सोने से लिखी इबारत जीत की

सोने से लिखी इबारत जीत की

गोल्ड जीतने वाले लगभग सभी खिलाड़ी छोटे शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखते हैं. उन्होंने कैसे एशियन गेम्स तक का सफ़र तय किया वो कहानियां असल में सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए नज़ीर की तरह हैं. रिक्शा वाले की बेटी से लेकर किसान के बेटे का गोल्ड जीतना उनके संघर्ष और परिश्रम की कहानी कहता है.

15 गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ियों के जज़्बे की दास्तान

Ankit FrancisDevbrat Bajpai | Hindi.News18.com @devbrat

Published: September 7, 2018

जकार्ता एशियन गेम्स में भारतीय खिलाड़ियों ने 15 गोल्ड मेडल जीते. इनमें ज्यादातर मेडल उत्तर भारतीय राज्यों ने दिलाए. इनमें हरियाणा 5 गोल्ड मेडल के साथ टॉप पर रहा. गोल्ड जीतने वाले ज्यादातर खिलाड़ी छोटे शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखते हैं.

उन्होंने कैसे एशियन गेम्स तक का सफ़र तय किया वो कहानियां असल में सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए नज़ीर की तरह हैं. रिक्शा वाले की बेटी से लेकर किसान के बेटे का गोल्ड जीतना उनके संघर्ष और परिश्रम की कहानी कहता है. उन्होंने दिखा दिया कि जज़्बे और मेहनत के दम पर सारा जहां जीता जा सकता है और इसके लिए आर्थिक तौर पर बहुत मज़बूत परिवार का होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं.

भारत ने इस बार कुल 69 मेडल जीते जो एशियाई खेलों में भारत के सबसे ज्यादा मेडल हैं. 2010 में भारत ने 65 मेडल जीते थे पर यह नहीं भूलना चाहिए कि इतने मेडल जीतने के बावजूद भारत रैंकिंग में आठवें स्थान पर लुढ़क गया. हम आपको रूबरू करा रहे हैं उन गुदड़ी के लाल खिलाड़ियों की ज़िंदगी से जिन्होंने इस बार गोल्ड जीतकर भारत का नाम ऊंचा किया है.

65 किग्रा फ्री स्टाइल में खेलने वाले भारतीय स्टार पहलवान बजरंग पूनिया ने पिछले एशियन गेम्स (इंचियोन- 2014) में सिल्‍वर मेडल जीता था, लेकिन इस बार युवा पहलवान ने अपने मेडल का रंग बदल दिया है.शोहरत और कामयाबी कभी भी आसानी से हासिल नहीं होती है. यकीनन इसके लिए ना सिर्फ कड़ी मेहनत करनी पड़ती है बल्कि गरीबी, असुविधा जैसे तमाम विपरीत हालातों से लड़ते हुए खुद का मनोबल ऊंचा रखना पड़ता है.

ऐसी ही कहानी है 24 साल के पहलवान बजरंग पूनिया की. हालांकि उन्‍हें कुश्‍ती विरासत में मिली है. दरअसल, उनके पिता बलवान पूनिया भी अपने समय के नामी पहलवान रहे हैं, लेकिन गरीबी के कारण उनका ख्‍वाब अधूरा रह गया. हालात कुछ ऐसे थे कि जरूरी डाइट तक के लाले पड़ जाते थे.

यकीनन पिता का अधूरा ख्‍वाब बेटे बजरंग की जिद बन गया और उन्‍होंने अपना एकमात्र लक्ष्‍य देश के लिए मेडल जीतना बना लिया. गरीबी अभी भी अड़चन पैदा कर रही थी और पिता के पास अपने पहलवान बेटे को घी पिलाने के लिए पैसे नहीं होते थे. बेटे की रुचि देखकर बलवान ने बस के बजाए साइकिल से चलने का फैसला किया, ताकि बेटे की डाइट को बेहतर किया जा सके. इस बदहाली के दौर से गुजरने के बावजूद बजरंग ने अपने हौसले को पस्‍त नहीं होने दिया और अब हर तरफ उनकी चर्चा हो रही है.

पहलवानी के शुरुआती दौर में बजरंग ने अपनी मेहनत में कोई कसर नहीं रखी तो भगवान ने उनकी मदद के लिए चार बार ओलंपिक के मैदान में उतरने वाले पहलवान योगेश्‍वर दत्‍त को दूत के रूप में भेज दिया. यह युवा पहलवान पिछले काफी समय से योगेश्‍वर के अखाड़े में उन्‍हीं की देखरेख में ट्रेनिंग करता है. जबकि योगेश्‍वर के बीच गुरु और चेले का नहीं बल्कि पिता और बेटे जैसा रिश्‍ता है. 24 साल के इस भारतीय पहलवान ने एशियाई खेलों से पहले लगातार तीन स्वर्ण पदक अपने नाम किये थे. उन्होंने गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में, जार्जिया में तबलिसी ग्रां प्री और इस्तांबुल में यासर दोगु अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में खिताब जीता था.

भारतीय शूटर राही सरनोबत ने एशियन गेम्स में 25मीटर पिस्टल कैटेगिरी में गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया. भारत की ओर से एशियाई खेलों में शूटिंग कैटेगिरी में गोल्ड जीतने वाली वह पहली महिला खिलाड़ी हैं. एक इंटरव्यू में राही ने बताया था, "10वीं के बाद मैं क्रैश कोर्स करने के बारे में सोच रही थी."

"कोल्हापुर फुटबॉल और शूटिंग के लिए जाना जाता है इसलिए मैंने इसमें एक हफ्ते का कोर्स किया और इसके बाद मेरी खेलों में दिलचस्पी बढ़ने लगी." राही की दिलचस्पी सिविल सर्विसेज में भी रही है और वह इसमें भी करियर बनाना चाहती थीं. उन्होंने कहा था, "हो सकता है मैं बाद में सिविल सर्विसेज में ट्राय करूं लेकिन शूटिंग हमेशा मेरी प्राथमिकता रहेगी." 27 साल की सरनोबत ने पिछली बार इंचियॉन में ब्रॉन्ज मेडल जीता था लेकिन इस बार उन्होंने कमाल कर दिया.

सरनोबत ने अपना पहला गोल्ड मेडल साल 2008 में पुणे में आयोजित किए गए कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स में जीता था. उसके अलावा उन्होंने साल 2010 में दिल्ली में आयोजित किए गए कॉमनवेल्थ खेलों में दो गोल्ड जीते थे. राही की प्रेरणास्त्रोत 50 मीटर की राइफल वर्ल्ड चैंपियन तेजस्विनी सावंत हैं. उन्होंने वर्ल्ड कप में भी गोल्ड मेडल जीता था. गौर करने वाली बात है कि उन्होंने चैंगवोन में आयोजित किए गए ISSF वर्ल्ड कप में 25मीटर पिस्टल इवेंट में गोल्ड जीता था. साल 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने महिला 25 मीटर पिस्टल कैटेगिरी में गोल्ड जीता था. बहरहाल, अब उनकी नजरें ओलंपिक पर होंगी.

एशियन गेम्स में तजिंदर पाल सिंह तूर ने भारत को एथलेटिक्स में गोल्ड मेडल दिलाया. इसके साथ ही भारत को एथलेटिक्स में पहला गोल्ड मेडल दिलाने का श्रेय 22 वर्षीय तजिंदर को जाता है, जिन्होंने शॉटपुट में ये गोल्ड मेडल हासिल किया. पंजाब के एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले तजिंदर पाल सिंह तूर बचपन में एक क्रिकेटर बनना चाहते थे.

लेकिन, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. पिता के कहने पर उन्होंने शॉटपुट खेलना शुरू किया और ये उनकी जिंदगी का सबसे अच्छा फैसला साबित हुआ. युवा तजिंदर को इसमें काफी सफलता मिली.

13 नवंबर 1994 को पंजाब के मोगा में जन्में तजिंदर के लिए ये रास्ता आसान नहीं था. साधारण घर से आने वाले तजिंदर के लिए ट्रेनिंग, डायट और उपकरण का खर्च उठाना इतना आसान नहीं था.

वे कहते हैं कि जूते भी कुछ ही महीने चलते थे. ऐसे में उनके महीने का खर्च काफी ज्यादा हो जाता था.

लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और एक के बाद एक उपलब्धियां उनके नाम के साथ जुड़ने लगीं. लेकिन, खेल के मैदान का ये शेर अपनी निजी जिंदगी में भी एक लड़ाई लड़ रहा है. जकार्ता से नई दिल्ली वापस लौटने के साथ ही तेजिंदर को दिल तोड़ देने वाली खबर मिली. पिछले काफी समय से कैंसर से जूझ रहे तेजिंदर के पिता का सोमवार को मोगा में निधन हो गया.

एशियाड में रिकॉर्ड बनाते हुए जो स्वर्ण तेजिंदर ने हासिल किया था, वो उसे अपने पिता को नहीं दिखा पाए. उनके पिता कैंसर के मरीज़ थे. वैसे तो 2015 में त्वचा कैंसर का इलाज होने के बाद वो स्वस्थ हो चुके थे. पर उसके अगले साल एक बार फिर उन्हें कैंसर डिटेक्ट हुआ.

उनके पिता को चौथा स्टेज बोन कैंसर था. इस मुश्किल की घड़ी में भारतीय नौसेना ने उनकी काफी मदद की. नौसेना ने तजिंदर पाल सिंह तूर को ना केवल नौकरी दी बल्कि उनके पिता के इलाज में भी मदद की.

कई वर्ष पूर्व पिता की मौत हुई थी, रियो ओलंपिक में ऐसी चोटी लगी कि बिस्तर पर रही, फिर भी चरखी दादरी की बहादुर बेटी विनेश फोगाट का जज्बा कम नहीं हुआ और एशियन खेलों में महिला कुश्ती में पहला गोल्ड जीतकर इतिहास रचा है.

पिता की मौत के बाद ताऊ द्रोणाचार्य अवार्डी महाबीर फोगाट ने विनेश और उसकी छोटी बहन को अपनाया और अपनी बेटियों के साथ अखाड़े में उतारा. ताऊ के विश्वास और गीता-बबीता बहनों से प्रेरणा लेते हुए विनेश फोगाट ने एशियन खेलों में गोल्ड जीतकर पुराने जख्मों पर मरहम लगा दिया. विनेश ने अपने परिवार और जिले के लोगों की आशा के अनुरूप जीत हासिल की है. परिवार, क्षेत्र के लोग विनेश की इस उपलब्धि पर खुशी से झूम उठे.

बता दें कि विनेश के पिता और महाबीर फोगाट के भाई राजपाल जो रोडवेज विभाग में ड्राइवर थे. उनकी वर्ष 2003 में मौत हो गई थी. जिसके बाद महावीर फोगाट ने विनेश और उसकी बहन प्रियंका को अपनाया और पहलवानी की ट्रेनिंग दी. विनेश ने भी अपने ताऊ जी का मान रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा दिखाते हुए दो गोल्ड सहित 8 मेडल जीतकर उनका और देश का नाम रोशन किया है.

इसी कड़ी में विनेश ने अपनी प्रतिभा दिखाते हुए एशियन खेलों में महिला कुश्ती में पहला गोल्ड जीतकर इतिहास रचा है. बता दें कि विनेश फोगाट चोट लगने से पूर्व 48 किलोग्राम वर्ग में खेलती थी. इस वर्ष अप्रैल माह में हुए कॉमनलवेल्थ में विनेश ने 50 किलोग्राम वर्ग में रिंग में उतरते हुए गोल्ड मेडल जीता था.

सरकार द्वारा विनेश की प्रतिभा व उसके खेल को देखते हुए अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया था. विनेश इस वर्ष अप्रैल में और वर्ष 2014 कॉमनवेल्थ में गोल्ड और 2014 एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकी हैं. एशियन खेलों के फाइनल मुकाबले में विनेश ने जापान की इरी युकी को 6-2 से से मात देते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया.

16 साल के सौरभ चौधरी ने 10 मीटर एयर राइफल पिस्टल स्पर्धा में भारत को गोल्ड मेडल दिलवाया. भारतीय निशानेबाज़ सौरभ चौधरी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के रहने वाले हैं. वह कलीना गांव के किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं. 16 साल के सौरभ ने आज से तीन साल पहले अपने शूटिंग करियर की शुरुआत की थी. सौरभ चौधरी बागपत के बिनौली के वीर शाहमल राइफल क्लब में प्रैक्टिस करते हैं. उनके कोच का नाम अमित श्योराणा है. उन्होंने मशहूर शूटर रहे जसपाल राणा से भी कुछ गुर सीखे हैं.

2017 में गोल्ड मेडल के साथ सौरभ यूथ ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाइ कर चुके हैं. बचपन से सौरभ चौधरी का सपना था कि वो देश के लिए कुछ करें. साल 2018 में उन्हें ये मौका मिला. सौरभ चौधरी ने जर्मनी के सुहल में आईएसएसएफ जूनियर वर्ल्ड कप में विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए तीन गोल्ड मेडल अपने नाम किए.

इंडोनेशिया के जकार्ता में खेला गया एशियाई खेल सौरभ का पहला एशियाई खेल है. इसमें सौरभ ने 10 मीटर एयर पिस्टल के फाइनल में स्टेज वन में 50.6 और 50.8; स्टेज 2 में 18.6, 20.6, 20.2, 19.9 और 20.6 समेत कुल 240.7 अंक हासिल किए और एशियाई खेलों का नया रिकॉर्ड बनाया.

सौरभ चौधरी का अगला लक्ष्य है, 2020 टोक्यो ओलंपिक में देश को गोल्ड मेडल दिलाना. अभी तक सिर्फ अभिनव बिंद्रा ही ऐसा कर पाए हैं. बिंद्रा ने 2008 बीजिंग ओलंपिक में गोल्ड जीता था. एशियाई खेलों में गोल्ड जीतने वाले शूटर सौरभ चौधरी को यूपी सरकार 50 लाख रुपये का इनाम देगी.

अरपिंदर सिंह ने भारत को गोल्ड मेडल दिलाया. उन्होंने ये मेडल पुरुषों की ट्रिपल जंप स्पर्धा में जीता. भारत ने 48 साल बाद ट्रिपल जंप में गोल्ड मेडल जीता है लेकिन अरपिंदर को इस सफलता के पीछे किन-किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ा ये दर्द उनके परिवार की आंखों में छलकता है. पंजाब के अमृतसर के रहने वाले अरपिंदर सिंह को कल तक कोई भी नहीं जानता था लेकिन एशियन गेम्स में ट्रिपल जम्प में गोल्ड जीत कर एकाएक सुर्खियों में आ गए.

अरपिंदर सिंह वैसे तो पंजाब के अमृतसर के रहने वाले हैं, लेकिन पंजाब सरकार की अनदेखी का शिकार होकर वह हरियाणा के सोनीपत में स्थित साई सेंटर में कड़ी मेहनत करने में जुट गए. अरपिंदर की बहन और जीजा ने बताया कि अरपिंदर शुरुआत से ही ट्रिपल जम्प में देश के लिए कुछ करना चाहते थे, लेकिन पंजाब सरकार की खेल नीति से परेशान होकर वह सोनीपत आ गए और यहां अभ्यास करने में जुट गए.

अरपिंदर की बहन ने कहा कि पंजाब सरकार ने उनकी अनदेखी की है. पांच साल से वह हरियाणा से मेहनत कर रहे हैं. हमें उम्मीद है कि हरियाणा सरकार उन्हें वहीं सम्मान और इनामी राशि देगी जिसे वह अन्य खिलड़ियों को देगी.

अरपिंदर के भाई शमशेर सिंह को भी पंजाब सरकार से रंज है कि भाई हरियाणा के कोटे से खेला. उन्होंने कहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों पर हरियाणा सरकार ने पैसों की बरसात की. लेकिन अरपिंदर को पंजाब सरकार ने सिर्फ छह लाख रुपये देने की घोषणा की थी, जिसका उन्हें मलाल था. अब वह हरियाणा की तरफ से खेल रहे हैं और वहीं सेटेल्ड भी हो गए हैं.

एशियन गेम्स में मेडल जीतना किसी भी एथलीट के लिए सपना होता है. बॉक्सर अमित पंघाल ने न सिर्फ इस सपने को हकीकत में बदला, बल्कि उन्होंने इसे बेहद यादगार भी बना दिया. उन्होंने फाइनल में रियो ओलंपिक के गोल्ड मेडलिस्ट और एशियाई चैंपियन उज्बेकिस्तान के हसनबॉय दुश्मातोव को मात दी. आखिरकार अमित पंघाल ने हसनबॉय दुश्मातोव से हार का बदला ले ही लिया.

पिछले साल यानी 2017 में हैमबर्ग वर्ल्ड चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल में भी अमित का सामना उज्बेकिस्तान के दुश्मातोव से हुआ था, लेकिन यहां अमित को हार का सामना करना पड़ा था. हलांकि इस मैच में उन्होंने दुश्मातोव को कड़ी टक्कर दी थी. दुश्मातोव एक चैंपियन बॉक्सर हैं. 2016 के रियो ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाले हसनबॉय दुश्मातोव को बेस्ट मेल बॉक्सर चुना गया था.

अमित पंघाल हरियाणा के रोहतक ज़िले के मायना गांव से आते हैं. उनके पिता एक किसान हैं, जबकि उनके बड़े भाई अजय पंघाल सेना में हैं. अपने बड़े भाई को देखकर ही वो सेना में भर्ती हुए और उन्होंने ही अमित को बॉक्सिंग के रिंग में आने के लिए प्रेरित किया. साल 2008 में उन्होंने बॉक्सिंग की शुरुआत की थी. अमित के चाचा गांव में बच्चों को बॉक्सिंग की ट्रेनिंग देते थे.

यहां ट्रेनिंग के लिए उनके भाई अजय भी जाते थे. अमित शुरूआत में यहां बॉक्सिंग सीखने के लिए नहीं जाते थे बल्कि सिर्फ फिजिकल फिटनेस के लिए वो यहां पहुंचते थे. लेकिन चाचा ने देखा कि अमित का बॉक्सिंग से लगाव है ऐसे में वो उन्हें भी ट्रेनिंग देने लगे.

साल 2015 से अमित ने पटियाला में ट्रेनिंग शुरू की. लेकिन इसके बावजूद शनिवार-रविवार और छुट्टी के दिन वो अपने गांव में चाचा से बॉक्सिंग के गुर सीखने जाते थे. साल 2017 में पहली बार उन्होंने बॉक्सिंग में राष्ट्रीय स्तर पर कदम रखा और इसी साल वह नेशनल चैंपियन भी बन गए. इस बार कॉमवेल्थ खेलों में पंघाल ने सिल्वर मेडल जीता था.

फाइनल में वह इंग्लैंड के गाला याफी के खिलाफ हार गए थे. फाइनल में हारने के बाद अमित ने कहा था कि उन्हें हाथों में इंजरी हो गई थी इसके चलते वो पूरी ताकत के साथ नहीं खेल सके थे. लेकिन उन्होंने वादा किया था कि वो एशियाई खेलों में जरूर मेडल लेकर आएंगे और अब उनका ये सपना पूरा हुआ.

भारत के मनजीत सिंह ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए पुरुषों की 800 मीटर रेस में गोल्ड मेडल अपने नाम किया. वह ट्रेनिंग के सिलसिले में पिछले चार महीने से घर से बाहर थे. इस दौरान वह पिता भी बने लेकिन अपने बेटे की शक्ल तक नहीं देख सके हैं. मनजीत सिंह की स्टोरी किसी फिल्मी स्टोरी की तरह है.

साल 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में मनजीत सेमीफाइनल तक पहुंचने में कामयाब रहे थे लेकिन कोई मेडल जीतने में सफल नहीं रहे. इसके बाद वह 2013 एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी मेडल जीतने से नाकामयाब रहे.

इसी बीच वह चोटिल हो गए. वह ONGC में कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी करते थे. उनके खराब प्रदर्शन को देखकर ONGC ने उनका कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू करने से पल्ला झाड़ लिया. इस तरह से मनजीत अब बेरोजगार हो गए. यही नहीं इस दौरान निराश होकर मनजीत ने ट्रैक को अलविदा कहने का मन भी बना लिया था लेकिन कोच के समझाने के बाद वह ट्रैक पर बने रहे. अब चूंकि मनजीत के नाम एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल आ चुका है तो उन्हें उम्मीद होगी कि उनकी जिंदगी भी बदल जाएगी.

मनजीत ने 1 मिनट 46.15 सेकेंड के समय में रेस पूरी की. मनजीत को मेडल का दावेदार नहीं माना जा रहा था लेकिन उन्होंने अनुभवी जॉनसन को पीछे छोड़कर एक मिनट 46.5 सेकेंड का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय निकालते हुए अपना पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय मेडल जीता. केरल के एशियाई चैंपियनशिप के मेडल विजेता जॉनसन एक मिनट 46.35 सेकेंड का समय लेकर दूसरे स्थान पर रहे.

भारत ने 800 मीटर में आखिरी बार 1982 दिल्ली एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीता था. तब चार्ल्स बोरोमियो ने यह उपलब्धि हासिल की थी. मनजीत हरियाणा के उझाणा गांव के रहने वाले हैं. उनके पिता भैंसों के व्यापारी हैं.

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से कस्बे जलपाईगुड़ी में एक रिक्शा चालक की बेटी 21 वर्षीय स्वप्ना बर्मन ने बुधवार को एशियाई खेलों में हेप्टाथलान इवेंट में भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलवाया. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वप्ना को उनकी इस सफलता पर बधाई दी और और राज्य सरकार की ओर से उन्हें 10 लाख रुपय का इनाम देने की घोषणा की.

बंगाल के पर्यटन मंत्री गौतम देव जलपाईगुड़ी में स्वप्ना के घर गए और उन्हें बधाई दी. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वप्ना की माता से फोन पर बात की. स्वप्ना को पश्चिम बंगाल सरकार नौकरी देगी. स्वप्ना ने तमाम बाधाओं को पार करते हुए एशियाई खेलों में सफलता प्राप्त की. उन्होंने जलपाईगुड़ी में अपने घर के पास ही स्कूल के मैदान में दौड़ना शुरू किया और कड़ी मेहनत की.

स्वप्ना के पिता रिक्शा चलाते हैं और उनकी माता चाय के बागनों से चाय की पत्तियां तोड़ने का काम करती हैं. स्वप्ना के लिए यहां तक कि राह आसान नहीं थी लेकिन तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए उन्होंने अपनी मंज़िल हासिल कर ही ली. बचपन में जब स्वप्ना अपनी ट्रेनिंग कर रही थीं तो उनकी माता अपने काम पर जाते हुए उन्हें मैदान में छोड़ देती थीं और शाम को काम से लौटते हुए उन्हें उसी मैदान से साथ लेते हुए घर आती थीं. एक छोटे से घर से शुरुआत करके स्वप्ना ने यह मुकाम पाया है.

स्वप्ना के जीवन में संकट आते ही गए. घर में तंगी का माहौल तो था ही उस पर कुछ सालों से उनके पिता ने बीमारियों के कारण बिस्तर पकड़ लिया. स्वप्ना के पैरों में 6 उंगलियां हैं इसलिए उनके मुताबिक जूते भी उन्हें नहीं मिल पाते थे. लेकिन ये सारी कठनाई एक तरफ और स्वप्ना का लक्ष्य एक तरफ, जिसे उन्होंने हासिल कर ही लिया.

भारतीय खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन करते हुए पुरुषों की जेवलिन थ्रो स्‍पर्धा में गोल्‍ड मेडल अपने नाम किया. नीरज के लिए भी यह बहुत आसान तो नहीं था. वह जानते थे कि एक ज्वांइट परिवार में किसी एक व्यक्ति पर ज्यादा खर्च नहीं किया जा सकता. घर के आर्थिक हालात भी उनसे छिपे नहीं थे, लेकिन इन सब पहलुओं को दरकिनार करते हुए उन्होंने भाला थाम लिया.

सच कहा जाए तो जेवलिन की कीमत डेढ़ लाख रुपये थी, लेकिन इस युवा ने हौसला नहीं खोया. पिता सतीश कुमार व चाचा भीम सिंह चोपड़ा से सात हजार रुपये लेकर सस्ता जेवलिन खरीदा और हर दिन आठ घंटे अभ्यास किया. नीरज के पिता जहां खेती करते हैं, वहीं उनकी माता गृहणी हैं. नीरज के परिवार की खास बात यह है कि उनके पिता चार भाई हैं और उनका 17 सदस्यों का संयुक्त परिवार है.

नीरज के जेवलिन थ्रो में रिकॉर्ड रचने के बाद भारतीय जेवलिन थ्रो के कोच गैरी कॉलवर्ट्स ने संघ से विवाद के चलते अप्रैल 2017 में इस्तीफा दे दिया था. गैरी के जाने के बाद भारतीय जेवलिन थ्रो टीम के पास कई महीनों तक कोई कोच नहीं था. गैरी की ही कोचिंग में नीरज ने वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम किया था. उनके जाने के बाद नीरज नें यू-ट्यूब का सहारा लेते हुए अपनी ट्रेनिंग जारी रखी. हालांकि इस दौरान वह लंदन विश्व चैंपियनशिप में कोई खास प्रदर्शन नहीं कर सके थे.

खराब प्रदर्शन से जूझ रहे नीरज ने फिर तीन महीने जर्मनी में ट्रेनिंग ली. जिसके बाद भारत वापस आकर कोच ओवे होम की निगरानी में कोचिंग की. फिर कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 में पहली बार हिस्सा लेने पहुंचे. कॉमनवेल्थ गेम्स में नीरज से लोगों को अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद तो थी लेकिन उस उम्मीद को मेडल में तब्दील खुद उन्होंने किया. नीरज ने गोल्‍ड मेडल जीता था.

एशियन गेम्स में उन्‍होंने अपना सर्वश्रेष्ठ थ्रो 88.06 मीटर का फेंका और मेडल पर कब्जा जमाया. नीरज ने यह मेडल पांच में से दो प्रयासों में विफलता के बाद हासिल किया. यह भारत के लिए एशियाई खेलों के इतिहास में जेवलिन में पहला पहला गोल्‍ड मेडल है. जबकि मौजूदा एशियाई खेलों में यह भारत के लिए 8वां गोल्‍ड मेडल है. 24 दिसंबर, 1997 को पानीपत में जन्‍में नीरज से पहले जेवलिन थ्रो में भारत के लिए सिर्फ एक मेडल आया था. यह मेडल 1982 एशियाई खेलों में भारत के गुरतेज सिंह ने ब्रॉन्‍ज के रूप में जीता था.

भारत के लिए 800 मीटर और 1500 मीटर में देश को मेडल दिलाने वाले जिनसन जॉनसन को शायद इससे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी. एशियन गेम्स में 800 मीटर के इवेंट जिनसन जॉनसन को उनके ही हमवतन मनजीत सिंह ने मामूली अंतर से मात दी. मनजीत का यह पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय मेडल था, जबकि जिनसन को सबसे बड़ी उम्मीद माना जा रहा था. साथ ही 800 मीटर इवेंट जिनसन की सबसे पसंदीदा है. अपनी सबसे पसंदीदा इवेंट में गोल्ड से चूकने के बाद भी उनका भरोसा खुद पर से नहीं हिला और मेडल की यह कसर उन्होंने 1500 मीटर में पूरी कर ली.

जिनसन जॉनसन ने 18वें एशियाई खेलों के 12वें दिन पुरुषों की 1500 मीटर स्पर्धा में गोल्‍ड मेडल जीता. जिनसन ने तीन मिनट 44.72 सेकेंड का समय निकाल कर गोल्‍ड मेडल जीता. ईरान के अमीर मुरादी ने तीन मिनट 45.621 सेकंड के साथ सिल्‍वर और बहरीन के मोहम्मद तौलाइ ने तीन मिनट 45.88 सेकेंड के साथ ब्रॉन्‍ज जीता.

800 मीटर में भारत के लिए स्वर्ण जीतने वाले मनजीत सिंह तीन मिनट 46.57 सेकेंड के साथ चौथे स्थान पर रहे. जिनसन को 800 मीटर में दूसरा स्थान मिला था. जिनसन जॉनसन के लिए 800 मीटर की दौड़ नहीं जीत पाना निराशाजनक रहा लेकिन एशियाई खेलों की 1500 मीटर स्पर्धा के चैंपियन जिनसन जॉनसन अपनी पसंदीदा स्पर्धा 800 मीटर में हमवतन मनजीत सिंह से पिछड़ने से हैरान नहीं हैं.

जॉनसन ने कहा, ‘हां, 800 मीटर मेरी पंसदीदा स्पर्धा है और मैं इसमें गोल्ड मेडल जीतना पसंद करता. इसलिए इस तरह से मैं निराश हूं लेकिन मुझे खुशी है कि किसी और देश की जगह दो भारतीयों ने गोल्ड और सिल्वर मेडल जीता.

भारत के चार गोल्ड टीम इवेंट में आए: भारतीय महिला टीम ने चार गुणा 400 मीटर रिले स्पर्धा में देश को स्वर्ण दिलाया. हिमा दास, पुवम्मा राजू, सरिताबेन गायकवाड़ और विसमाया वेलुवाकोरोथ की जोड़ी ने तीन मिनट 28.72 सेकेंड का समय निकाल भारत की झोली में स्वर्ण पदक डाला.

भारत के प्रणब बर्धन और शिभनाथ सरकार की जोड़ी ने पुरुषों की युगल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता. 60 वर्षीय प्रणब और 56 साल के शिभनाथ सरकार ने 384 अंक हासिल करते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया.

भारतीय नौकायन खिलाड़ियों स्वर्ण सिंह, दत्तू भोकानाल, ओम प्रकाश, सुखमीत सिंह की चौकड़ी ने स्कल्स में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक अपने नाम किया.

रोहन बोपन्ना और दिविज शरण ने एशियाई खेलों की पुरूष युगल टेनिस स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता. बोपन्ना और शरण ने कजाखस्तान के अलेक्जेंदर बबलिक और डेनिस येवसेयेव को 52 मिनट में 6-3, 6-4 से हराया.

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