महिला किसान

महिला किसान

देश की कृषक आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा महिलाओं का है लेकिन जब भी खेती-किसानी की बात चलती है, ये दिखाई नहीं पड़ता. सिर्फ 'किसान भाईयों' की बात होती है, 'किसान बहनों' की बात कभी नहीं होती. ऐसा क्यों है?

खेतों में 70% औरतें, सरकार को दिखते हैं सिर्फ 'किसान भाई'

Sheikh Saaliq | News18.com

Published: Mar 08, 2018

जब वित्तमंत्री अरुण जेटली ने वर्ष 2018-2019 का केंद्रीय बजट पेश किया था, तो एक बात पहले से ही कही जा रही थी कि बजट 'किसानों के अनुकूल' होगा. जेटली ने अपने भाषण के दौरान 27 बार 'किसान' शब्द का इस्तेमाल किया और ढेर सारी योजनाओं का वादा किया, इस उम्मीद के साथ कि इससे 'किसान भाइयों' को मदद मिलेगी.

एक ओर तो भारत सरकार 'किसान' को एक व्यक्ति के तौर पर परिभाषित करती है, जो खेती करता है, भले ही वो पुरुष हो या फिर महिला, खेत का मालिक हो या नहीं. दूसरी ओर ज्यादातर राजनेता, जिनमें वित्तमंत्री भी शामिल हैं, अपने भाषण में किसानों को 'भाई' संबोधित करते हैं.

खेती को पुरुषों के वर्चस्व वाला काम माना जाता रहा और औरतें इसके जिक्र के दौरान बाहर ही रहीं. हालांकि, खेती-बाड़ी के बारे में सोचते हुए इस तथ्य को नजरअंदाज करना हैरानी भरा है कि भारत में महिला कृषकों की तुलना में पुरुष किसानों का प्रतिशत कम है.

हर 10 में से 6 किसान, महिलाएं हैं. इसका मतलब है कि भारत की कुल किसान आबादी का 60% हिस्सा महिलाओं से बना है. बात चाहे बुआई की हो या फिर फसल जुताई, कटाई या फिर ट्रैक्टर चलाने की- महिलाएं ही खेतों में ये काम पुरुषों से ज्यादा करती दिखती हैं. इसके बावजूद 13 प्रतिशत से भी कम महिलाएं किसी जमीन की मालिक हैं.

खेत पर काम, लेकिन नाम नहीं

39 वर्षीय उषा देवी पिछले 15 सालों से उस जमीन पर खेती कर रही हैं, जिसपर उनका कोई हक नहीं. वह अपने तीन बच्चों और पति के लिए खाना बनाने के लिए अंधेरा टूटने से पहले उठती हैं, भैंसों का दूध दुहती हैं, बच्चों को स्कूल भेजती हैं और फिर अपना पूरा दिन चार एकड़ की उस जमीन पर बिताती हैं, जो सोनीपत में उनके घर के ठीक सामने है.

उनके पति देवेन्द्र कुमार बेरोजगार हैं, अपने दिन का अधिकतर वक्त दोस्तों के साथ कार्ड खेलते हुए बिताते हैं. वही खेत के मालिक हैं.

देवी खेत में सब्जियां उगातीं हैं और पास के मंडी में बेचती हैं. इससे आए पैसों से ही परिवार का पेट भरता है और वही पैसे कमाती हैं लेकिन इसके बावजूद खेत पर उनका कोई हक नहीं.

"मेरे पति कोई काम नहीं करते हैं. मैं जैसे-तैसे इस खेत से हुई पैदावार से ही परिवार चलाती हूं. क्या मुझे भी जमीन के छोटे से हिस्से पर हक नहीं मिलना चाहिए ताकि मैं अपने बच्चों के भविष्य के लिए कुछ बचा सकूं? " देवी पूछती हैं.

देवी देश की उन बहुत सी महिला कृषकों में से हैं, जिनके काम को कोई नहीं पूछता. अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी वे बजट भाषण में भी नजर नहीं आतीं. वे दूसरी महिलाओं की तरह देश की कृषि अर्थव्यवस्था का प्रमुख हिस्सा तो हैं लेकिन जमीन पर उनका कोई अधिकार नहीं और न ही किसी निर्णय में उन्हें पूछा जाता है.

क्रेडिट तक पहुंच नहीं

जमीन पर किसी अधिकार के बिना, महिलाओं की क्रेडिट तक बहुत कम पहुंच होती है, और इसी वजह से वे अक्सर किसी सरकारी योजना तक नहीं पहुंच पाती हैं, जो खास किसानों की मदद के बनाई जाती हैं.

पपिछले पांच सालों में हुए कई सर्वेक्षणों और रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में आर्थिक तौर पर स्वतंत्र महिलाओं में 80 प्रतिशत महिलाएं खेती-किसानी से जुड़ी हुई हैं. इनमें से 33% खेती के काम में मजदूरी कर रही हैं और 48% के पास अपना काम है.

नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के मुताबिक, खेती से संबंधित लगभग 18 प्रतिशत काम केवल महिलाएं ही करती हैं और यहां तक कि कृषि संबंधित कोई भी काम नहीं है, जिसमें उनकी जरूरत न पड़े.

2001 के बाद से खेती में महिलाओं की सहभागिता बढ़ी

ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश जो कि भारत का सबसे बड़ा राज्य है, यहां खेती योग्य जमीन पर 18% से भी कम महिलाएं मालिकाना हक रखती हैं. केरल, जो कि सबसे अधिक साक्षरता वाला राज्य है, यहां केवल 14% महिलाएं खेतों की मालिक हैं.

इन आंकड़ों के पीछे यह तथ्य काम करता है कि ज्यादातर राज्यों में जमीनों पर लगभग हमेशा ही पुरुषों का हक होता है.

कानून भी है अड़चन

हालिया विरासत कानून यह सुनिश्चित करता है कि महिलाएं को खासकर खेती योग्य जमीन पर मालिकाना हक न मिले. इस वजह के साथ कि इससे जमीन के बंटवारे पर वाद-विवाद के हालात बन सकते हैं. हालांकि यह पूरी समस्या का छोटा सा ही हिस्सा है.

भारत में महिलाओं का भूमि पर अधिकार कई व्यक्तिगत अधिकारों से होकर गुजरता है. हिंदू पर्सनल लॉ में औरतों को ये अधिकार मिला हुआ है कि वे अपनी जमीन के मामलों को खुद देखें, इसमें खेती योग्य जमीन भी शामिल है. लेकिन उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य जैसे कई राज्यों ने इसका पालन नहीं किया है. दूसरी ओर, मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं को खेती की जमीन पर हक नहीं देता, कुछ राज्य ही अपवाद हैं.

परंपराएं और प्रथाएं भी औरतों के जमीन पर हक में बाधा हैं, भले ही उन्हें कानूनी हक मिल गया हो.

देश में 90% से अधिक मामलों में खेती योग्य जमीन विरासत के जरिए ही स्थानांतरित की जा रही है. यहां, महिलाओं को अपने ही परिवार में गंभीर भेदभाव का सामना करना पड़ता है. कई शोध बताते हैं कि परिवारों में शादीशुदा बेटियों, विधवाओं और अविवाहित महिलाओं को संपत्ति के अधिकार के तहत जमीन का हक प्रायः नहीं ही मिलता है.

विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, जमीन पर अधिकार न होने का मतलब है, खेती में औरतों का चेहरा दिखाई न देना. यानी 'किसान भाइयों' की तरह ही मेहनत के बावजूद कम उत्पादकता दिखाई देना.

कविता कंवर, एक लॉयर और महिला अधिकारों की एक्सपर्ट का मानना है कि इस समस्या को सुलझाने के कई तरीके हैं. इसपर ध्यान देने की खासकर तब ज्यादा जरूरत है क्योंकि जमीन केवल पेट नहीं भरती, इससे सुरक्षा, रुतबा और सम्मान भी हासिल होता है

हमें कानून से भेदभावपूर्ण प्रावधानों को काटने-छांटने की जरूरत है, ताकि महिलाओं को जमीनी विरासत पर बराबरी का हक मिल सके. हमें इस दिशा में भी कोशिश करनी होगी कि कानून ठीक से लागू हो सके. इसमें भू-अधिकारियों को संवेदनशील बनाने से लेकर प्रक्रिया आसान बनाने की कोशिश भी शामिल है," कविता कहती हैं.

आय में असमानता

ऐसे में, जहां किसानों के हालात दिन-बदिन खराब हो रहे हैं, देश की किसान महिलाएं और भी बदतर परिस्थितियों में जी रही हैं.

संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक, अगर उचित अधिकार और जमीन का हिस्सा दिया जाता है तो महिलाएं अतिरिक्त आय अर्जित कर सकती हैं और वे भोजन, स्वास्थ्य, कपड़े और शिक्षा पर पुरुषों की तुलना में ज्यादा बेहतर तरीके से खर्च कर सकती हैं. इससे गरीबी से निपटा जा सकता है.

भू-स्वामित्व न होना एकमात्र समस्या नहीं, महिलाओं को अक्सर खेती में कम भुगतान की नौकरियों के साथ ही संतुष्ट होना पड़ता है.

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और रांची विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीन ड्रेज का कहना है कि पिछले कुछ सालों में मजदूरी में ये अंतर कम हो गया है, लेकिन ये काफी नहीं. ड्रेज कहते हैं "किसानों के लिए मजदूरी पर- चाहे वे पुरुष हों या महिला- नए सिरे से सोचने की जरूरत है. हालांकि अनौपचारिक क्षेत्र में ये बदलाव आसान नहीं.

मार्च 2017 में, श्रम मंत्रालय ने खेती से जुड़े मजूदरों की न्यूनतम मजदूरी दोगुनी कर दी. श्रम मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक, अकुशल कृषि मजदूर सी श्रेणी के शहरों में प्रतिदिन 300 रूपए न्यूनतम मजदूरी पाने का हकदार होगा, जो कि वर्तमान में 160 रुपए है, वहीं बी और ए श्रेणी के शहरों के मजदूरों को क्रमशः 303 और 333 रुपए मिलेंगे. लेकिन इसमें से कितना लागू हो सकेगा, ये सोचने की बात है. "

30 साल की सावित्री की शादी चार महीने पहले पलसर, सोनपत में हुई थी. सावित्री और उनके पति श्यामलाल एक स्थानीय जमींदार के खेत में मिलकर काम करते हैं. "हम खेत में बराबर वक्त तक काम करते हैं और सारे काम करते हैं लेकिन फिर भी मेरे पति मुझसे ज्यादा कमाते हैं," वे कहती हैं.

दोनों के बीच मजदूरी का अंतर पितृसत्तात्मक मानसिकता को दर्शाता है, जो कि सारे क्षेत्रों में इसी तरह से दिखता है.सावित्री के पति को एक दिन के काम के लिए 180-200 रुपये के बीच भुगतान किया जाता है, सावित्री अपने पति के समान काम के बावजूद 120 रुपयों से भी कम पाती है.

"लेकिन मैं शिकायत नहीं कर सकती, हमें पुरुषों के बराबर कमाना शुरू करने में अभी वक्त लगेगा," सावित्री कहती हैं.

पितृसत्तात्मक समाज की देन है ये नजरिया

ड्रेज़ इससे सहमत हैं. उनका मानना है कि महिला किसानों को हो रही दिक्कतें दरअसल पितृसत्तात्मक समाज की देन हैं. "जब तक सरकार ये नहीं समझती कि महिलाएं ही खेती का प्रमुख चेहरा हैं, और उनकी बेहतरी के लिए काम शुरू नहीं करती, ये समस्याएं बनी रहेंगी," वे कहते हैं.

मजदूरी में इस अंतर की वजह पलायन भी है, जिसमें कमाने के लिए पुरुष शहरों की ओर आते हैं. खेती पूरे साल का काम नहीं है, यही वजह है कि सालभर आय होती रहे, इसके लिए पुरुष शहर की ओर पलायन करते हैं. उनके जाने पर महिलाओं को उनकी जगह लेनी पड़ती है.

सोनीपत में एक महिला स्वयंसेवी किसान समुदाय चलाने वाले आशीष यादव कहते हैं, "कई मामलों में महिलाएं अपने ही गांव में कम वेतन पर मजदूरी के लिए मजबूर हो जाती हैं."

विशेष रूप से बुआई और कटाई के दौरान महिला श्रम पर निर्भरता बहुत आम हो गई है. "वे (महिलाएं) कितने ही कम वेतन की पेशकश स्वीकार कर लेती हैं. घर के मर्द बाहर हैं और परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है," यादव कहते हैं.

इनकी मौत भी 'अदृश्य' रह जाती है. लिंग भेदभाव इस हद तक है कि कहीं-कहीं किसान अच्छी पैदावार न होने के कारण खुदकुशी को मजबूर हो जाते हैं.

एक ओर किसानों की आत्महत्या पर फिर भी पिछले कुछ समय से बात हो रही है लेकिन औरतों का जिक्र इससे भी गायब है.

वर्ष 2016 और 2017 के आंकड़े अभी तक नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी नहीं किए गए हैं, लेकिन उपलब्ध आंकड़े कहते हैं कि आत्महत्याएं बढ़ी हैं. आंकड़ों के मुताबिक, 2014 से 2015 के बीच किसानों की आत्महत्या की दर 42% तक बढ़ी.

उल्लेखनीय बात यह है कि 2014 में कुल 8,007 किसानों ने खुदकुशी की थी, जिनमें से 441 महिला किसान थीं. एनसीआरबी के ही अनुसार ऐसी 577 महिलाएं भी इसमें शामिल थीं, जो खेतों में मजदूरी करती थीं.

"इस काम का कोई मोल नहीं"

इन तमाम परेशानियों और भेदभाव के बावजूद, देश में महिला कृषक ही ज्यादा हैं, भले ही इस ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा.

"हम (औरतों) का जमीन के साथ खास लगाव होता है. इससे हमें खाना और सम्मान मिलता है," देवी ने कहा.

"लेकिन ऐसे कम ही लोग हैं जो इन महिलाओं को उनके काम का श्रेय देते हैं. यहां तक कि अपने घरों के भीतर भी नहीं.

"अक्सर मेरा पति नशे की हालत में घर लौटता है. सुबह उठकर वो दोस्तों के साथ जुआं खेलने चला जाता है. क्या आपको लगता है कि वो वक्त निकालेगा और इस बात के लिए मेरी तारीफ करेगा कि मैं उसके और उसके परिवार के लिए कमाती हूं? इस काम का कोई मोल नहीं है," सावित्री कहती हैं. "हम सभी (महिला किसानों को) अपनी पहचान बनाने की जरूरत है."

हालांकि देश में खेती-किसानी का असल आधार ये चेहरे, पुरुष चेहरों में इस कदर घुले-मिले हैं कि इनकी अलग पहचान काफी दूर की बात लगती है.

Translation: Mridulika Jha

Produced by Om Prakash

(आंकड़े- यूएन, ऑक्सफेम, सेंसस ऑफ इंडिया, वर्ल्ड बैंक, नेशनल सेंपल सर्वे (एनएसएस) एवं नेशनल कमीशन फॉर वीमन

(Photos: PTI, Getty)

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