कश्मीर में बीजेपी

कश्मीर में बीजेपी

भारतीय जनता पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में कैसे अपनी पैठ बनाई. किन-किन लोगों ने इसके लिए काम किया. कैसे पार्टी ने पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाकर अपने लिए जमीन तैयार की है?

बीजेपी ने कश्मीर में कैसे बनाई पैठ?

| Hindi.News18.com @HindiNews18

Published: October 5, 2018

जनवरी 26, 1992 से कुछ दिनों पहले, भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी ने एक यात्रा की घोषणा की जिसका गणतंत्र दिवस के अवसर पर श्रीनगर के लाल चौक में तिरंगा फहराकर समापन करना था.

जोशी की ये घोषणा उन सैकड़ों हथियारबंद आतंकियों को सीधी चुनौती थी जो श्रीनगर की सड़कों पर खुलेआम घूमते थे. गणतंत्र दिवस के ठीक दो दिन पहले राज्य पुलिस प्रमुख के दफ्तर पर आतंकियों ने बम धमाका किया. पुलिस महानिदेशक समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को धमाके में गंभीर चोटें आईं. उस वक्त ये सभी सुरक्षा तैयारियों पर एक बैठक में हिस्सा ले रहे थे.

अभी और ड्रामा होना बाकी था. भूस्खलन में जम्मू-श्रीनगर सड़क पूरी तरह से धुल गया था. जोशी को अपनी यात्रा के प्लान में आखिरी मिनट पर बदलाव करना पड़ा और उन्हें सीधे घाटी के लिए फ्लाइट लेनी पड़ी.

10 मील श्रीनगर के पश्चिम में बडगाम के हकरमुल्ला गांव में 20 साल से थोड़ी ज्यादा उम्र के नौजवान मुहम्मद अशरफ आज़ाद बीबीसी रेडियो के ज़रिए इन गतिविधियों पर पैनी नज़र रखे हुए थे. अशरफ अपनी उत्साह छुपाए नहीं छुपा पा रहे थे. उन्होंने गणतंत्र दिवस के मौके पर लाल चौंक जाकर सबकुछ अपनी आंखों से देखने का फैसला किया.

पूरी घाटी में कर्फ्यू लगा दिया गया था. लाल चौक की सुरक्षाबलों ने पूरी तरह से घेराबंदी कर रखी थी. आतंकवादी, गुटों में बंटकर पूरी घाटी में अलग-अलग जगहों पर हमले करने के लिए फैल चुके थे. लाल चौक जाने के लिए अशरफ तड़के घर से निकले. ज्यादातर हिस्सा उन्होंने पैदल चलकर तय किया. अशरफ कहते हैं, 'सुरक्षाबलों ने मुझे रोका, लेकिन मैंने झूठ बोला. मैंने उन्हें बताता कि मुझे अस्पताल जाना है.'

Road from Jagarguna to Dornapal

इस दौरान मुरली मनोहर जोशी सुरक्षित श्रीनगर पहुंच चुके थे. वो एक सफेद एम्बेसडर गाड़ी से उतरे जहां उनकी पार्टी के लोगों ने उनका स्वागत किया. लंबे सफेद फिरन और सिर पर गहरे भूरे रंग की गर्म टोपी पहने जोशी ने क्लॉक टावर की चौकी पर झंडे को ऊंचा किया, हालांकि इस दौरान उन्हें कुछ चोट लगी जब तिरंगे को थामने वाले कुछ लोग गिर गए.

बीजेपी कार्यकर्ताओं को झंडे को सलामी देते देख कुछ ही दूरी पर खड़े अशरफ ने भी सलामी देने के लिए अपना हाथ ऊपर किया. वो कहते हैं, 'उनके समर्पण के प्रति मेरी इज्जत दिखाते हुए मैंने ऐसा किया. मैं उनकी हिम्मत देखकर आश्चर्यचकित था.' जल्द ही वो नज़रों में आ गए. अशरफ उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, 'मैंने देखा कि काले लिबास में एक शख्स मेरी तरफ आ रहा है. उसने मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ा और मुझसे मेरा नाम पूछा. मैं डर गया था, लेकिन जैसा मुझे कहा गया मैंने वैसा ही किया.'

अशरफ कहते हैं कि वो शख्स उन्हें एक एम्बेसडर गाड़ी में बिठाकर एक जगह पर ले गए, जिसके बारे में उन्हें बाद में पता चला कि वो श्रीनगर का नेहरू गेस्ट हाउस है. जल्द ही उन्हें उस शख्स का नाम भी पता चल गया जो उन्हें पार्टी के अस्थायी दफ्तर पर ले आए थे. वो एक आरएसएस प्रचारक थे और उनका नाम नरेंद्र दामोदरदास मोदी था. जोशी और मोदी ने अशरफ से बातचीत की और वो उनसे काफी प्रभावित हुए. उन्हें साथ जम्मू ले जाया गया और उनसे बीजेपी के लिए काम करने को कहा गया.

अशरफ कहते हैं, 'जब मैं श्रीनगर पहुंचा तो मुझे सुरक्षा प्रदान की गई और साथ ही सरकारी आवास मुहैया कराया गया. मेरा काम था कि मैं लोगों को समझाऊं कि बंदूक से उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा.' अगले साल जब नरेंद्र मोदी कश्मीर गए तो अशरफ को उनके साथ रहने के लिए कहा गया. वो दावा करते हैं, 'उस समय कश्मीर में केवल 6 जिले थे. मोदी जी और मैंने सभी जिलों का दौरा किया. हमने बहुत सारे लोगों से मुलाकात की.' घाटी में बीजेपी की नींव रखी जा रही थी.

धीमा परंतु स्थिर विकास

अशरफ कहते हैं कि मोदी हालात को समझने लगे थे और ऐसे लोगों की तलाश में थे जो उनके लिए काम कर सकें. आतंकवाद का खूनी खेल हर बीते दिन के साथ और ख़तरनाक होता जा रहा था और वहां मोदी और उनकी टीम बहुत खामोशी से बीजेपी के आधार को विस्तार देने का काम करने में जुटी थी.

इस दौरान अशरफ कहते हैं कि मोदी उनके घर पर तीन दिनों तक रहे. अशरफ याद करते हैं, 'कुछ ही दिनों में करीब एक दर्जन लोग हमारे साथ जुड़ गए जो बीजेपी के लिए पूरी निष्ठा के साथ काम करने लगे. लेकिन इसके बारे में कोई बात नहीं करता था. उन दिनों बंदूक का खौफ था.'

1998 में बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई और मोदी को जम्मू-कश्मीर में पार्टी का प्रभारी नियुक्त किया गया. मोदी और अशरफ के बीच संबंध और मज़बूत हुए. 1999 में करगिल युद्ध के दौरान मोदी के आग्रह पर अशरफ ने श्रीनगर से करगिल तक बीजेपी कार्यकर्ताओं की एक रैली का नेतृत्व किया.

अशरफ याद करते हैं कि मोदी ने उन्हें कहा था, 'सभी हवाई यात्रा के ज़रिए करगिल पहुंच रहे हैं, लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम सड़क के रास्ते जाओ.' वो कहते हैं, 'मैंने कुछ और कार्यकर्ताओं के साथ स्थानीय लोगों और सेना के साथ मुलाकात की.'

इस समय तक पार्टी ने घाटी में सौ से ज्यादा स्थानीय मुसलमानों का समर्थन हासिल कर लिया था. उनमें से अशरफ समेत कुछ 1996 में बीजेपी की टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके थे. भले ही कश्मीर में सभी बीजेपी प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा, जम्मू में पार्टी ने 1987 की 2 सीटों के मुकाबले 1996 में 8 सीटें जीतीं.

जहां बीजेपी देश में पार्टी के विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाने की ओर देख रही थी, उसे जम्मू-कश्मीर में पूरी तरह से समर्पित होकर पार्टी के लिए काम करने वाले सक्रिय सदस्य नहीं मिल रहे थे. हवलदार सोफी यूसुफ की सोच अलग थी. वो 1996 में अपनी पुलिस की नौकरी छोड़कर पार्टी में शामिल हो गए. यूसुफ का बीजेपी में शामिल होना छोटा लेकिन उल्लेखनीय घटना थी, क्योंकि उस दौर में जब आतंकवाद अपने शिखर पर था, यूसुफ के जैसे नौजवान सीमा पार कर हथियार उठा रहे थे.

यूसुफ कहते हैं कि 1987 के चुनावों में धांधली ने कश्मीर में आतंकवाद को जन्म दिया और ये मुश्किलें उस वक्त और अधिक बढ़ गईं जब सरकार की ओर से प्रायोजित मिलिशिया, इख्वानियों ने अत्याचार करना शुरू कर दिया. यूसुफ कहते हैं, 'इन सबके पीछे कांग्रेस थी और यही वो वजह है कि मैंने बीजेपी में शामिल होने का निर्णय लिया.'

अमरनाथ ज़मीन विवाद और…

आश्चर्य की बात है कि सबसे गहरे संकट के दौरान ही बीजेपी घाटी में गहरी पैठ बनाने की कोशिश में थी. कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान अपने चरम पर था. कोई भी अपनी पार्टी के झंडे का इस्तेमाल नहीं कर रहा था. लेकिन दबे आवाज़ में द्वार से द्वार वार्तालाप चल रहा था.

कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार केंद्र में सत्ता में आई, पीडीपी-कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन सरकारें राज्य में बनीं. इस दौरान बीजेपी के समर्थक घाटी में चुपचाप काम करते रहे.

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सोफी यूसुफ कहते हैं, 'यही वो समय था जब हम ज़मीनी स्तर पर तेज़ी से काम करने लगे. लेकिन ज़ाहिर तौर पर पार्टी के लिए कुछ बड़ा नहीं हो रहा था. ' 2008 के तुरंत बाद पार्टी को उस वक्त एक बड़ा अवसर दिखाई दिया जब राज्य सरकार तीर्थयात्रियों के लिए शिविर बनाने के मकसद से 99 एकड़ ज़मीन अमरनाथ यात्रा बोर्ड को ट्रांस्फर करने पर सहमत हुई. इस फैसले से घाटी की मुस्लिम आबादी और जम्मू में रहने वाले हिन्दुओं के बीच दरार पैदा हो गई. 61 दिनों तक चले गतिरोध के दौरान 6 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों घायल हो गए और राज्य फिर तनाव से घिर गया.

2002 से बीजेपी समर्थक और अब राज्य में पार्टी के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर कहते हैं, 'हम उस वक्त सीधे युवाओं तक पहुंचने लगे.' उन्होंने कहा, 'बहुत से युवाओं को दौरे और दिल्ली में पार्टी हाईकमान के साथ बैठक करने के लिए भेजा गया.'

2008 विधानसभा चुनावों में और ज्यादा प्रत्याशियों को, करीब-करीब सभी सीटों से मैदान में उतारा गया. भले ही पार्टी को एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हो पाई, लेकिन पहली बार घाटी के कुछ बेहद संवेदनशील इलाकों से बीजेपी की टिकट पर खुलेआम लोगों का चुनाव लड़ना पार्टी के बढ़ते आत्मविश्वास का एक और प्रतीक था.

कैंपस कॉलिंग

चेन्नई के एक कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले एजाज़ हुसैन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से प्रभावित हुए. जब वो कश्मीर लौटे और अपना कारोबार शुरू किया तो उनकी बीजेपी के एक नेता से मुलाकात हुई और इसके तुरंत बाद 2006 में वो पार्टी में शामिल हो गए.

एजाज़ कहते हैं, 'दरअसल वो बीजेपी नेता एक स्थानीय दोस्त थे और जब भी उन्हें काम से किसी भी जगह यात्रा करना होता था तो वो मुझसे मेरी गाड़ी मांगते थे. मैं उन्हें गाड़ी चलाकर यहां-वहां ले जाता था और कभी-कभी तो बैठकों में भी शामिल होता था. मैं उनके काम से काफी प्रभावित हुआ और उनके साथ जुड़ने की इच्छा ज़ाहिर की.'

उन्हें पार्टी के यूथ विंग, युवा मोर्चा में शामिल कर लिया गया. दो सालों में वो यूथ विंग के प्रदेश सचिव बन गए. 2008 में अमित शाह के दौरे को याद करते हुए वो कहते हैं, 'मैंने पार्टी के लिए कड़ी मेहनत से काम किया. झंडों, बैनरों और होर्डिंग देखकर अमित शाह जी बहुत खुश हुए.'

एजाज़ पार्टी के एक जानेमाने युवा चेहरा हैं जो घाटी में युवा सदस्यों की तलाश करते हैं. 2015 में उन्हें यूथ विंग का राज्य उपाध्यक्ष बना दिया गया. जुलाई 2016 में एजाज़ को उनके प्रयासों के लिए बतौर इनाम बीजेपी राष्ट्रीय युवा टीम में शामिल कर लिया गया. वो पहले कश्मीरी हैं जिन्हें पार्टी में इस स्तर तक पहुंचने का मौका मिला. उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया.

वो कहते हैं, 'अगर मैं किसी और पार्टी में काम कर रहा होता तो मुझे कभी भी ऐसी ऊंचाइयों तक पहुंचने का मौका नहीं मिलता. वो आगे जोड़ते हैं, 'लेकिन बीजेपी में केवल कड़े परिश्रम का ही महत्व है, भले ही आप किसी भी धर्म से क्यों ना हों.'

32 साल के एजाज़ भारतीय जन संघ के संस्थापक और कई मायनों में बीजेपी के पुरोधा रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने को पूरा कर रहे हैं. मुखर्जी अनुच्छेद 370 के धुर विरोधी थे, जिसे वो राष्ट्रीय एकता के लिए ख़तरा मानते थे. वो कहते थे, 'एक देश में दो संविधान, दो प्रधानमंत्री और दो राष्ट्रीय प्रतीक नहीं चल सकते.' लंबे कद और चौड़े कंधों वाले एजाज़ कहते हैं, 'मुझे गर्व है कि मुझे श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मातृभूमि की सेवा करने का मौका मिला.' वो घोषणा करते हैं, 'घाटी में कमल का फूल खिल रहा है.'

हमलों के साए में

कश्मीर में बीजेपी कार्यकर्ता होना सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण राजनीतिक काम है और किसी भी युवा नेता के लिए ऐसी दिक्कतें जारी हैं. कई पार्टी कार्यकर्ताओं की सार्वजनिक तौर पर पहचान कर उनपर हमले, अगवा, उत्पीड़न और हत्या कर दिए गए.

1999 में संसदीय चुनावों के दौरान अनंतनाग निर्वाचक क्षेत्र से बीजेपी प्रत्याशी हैदर नूरानी के साथ सोफी प्रचार कर रहे थे. दक्षिण कश्मीर के बिजबेहारा में थाजीवारा गांव के पास उनके गाड़ियों के काफिले पर हमला हुआ. एक आईईडी धमाका हो गया. सोफी याद करते हैं, 'हमारी गाड़ियों को उड़ा दिया गया. हैदर नूरानी और तीन स्थानीय कार्यकर्ताओं की मौके पर ही मौत हो गई. मैं खून से लथपथ पड़ा था. पास ही के छोटी पहाड़ियों से आतंकी हमपर गोलियां बरसा रहे थे.'

यूसुफ बुरी तरह से घायल हो गए थे. उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया. उनका ऑपरेशन हुआ और अगले छह महीनों तक वो बिस्तर पर ही पड़े रहे. भले ही करीब-करीब सभी राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं पर कश्मीर में हमले हो चुके हैं, बीजेपी कार्यकर्ताओं पर ये हमले ज्यादा हुए.

अशरफ आज़ाद के घर को कई बार जला दिया गया. ईद-उल-अज़हा के ठीक एक दिन पहले पुलवामा जिले के बीजेपी युवा अध्यक्ष शबीर अहमद भट्ट को अगवा कर लिया गया. अगले दिन उनके गोलियों से छल्लनी हो चुका शव बरामद हुआ.

2014 में पार्टी में शामिल हुए शबीर को आतंकवादियों ने अगवा कर लिया, लेकिन वो वहां से बचकर भागने में सफल रहे. उन्हें राज्य से सुरक्षा प्रदान करवाया गया. दुर्भाग्य से जब दूसरी बार आतंकवादी उन्हें ढूंढते हुए आए तो वो अकेले थे.

नवंबर 2017 में शोपियां से बीजेपी युवा अध्यक्ष, 30 साल के गौहर हुसैन भट्ट को एक शाम उनके घर से आतंकवादियों ने अगवा कर लिया. बाद में उनका गला रेता हुआ शव बरामद हुआ. श्रीनगर बीजेपी दफ्तर में अभी तक पिछले ग्रेनेड हमले के निशान देखे जा सकते हैं. धमाके में चूर-चूर हो चुके खिड़कियों के कांच अभी भी बदले जाने बाकी हैं. अल्ताफ कहते हैं, 'हमारे पिछले दफ्तर में तीन ग्रेनेड हमले हो चुके हैं और इस दफ्तर के प्रांगण में दो बार ग्रेनेड फेंके जा चुके हैं. 'दफ्तर में कड़ी सुरक्षा का घेरा है और उसकी दीवारों पर कांटेदार तार लगे हैं.

मूलभूत विकास

2014 विधानसभा चुनावों के बाद पार्टी की संभावनाएं नाटकीय ढंग से बदलीं और पीडीपी के साथ पार्टी का गठबंधन हुआ. सत्ता में काबिज़ पार्टी ने दावा किया कि उसे कश्मीर में हज़ारों युवाओं का समर्थन हासिल है.

अल्ताफ ठाकुर कहते हैं, 'हमने पहले अपने कैडर का जुगाड़ किया और फिर दिल्ली, जम्मू और श्रीनगर में बैठकें कीं. इन सदस्यों की उनके कार्यक्षेत्र में प्रतिनियुक्त की गई जिससे पार्टी को मज़बूती प्रदान की जा सके. '

सोफी यूसुफ कहते हैं, 'हज़ारों लोग हमसे जुड़े. ये पहली बार था कि हमारे कार्यकर्ताओं की संख्या पहली बार लाख का आंकड़ा पार कर गई.' बीजेपी के श्रीनगर दफ्तर में मौजूद रिकॉर्ड के आधार पर आज की तारीख में पार्टी के पास कश्मीर में 3.5 लाख से अधिक सक्रिय कार्यकर्ता हैं.

चुनावों और फिर पीडीपी के साथ गठजोड़ के बाद गठबंधन सरकार में मौजूद आधे मंत्री बीजेपी से थे. नाम नहीं बताने की शर्त पर एक बीजेपी कार्यकर्ता ने कहा, 'हमारे मंत्रियों को अपना पूरा ध्यान कश्मीर पर केंद्रित करने के दिशा निर्देश दिए गए थे और ऐसा करते हुए उन्होंने कभी भी हमारी मांगों की अनदेखी नहीं की.

'जब मैं सचिवालय जाता था तो केवल बीजेपी के ही नहीं, किसी भी मंत्री से मिलने के लिए मैं आज़ाद था. अगर कोई अधिकारी हमारा काम नहीं करता था तो हम अपने मंत्री के पास जाते थे और ये सुनिश्चित करते थे कि वो इस काम को करें.'

कश्मीर में एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने दावा किया कि घाटी में एक मंत्री जो पार्टी कार्यकर्ताओं की बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे थे, उन्हें तुरंत हटा दिया गया. एक बड़ी मुस्कान के साथ उन्होंने दावा किया, 'एक नेता कश्मीरी पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति उदासीन दृष्टिकोण रखते थे. हमने ये मामला पार्टी कमांड के सामने रखा. अगले मंत्रिमंडल के फेरबदल के दौरान उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.' उन्होंने आगे जोड़ा, 'इसी तरह से पार्टियां अपनी जड़ों को मज़बूत करते हैं.'

इसी सरकार के कार्यकाल के दौरान बीजेपी को कश्मीर से अपना पहला विधायक मिला. सोफी यूसुफ को जम्मू-कश्मीर विधानसभा के ऊपरी सदन के लिए निर्वाचित किया गया. अनंतनाग से बीजेपी कार्यकर्ता राशिद अहमद ने कहा, 'ये मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं ज़रूरतमंदों के लिए काम करूं. जब मैं किसी जगह के विकास कार्यों के लिए अपनी तरफ से फंड आवंटित करता हूं, उस इलाके के लोग मेरे साथ जुड़ते चले जाते हैं. ज़ाहिर है कि ऐसे में वो मेरे लिए ही वोट करेंगे. केवल विकास ही मायने रखता है.'

जब उनसे पूछा गया कि बीजेपी से जुड़ाव के कारण क्या लोग उन्हें नीची निगाहों से देखते हैं तो उनका कहना था, 'दूसरी पार्टियों में केवल बुज़ुर्गों को उनके पार्टी हाईकमान की तरफ से तवज्जो मिलता है. बीजेपी ऐसा कोई पक्षपात नहीं करती. तो भला मैं क्यों दूसरी पार्टियों के लिए काम करूं.' सचिवालय में कार्यरत एक नौकरशाह का दावा है कि पिछले तीन सालों में उनके दफ्तर में ज्यादातर घाटी से बीजेपी कार्यकर्ताओं का ही आना हुआ है.

वो कहते हैं, 'उनके कार्यकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान किया गया है, जिन्हें जान का ख़तरा महसूस हो रहा था उन्हें सरकारी आवास भी मुहैया करया गया है. उन्हें ना कहना बहुत मुश्किल है.' एक खंड विकास अधिकारी जिनकी ज़िम्मेदारी ग्राम स्तर पर विभिन्न राज्य और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत छोटा कॉन्ट्रेक्ट आवंटित करना है, वो कहते हैं, 'बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ ही दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ताओं को भी इससे लाभ हुआ. वरिष्ठ मंत्रियों के प्रभाव के चलते कभी-कभी बीजेपी कार्यकर्ताओं को ज्यादा लाभ पहुंचा.'

अल्ताफ ठाकुर कहते हैं, 'जब हम सत्ता में आए तो सभी जिलों में हमने दफ्तर खोला. अब दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ताओं की तरह ही हमारे कार्यकर्ताओं को भी सरकारी दफ्तरों में उतना ही सम्मान मिलता है.'

उन्होंने पीडीपी का शुक्रियाअदा करते हुए तारीक हामिद कर्रा जिन्होंने हाल ही में पीडीपी छोड़ कांग्रेस का दामन थामा उन्हें उद्धृत किया. कर्रा ने एक बार दावा किया था, 'बीजेपी और आरएसएस घाटी के हर एक हिस्से में दाखिल हो चुकी है, यहां तक कि हमारे बेडरूम्स में भी और ये अवांछित सुविधा खुद पीडीपी की देन है.'

डर के साए में जीना

कश्मीर में बीजेपी का विकास बिना कई तरह की दिक्कतों के नहीं हासिल हुआ है. बीजेपी पर आरोप है कि बचे हुए दो सालों तक राज्य पर शासन करने के लिए उसने दलबदल का रास्ता अपनाने की कोशिश की और दूसरी पार्टियों जैसे नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी के विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करने की कोशिश की. पीडीपी-बीजेपी गठजोड़ टूटने के बाद भी विधानसभा को भंग नहीं किया गया है. .

पार्टी के नेता और पूर्व उप-मुख्यमंत्री कविंदर गुप्ता ने जुलाई में न्यूज़ 18 से कहा था कि एक नयी सरकार जल्द ही गठित हो सकती है. उन्होंने कहा था, 'अनिश्चितताएं हैं, लेकिन हम किसी चीज़ पर काम कर रहे हैं और लोगों को उसके बारे में पता चल जाएगा.' इसी बात को आधार बनाकर विपक्ष के नेता उमर अब्दुल्ला ने बीजेपी पर नेताओं के खरीद फरोख्त का आरोप लगाया था.

श्रीनगर से पार्टी के युवा नेता बिलाल अहमद पर्रे ने अगस्त में अपना इस्तीफा घोषित कर दिया. 27 साल के पर्रे ने कहा कि वो लोगों और पार्टी के बीच ब्रिज का काम करना चाहते थे. पर्रे कहते हैं, 'मैंने दर्जनों युवाओं को पार्टी में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. मैं एक सक्रिय भूमिका निभा रहा था और ये पहली बार था कि मैं किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हुआ.'

कश्मीरी पंडितों के संगठन में बढ़ते दबदबे को उन्होंने पार्टी से इस्तीफा देने का मुख्य कारण बताया. उनका कहना है, 'पार्टी का नेतृत्व कश्मीरी पंडितों को ज्यादा तवज्जो दे रहा है, जबकि असल में हम लोग ज़मीनी स्तर पर ज्यादा जोखिम उठाकर काम कर रहे हैं.' वो बीजेपी में इसलिए शामिल हुए थे क्योंकि उनका विश्वास था कि पार्टी पक्षपात के खिलाफ है और वो कठिन परिश्रम का ईनाम देती है.

पर्रे ने न्यूज़ 18 से कहा, 'दिक्कत है कि वो कश्मीरी मुसलमानों को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं, वो अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A जैसे मुद्दों को उठाने में ज्यादा इच्छुक है. अगर बीजेपी कश्मीर में अपने पांव पसारना चाहती है तो उसे अपने रवैये को बदलना होगा.'

दक्षिण कश्मीर से एक और नेता ने हाल ही में सुरक्षा ख़तरों के चलते पार्टी से इस्तीफा दे दिया. उनका कहना है, 'हम भय के माहौल में रह रहे हैं. ख़तरा केवल आतंकवादियों से ही नहीं है, बल्कि लोगों से भी है. लोगों ने कई बार मेरे घर पर हमला किया. मुझे सुरक्षा मिल सकता है लेकिन वो काफी नहीं है.' हाल के महीनों में बीजेपी के कुछ कार्यकर्ताओं ने स्थानीय मस्जिदों से अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए सार्वजनिक तौर पर ऐलान तक किया कि उनका बीजेपी से कोई लेना देना नहीं है.

2014 में पैठ जमाती

2014 में ये मानना था कि इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों में पीडीपी की लहर बहेगी. सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस को विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा था. अफजल गुरू की फांसी पर लोगों के बढ़ते गुस्से और 2010 में जन विद्रोह में 120 लोगों की मौत से उसके चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने की संभावना को और अधिक नुकसान पहुंचाया था. कांग्रेस बड़ी मुश्किल से इन चुनावों में अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रही थी. पीडीपी के भारी बहुमत से जीत मिलने की पूरी संभावना थी.

मत की गिनती के दिन घाटी में लोग आश्चर्यजनक नतीजों की तरफ आंखें गढ़ाए देख रहे थे. 87 सदस्यों वाली विधानसभा में पीडीपी ने 28 सीटें जीती थीं, लेकिन वो बहुमत से काफी दूर थी. 25 सीटें जीतकर बीजेपी ने ना केवल कांग्रेस को चौथे स्थान पर ढकेल दिया था, बल्कि त्रिशंकु विधानसभा में वो किंगमेकर की भूमिका में उभरी. हालांकि 2014 के नतीजों से सबसे चौंकाने वाले आंकड़े बीजेपी का राज्य में किसी भी पार्टी के मुकाबले सबसे अधिक वोट शेयर हासिल करना रहा.

पीडीपी के 22.7 फीसदी वोट शेयर के मुकाबले उसे थोड़ी ज्यादा, 23 फीसदी वोट शेयर हासिल करने में कामयाबी मिली. नेशनल कॉन्फ्रेंस का वोट शेयर गिरकर 20.8 फीसदी हो गया और कांग्रेस केवल 18 फीसदी ही वोट शेयर हासिल कर पाई.

हिन्दू बहुल जम्मू क्षेत्र की सीटों पर बेहतरीन प्रदर्शन बीजेपी के वोट शेयर बढ़ने के पीछे मुख्य कारण रहा. यहां के 25 सीटों में से उसने 22 सीटें जीतीं और इस क्षेत्र में उसका वोट प्रतिशत 48.1 रहा जो पार्टी के राज्य में वोट शेयर बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण रहा.



जम्मू में लहर

2014 में पूरे भारत में मोदी लहर दिखी और उसके चंद महीनों बाद ही वो आगे उत्तर की तरफ और बढ़ते हुए जम्मू-कश्मीर पहुंची. विधानसभा चुनाव में सूबे के 37 सीटों में से बीजेपी ने 25 पर जीत हासिल की जो पिछली विधानसभा चुनावों के मुकाबले 14 सीटों की बढ़त थी. इसी ने उसे राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने में मदद की जिसने आगे उसके शासन का रास्ता प्रशस्त किया.

इस क्षेत्र में करीब आधी आबादी ने बीजेपी के लिए मतदान किया. पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले ये करीब-करीब 100 फीसदी वोट शेयर में बढ़ोतरी थी और 2008 के मुकाबले करीब 200 फीसदी बढ़ोतरी थी. ये एक जीता जागता उदाहरण है कि कैसे इस भगवा पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में अपनी पैठ जमाई.

जम्मू जिला

2008 चुनाव में जहां बीजेपी के वोट शेयर में 164 फीसदी की उल्लेखनीय वृद्धि दिखी, वहीं 2014 चुनावों ने जम्मू जिले में पार्टी के आधार को और मज़बूती प्रदान करते देखा. करीब 4 लाख लोगों ने बीजेपी के लिए वोट किया जो पिछले चुनाव के मुकाबले 1.75 लाख से ज्यादा की वृद्धि थी.

सीमावर्ती इलाके

बीजेपी का सबसे शानदार प्रदर्शन जम्मू के सीमावर्ती इलाकों में रिकॉर्ड की गई जहां उसे 19 सीटों में से 13 पर जीत हासिल हुई. 2008 के चुनावों में उसे केवल तीन सीटों-राजौरी, नगरोटा और बिश्नाह निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल हुई थी.

2008 के 20.6 फीसदी और 2002 के 19.2 फीसदी के मुकाबले 2014 में बीजेपी ने राज्य चुनावों में 54.15 फीसदी वोट शेयर हासिल किए. हीरा नगर, चाम्ब और बिलावर निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी ने 69.2 फीसदी, 60.5 फीसदी और 58.3 फीसदी वोट शेयर हासिल किए.

मुस्लिम बहुल इलाके

जम्मू के मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी ने 30 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल किया. 2008 चुनावों के मुकाबले डोडा में पार्टी ने बहुत बड़ी 31.3 फीसदी वोट शेयर की बढ़त देखी. सूबे के सात मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में से डोडा एक है जहां उसके प्रत्याशी शक्ति राज ने 2008 के 2,756 वोटों के मुकाबले 2014 में 24,572 वोट जीते.

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हमेशा के लिए अपरिवर्तित कश्मीर घाटी

2014 विधानसभा चुनावों में बीजेपी 87 सदस्यों वाले विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लक्ष्य से 'मिशन 44 प्लस' के साथ उतरी थी. हालांकि पार्टी कश्मीर घाटी में एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसके सभी 34 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई.

उत्तर कश्मीर

यहां भेद करना बीजेपी के लिए एक कड़ी चुनौती रही. ये क्षेत्र आतंकवाद का गढ़ रहा है. यहां के हालात ऐसे हैं कि 2014 में भगवा पार्टी ने आधे निर्वाचन क्षेत्रों में अपने प्रत्याशी तक नहीं उतारे. कुछ और निर्वाचन क्षेत्रों जैसे करनाह, लोलाब और उरी में वोट शेयर 2008 के चुनावों जितना ही रहा.

दक्षिण कश्मीर

बीजेपी का दक्षिण कश्मीर में प्रदर्शन कुछ बेहतर रहा. 2008 में पार्टी की आत्मविश्वास में कमी दिखी जब पार्टी ने एक तिहायी निर्वाचन क्षेत्रों में अपने प्रत्याशी तक नहीं उतारे. 6 सालों बाद उन्होंने ना केवल एक छोड़कर सभी निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ा, बल्कि 11 निर्वाचन क्षेत्रों से 1,500 से ज्यादा वोट भी हासिल किए.

कश्मीर में एक भी सीट जीतने के सभी अनुमान उस वक्त धरे रह गए जब वहां भारी संख्या में लोग मतदान करने के लिए घरों से निकले. लेकिन पार्टी ने देवसर, होमशालीबुग, पंपोर, त्राल और शोपियां में कुछ बेहतर प्रदर्शन किए.

मध्य कश्मीर

2014 चुनावों में नेशनल कॉन्फ्रेंस के पूर्व वोटिंग बैंक भी भगवा पार्टी की पहुंच से बाहर रहे. चदूरा, खान साहेब और ईदगाह जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी ने अपने प्रत्याशी तक खड़े नहीं किए.

श्रीनगर

घाटी में पार्टी के पहले गंभीर प्रयास के मद्देनज़र श्रीनगर शहर में बीजेपी प्रत्याशियों की ओर से हासिल किए गए वोट सम्मानजनक रहे. जहां श्रीनगर के ज्यादातर निर्वाचन क्षेत्रों में बहुत कम संख्या में लोग मतदान करने पहुंचे, श्रीनगर के कुछ मुख्य निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी अपना वोट शेयर बढ़ाने में सफल रही. इसका एक मुख्य कारण पोस्टल वोट रहे जो उन कश्मीरी पंडितों के प्रवासी वोट हैं जो देश के दूसरे हिस्सों में रहते हैं. श्रीनगर के हबा कादल ने बीजेपी को घाटी में सबसे अधिक वोट शेयर दिया जहां 22.2 वोट भगवा पार्टी के नाम रहे.

लद्दाख हारना

बीजेपी ने इस इलाके की एक मात्र संसदीय सीट उस साल मई में जब जीती तो उम्मीदें अधिक थीं और उसके साथ ही दांव भी. उस क्षेत्र में ये एक नए लहर को दर्शाता था और बीजेपी कम से कम दो विधानसभा सीटों में जीतने की उम्मीद लगाए हुए थी, ख़ासकर बौद्ध बहुल लेह में.

पार्टी ने इस इलाके में पर्याप्त निवेश किया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लेह और करगिल में अगस्त 12,2014 के भाषणों के दौरान उमड़ी भारी जनसैलाब को देख उम्मीदें काफी बढ़ गई थीं. लेकिन सतर्क कांग्रेस ने क्षेत्र में अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया और 4 में से 3 निर्वाचन क्षेत्रों में विजयी रही.

कठिनाइयों के बीच मौका

2014 से पार्टी ने घाटी में एक वैकल्पिक राजनीतिक विचार पेश किया, लेकिन कश्मीर में इसके अभी भी एक शक्तिशाली राजनीतिक ताकत के तौर पर उभरने में काफी समय लगेगा. अब तक बीजेपी कश्मीर में एक भी सीट जीत नहीं पाई है, वो किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में समापन रेखा तक नहीं पहुंची है.

ऐसे क्षेत्रों में जहां उसके कुछ कार्यकर्ताओं ने पार्टी के लिए अपने जीवन के करीब 30 साल दे दिए, वहां बीजेपी करीब-करीब सभी, नगर पालिका चुनाव से लेकर संसदीय चुनाव तक, अपना खाता तक नहीं खोल पाई.

हालांकि पीडीपी के साथ गठबंधन के बाद बीजेपी आशावान है. सोफी यूसुफ ने न्यूज़ 18 से कहा, 'अगले चुनावों के लिए हमारा पूर ध्यान ख़ासतौर पर जम्मू पर रहेगा, लेकिन कश्मीर में हम आठ निर्वाचन क्षेत्रों में पकड़ मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं.'

लेह में हाल में हुए लद्दाख स्वायत्त हिल विकास परिषद के चुनावों में बीजेपी को केवल एक सीट पर जीत हासिल कर शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा. केवल चार साल पहले 2014 के आम चुनावों में पार्टी ने इस संसदीय सीट पर पहली बार जीत हासिल की थी.

सोफी कहते हैं, 'अगले चुनावों में कश्मीर में हमें सीटें भले ही न हासिल हों, लेकिन हम पर्दा उठाने में कामयाब रहे.' नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पंचायत चुनावों का बहिष्कार किया और धमकी दी अगर अनुच्छेद 35A के मुद्दे को नहीं सुलझाया गया तो 2019 लोकसभा चुनावों से भी वो दूर रहेगी. इसी राह पर चलकर पीडीपी ने भी पंचायत चुनावों के बहिष्कार का फैसला किया.

एक बार फिर राजनीतिक संकट के बीच, जब मतदान में तेज़ी से गिरावट हो रही है और क्षेत्रीय पार्टियां खुलेआम बहिष्कार की बात कर रही हैं, बीजेपी खुद के लिए एक बार फिर अवसर देख रही है. घाटी में बीजेपी नेता इस अवसर का इस्तेमाल कर पार्टी के विकास के संदेश को आगे और फैलाने की बात कर रही है. दूसरी पार्टियों की ओर से चुनाव के बहिष्कार से बीजेपी बेचैन नहीं है. 2019 में होने वाले आम चुनाव संभवतः इस क्षेत्र में पार्टी की ताकत का सबसे बड़ा इम्तहान होगा.

Written by Aakash Hassan

Translation by Shampa Sen

Produced by Om Prakash

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