ग्राउंड जीरो पर IBN7, देखा सरहद का सच

आईबीएन 7 का कैमरा पहुंचा भारत-चीन सीमा से करीब 40 किलोमीटर पहले तवांग में।

  • News18India
  • Last Updated: November 7, 2009, 4:31 PM IST
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नई दिल्ली। आज बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा अरुणाचल की यात्रा पर जा रहे हैं। चीन इस दौरे को लेकर बौखलाया हुआ है क्योंकि चीन को एहसास है कि पिछले कुछ दिनों से शांत चीन के कब्जे वाला तिब्बती इलाका कहीं इस दौरे के बाद से गरम न हो जाए। दूसरी ओर तवांग इलाके के लोग उत्साहित हैं और उन्हें लगता है कि लामा को लगातार इस इलाके का दौरा करना चाहिए।

आईबीएन 7 का कैमरा पहुंचा भारत-चीन सीमा से करीब 40 किलोमीटर पहले अरुणाचल प्रदेश के तवांग इलाके में। करीब सात साल बाद दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश पधार रहे हैं। वे ऐसे माहौल में यहां का रुख कर रहे हैं जब चीन ने अरुणाचल प्रदेश पर नए सिरे से दावा ठोकना शुरू कर दिया है।

पहले तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रदेश दौरे को लेकर पिछले दो साल में चीन ने कई बार आपत्ति जताई। फिर अरुणाचल प्रदेश को मिलने वाले एशियन डेवलेपमेंट बैंक के लोन पर रोक लगवाने की कोशिश की। देश में ये सवाल उठने लगे कि आखिर चीन चाहता क्या है। भारत ने भी चीन की इस हरकत पर कड़ा रुख अख्तियार किया और न केवल दलाई लामा को राज्य दौरे की इजाजत दे डाली बल्कि यहां तक कहा कि वो राजकीय अतिथि की हैसियत से वहां जाएंगे।



तवांग की ये मोनेस्ट्री करीब सवा तीन सौ साल पुरानी है। पांचवें तिब्बती लामा के कहने पर 1680 के करीब इसका निर्माण शुरू हुआ। दलाई लामा को लेकर चीन पिछले करीब 60 सालों से गंभीर रहा है। 50 के दशक में तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद दलाई लामा ने भागकर भारत में शरण ली। उसके बाद से ही चीन लगातार इस बात का विरोध करता रहा है कि आखिर दलाई लामा को भारत ने क्यों शरण दी है।
चीन का ये भी दावा है कि अरुणाचल प्रदेश तिब्बत का ही हिस्सा रहा है। इसलिए अरुणाचल प्रदेश पर उसकी दावेदारी बनती है। चीन का कहना है कि तिब्बत के पांचवें लामा ने तवांग की इस मोनेस्ट्री को बनवाया था इसीलिए इस पर भी उसका हक है। बहरहाल तिब्बती लोग चीन के इस दावे को सिरे से खारिज करते हैं। उनका मानना है कि तिब्बत पर चीन का कब्जा गलत है और अरुणाचल भारत का ही अभिन्न अंग है।

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लोगों में भय, बैंकों से निकाल रहे हैं पैसा

दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश के दौरे को लेकर चीन की बयानबाजी के बाद से पूरे प्रदेश और खासतौर से तवांग के लोगों में भय है। 1962 में चीन के हमले के दौरान 9 साल के थे लामा नुई। नुई के जेहन में आज भी उस जंग का मंजर ताजा है। नुई को डर लगता है जब चीन ऐसे नारे लगाने लगता है कि अरुणाचल प्रदेश की 90 हजार वर्ग किलोमीटर की जमीन उसकी है। नुई नहीं चाहते कि जंग जैसे हालात पैदा हों।

तवांग के लोगों को इस बात का डर है कि कहीं चीन एक बार फिर किसी नई खुराफात की फिराक में न हो। खुलकर कोई नहीं बोल रहा लेकिन सच्चाई तो ये है कि हाल के दिनों में लोगों ने डर के चलते बैंकों में पैसे तक जमा करना कम कर दिया है। लोग पैसे अपने पास रखना चाहते हैं ताकि जंग के दौरान उनकी जमापूंजी उनके काम आए।

आखिर चीन टेढ़ी चाल क्यों चल रहा है। बीजिंग ओलंपिक के दौरान चीन ने ऐसा कोई भी गैर जिम्मेदाराना बयान नहीं दिया था क्योंकि उसके पास सबसे बड़ी चुनौती ओलंपिक कराना था। उस वक्त चीन ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के भी अरुणाचल दौरे को नजरअंदाज कर दिया था। लेकिन अब स्थिति दूसरी हो गई है।

चीन फिलहाल खुद को महाशक्ति साबित करने में जुटा हुआ है इसलिए उसने भारत पर दबाव बनाने की कूटनीतिक कोशिशें शुरू कर दी हैं। अरुणाचल तो बस इस पूरी कूटनीति का मोहरा भर है लेकिन तमाम राजनीति और कूटनीति से अंजान स्थानीय लोग चीन की इस आक्रामक सोच के पीछे गहरी साजिश मान रहे हैं और वो इस साजिश के अंजाम से डरे हुए हैं।

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निहत्थे सैनिक रख रहे हैं सीमा पर निगाह

आईबीएन 7 की पड़ताल जारी थी। हम पहुंचे तवांग से 40 किलोमीटर दूर उस जगह पर जिसे भारत-चीन नियंत्रण रेखा कहा जाता है। हमारी मंजिल थी यहां की बूमला पोस्ट। बूमला पोस्ट पर तैनात सेना के जवान दूरबीन के जरिए सीमापार होने वाली हर हरकत पर कड़ी नजर रखे हुए थे। लेकिन आप ये जानकर हैरान हो जाएंगे कि जवानों के पास न तो कोई हथियार है और न ही कोई गोला बारूद।

दूसरी हैरानी की बात ये कि ठीक ऐसे ही हालात सीमा के उस पार चीन के सैनिकों के भी हैं जो भारत पर नजर रखे हुए हैं। यानि दोनों तरफ के सैनिक निहत्थे ही एक-दूसरे पर नजर रख रहे हैं। इस पोस्ट पर भारत-चीन दोस्ती का बोर्ड भी नजर आता है। यहां नहीं लगता कि दोनों देशों के बीच कोई दरार है।

1962 की लड़ाई में चीन ने भारत की तकरीबन 38 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा किया। ये चीन की तरफ से भारत को दिया गया सबसे बड़ा धोखा था। इसके बाद चीन शांत रहा औऱ सीमा विवाद को खत्म करने की मंशा से भारत से बातचीत भी शुरू कर दी। लेकिन एक बार फिर चीन ने 1987 में धोखा दिया। उसने सैमदुरांग चू घाटी में नियंत्रण रेखा के भारत के कब्जे वाले करीब 2000 वर्ग फुट इलाके पर दोबारा कब्जा कर लिया।

इसके बाद से चीन की तरफ से कोई भी सैन्य कार्रवाई नहीं की गई है। सीमा पर दोनों फौजों की तैनाती से युद्ध जैसा माहौल भी नहीं लगता। लेकिन हाल फिलहाल के चीन के बयान से माहैल कम से कम गरमाने जरूर लगा है। खुराफात की दो कोशिशों के बाद भी सरकारों ने सीख नहीं ली और आलम ये है कि अरुणाचल प्रदेश जाने वाले रास्तों को भी इस लायक नहीं बनाया कि युद्ध के हालात में फौज को आसानी से सीमा पर भेजा जा सके।

तवांग इलाके के सबसे करीब चीनी सीमा पर बूमला पोस्ट है। ये पोस्ट ल्हासा जाने वाले रास्ते पर है और तवांग से वहां की दूरी 40 किलोमीटर है। लेकिन इस दूरी को पूरा करने में करीब ढाई घंटे लगते हैं। यही हाल अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने की एक मात्र सड़क तेजपुर से तवांग का भी है।

तेजपुर से तवांग की दूरी करीब 370 किमी है और फौज हो या आम आदमी उसे ये दूरी पूरी करने में दो दिन लगते हैं। ये आलम उस प्रदेश का है जिसका अधिकांश हिस्सा चीनी सीमा से लगा है। दूसरी ओर चीन के कब्जे वाले इलाके की तरफ गौर करें तो उसने नियंत्रण रेखा के करीब तक एक नहीं चार सड़कें बना दी हैं। यानि चीन जब चाहे आसानी से फौज को सीमा पर तैनात कर सकता है।

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