में यह घटना एक बड़े दंगे के रूप में बदल गई. जिसमें करीब 2000 लोगों की जानें गईं और लाखों लोगों को बेघर होना पड़ा.

पत्रकारों की भूमिका

आशीष नंदी, शिखा त्रिवेदी, शैल मायाराम और अच्युत याग्निक ने ‘राष्ट्रवाद का अयोध्या कांड’ में पत्रकारों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं. किताब के मुताबिक “स्थानीय पत्रकारों ने 30 अक्टूबर का दिन 'महान विजय' के दिन के रूप में मनाया. वे सड़कों पर प्रसाद बांटते देखे गए. बाद में आंदोलन के नेताओं द्वारा महान विजय के दिन की तुलना विजयादशमी से की जाने लगी...”

“30 अक्टूबर से पहले ही हिंदी के दो प्रमुख अख़बार.. अपनी कारसेवा शुरू कर चुके थे.. 30 अक्टूबर से पहले अखबार या तो सुरक्षाबलों पर कारसेवकों को सताने का इल्ज़ाम लगा रहे थे या उनके आत्मविश्वास को कमज़ोर करने के लिए उन्हें क़ानून और व्यवस्था का एजेंट बताने में लगे हुए थे. मसलन यह प्रचार किया जा रहा था कि जो भी व्यक्ति आते-जाते राम का नाम भी लेता है यानी राम-राम या जै सियाराम कहता है और यहां तक कि अर्थी ले जाते समय राम नाम सत्य है कहता है तो पुलिस उसे तंग करती है. एक अखबार...ने पुलिस पर इल्ज़ाम लगाया कि वह कारसेवकों को राम के बजाय मुलायम का नाम लेने पर मजबूर कर रही है."

"एक के बाद एक ख़बरें छापी जा रही थीं कि आंदोलन को मुसलमानों का कितना समर्थन मिल रहा है. लखनऊ के एक अखबार...ने पहले पन्ने पर प्रकाशित किया था कि लालकृष्ण आडवाणी का रथ ड्राइव करने वाला मुसलमान ड्राइवर किस प्रकार अन्य मुसलमानों को कारसेवा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है." प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने इनमें से कई अख़बारों को सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का जिम्मेदार ठहराया.

वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया के मुताबिक़ “आडवाणी की रथयात्रा के साथ ही पत्रकारों में विचारधारा को लेकर धड़ेबाजी शुरू हो गई थी. पत्रकारों का एक तबक़ा खास विचारधारा से प्रभावित हो गया था.”

अयोध्या के जैन-बौद्ध दावेदार

विवादित स्थल पर सुप्रीम कोर्ट में बौद्धों ने भी दावा जताया है. अयोध्या के याचिकाकर्ता विनीत कुमार मौर्य आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) की खुदाई में मिले गोलाकार स्तूप, दीवार और खंभों को बौद्ध विहार से जुड़ा बताते हैं. उनका कहना है कि ये विशिष्टताएं न मंदिर की हैं और न मस्जिद की. चीनी यात्रियों (फाह्यान, ह्वेनसांग) के यात्रा वृतांत, त्रिपिटक साहित्य भी अयोध्या की विवादित भूमि को बौद्धस्थल बताते हैं.

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‘अयोध्या का इतिहास’ में अवधवासी लाला सीताराम ने लिखा है “अयोध्या जैन धर्मावलंबियों का ऐसा ही तीर्थस्थल है जैसा हिंदुओं का.” इतिहासकार रामशरण शर्मा लिखते हैं “अयोध्या को परंपरागत रूप से कई जैन तीर्थंकरों या धार्मिक उपदेशकों की जन्मस्थली भी माना जाता है. जैन इसे तीर्थ मानते हैं. जैन परंपरा में इसे कोसल राज्य की राजधानी बताया गया है, पर यह ठीक कहां स्थित है यह नहीं दर्शाया गया.”

विवादित स्थल के नीचे क्या है?

विवादित स्थल के नीचे क्या है इसका पता किया गया, ताकि विवाद खत्म हो जाए. जनवरी 2003 में रेडियो तरंगों के जरिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष दबे हैं? इसके बाद 12 मार्च से 7 अगस्त 2003 के बीच 82 स्थानों पर खुदाई की गई. इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया इस काम को अंजाम दिया.

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अदालत में अयोध्या

पहला मुक़दमा: विश्व हिंदू परिषद की वेबसाइट के मुताबिक, पहला मुक़दमा (नियमित वाद क्रमांक 2/1950) एक दर्शनार्थी भक्त गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी, 1950 ई. को सिविल जज, फ़ैज़ाबाद की अदालत में दायर किया था. वे उत्तर प्रदेश के तत्कालीन ज़िला गोंडा, वर्तमान ज़िला बलरामपुर के निवासी और हिंदू महासभा, गोंडा के ज़िलाध्यक्ष थे. गोपाल सिंह विशारद 14 जनवरी, 1950 को जब भगवान के दर्शन करने श्रीराम जन्मभूमि जा रहे थे, तब पुलिस ने उनको रोका. पुलिस अन्य दर्शनार्थियों को भी रोक रही थी.

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गोपाल सिंह विशारद ने ज़िला अदालत से प्रार्थना की कि-‘‘प्रतिवादीगणों के विरुद्ध स्थायी व सतत निषेधात्मक आदेश जारी किया जाए ताकि प्रतिवादी स्थान जन्मभूमि से भगवान रामचन्द्र आदि की विराजमान मूर्तियों को उस स्थान से जहां वे हैं, कभी न हटावें तथा उसके प्रवेशद्वार व अन्य आने-जाने के मार्ग बंद न करें और पूजा-दर्शन में किसी प्रकार की विघ्न-बाधा न डालें.’’

वेबसाइट पर लिखी जानकारी के मुताबिक़ अदालत ने सभी प्रतिवादियों को नोटिस देने के आदेश दिए. तब तक के लिए 16 जनवरी, 1950 को ही गोपाल सिंह विशारद के पक्ष में अंतरिम आदेश जारी कर दिया. भक्तों के लिए पूजा-अर्चना चालू हो गई. सिविल जज ने ही 3 मार्च, 1951 को अपने अंतरिम आदेश की पुष्टि कर दी.

मुस्लिम समाज के कुछ लोग इस आदेश के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चले गए. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मूथम व न्यायमूर्ति रघुवर दयाल की पीठ ने 26 अप्रैल, 1955 को अपने आदेश के द्वारा सिविल जज के आदेश को पुष्ट कर दिया. ढांचे के अंदर निर्बाध पूजा-अर्चना का अधिकार सुरक्षित हो गया. इसी आदेश के आधार पर आज तक रामलला की पूजा-अर्चना हो रही है.

घटना के बाद कुल 49 मामले

केस नंबर 197: बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद शाम सवा पांच बजे थाना राम जन्मभूमि, अयोध्या में अज्ञात कार सेवकों के खिलाफ बाबरी मस्जिद गिराने का षड्यंत्र, मारपीट और अन्य मामलों में केस दर्ज किया गया.

केस नंबर 198: इसके कुछ ही देर बाद 198 नंबर केस दर्ज हुआ. इसमें नामजद हुए अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विष्णु हरि डालमिया, विनय कटियार, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा. आठ लोगों के खिलाफ राम कथा कुंज सभा मंच से मुस्लिम समुदाय के खिलाफ धार्मिक उन्माद भडकाने वाला भाषण देकर बाबरी मस्जिद गिरवाने का मुकदमा दर्ज हुआ. जबकि, अलग से 47 केस पत्रकारों और फोटोग्राफरों ने मारपीट, कैमरा तोड़ने और छीनने आदि के अलग से दर्ज करवाए.

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मुकदमे के ट्रायल के लिए ललितपुर में विशेष अदालत स्थापित की गई. बाद में यह रायबरेली स्थानांतरित कर दी गई. सरकार ने बाद में सभी केस सीबीआई को जांच के लिए दे दिए. उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 सितंबर 1993 को 48 मुकदमों के ट्रायल के लिए लखनऊ में स्पेशल कोर्ट के गठन की अधिसूचना जारी की. लेकिन इस अधिसूचना में केस नंबर 198 शामिल नहीं था, जिसका ट्रायल रायबरेली की स्पेशल कोर्ट में चल रहा था. फिर सीबीआई ने सभी 49 मामलों में चालीस अभियुक्तों के खिलाफ संयुक्त चार्जशीट फाइल की.

दीवानी मामले

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील दायर हैं. इनमें 8 मुस्लिम पक्षकारों की ओर से और 6 हिंदू पक्षकारों की तरफ से. 15वां केस बौद्धों का है. जिसके लिए अयोध्या निवासी विनय कुमार मौर्य ने याचिका लगाई थी.

हिंदू पक्षकार- हिंदू महासभा आदि की दलील है कि हाईकोर्ट में रामलला विराजमान की संपत्ति का मालिक बताया गया है. वहां हिंदू मंदिर था और उसे तोड़कर विवादित ढांचा बनाया गया था. ऐसे में हाईकोर्ट एकतिहाई ज़मीन मुसलमानों को नहीं दे सकता.

मुस्लिम पक्षकार- सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकारों का कहना है कि बाबर के आदेश पर मीर बाक़ी ने अयोध्या में 1528 में 1500 वर्गगज ज़मीन पर मस्जिद बनवाई थी. इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता है, मस्जिद वक्फ़ की संपत्ति है और मुसलमान वहां नमाज़ पढ़ते रहे हैं. 22 और 23 दिसंबर 1949 की रात हिंदुओं ने केंद्रीय गुंबद के नीचे मूर्तियां रख दीं.

हाईकोर्ट का फ़ैसला-2010

इलाहाबाद हाईकोर्ट की अयोध्या बेंच ने 30 सितंबर 2010 को दस हजार पन्नों में अपना फ़ैसला सुनाया. न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल, न्यायमूर्ति एसयू खान व न्यायमूर्ति डीबी शर्मा ने अयोध्या के विवादित स्थल 2.77 एकड़ को तीन हिस्सों में बांटने का निर्देश दिया.

कोर्ट ने कहा कि परिसर के एक हिस्से में भगवान राम विराजमान हैं, दूसरे पर सीता रसोई और राम चबूतरा जहां बना है, पर निर्मोही अखाड़े का क़ब्ज़ा रहा है. इसलिए यह हिस्सा निर्मोही अखाड़े के ही पास रहेगा.

दो जजों ने यह भी कहा कि विवादित परिसर की कुछ जगह पर मुसलमान नमाज़ अदा करते रहे हैं. इसलिए जमीन का एक तिहाई हिस्सा मुसलमानों को दे दिया जाए.

जजों ने माना था कि विवादित मस्जिद के अंदर भगवान राम की मूर्तियां 22/23 दिसंबर 1949 को रखी गईं. यह भी माना कि मस्जिद का निर्माण बाबर या उसके आदेश पर किया गया और यह जगह भगवान राम का जन्मस्थान है.

अदालत ने यह भी माना था भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में वहां एक विशाल प्राचीन मदिर के अवशेष मिले हैं, जिसके खंडहर पर मस्जिद बनी. हालांकि तीनों जजों में मतभेद रहे कि मस्जिद बनाते समय पुराना मंदिर तोड़ा गया.

अयोध्या बेंच के फ़ैसले पर दोनों पक्षों ने असंतोष जताया और सुप्रीम कोर्ट चले गए. सुप्रीम कोर्ट की पीठ हाईकोर्ट के फ़ैसले के खिलाफ दायर 13 अपीलों पर सुनवाई कर रही है. फ़ैसला इस बात का होना है कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की विवादास्पद 2.77 एकड़ भूमि पर मालिकाना हक़ किसका है.

अयोध्या कांड के प्रमुख किरदार

लालकृष्ण आडवाणी: सीबीआई की मूल चार्जशीट विवादित ढांचा गिराने के 'षड्यंत्र' के मुख्य सूत्रधार

कल्याण सिंह:1991 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. सीबीआई की मूल चार्जशीट में मस्जिद गिराने के 'षड्यंत्र' में शामिल. तकनीकी कारणों से मुक़दमे से बाहर.



अशोक सिंघल: विश्व हिंदू परिषद नेता अशोक सिंघल रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण आंदोलन के प्रमुख. कारसेवकों से नारा लगवाया "राम लला हम आए हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे. एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो."

विनय कटियार: विश्व हिंदू परिषद के सहयोगी संगठन बजरंग दल के नेता. चार्जशीट के मुताबिक़ कटियार ने 6 दिसंबर को भाषण में कहा, “हमारे बजरंगियों का उत्साह समुद्री तूफान से भी आगे बढ़ चुका है, जो एक नहीं तमाम बाबरी मस्जिदों को ध्वस्त कर देगा."

मुरली मनोहर जोशी: 6 दिसंबर को विवादित परिसर में मौजूद. अभियोजन पक्ष ने कहा कि वे और आडवाणी कारसेवा के लिए मथुरा-काशी होते हुए दिल्ली से अयोध्या गए.

महंत नृत्य गोपाल दास, परमहंस रामचंद्र दास और महंत अवैद्यनाथ कार सेवा के अगुवा थे. इन्होंने ही साधु-संतों, भक्तों और कारसेवकों को देशभर से अयोध्या लाने का बीड़ा उठाया था.



बाबरी मस्जिद के विध्वंस की जांच पड़ताल के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिन 68 लोगों को दोषी ठहराया था, उनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, शिवसेना अध्यक्ष बाल ठाकरे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन, केएन गोविंदाचार्य, उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा और प्रवीण तोगड़िया के नाम भी शामिल थे.

गोरक्षनाथ मठ कनेक्शन

महंत दिग्विजय नाथ: गोरक्षनाथ मठ की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार टीपी शाही बताते हैं "गोरक्षनाथ मठ के महंत दिग्विजय नाथ उन चंद शख्सियतों में थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद को मंदिर में बदलने की कल्पना की थी. उन्हीं की अगुवाई में 22 दिसंबर 1949 को विवादित ढांचे के भीतर भगवान राम की प्रतिमा रखवाई गई थी. तब हिंदू महासभा के विनायक दामोदर सावरकर के साथ दिग्विजय नाथ ही थे, जिनके हाथ में इस आंदोलन की कमान थी. हिंदू महासभा के सदस्यों ने तब अयोध्या में इस काम को अंजाम दिया था."



महंत अवैद्यनाथ: महंत अवैद्यनाथ मंदिर आंदोलन का प्रमुख चेहरा थे. वह श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष थे. अवैद्यनाथ के दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस के साथ बेहद अच्छे संबंध थे. रामचंद्र परमहंस राम जन्मभूमि न्यास के पहले अध्यक्ष भी थे, जिसे मंदिर निर्माण के लिए बनाया गया था. माना जाता है कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने का प्लान उनकी देखरेख में बनाया गया था. मंदिर के लिए विश्व हिंदू परिषद ने इलाहाबाद में जिस धर्म संसद (साल 1989 में) का आयोजन किया, उसमें अवैद्यनाथ के भाषण ने ही इस आंदोलन का आधार तैयार किया.”

अयोध्या का पहला ‘हिंदू’ चुनाव

अयोध्या के वयोवृद्ध पत्रकार शीतला सिंह के मुताबिक़ 1948 के फ़ैज़ाबाद विधानसभा उपचुनाव में आचार्य नरेंद्र देव सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी थे. उनको हराने के लिए कांग्रेस ने खुलकर हिंदू कार्ड खेला. उनके ख़िलाफ़ देवरिया जिले से बाबा राघव दास नामक साधु को उम्मीदवार बनाया.

‘‘उत्तर प्रदेश के प्रीमियर गोविंद वल्लभ पंत ने कांग्रेस प्रत्याशी बाबा राघव दास के समर्थन में अयोध्या के संतों-महंतों की सभाएं कीं, जिनमें उन्होंने कहा कि राघव दास में तो गांधी जी की आत्मा बसती है, लेकिन आचार्य नरेंद्र देव तो नास्तिक हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की नगरी अयोध्या ऐसे व्यक्ति को कैसे स्वीकार कर पाएगी? इस चुनाव में पुरुषोत्तम दास टंडन भी प्रचार में शामिल हुए. उन्होंने भी आचार्य जी की नास्तिकता का सवाल उठाया था. अंतत: साधु जीत गया और एक संघर्षशील समाजवादी हार गया.”



बीजेपी का उदय

1990 की कारसेवा ने राम जन्मभूमि आंदोलन को मज़बूती दी. साथ ही उत्तर प्रदेश में बीजेपी को स्थापित भी कऱ दिया. चुनाव आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक़ 1991 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 221 सीटें मिलीं और कल्याण सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बने. साल भर बाद 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया गया.



डीयू में पॉलिटिकल साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार के मुताबिक, “1995 के बाद हुए आम चुनावों में बीजेपी ने हिंदुत्व के सहारे पकड़ बनानी शुरू कर दी थी. मंदिर मसले पर ही पहली बार बीजेपी केंद्र में सत्ता तक पहुंची. 1996 में हुए आम चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार बीजेपी ने केंद्र में सरकार बनाई. ये अलग बात है कि बहुमत साबित न कर पाने के कारण सरकार मात्र 13 दिन ही चली. दो साल बाद 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने वापसी की और वाजपेयी दोबारा पीएम बने.”



दलों का धार्मिक ध्रुवीकरण

राजनीतिक विश्लेषक सुभाष निगम के मुताबिक़, “6 दिसंबर 1992 की घटना के बाद बीजेपी और शिवसेना ने जहां हिंदुत्व की राह पकड़ी, वहीं कई दल धर्मनिरपेक्षता के नारे के साथ मुस्लिमों के पक्ष में आ खड़े हुए. मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण का फ़ायदा समाजवादी पार्टी ने सबसे ज्यादा लिया. बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तारी का लाभ तब जनता दल नेता लालू प्रसाद यादव ने उठाया. दोनों दलों का कोर वोटर यादव और मुसलमान हैं. मुलायम सिंह का नाम ही लोगों ने 'मुल्ला मुलायम' रख दिया. हालांकि हिंदू-मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के बाद भी देश में कोई मुस्लिम पार्टी पैर नहीं पसार सकी.”



यूपी में बीजेपी को मंदिर से क्या मिला?

यूपी की बात करें तो अयोध्या मामले के ध्रवुीकरण से 1991 में बीजेपी को फायदा मिला. पार्टी ने 221 सीटों पर जीत दर्ज करके सरकार बनाई. 24 जून 1991 को कल्याण सिंह सीएम बने. लेकिन बाबरी विध्वंस के बाद 6 दिसंबर 1992 को उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई.



इसके बाद बीजेपी को यूपी में नुकसान होना शुरू हो गया. 1993 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 177 सीट सीट पर सिमट गई. सत्ता लगी मुलायम सिंह यादव के हाथ. 1996 के चुनाव में बीजेपी की सीटें और घटकर 174 ही रह गईं. राम मंदिर मामले से हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश बेकार साबित होती रही और 2002 में पार्टी को सिर्फ 88 सीट लेकर संतोष करना पड़ा. यह सिलसिला 2012 तक चला. 2007 में 51 और 2012 में सिर्फ 47 सीट ही रह गईं.



इसके बाद बीजेपी में नरेंद्र मोदी और अमित शाह युग शुरू हो गया. 2017 के चुनाव में राम मंदिर मसले को हाशिए पर रखकर बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग शुरू की यानी जातियों पर फोकस किया. पिछड़ी जाति और अनुसूचित जाति में सेंध लगाई और रिकॉर्ड 312 सीट लेकर पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई.



सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ़ सोसायटी एंड पॉलिटिक्‍स के निदेशक प्रो. एके वर्मा कहते हैं कि "यूपी, जहां अयोध्या है वहां 1992 के बाद बीजेपी का ग्राफ नीचे गिरा. पार्टियों को लगता है कि राम मंदिर का मुद्दा महत्वपूर्ण है लेकिन असल में लोग तो विकास चाहते हैं."



केंद्र में बीजेपी ने बनाई पकड़

हालांकि केंद्र में मंदिर आंदोलन ने उसे जरूर सहारा दिया. 1984 में सिर्फ 2 लोकसभा सीटों वाली पार्टी मंदिर मुद्दे पर अपने रुख से हिंदू वोटबैंक को अपनी ओर करने में कुछ हद तक कामयाब रही. उसे 1989 में 85 सीट मिलीं. 1991 में 120 सीट हो गई. 1996 में 161 सीट के साथ अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकार बनाई लेकिन वो सिर्फ 13 दिन चली. 1998 में पार्टी को 182 सीट पर जीत मिली. अटल बिहारी वाजपेयी पीएम बने. 1999 में भी 182 सीट के साथ बीजेपी को सत्ता मिली. वाजपेयी पीएम बने.

लेकिन 2004 के चुनाव में उसे सिर्फ 138 सीट पर संतोष करना पड़ा. 2009 में उसकी सीटें घटकर सिर्फ 116 रह गईं. 2014 में मंदिर आंदोलन के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कल्याण सिंह आदि लगभग साइडलाइन हो चुके थे. पार्टी की कमान नए नेताओं के हाथ में आ गई. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 282 सीट के साथ बीजेपी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया.

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अयोध्या का पॉलिटिकल ग्राफ़

राम मंदिर आंदोलन का बीजेपी को अयोध्या और फैजाबाद में खूब फायदा मिला है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 1991 से 2017 तक अयोध्या विधानसभा से 6 बार बीजेपी की जीत हुई. जबकि सपा को सिर्फ एक बार मौका मिला. जबकि फैजाबाद लोकसभा (अब अयोध्या) में 1991 से 2014 तक चार बार बीजेपी का सांसद बना है. जबकि एक-एक बार कांग्रेस, सपा और बीएसपी के सांसद बने.

2019 की अयोध्या

अयोध्या के विवादित स्थल को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जनवरी 2019 में होगी. मार्च में आम चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो सकती है. संघ परिवार और हिंदू संगठन मंदिर निर्माण को लेकर सरकार पर दबाव बना रहे हैं. 24 नवंबर को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अयोध्या का दौरा कर चुके हैं. 25 नवंबर को विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में धर्मसभा की. बीजेपी का एक हिस्सा चाहता है कि सरकार राम जन्मभूमि मुद्दे पर अध्यादेश लाकर या क़ानून बनाकर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ करा दे. 2019 के आम चुनाव से पहले इस पर उन्हें फ़ैसले की उम्मीद भी है.

सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार कहते हैं "अभी तक तो राजनीतिक दलों की कोशिश राम मंदिर को 2019 का सबसे बड़ा मुद्दा बनाने की है. राम मंदिर, राष्ट्रवाद, हिंदुत्व मुद्दा होगा या नहीं इसका पता पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद चलेगा."

इस वक्त बीजेपी और उसके सहयोगी संगठन मंदिर मसले को हवा देने में जुटे हुए हैं. पूरी कोशिश हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की है. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का कहना है कि ‘‘भगवान राम के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर निर्माण कराने के मार्ग पर कोई रोड़ा अटका रहा है तो वह कांग्रेस है.’’

दूसरी ओर कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि बीजेपी मंदिर-मंदिर रट के सिर्फ हिंदुओं का वोट लेना चाहती है. कांग्रेस बीजेपी को चिढ़ा रही है कि ‘मंदिर वहीं बनाएंगे, तारीख नहीं बताएंगे.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफ़ेसर अब्दुल रहीम कहते हैं, "अब अयोध्या का मसला लोगों पर उतना असर नहीं करता जितना पहले करता था. अयोध्या के बहाने सभी राजनीतिक दल अपना हित साध रहे हैं."

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बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने 22 नवंबर को जयपुर में कहा, "अयोध्या में जहां रामलला विराजमान हैं, उसी स्थान पर भव्य राम मंदिर बने, इसके लिए भारतीय जनता पार्टी कटिबद्ध है और यह हमारा देश से वादा है. इसमें एक इंच भी पीछे हटने का कोई सवाल नहीं है." शाह के अनुसार बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि वह इस मुद्दे का न्यायिक समाधान चाहती है और वहां पर जल्द से जल्द राम मंदिर बनाना चाहती है.

Produced by Om Prakash

Assistance-Praveen Sharma

Graphics-Aniket Saxena

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