खतरनाक साइंस: बच्चों के साथ पहले करते थे रेप, फिर इलेक्ट्रिक शॉक देकर मिटा देते थे याद!

प्रतीकात्मक तस्वीर

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आज खतरनाक साइंस की सीरीज में अमेरिका के उस खतरनाक एक्सपेरिमेंट के बारे में जानिए, जिसने आम इंसान को चलता-फिरता रोबोट बना दिया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 1, 2019, 12:09 PM IST
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द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद अमेरिका और सोवियत यूनियन के बीच शीत युद्ध यानी 'कोल्ड वॉर' शुरू हो चुका था. इस दौरान दोनों देशों की इंटेलिजेंस एजेंसियां कई खतरनाक प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही थीं. इन प्रोजेक्ट्स का मकसद था ऐसी जानकारियां इकट्ठा करना, जिन्हें एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके. इसी मकसद से आम लोगों पर अमेरिका एक ऐसा प्रयोग कर रहा था, जिसके खुलासे से पूरी दुनिया कांप उठी थी. ये प्रयोग था-माइंड कंट्रोल.  आज खतरनाक साइंस की सीरीज में अमेरिका के उस खतरनाक एक्सपेरिमेंट के बारे में जानिए, जिसने आम इंसान को चलता-फिरता रोबोट बना दिया था.



साल 1974 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक ऐसा खुलासा किया जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया. यह खुलासा एक ऐसे प्रयोग को लेकर था जिसे अमेरिका की खुफिया विभाग सीआईए ने आम नागरिकों पर किया था. इस प्रयोग के दौरान कुछ ऐसे तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता था जिससे किसी भी इंसान के दिमाग पर पूरी तरह से काबू किया जा सके. इतना ही नहीं, लोगों के दिमाग को कंट्रोल करने के लिए सीआईए उन्हें एक ऐसा ड्रग देती थी, जिससे उनकी सोचने-समझने की शक्ति पूरी तरह से खत्म हो जाती थी.



सीआईए ये प्रयोग सिर्फ जानकारियां इकट्ठा करने के लिए नहीं कर रही थी, बल्कि उसका असल मकसद अमेरिका को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाने का था. यह सब एक खास प्रोजेक्ट के अतंर्गत हो रहा था, जिसका नाम था-'एमके अल्ट्रा'. इस माइंड कंट्रोल एक्सपेरिमेंट के दौरान कई तरह के टेक्नीक और ड्रग्स का इस्तेमाल किया जा रहा था, जिनमें मुख्य था हिपनोसिस और एलसीडी ड्रग.





प्रोजेक्ट एमके अल्ट्रा:
अमेरिकी नागरिकों पर किए जाने वाले माइंड एक्सपेरिमेंट्स को सीआइए ने एक प्रोजेक्ट के अंतर्गत रखा था, जिसका कोड नाम था- 'एमके अल्ट्रा'. साल 1953 में इस प्रोजेक्ट को आधिकारिक रूप से स्वीकृति मिली थी. इस प्रोजेक्ट के अलावा सीआईए और भी कई प्रोजेक्टस पर काम कर रही थी, जिनमें इंसान के व्यवहार से लेकर उनके पहचान तक को बदलने की कोशिश की जा रही थी.



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इतना ही नहीं, सीआईए जिन लोगों पर ये एक्सपेरिमेंट कर रही थी, उन्हें एलसीडी नाम का ड्रग भी दिया जा रहा था. इस ड्रग की खासियत होती है कि ये आसानी से किसी के भी याददाश्त को पूरी तरह से मिटा सकता है. इसकी सबसे खास बात ये है कि यह ड्रग नशीला नहीं होता और न ही इंसान इसका आदी होता है. प्रोजेक्ट एमके अल्ट्रा के अंदर कई सब- प्रोजेक्टस भी थे. जैसे- प्रोजेक्ट ब्लूबर्ड, प्रोजेक्ट आर्टीचोक, एमके सर्च, एमके नाओमी.



सीआईए द्वारा चलाए जा रहे प्रोजेक्ट के अंदर एक ऐसा सीरम भी तैयार किया जा रहा था, जिसे पीते ही लोग सच बोलने लगे. इस एक्सपेरिमेंट को खासतौर पर कैदियों पर किया जा रहा था, जिसके लिए उन्हें कम से कम तीन महीने तक बिलकुल एकांत और अंधेरी जगह पर रखा जाता था. इस दौरान उन्हें ऐसे ड्रग भी दिए जाते थे जिससे उनके दिमाग को पूरी तरह से कंट्रोल किया जा सके. इस प्रोजेक्ट में ये देखने की कोशिश की जा रही थी कि क्या किसी इंसान के दिमाग को इस कदर काबू किया जा सकता है कि वह न चाहते हुए भी किसी का खून कर सके.



गौर करने वाली बात यह है कि सीआईए ये सभी एक्सपेरिमेंट अमेरिका के हॉस्पिटल और यूनिवर्सिटी में करवा रही थी. बाद में हुए खुलासे में ये बात भी निकलकर सामने आई कि अमेरिका के करीब 86 हॉस्पिटल, यूनिवर्सिटी और रिसर्च सेंटर इस तरह के एक्सपेरिमेंट अपने स्टूडेंट्स और मरीजों पर कर रहे थे. हालांकि, उन सभी का यही कहना था कि उन्हें इस प्रयोग के पीछे की असली वजह नहीं मालूम थी.



ऑपरेशन मिडनाइट क्लाइमैक्स:

इस ऑपरेशन के तहत सीआईए सेक्स वर्कर्स का इस्तेमाल कर आम नागरिकों पर एक्सपेरिमेंट करती थी. ये सेक्स वर्कर्स आम लोगों को बहला-फुसलाकर एक बंद कमरे में ले जाती थीं, जहां एक वनवे मिरर लगा होता था. इस मिरर की दूसरी तरफ सीआईए एजेंट बैठा होता था, जो उस कमरे में हो रहे सारी गतिविधियों पर नज़र बनाए रखता था. यहां आम नागरिकों को एक ऐसी ड्रिंक पिलाई जाती थी, जिसके बाद उसे किसी भी बात का होश नहीं रहता था. उनकी बेहोशी का फायदा उठाकर उनसे वह सभी काम करवाए जाते, जो वे कभी होश में करने के लिए तैयार नहीं होते.



ब्रिटिश मनोचिकित्सक डॉनल्ड इवेन कैमरन




सीआईए का माइंड इरेज़िंग एक्सपेरिमेंट:

इस एक्सपेरिमेंट का जिम्मा सीआईए ने ब्रिटिश मनोचिकित्सक डॉनल्ड इवेन कैमरन को दिया था, जो कि पहले से इस विषय पर रिसर्च कर रहे थे. कैमरन को शुरू से इंसानी दिमाग में गहरी रुचि थी. वह कई सालों से इस विषय पर शोध कर रहे थे कि कैसे किसी मनुष्य के दिमाग में पहले से मौजूद यादों को मिटा कर वापस रिप्रोग्राम किया जा सकता है. इस तरह के प्रयोग ज्यादातार कैमरन के अस्पताल में आने वाले मरीजों पर किया जाता था. इस प्रयोग के दौरान कैमरन मरीजों को कई सप्ताह तक कोमा में रखते थे. कोमा में ही उन्हें इलेक्ट्रिक शॉक भी दिया जाता था. इन सभी प्रयोगों के बाद जब मरीज कोमा से जागता था तो वह पूरी तरह से अपनी याददाश्त खो चुका होता था. ऐसे प्रयोग कैमरन बीमार बच्चों पर भी करते थे.

कोमा में डालने से पहले उनका रेप भी किया जाता था.



साल 1973 में सीआईए डायरेक्टर रिचर्ड हेम्स ने इस प्रोजेक्ट से जुड़ी सारे जरूरी डाक्यूमेंट्स को नष्ट कर दिया था. हालांकि, लगभग 20,000 डाक्यूमेंट्स सुरक्षित थे. 1977 में कांग्रेस ने एक चर्च कमिटी का गठन किया और इस बात की जांच की गई. इस जांच के बाद भविष्य में किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा किसी भी तरह के मानव प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने के आदेश जारी कर दिया गया.



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