एक ऐसी प्रथा जिसमें लोगों को रौंदते हैं जानवर, देखें VIDEO

एक साथ कई गाय और बैल लोगों को पैरों से रौंदते हुए निकल जाते हैं और किसी को चोट तो दूर, एक हल्की सी खरोंच तक नहीं आती. ऐसा दावा करने वालों के मुताबिक एक अंजान शक्ति उनकी रक्षा करती है.

News18Hindi
Updated: April 12, 2019, 7:01 PM IST
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आधी हकीकत आधा फसाना. 700 से 800 किलोग्राम की वजन वाली गाय किसी इंसान को रौंदते हुए गुजर जाए तो क्या होगा? सवाल थोड़ा अजीब है लेकिन जवाब बहुत ही सीधा. या तो वो इंसान बुरी तरह जख्मी हो जाएगा या गंभीर चोट लगने से उसकी मौत हो जाएगी लेकिन दावा किया जाता है कि उस गांव में ऐसा कुछ नहीं होता. एक साथ कई गाय और बैल लोगों को पैरों से रौंदते हुए निकल जाते हैं और किसी को चोट तो दूर, एक हल्की सी खरोंच तक नहीं आती. ऐसा दावा करने वालों के मुताबिक एक अंजान शक्ति उनकी रक्षा करती है. इसी दावे की पड़ताल करने न्यूज़ 18 की टीम उस गांव में पहुंची और हर तस्वीर को हक़ीक़त में देखा.

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लोग इसे पूजा का नाम देते हैं. इस पर भी चमत्कार का दावा है कि इसमें कोई जख्मी नहीं होता, यहां तक की देवी की कृपा से एक खरोंच तक नहीं आती. विज्ञान इस बात को नकारता है, अंधविश्वास कहता है लेकिन आस्था नहीं होती तो न जाने कितने लोग घायल हो जाते या मर जाते.

आस्था और अंधविश्वास के बीच ये खेल सदियों से मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में खेला जा रहा है. अब ये दावा हकीकत है या फसाना. इसकी पड़ताल के लिए न्यूज़ 18 की टीम पहुंची झाबुआ. प्रथा का नाम है गाय गौहरी जिसकी तैयारी के रंग वहां लगे मेले में दिख रहे थे. लोग गायों को सजाने के लिए सामानों की खरीदारी कर रहे थे.

गाय गौहरी की शुरुआत का सीधा तालुल्क है झाबुआ रियासत से जहां के राजा का कृष्ण से एक अजीब सा लगाव था इसलिए वहां पर बहुत सारे कृष्ण मंदिर बनवाए गए थे. इन मंदिरों में ही ये सारी प्रथाएं शुरु हुई जिनमें गाय गौहरी आज भी मनाया जाता है. लोगों में गाय गौहरी को लेकर गहरी आस्था है और इसके खिलाफ किसी को एक शब्द सुनना भी गंवारा नहीं. विज्ञान इसे नकारता है इसे अनावश्यक समझता है लेकिन अगर आस्था नहीं होती तो इस परिक्रमा के दौर में न जाने कितने लोग मर जाते या घायल हो जाते लेकिन आज तक इस तरह की दुर्घटना का कोई अवसर नहीं आया.

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झाबुआ के गाय गौहरी बहुत हर तक तमिलनाडु के जलिकट्टू जैसा ही है. दोनों परंपराओं में काफी समानता है लेकिन जलिकट्टू की परंपरा आस्था और कानून के बीच उलझकर कर रह गई थी और गाय गौहरी की पहेली आस्था और अंधविश्वास में उलझी हुई है. झाबुआ में इस प्रथा को उत्सव के तौर पर मनाया जाता है. इसमें तीन चीजें अहम हैं, पहली गाय दूसरे वो गौहरी जो लेटते हैं और तीसरे वो ग्वाल जो गायों को लेकर आते हैं. गायों को नहलाकर सजाया जाता है, फिर उसे गौहरी पढ़ने के लिए ले जाया जाता है.
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गाय गौहरी प्रथा के बारे में जानने के लिए सबसे पहले उन लोगों से बातचीत की गई जो उसे अंजाम तक पहुंचाते हैं. ग्वाल मुकेश जी बताते हैं कि प्रथा के दौरान अचानक एक शक्ति आती है और शरीर कांपने लगता है. मुकेश ने बताया कि मैं माता के नीचे लेट गया और कोई दर्द वगैरह नहीं हुआ. मुकेश के अलावा भी कई लोगों के मुताबिक गाय के सामने लेटने में उन्हें डर तो लगता है लेकिन अंजान शक्ति काम को आसान कर देती है.

रात होते ही गायों की पूजा का दौर शुरु हुआ जहां गाय गौहरी के लिए सारी तैयारी हुई और अलग अलग घरों में पूजा की गई. पूजा का ये दौर देर रात तक जारी रहा.

अब कोई विश्वास करे या ना करे, इस गांव की हकीकत यही है. इस प्रथा से जुड़े लोग एक अंजान शक्ति में यकीन रखते हैं और यही वजह है कि गाय के नीचे लेटे उन लोगों को चोट तक नहीं आती. लेकिन चमत्कार का दावा कहां तक सही है. इस बात की पड़ताल अभी बाकी थी. जब हम इन सवालों का जवाब तलाशने निकले तो एक ऐसे हकीकत से सामना हुआ, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी.

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