दक्षिण भारत का महाकुम्भ

महामस्तकाभिषेक

श्रवणबेलगोला दक्षिण का एक तीर्थ है, जहां भगवान गोमतेश्वर की 18 मीटर ऊंची मूर्ति स्थापित है. जैन धर्म का उत्सव ‘महामस्तकाभिषेक’ हर 12 साल बाद यहीं मनाया जाता है.

दक्षिण भारत का महाकुम्भ

डी पी सतीश डी पी सतीश | Hindi.News18.com dp_satish

Published: February 12, 2018

जयपुर के खेमचन्द खारीवाल अपनी उम्र के 65वें पड़ाव पर हैं. उम्र के इस पड़ाव पर शरीर में वो गति नहीं रह जाती जो जवानी के दिनों में होती है. हालांकि जयपुर का ये बिजनेसमैन आज भी एक युवा की तरह ही स्फूर्तिवान है. लगभग 6 महीने में 2500 किलोमीटर से भी ज्यादा नंगे पांव चलकर वो जैन धर्म के पवित्र तीर्थ श्रवणबेलगोला पहुंच गए हैं. और वो भी जैन धर्म के विराट पर्व ‘महामस्तकाभिषेक’ से ठीक एक महीने पहले.

बेंगलुरू से लगभग 144 किलोमीटर दूर, कर्नाटक के हासन जिले के चन्नारायपट्टन के पास श्रवणबेलगोला एक तीर्थ है, जहां भगवान गोमतेश्वर की 18 मीटर ऊंची मूर्ति स्थापित है. जैन धर्म का उत्सव ‘महामस्तकाभिषेक’ 12 वर्ष के अंतराल के बाद इसी तीर्थ पर आयोजित किया जाता है.

खेमचन्द खारीवाल पांचवीं बार 'महामस्तकाभिषेक' में शामिल हो रहे हैं.

1967 में उन्होंने पहली बार अपने पिता के साथ ये यात्रा की थी, तब वो अपनी किशोर उम्र में थे. खारीवाल का मानना है कि ये शायद उनकी आखिरी यात्रा होगी. उन्होंने कहा कि अगले महामस्तकाभिषेक तक मैं 77 का हो जाऊंगा और शायद तब तक मैं जीवित न रहूं.

खारीवाल ने फैसला किया है कि अब वो सांसारिक सुखों को त्याग देंगे. साफ़ शब्दों में कहा जाए तो वह सभी भौतिक चीज़ों का बलिदान करना चाहते है. उन्होंने कहा कि उनके पिता और दादा दोनों ने भी श्रवणबेलगोला जाने के बाद ऐसा ही किया था. उन्होंने कहा, "मैं जिस तरह से इस पार आया हूं, मैं दुनिया को छोड़ देना चाहता हूं. ऐसा कहते हुए उनकी आवाज़ का एक अलग ही टोन होता है जो बेहद ख़ास लगता है.

  • गोमतेश्वर की 57 फीट उंची प्रतिमा श्रवणबेलगोला में विंध्यगिरी पर स्थित है. 17 फरवरी को हज़ारों जैन यहां पर महामस्तकाभिषेक में शामिल होंगे.(फोटो : PTI)

    गोमतेश्वर की 57 फीट उंची प्रतिमा श्रवणबेलगोला में विंध्यगिरी पर स्थित है. 17 फरवरी को हज़ारों जैन यहां पर महामस्तकाभिषेक में शामिल होंगे.(फोटो : PTI)

करीब 2300 साल पहले, खेमचंद की तरह ही एक और उत्तर भारतीय संसार के सभी सुखों को त्यागते हुए श्रवणबेलगोला आया था, वो कोई साधारण आदमी नहीं था बल्कि भारत के महान सम्राट और मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य थे. वे अपनी राजधानी पाटलिपुत्र (आज बिहार में पटना) से श्रवणबेलगोला पहुंचे थे. इस यात्रा को पूरा करने में उन्हें लगभग 1 साल लगा था. किंवदंती है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने एक पहाड़ी के ऊपर जैन मन्दिर में संथारा (मृत्यु होने तक अन्न जल का त्याग) किया था. इस पहाड़ी को बाद में उनके सम्मान में चंद्रगिरी नाम दिया गया.

हजारों सालों से कर्नाटक के हासन जिले का यह छोटा सा गांव दुनिया भर से लाखों जैनियों और अन्य के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. चंद्रगुप्त की मौत के 13 सदियों बाद यहां बाहुबली की एक खूबसूरत अखंड प्रतिमा स्थापित की गई. स्थानीय लोग उन्हें गोमतेश्वर कहते हैं. यह प्रतिमा विंध्यगिरी नाम की एक पहाड़ी पर 981 ईस्‍वी में स्थापित की गई. यह प्रतिमा 58.8 फीट ऊंची है और दुनिया में अपनी तरह की इकलौती प्रतिमा है. 10वीं सदी में कर्नाटक के इस हिस्से पर गंग वंश का शासन था, जिनकी राजधानी कावेरी नदी के तट पर बसे मैसूर के समीप स्थित तलाकडु थी.

गंग राजवंश के एक मंत्री चांवुडराय जनरल के तौर पर काम करते थे. बाहुबली की प्रतिमा का निर्माण उन्हीं की देखरेख में हुआ. ये प्रतिमा समुद्र तल से 4000 फीट की ऊंचाई पर स्थित पहाड़ी पर एक बड़े पत्थर को काटकर बनाई गई है. इसके निर्माण में दूसरे पत्थर का इस्तेमाल नहीं किया गया है. जैनियों के इतिहास के मुताबिक अरिष्टनेमी नाम के एक संन्यासी ने इस विशालकाय प्रतिमा को तैयार किया है. यह दुखद है कि इस महान शिल्पकार के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है- वह हजार सालों से कलात्मक उत्कृष्टता की एक मिसाल बने हुए हैं.

कैसे बनी बाहुबली की प्रतिमा

बाहुबली अयोध्या के राजा ऋषभदेव (ऋषभनाथ) के पुत्र हैं. ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भी हैं. किंवदंती है कि अपना राज्य अपने 100 बच्चों में बराबर बांटने के बाद अयोध्या के राजा ने अपना राज्य छोड़ दिया था. उनका सबसे बड़ा बेटा भरत बेहद महत्वाकांक्षी था और वह एकमात्र राजा बनना चाहता था. भरत के सभी भाइयों ने उसके सामने समर्पण कर दिया लेकिन बाहुबली नहीं झुके.

बाहुबली और भरत को उनके रिश्तेदारों और बुजुर्गों ने सुझाव दिया कि राजा कौन होगा इसका फैसला करने के लिए दोनों को दो-दो हाथ करना चाहिए ताकि युद्ध और खून-खराबा न हो. दोनों के बीच हुए द्वंद्व में बाहुबली आसानी से जीत गए लेकिन वह भरत को मारना नहीं चाहते थे.

यही बाहुबली के जीवन का टर्निंग पॉइंट था. उन्हें अहसास हुआ कि संसार की हर चीज नष्ट होने वाली है. उन्होंने अपना सबकुछ त्याग दिया और जंगल चले गए. वहां उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए कई सालों तक कठिन तपस्या की. बाहुबली तीर्थंकर नहीं है लेकिन जैनी उनका बेहद सम्मान करते हैं.

  • महामस्तकाभिषेक महोत्सव 2018 के शुभारम्भ के अवसर पर तुरही बजाते कलाकार (फोटो : PTI)

    महामस्तकाभिषेक महोत्सव 2018 के शुभारम्भ के अवसर पर तुरही बजाते कलाकार (फोटो : PTI)

तब भारतीय जैन संन्यासी गंग वंश के राजा रचमल्ला के दरबार में प्रस्तुत हुए. उन्होंने उन्हें बाहुबली की कहानी सुनाई जिससे दरबार में मौजूद हर शख्स बेहद प्रभावित हुआ. बाद में जब राजा के मंत्री चांवुडराय अपनी मां के साथ तीर्थयात्रा पर जा रहे थे तो उन्हें एक सपना आया. सपने में उन्होंने खुद को चंद्रगिरी की चोटी से पास की पहाड़ी पर तीर से वार करते देखा. तब उन्हें वहां गोमतेश्वर की प्रतिमा दिखाई दी. बाद में उन्होंने वहां पर बाहुबली की प्रतिमा का निर्माण कराया.

महामस्‍तकाभिषेक —12 साल में एक बार

भगवान बाहुबली या गोमतेश्‍वर का महामस्‍तकाभिषेक 12 साल में एक बार होता है. सबसे पहले यह 981 ईस्‍वी में हुआ था.

इस बार 88वां महामस्‍तकाभिषेक होगा और यह 17 फरवरी से शुरू होगा. अस्‍थायी मचानों के जरिए दूध, शहद, औषधि, केसर, हल्‍दी, चंदन, नारियल पानी और अन्‍य महंगी वस्‍तुओं से भरे कलशों को प्रतिमा के सबसे ऊपर ले जाया जाएगा. इसके बाद इनसे प्रतिमा का अभिषेक होगा. कार्यक्रम के पहले दिन 108 कलश इस्‍तेमाल होंगे. दूसरे दिन से बाहुबली की शानदार प्रतिमा के स्‍नान के लिए 1008 कलश उपयोग में होंगे.

  • अस्‍थायी मचानों के जरिए दूध, शहद, औषधि, केसर,हल्‍दी, चंदन, नारियल पानी और अन्‍य महंगी वस्‍तुओं से भरे कलशों को प्रतिमा के सबसे ऊपर ले जाया जाएगा. इसके बाद इनसे प्रतिमा का अभिषेक होगा.

    अस्‍थायी मचानों के जरिए दूध, शहद, औषधि, केसर,हल्‍दी, चंदन, नारियल पानी और अन्‍य महंगी वस्‍तुओं से भरे कलशों को प्रतिमा के सबसे ऊपर ले जाया जाएगा. इसके बाद इनसे प्रतिमा का अभिषेक होगा.

अभिषेक में प्रयोग होने वाले कलशों पर भी इन दिनों महंगाई की मार पड़ रही है. एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर न्‍यूज18 को बताया कि नोटबंदी और जीएसटी से कलश की बोली पर असर पड़ा है. उन्‍होंने कहा, 'इससे पहले कलश खरीदने को लेकर धनवान जैनियों के बीच जमकर मुकाबला होता था. वे एक दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए बोली लगाते थे. इस बार दिलचस्‍पी कम रही. उनका कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी से कारोबार पर असर पड़ा है. हमें पैसा जोड़ने में संघर्ष करना पड़ा. इससे (बोली) जो पैसा आता है उससे अस्‍पताल, स्‍कूल और भोजन जैसे दान-पुण्‍य के काम किए जाते हैं.'

हालांकि कलश की बोली से कम पैसा आने की प्रशासन की आशंका के बावजूद पहले कलश पर 12 करोड़ रुपये की बोली लगी है. यह बोली उत्‍तर भारत के एक कारोबारी ने लगाई है. इसी कारोबारी ने 2006 में भी पहला कलश खरीदा था.

यह कार्यक्रम नौ दिन तक चलेगा और 26 फरवरी को इसका समापन होगा.

इस साल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 7 फरवरी को आयोजन का शुभारंभ किया, साल 2006 में ये काम तब के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था. आज़ादी के बाद से ही श्रवणबेलगोला में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री शिरकत करते रहे हैं. भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1951 में इंदिरा गांधी के साथ इसमें शिरकत की थी और कहा था, "मेरे पास शब्द नहीं हैं, मैं इसे देखकर हैरान हूं."

प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी ने भी दो बार महामस्तकाभिषेक में हिस्सा लिया था. तब उन्होंने एक हेलीकॉप्टर से प्रतिमा पर फूल गिरवाए थे. 1981 महामस्तकाभिषेक और बाहुबली गोमतेश्वर की मूर्ति स्थापना का 1000वां साल था. गंग वंश के राजाओं से लेकर मैसूर के वाडयार तक-12 सालों में एक बार होने वाला महामस्तकाभिषेक कभी ना थमने वाला एक रिवाज रहा है. टीपू सुल्तान और हैदर अली के शासन में भी ये उतनी ही धूमधाम से मनाया जाता था.

  • प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी ने 1967 और 1981 में महामस्तकाभिषेक में हिस्सा लिया था.

    प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी ने 1967 और 1981 में महामस्तकाभिषेक में हिस्सा लिया था.

इस मौके पर श्रवणबेलगोला जैन मठ में जैन भिक्षुओं और संतों द्वारा किया जाने वाला हर धार्मिक समारोह, चारूकीर्ति भट्टारक- जो मुख्य भिक्षु हैं, की देखरेख में संपन्न होता है. कर्नाटक सरकार इस समारोह के लिए सैंकड़ों करोड़ रुपये खर्च करती है. इस साल इस समारोह के लिए सरकार ने 175 करोड़ का बजट तय किया, जिसमें 75 करोड़ जैन भिक्षुओं और लाखों श्रद्धालुओं के रहने के लिए अस्थायी घरों को बनाने में खर्च हुए. इसके लिए घाटी के नीचे 12 टाउनशिप पहले ही बना दी गई हैं.

एक जर्मन कम्पनी ने मूर्ति के इर्द गिर्द मचान बनाई है, जिसमें रिंग और लॉक सिस्टम का इस्तेमाल किया है. ये एक बार में 5000 लोगों को जगह दे सकती है और इसमें 3 एलिवेटर लगे हुए हैं. भारतीय पुरातत्व विभाग, जो इस इमारत की देखरेख करता है, उसने समारोह के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

बाहुबली की मूर्ति के पैरों तक पहुंचने के लिए एक व्यक्ति को 640 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. चूंकि विभाग ने रस्सियों और ट्रॉली के प्रयोग पर रोक लगाई है, इसलिए प्रशासन ने इस बार श्रद्धालुओं को ले जाने के लिए 100 डोलियों को इस्तेमाल किया है, जो उन्हें चोटी तक लेकर जाएंगी.

पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी दैवगौड़ा, जो इलाके के सांसद भी हैं, उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में अहम किरदार निभाया है. उनका गांव श्रवणबेलगोला से 30 मिनट की दूरी पर है. हालांकि इस बार वो बहुत उदास हैं कि केंद्र नें आयोजन के लिए पैसों की कोई मदद नहीं की. न्यूज़ 18 से बातचीत में देवगौड़ा ने कहा, "मैंने व्यक्तिगत रूप से पीएम मोदी से मुलाकात की और आर्थिक मदद के लिए आग्रह किया. लेकिन केंद्र से किसी भी प्रकार का आर्थिक सहयोग नहीं मिला."

दशकों के प्रयास के बाद श्रवणबेलगोला को आखिरकार एक रेलवे लाइन का तोहफा मिला. बेंगलुरू-हासन रेलवे लाइन अब इस पवित्र जगह से होकर गुजरती है. दुनियाभर से तकरीबन 40 लाख लोग इस बार समारोह में शिरकत करेंगे. इसमें प्रमुख रूप से उत्तर भारतीय और विदेशों में रहने वाले जैन समुदाय के लोग होंगे.

  • प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी ने दो बार महामस्तकाभिषेक में हिस्सा लिया था. तब उन्होंने एक हेलीकॉप्टर से प्रतिमा पर फूल बरसाए थे.

    प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी ने दो बार महामस्तकाभिषेक में हिस्सा लिया था. तब उन्होंने एक हेलीकॉप्टर से प्रतिमा पर फूल बरसाए थे.

तकरीबन 1000 से ज्यादा जैन भिक्षु समारोह में हिस्सा लेने के लिए पहले ही श्रवणबेलगोला पहुंच चुके हैं. कुछ तो यहां पैदल चलकर, कई मीलों का सफर करते हुए यहां पहुंचे हैं. इन्हें टाउनशिप में ठहराया गया है. इस समारोह में सैंकड़ों महिला भिक्षु की उपस्थिति भी होगी, जो श्रवणबेलगोला पहुंच चुकी हैं.

महामस्तकाभिषेक उत्सव में सैकड़ों लोग सांसारिक सुख त्याग देते हैं और जैन भिक्षु बन जाते हैं. उनमें से बहुत से लोग धनी परिवारों से होते हैं जिनकी संपत्ति सैकड़ों करोड़ से ज्यादा की होती हैं.

 

श्रवणबेलगोला

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, श्रवणबेलगोला सबसे पुरानी जगहों में से एक है. यह लगभग 2500 से अधिक वर्षों से अस्तित्व में है. और यह न केवल जैन धर्म के लिए बल्कि कला और संस्कृति के लिए भी हमेशा से एक खास केंद्र रहा है. चंद्रगिरी और विंध्यगिरी दोनों पहाड़ियों पर एक साथ 650 से अधिक शिलालेख हैं, जोकि 1500-2500 साल पुराने हैं.

श्रवणबेलगोला सड़क और रेल से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है. यह बेंगलुरू से करीब 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. बेंगलुरू-मंगलुरू राष्ट्रीय राजमार्ग इस शहर के नजदीक से होकर गुजरता है. बेंगलुरू से यहां तक पहुंचने के लिए रेल सुविधा भी है.

बेंगलुरू के कैम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से ये शहर करीब 200 किलोमीटर की दूरी पर है. यात्रा सुलभ बनाने के लिए कर्नाटक सरकार ने सभी तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिए विस्तृत परिवहन व्यवस्था भी मुहैय्या करा रखी है.

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प्रस्तुतीकरण : आकाश दीप शुक्ला