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मिज़ोरम लोकसभा चुनाव 2019 - Election Trivia

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मिज़ोरम चुनावी ट्रिविया
#1
देव आनंद ने बनाई राजनीतिक पार्टी: 14 सितंबर, 1979 को एक पार्टी का गठन हुआ, जिसका नाम था \'नेशनल पार्टी\'. इस पार्टी के अध्यक्ष थे मशहूर एक्टर देवानंद. उस समय कांग्रेस और जनता पार्टी से लोगों को मोहभंग हो रहा था, ऐसे में लोगों ने देवानंद के साथ मिलकर इस पार्टी को तीसरे विकल्प के तौर पर पेश किया. नेशनल पार्टी ने चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी और रैलियों की तैयारियां होने लगीं. लेकिन धीरे-धीरे ये बात फैली की इससे फिल्म इंडस्ट्री को नुकसान उठाना पड़ेगा. इसके बाद एक-एक कर लोग नेशनल पार्टी का साथ छोड़ने लगे. इस तरह देवानंद का राजनीतिक सपना और पार्टी दोनों खत्म हो गए.
#2
1977 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहे जनता पार्टी के गठबंधन को बेमेल खिचड़ी कहा था. इसके बाद जब जनता पार्टी चुनाव में जीती तो पार्टी ने कई जगहों पर खिचड़ी बंटवाई थी. इस चुनाव में जनता पार्टी को 298 और कांग्रेस को 153 सीटों पर जीत हासिल हुई. ये पहला मौका था जब आज़ादी के बाद कांग्रेस कोई चुनाव हारी थी. 1977 चुनाव में सबसे बड़ा नारा था ‘सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है’.
#3
कैसे बनता है राजनीतिक दलः चुनाव आयोग में किसी भी दल को रजिस्टर कराने के लिए एक एप्लीकेशन देनी होती है. सभी जरूरी कागजात के साथ 10 हजार की फीस भी लगती है. इसके बाद लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के सेक्शन 29ए के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन होता है. रजिस्ट्रेशन से पहले अखबारों में विज्ञापन दिया जाता है, जिससे अगर किसी को कोई आपत्ति है तो अपना जवाब दाखिल कर सके. हर बार जब भी चुनाव होते हैं, आयोग की वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन की संख्या बढ़ जाती है.
#4
10 अप्रैल, 2019 तक देश में 2416 पार्टियां रजिस्टर्ड हैं. इनमें से 7 राष्ट्रीय, 36 राज्य मान्यता प्राप्त पार्टिया हैं, 329 क्षेत्रीय दल हैं. इसके साथ ही करीब 2044 अन्य छोटी-छोटी पार्टियां भी चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड हैं. जो भी पार्टी पंचायत, राज्य और नेशनल स्तर के चुनाव लड़ना चाहती है, उन्हें चुनाव आयोग में रजिस्टर कराना जरूरी है.
#5
मायावती की बहुजन समाज पार्टी और जॉर्ज डब्ल्यू बुश की रिपब्लिकन पार्टी का चुनाव चिह्न एक ही है. दोनों ही पार्टियां \'हाथी\' चिह्न पर चुनाव लड़ती है. वहीं, असम गण परिषद का चुनाव चिह्न भी हाथी है.
#6
आज़ादी के बाद पहली बार 1952 में लोकसभा चुनाव हुए थे. 1952 में पहले लोकसभा चुनावों की लागत लगभग 10.45 करोड़ रुपए थी, जबकि 2014 के आम चुनावों की लागत करीब 3,870 करोड़ रुपए हो गई. 1952 के चुनाव में 489 सीटों के लिए कुल 53 दलों ने चुनाव लड़ा था. उस समय कुल 533 निर्दलीय उम्मीदवर मैदान में थे. 2014 आते-आते चीजें काफी बदल गईं और तब 464 राजनीतिक दलों ने चुनाव में हिस्सा लिया. 2014 में 543 सीटों के लिए कुल 3,234 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई. 2014 के लोकसभा चुनावों में 8 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे थे, जहां वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल यानी (VVPATs) का उपयोग किया गया था. जबकि 2019 में सभी निर्वाचन क्षेत्रों में वीवीपैट का इस्तेमाल होगा.
#7
चुनावी समर अपने चरम पर है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में नागरिकता को लेकर क्या नियम है? दरअसल, भारत में संशोधित नागरिकता अधिनियम 1955 के मुताबिक किसी भी भारतीय नागरिक दो देशों की नागरिकता नहीं लेने की अनुमति नहीं है. अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो नागरिकता अधिनियम की धारा 9 के मुताबिक उसकी नागरिकता खत्म की जा सकती है. यानी वह भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा. नियम के मुताबिक अगर भारत का कोई भी नागरिक रहने के लिए या किसी कारण से अन्य देश की नागरिकता ले लेता है तो पहले देश की नागरिकता को रद्द कर दी जाती है.
#8
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
फरवरी 1967 के चुनावों की बात है. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी घूम घूमकर देशभर चुनाव प्रचार कर रही थीं. हालांकि उस समय भी देश में ज्यादातर लोगों को भ्रम था कि इंदिरा इतनी सुकोमल हैं कि देश के प्रधानमंत्री का भार नहीं उठा सकतीं. लेकिन वो लगातार ऐसी बातों को गलत साबित कर रहीं थीं. 1967 के चुनावों में वो देश के दूरदराज के हिस्सों में गईं. लाखों लोग खुद ब खुद उनका भाषण करने के लिए इकट्ठा होते थे. ऐसे ही चुनाव प्रचार के सिलसिले में जब वो ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर गईं, तो वहां भीड़ में कुछ उपद्रवी भी थे. जिसके कारण भीड़ को नियंत्रण में रखना आयोजकों के लिए मुश्किल हो गया. वो बोल ही रही थीं कि उपद्रवियों ने पथराव शुरू कर दिया. एक ईंट का टुकड़ा आकर उनकी नाक पर लगा. खून बहने लगा. सुरक्षा अधिकारी उन्हें मंच से हटा ले जाना चाहते थे. स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता अनुरोध करने लगे कि वो मंच के पिछले हिस्से में जाकर बैठ जाएं. मगर इंदिरा ने किसी की नहीं सुनी. वो खून से डूबी नाक को रूमाल से दबाए निडरता से क्रुद्ध भीड़ के सामने खड़ी रहीं. उन्होंने उपद्रवियों को फटकारते हुए कहा, ये मेरा अपमान नहीं है बल्कि देश का अपमान है. क्योंकि प्रधानमंत्री होने के नाते मैं देश का प्रतिनिधित्व करती हूं. इस घटना से सारे देश को गहरा झटका लगा.
#9
बॉलीवुड के मशहूर एक्टर देवानंद
1977 में हिंदी फिल्मों के जाने-माने अदाकार देवानंद ने इंदिरा गांधी के विरोध में एक राष्ट्रीय दल का गठन किया था. पार्टी के गठन के समय मुंबई के शिवाजी पार्क में एक बड़ी रैली हुई गई थी. इस रैली में जाने-माने लॉ एक्सपर्ट नानी पालकीवाला और विजय लक्ष्मी पंडित भी शामिल हुए थे. लेकिन देवानंद की वह पार्टी एक माह के अंदर ही गुमनाम होकर रह गई और आम चुनावों में उसका कोई भी उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरा
#10
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
1957 में अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन क्षेत्रों से चुनाव लड़ा था. लखनऊ में वे हार गए, मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई थी लेकिन बलरामपुर से वह जीत गए थे. उस चुनाव में मथुरा में कांग्रेस और जनसंघ के उम्मीदवारों को पछाड़ते हुए स्वतंत्र रूप से लड़े राजा महेंद्र प्रताप सिंह विजयी घोषित हुए थे.
#11
(प्रतीकात्मक तस्वीर)
वैसे तो दुनिया भर के कई देशों में वोट देने के लिए उम्र 18 साल कर दी गई है लेकिन अभी भी कुछ देश ऐसे हैं जहां पर वोट देने की आधिकारिक उम्र जान कर आप चौंक जाएंगे. कई देश ऐसे भी हैं जहां पर यह उम्र 25 साल है तो कुछ ऐसे भी हैं जहां पर यह 16 ही रखी गई है. ब्राजील में मताधिकार का प्रयोग करने की उम्र 1988 में 18 साल से घटा कर 16 साल कर दी गई थी. ईरान में पहले वोट डालने की आधिकारिक उम्र 15 साल ही थी लेकिन जनवरी 2007 में इसको बढ़ा कर 18 साल कर दिया गया. लक्जेमबर्ग में भारत की ही तर्ज पर पहली बार मताधिकार का प्रयोग करने की उम्र 18 साल ही है. माल्टा यूरोपियन यूनियन में पहला देश बना जिसने मताधिकार की उम्र 16 की थी. ऑस्ट्रिया में 1992 में मताधिकार की उम्र 19 से घटाकर 18 की गई और फिर 2007 में इसे एक बार फिर घटा कर 16 कर दिया गया
#12
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन
हम बात कर रहे हैं देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे तिन्नेल्लई नारायण अय्यर शेषन की, जिन्हें हम-आप टी.एन. शेषन के नाम से जानते हैं. टीएन सेशन बेहद सख्त चुनाव आयुक्त रहे हैं. कहा जाता है कि 1988 में त्रिपुरा में कांग्रेस के दिग्गज नेता संतोष मोहन देब ने पार्टी को बड़ी जीत दिलाई थी. लेकिन उन पर चुनाव प्रचार के दौरान पुलिस से मिलीभगत के आरोप लगे. ऐसे में टी एन शेषन ने 1993 में चुनाव रुकवा दिए थे और कहा कि जब तक आरोपी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई नहीं होगी, चुनाव नहीं होगी. इसके बाद सरकार को आरोपी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई करनी पड़ी. कानून के पालन पर अडिग शेषन ने अर्जुन सिंह को भी नहीं बख्शा. मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकारों को भंग करने के बाद पी.वी नरसिम्हाराव सरकार के सबसे ताकतवर मंत्रियों में शुमार अर्जुन सिंह ने कहा इन राज्यों में चुनाव एक साल बाद होंगे. शेषन ने तुरंत प्रेस विज्ञप्ति जारी कर याद दिलाया था कि चुनाव की तारीख मंत्रिगण या प्रधानमंत्री नहीं बल्कि चुनाव आयोग तय करता है
#13
भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी.
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस 133 साल की हो चुकी है. दिसंबर 1885 में एओ ह्यूम ने इसकी स्थापना की थी. कांग्रेस ने आजादी के बाद पहली बार 1951-52 के पहले लोकसभा चुनावों में चुनाव लड़ा. ये चुनाव तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस ने लड़ा था. इसमें कांग्रेस का चुनाव चिंह दो बैलों की जोड़ी थी. कांग्रेस ने तब ये चुनाव चिंह किसानों और ग्रामीण जनता को ध्यान में रखकर लिया था, ताकि बैलों के जरिए इन वोटरों से खुद को जोड़ा जा सके. 1967 के पांचवें आमचुनावों में कांग्रेस को पहली बार कड़ी चुनौती मिली. कांग्रेस 520 में 283 सीटें जीत पाई. ये उसका अब तक सबसे खराब प्रदर्शन था. इंदिरा प्रधानमंत्री तो बनी रहीं लेकिन कांग्रेस में अंर्तकलह शुरू हो गई. आखिरकार 1969 में कांग्रेस टूट गई. मूल कांग्रेस की अगुवाई कामराज और मोरारजी देसाई कर रहे थे और इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (आर) के नाम से नई पार्टी बनाई. हालांकि ज्यादातर सांसदों का समर्थन इंदिरा के साथ था. 1971 के चुनावों में इंदिरा की कांग्रेस (आर) गाय - बछड़ा चुनाव चिन्ह के साथ लोकसभा चुनावों में उतरी. इंदिरा गांधी को तीसरी बार 1952 में चुनाव चिह्न मिला. ये चुनाव चिह्न था हाथ का पंजा.
#14
लोकतंत्र में वोट के जरिए भागेदारी निभाते लोग. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
1996 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में इरोड के पास मोडाकुरुची सीट पर बहुत से प्रत्याशी चुनाव में खड़े हो गए. ये संख्या इतनी बड़ी थी कि निर्वाचन आयोग को ये चुनाव कराने के लिए बैलेट बॉक्स के बजाए बैलेट बुक छपवानी पड़ी थी. इस सीट से उस साल 1,033 प्रत्याशी चुनावी मैदान में थे. इसके बावजूद निर्वाचन आयोग ने पूरी मेहनत से अपनी जिम्मेदारी निभाई थी. हालांकि इस वाकये के चलते पहले निर्वाचन आयोग को चुनावों को एक महीने के लिए टालना पड़ा और बाद में निर्वाचन आयोग ने चुनाव लड़ने के लिए लगने वाली जमानत राशि बढ़ा दी.

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