भोले के साथ बोले- ओले ओले-बम बम भोले

तिरंगे के साथ बोले- ओले ओले-बम बम भोले

हाथों में तिरंगें लिए हज़ारों लोग, गाड़ियों पर लगे डीजे, स्पीकर्स पर बजते ग़दर फिल्म के डायलॉग्स और पाकिस्तान-चीन को सबक सिखाने की बातें... ये NH58 है भाई..

भोले की भक्ति में देशभक्ति का 'कॉकटेल'

Ankit FrancisAnkit Francis | Hindi.News18.com @francisankit1

Published: July 21, 2017

सवेरे के साढ़े चार बजे हैं और उमस से भरी बेहद गर्म रात ख़त्म होने को है, सुबह होता देख शिवभक्त कांवड़ियों ने लगातार पैदल चलने से हुए छालों पर से पुरानी काली पड़ चुकीं पट्टियां हटाकर नहाने की तैयारियां शुरू कर दीं हैं. ये दिल्ली से हरिद्वार जाने वाला नेशनल हाइवे 58 है. भारतीय कैलेंडर के मुताबिक ये सावन के महीने का दूसरा हफ्ता है और शिवरात्रि करीब है. कांवड़ियों के विश्राम और उनके खाने-पीने के इंतजाम के लिए हरिद्वार से लेकर दिल्ली तक इस पूरे रास्ते पर करीब 180 छोटे और बड़े सेवा शिविर लगाए गए हैं. ये वो इलाका है जहां कांवड़ यात्रा के दौरान कुछ दिनों तक कानून उस तरह से लागू नहीं होता जिस लिए उसे लिखा गया था...



शिव शायद अकेले ऐसे भगवान् हैं जिन्हें भारत के हर कोने से लगभग हर भाषा-बोली में बेहद प्यार, सम्मान और भक्ति हासिल होती है. इसका अंदाज़ा आप उत्तर में केदानाथ से लेकर दक्षिण में मौजूद रामेश्वर ज्योतिर्लिंग से लगा सकते हैं.

शिव वो हैं जिन्होंने दुनिया को बचा लेने के लिए ज़हर पीने से भी परहेज नहीं किया और उनके नीलकंठ में मौजूद इस ज़हर के असर को कम करने के लिए ही शिव भक्त उन पर जल और दूध चढ़ाते हैं, कांवड़ की ये यात्रा भी इसी मिथक से जुड़ी है.

शिव संसार के सबसे बड़े तपस्वी माने जाते हैं और उनके भक्त भी सावन के महीने में उन्हीं की तरह तप करते हैं, गंगा जल को कंधों पर लादकर पैदल 300 किलोमीटर से भी ज्यादा का सफ़र तय करते हैं.

दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर पर मौजूद जिस शिविर में हम सबसे पहले पहुंचे वो परवीन नागर का है.

परवीन खुद को बीजेपी कार्यकर्ता बताते हैं और बीते 10 साल से ये शिविर लगा रहे हैं. शिविर में फिलहाल करीब 150 लोग मौजूद हैं, इनमें से 100 के करीब अभी भी सो रहे हैं जबकि कुछ लोग नहा-धोकर आगे की यात्रा के लिए लगभग तैयार हैं. किचन में चाय बन गई है और बंटनी भी शुरू हो गयी है, इसके बाद जूस और पूरी-सब्जी वाला नाश्ता भी बंटेगा.

लोगों की आंखें देखकर ये अंदाजा लग रहा है कि हमारी उपस्थिति ने उन्हें ज़रा ज्यादा सतर्क कर दिया है, कुछ शिवभक्तों ने हमारी तरफ 'भोले-भोले' शब्दों को फेंककर हमारी मंशा जानने की शुरुआत भी कर दी है. हमने भी जवाब में 'भोले-भोले' कहकर उनकी आशंकाओं को दूर करना शुरू कर दिया है.



सूरज की किरणों ने आसमान के रंग को काले से हल्का नीला और बाद में नारंगी कर दिया और पीली-पीली धूप अब चमकने लगी है. शिवभक्त अभी बात करने के मूड में नहीं हैं और उन्हें धूप तेज़ हो जाने से पहले ज्यादा से ज्यादा रास्ता तय कर लेना है.

उत्तराखंड, यूपी और दिल्ली सरकार ने कांवड़ियों की सुविधा के लिए हरिद्वार के बाहर से ही NH58 की एक लेन को बंद कर दिया है और सारा ट्रैफिक सिंगल लेन इस्तेमाल कर रहा है.

हम शिविर को छोड़कर आगे निकल चुके हैं और सुबह 6:30 बजे ही तेज धूप ने ये बता दिया है कि दिन कितना मुश्किल होने वाला है.



सड़क की एक लेन को पहले ही कांवड़ियों को दे दिया गया है लेकिन इसके बावजूद दूसरी लेन में भी शिवभक्त बिना किसी रोक-टोक के आ जा रहे हैं.

ज्यादातर बाइक्स पर शिवभक्त ट्रिपलिंग कर रहे हैं और किसी ने भी हेलमेट नहीं पहना है. सभी बाइक्स पर एक भगवा झंडा और एक तिरंगा लगा हुआ है. पुलिसवाले ट्रैफिक को रोककर कांवड़ियों के आने जाने के लिए रास्ता बना रहे हैं.

रात भर ड्यूटी कर थक चुका एक पुलिसवाला प्लास्टिक की कुर्सी पर पसरा हुआ है. वो हमारे सवालों का जवाब देने में कोई रूचि नहीं ले रहा और 8 बजते ही घर जाने का इंतज़ार कर रहा है.

शिव को सृष्टि का सर्वोत्कृष्ट तपस्वी और आत्मसंयमी कहा जाता है. बाकी भगवानों के मुकाबले शिव को मदमस्त तो कहा जाता है लेकिन वो बाकी के मुकाबले सबसे सजग और सहनशील भी माने जाते हैं.

मिथकों के मुताबिक शिव वो हैं जिन्होंने अपना निर्माण खुद किया है इसलिए उनके माता-पिता नहीं हैं. कहते हैं न तो उनका कोई बचपन है न बुढ़ापा. शिव को अमर और सर्वव्यापी कहा जाता है...

Road from Jagarguna to Dornapal

गर्मी तेज़ हो गयी है और हम मोहननगर से गुजरते हुए अचानक ठिठक गए हैं. सड़क के किनारे फुटपाथ पर लाइन से करीब 20 दुकानें सजी हुई हैं जो कांवड़ लाने वालों के लिए भगवा कपड़े और झंडों के साथ-साथ तिरंगा भी बेच रहे हैं.

दूकान पर मोहन और बबलू मौजूद हैं. मोहन दूकान सजा रहा है जबकि बबलू नए झंडों में लगाने के लिए डंडे तैयार कर रहा है. बबलू बताते हैं कि पिछले तीन सालों में कांवड़ यात्रा के दौरान तिरंगों का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है. इसलिए ही उन्होंने ये दूकान सिर्फ तीन दिन के लिए लगाई है.

ये पूछने पर कि कांवड़ से तिरंगे का क्या लेना-देना है बबलू कहता है- 'अब से 10 साल पहले तक तो सिर्फ वही चलते थे जो सच में कांवड़ लेने जाते थे लेकिन अब तो सब जाने लगे हैं, पहले लोग नारंगी कपड़े देखकर 'भोले' को पहचानते थे लेकिन अब तो गाड़ी या बाइक पर तिरंगा लगा हो तो भी सब पहचान लेते हैं कि किसकी गाड़ी है.' सिर्फ तिरंगा ही नहीं हॉलीवुड की हॉरर फिल्म 'सॉ' से प्रचलन में आया मास्क लगाना भी खूब फैशन में है

90 साल की भगवानदेई से मिलते हैं हमें इशारों के जरिए बताती हैं कि अब वो ठीक से सुन नहीं पाती.

उनके साथ उनकी बहू सावित्री, बेटा राजकुमार और तीन पोते जल लेकर हरिद्वार से लौट रहे हैं. भगवानदेई 16वीं बार जबकि उनका बेटा 19वीं बार जल लेकर लौटा है. इतनी उम्र में भी वो कैसे इतना चल पाती हैं इस सवाल के जवाब में वो सिर्फ इतना ही कहती हैं कि भोले उन्हें ताकत देते हैं. ​


संजीव नाराज़ है कि लोग कांवड़ लेने आते हैं और लेकिन यहां भी एक-दूसरे का बैग चुरा लेते हैं

भगवानदेई के बगल में 25-26 साल उम्र का संजीव भी बैठा है जो कि मारुति में सर्विस एडवाइजर है.

संजीव बढ़ती महंगाई से भी चिंतित है और कहता है कि कांवड़ में आना भी अब महंगा हो गया है जिससे गरीब लोगों को दिक्कत हो रही है.

संजीव से जब हमने पूछा कि ये सारे 'भोले' इस बार तिरंगा क्यों लिए हुए हैं तो उसने बताया कि ये पाकिस्तान और चीन के लिए है. पाकिस्तान बॉर्डर पर मार रहा है इसलिए भोले उन्हें तिरंगे के जरिए हमारी ताकत का एहसास करा रहे हैं.

संजीव जब चीन-पाकिस्तान को सबक सिखाने के सपने देख रहा था ठीक उसी वक़्त उसके पीछे गौरव बैठा है. गौरव के दोनों पैर और एक हाथ पोलियो के चलते बचपन से ही ठीक से काम नहीं करते. गौरव दिल्ली के कल्याणपुरी में साइकिल पंक्चर की दुकान लगाता है और 5 सालों से कांवड़ लेने जाता है. गौरव पाकिस्तान और चीन को लेकर परेशान नहीं दिखता, उसे चिंता है कि उसके पीछे कमेटी वाले उसकी टीन की दुकान को उठाकर न ले जाएं...


सड़क में बड़े-बड़े स्पीकर से लदे ट्रैक्टर-ट्रॉली और ट्रक मिल रहे थे. इनके जरिए इतना लाउड म्यूजिक बजाया जा रहा था कि हमारी गाड़ी चारों शीशा चढ़े होने के बावजूद भी पूरा हिल रही थी.

एक ग्रुप ने ट्रक पर 36 बड़े-बड़े स्पीकर्स लगाए हुए थे और उस पर कश्मीर में पत्थरबाजों को सबक सिखाने वाला कोई गाना बज रहा था.

ज्यादातर कांवड़ियों के हाथ में बेसबॉल बैट नज़र आ रहे थे. पूछने पर मालूम चला कि शुरुआत में चलने के लिए लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता था जो कि पहले लाठियों में बदले और आज इसकी जगह बेसबॉल बैट्स ने ले ली है.

बात करने पर पता चला कि दिल्ली का एक ग्रुप थोड़ी देर पहले 153 फीट लंबे तिरंगे के साथ गुजरा है. करीबन हर 5 मिनट के बाद बड़े-बड़े स्पीकर्स से लदी कोई गाड़ी हमें मिल जाती थी जो बेहद तेज़ आवाज़ में कांवड़ और देशभक्ति के गाने बजा रही होती थी. एक कांवड़ वाला ट्रक 'ग़दर एक प्रेम कथा' फिल्म के डायलॉग बजा रहा था तो उसके पीछे चल रहे ट्रक पर 'ओले-ओले, बम-बम भोले' जैसा सुनाई दे रहा कोई गाना बज रहा था. हर-हर महादेव के साथ भारत माता की जय के नारे भी लगातार सुनाई दे रहे थे...

11 बजे हैं और तेज़ धूप से बेहाल कांवड़िये शिविरों में चल रहे पंखों के सामने अपना पसीना सुखा रहे हैं. हम अब उस मंदिर जा रहे हैं जिसके बारे में दावा किया जाता है कि कांवड़ की यात्रा यहीं से शुरू हुई और पिछले साल करीब 25 लाख शिवभक्तों ने यहां जल चढ़ाया था.

महादेव मंदिर : बागपत के बालौनी रोड पर स्थित पुरा महादेव का मंदिर इस इलाके में काफी मशहूर है. पुरा महादेव मंदिर के मुख्य पुजारी जयभगवान शर्मा बताते हैं कि यहां भगवान परशुराम ने ताप किया जिससे शिव खुद प्रकट हुए और फिर तभी से ये कांवड़ यात्रा कि शुरुआत हुई.

उन्होंने बताया कि इस मंदिर में जल चढ़ाने के लिए इस साल करीब 30 लाख भक्तों के आने का अनुमान है. मंदिर की सुरक्षा देखकर भी इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता था.



इस स्कूल में पढ़ने वालीं 70 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियां मुस्लिम हैं और गरीब परिवारों से ताल्लुक रखती हैं..

मंदिर से जुड़ा हुआ ट्रस्ट मंदिर के बगल में ही एक स्कूल भी चलाता है. ये स्कूल इलाके की लड़कियों की शिक्षा के लिए विशेष रूप से चलाया जा रहा है. जयभगवान शर्मा के मुताबिक इस स्कूल में पढ़ने वालीं 70 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियां मुस्लिम हैं और गरीब परिवारों से ताल्लुक रखती हैं. उनके मुताबिक इस इलाके में हिंदू-मुसलमानों में भेदभाव जैसी समस्याएं नहीं हैं और सभी मिलजुलकर रह रहे हैं.

हालांकि शामली यहां से सिर्फ 50 किलोमीटर दूर है जो करीबन 4 साल पहले मुज्जफरनगर दंगों की चपेट में था. उधर बातों-बातों में मंदिर में ड्यूटी कर रहे पुलिसवाले ने बताया कि कैसे मोदीनगर में कांवड़ियों ने दो पुलिसवालों को बाइक टकरा जाने के बाद बुरी तरह पीट दिया. उन्होंने अगली ही लाइन में ऑफिशियली इस बात की पुष्टि करने से मना कर दिया.


हम लोग वापस NH58 पर आ गए अब तक दोपहर के 3 बज चुके थे और सड़क पर कांवड़ियों की तादाद पहले से और बढ़ गई थी. चारों तरफ सिर्फ बड़े-बड़े स्पीकर्स से लदी गाडियां और तिरंगों से सजे कांवड़िये नज़र आ रहे थे.

इसी दौरान एक शिविर में हमारी मुलाक़ात वकील अहमद से हुई. वकील पिछले 16 साल से कांवड़ियों की मरहम-पट्टी करते हैं. अहमद बताते हैं कि 1000 लोग यहां रोज आते हैं. मैं पिछले 16 साल से सेवा कर रहा हूं.



पिछले साल रमजान और सावन लगभग एक ही साथ था. मैंने रोजे रखे हुए थे. सुबह 4 बजे नमाज पढ़ कर आता था और शाम 7 बजे तक सेवा करता था. जब अहमद से पूछा गया कि वो ये सब क्यों करते हैं तो उनका जवाब था- सब भोले बाबा करवाते है. इसके बाद व्यस्त होने की दुहाई देकर अहमद फिर काम पर लग गए.

थके हुए कांवड़ियों के साथ हम भी वापस दिल्ली पहुंच रहे थे. शाम हो गई थी और दिल्ली बॉर्डर पर झिलमिल के पास लगे एक शिविर में दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष और आम आदमी पार्टी नेता राम निवास गोयल भी कांवड़ सेवा में मशगूल थे. .

सरकार ने कांवड़ियों में नशे की लत छुड़ाने के लिए भी अभियान चलाया हुआ है और दिल्ली के शिविरों में धूम्रपान प्रतिबंधित किया हुआ है.

उन्होंने हमें बताया कि कैसे सरकार ने कांवड़ियों में नशे की लत छुड़ाने के लिए भी अभियान चलाया हुआ है और दिल्ली के शिविरों में धूम्रपान प्रतिबंधित किया हुआ है. इसके आलावा 50 लाख रुपए खर्च कर पंडाल भी लगाया गया है. बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गयी थी और इसे शिव की कृपा मानकर पंडाल 'हर-हर महादेव' के जयकारों से गूंज रहा था.

कांवड़ियों को शिव का रूप माना जाना है और इसलिए ही उन्हें 'भोले' कहकर बुलाया जाता है. कांवड़ लेने जाने वाले इन दिनों खुद को इतना महत्वपूर्ण मानते भी हैं. शिव को सुंदरता की मूर्ति कहा जाता है लेकिन उनका एक रूप औघड़ का भी है.

शिव शब्द का वास्तविक अर्थ ही है- 'जो नही है'. वो जिसकी उपस्थिति ऐसी हो जैसे वो है ही नहीं लेकिन वही इस ब्रह्माण का सबसे बड़ा हिस्सा है. लौटते हुए हमारे मन में जो सवाल सबसे ज्यादा आ रहा था वो यही था कि कांवड़िये जिस तरह सभी ट्रैफिक रूल्स और बाकी कानूनों को ताक पर रखते हैं.

पुलिसवालों पर भी हाथ उठाने से परहेज नहीं करते उससे 'शिव' और 'भोले' के बीच का ये फर्क और गहरा होता जाता है?

एक तरफ 90 साल की भगवानदेई और दोनों पैरों से लाचार गौरव है जो शिव को अपना सबकुछ मानकर हर साल पैसे और तमाम दिक्कतों से जूझते हुए जल लेने हरिद्वार और कभी-कभी गंगोत्री तक भी चले जाते हैं. दूसरी तरफ वो सब हैं जो 'शिव' को नहीं समझते लेकिन फिर भी 'भोले' कहलाते हैं...!

Produced by Gauri Shankar

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