इस हॉस्पिटल में इलाज के नाम पर मरीजों को किया जाता था टॉर्चर, आंख से दिमाग में घुसाई जाती थी ब्लेड

टैल्गर्थ अस्पताल के तौर पर पहचान रखने वाली यह इमारत 20 सालों से बंद है (फोटो क्रेडिट- Save Britain's Heritage)
टैल्गर्थ अस्पताल के तौर पर पहचान रखने वाली यह इमारत 20 सालों से बंद है (फोटो क्रेडिट- Save Britain's Heritage)

अपनी ढहती दीवारों के पीछे टैल्गर्थ अस्पताल (Talgarth Hospital) अंधेरे और परेशान करने वाले रहस्य छुपाए हुए है. मध्य वेल्स (Middle Wales) में काले पर्वतों की छाया में खड़ा, कभी व्यस्त रहने वाला यह अस्पताल इलाज के भुला दिये गये युग की एक भयानक कब्र (tomb) बनकर खड़ा है. पहले मानसिक रोगियों (mental patients) के अस्पताल के तौर पर पहचान रखने वाली यह इमारत 20 सालों से बंद है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 19, 2020, 5:19 PM IST
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ब्रिटेन (Britain) के मिडिल वेस्ट का टैल्गर्थ हॉस्पिटल (Talgarth Hospital) अपने भयानक तरीके के इलाज पद्धति (barbaric treatment) की वजह से काफी चर्चा में था. इस हॉस्पिटल में 1997 में आखिरी मरीज (last patient) का इलाज किया गया, इसके बाद इसे बंद कर दिया गया. अब ये धीरे-धीरे टूट रहा है, जिसकी वजह से यह एक बार फिर से चर्चा में है. लोग इलाज (treatment) के नाम पर अपनाए जाने वाले यहां के बर्बर तरीकों को याद कर आज भी सहम जाते हैं. इन तरीकों से इलाज के दौरान यहां रोगियों (patients) की मौत भी हुई. अब इस अस्पताल की तस्वीरें सेव ब्रिटेन हेरिटेज (Save Britain Heritage) ने जारी की हैं

अपनी ढहती दीवारों के पीछे टैल्गर्थ अस्पताल (Talgarth Hospital) अंधेरे और परेशान करने वाले रहस्य छुपाए हुए है. मध्य वेल्स (Middle Wales) में काले पर्वतों की छाया में खड़ा, कभी व्यस्त रहने वाला यह अस्पताल इलाज के भुला दिये गये युग की एक भयानक कब्र (tomb) बनकर खड़ा है. पहले मानसिक रोगियों (mental patients) के अस्पताल के तौर पर पहचान रखने वाली यह इमारत 20 सालों से बंद है. और इसकी इमारत (building) की हालत बुरी हो गई है. लेकिन इसकी दीवारें अभी भी अतीत में रोगियों पर अपनाये जाने वाले बर्बर उपचार (barbaric treatment) के तरीकों की गवाह हैं.

मानसिक स्वास्थ्य के इस अस्पताल में खेत और वर्कशॉप भी
ब्रेकन बीकॉन्स नेशनल पार्क के केंद्र में स्थित अब इस अस्पताल पर ताला डाल दिया गया है और दीवार खड़ी कर इस पूर्व अस्पताल को घेर दिया गया है. अब यह केवल भूत काल की यादों का घर है. और प्रकृति का भी. जो धीरे-धीरे इमारतों पर अपना अधिकार पाने को दिनों-दिन फैल रही है. 261 एकड़ भूमि में स्थित इस अस्पताल में खेत और वर्कशॉप भी हैं.
पहले जब इस विशाल विक्टोरियन भवन का निर्माण किया गया था, तो यह मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को उपचार प्रदान करने के लिए बनाया गया था. इसमें पुरुषों और महिलाओं को एक सी इमारतों में पूरी तरह एक-दूसरे से अलग रखा जाता था.



पूरी तरह से आत्मनिर्भर था यह मानसिक अस्पताल
इसे पूरी तरह से आत्मनिर्भर अस्पताल के तौर पर चलाने के लिए बनाया गया था, इसमें काम करने वालों को सभी आवश्यक फल और सब्जियां उगा सकते थे. और अस्पताल में ही विशेष रूप से निर्मित घरों में उन्हें रहना होता था.

यहां तक ​​कि अस्पताल में दिन और रात को 12 वार्डों को चालू रखने के लिए आवश्यक बिजली भी विशाल जनरेटर से दी जाती थी. और इस अस्पताल का उद्देश्य अपने रोगियों को उपलब्ध इलाज के तरीकों में सबसे अत्याधुनिक तरीके का इलाज देना था. हालांकि इन उपचारों के लिए बेहद भयानक तरीके इस्तेमाल किये जाते थे.

कपड़े फाड़ लेने वाले रोगियों के लिए थे विशेष सूट
अपने शुरुआती दिनों में, अस्पताल में तुर्की स्नानघर बनाये गये थे, जो गंभीर डिप्रेशन से पीड़ित लोगों के इलाज में मदद करने के लिए थे. यहां एक साथ 352 रोगियों को उपचार दिया जा सकता था. माना जाता है कि यहां मिर्गी के मरीज़ों के स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए उन्हें शाकाहारी आहार दिया जाता था.

वेल्स ऑनलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ कमरे पूरी तरह से गद्देदार थे (ताकि रोगी दीवारों से खुद को चोट न पहुंचाए) और उन मरीजों के लिए विशेष सूट तैयार किए गए थे, जो अपने कपड़े फाड़ लेते थे.

इलाज के नाम पर होती थी नृशंसता की हद
रोगियों को दिए गए अन्य उपचारों में गहरी नींद की चिकित्सा शामिल थी, जो लोगों को जानबूझकर उनके स्किज़ोफ्रेनिया या डिप्रेशन के इलाज के तरीके के रूप में उन्हें कोमा में ले जाती थी. 1930 से इस हाइपोग्लेसेमिक शॉक थेरेपी का प्रयोग शुरू हुआ. जिसमें इंसुलिन का प्रयोग कर रोगी को जबरदस्ती कोमा में डाला जाता था. 1941 से यहां पर इलेक्ट्रिक शॉक दिये जाने की शुरुआत भी हो गई. इसका प्रयोग उन रोगियों पर होता था, जिनपर दवाओं का असर नहीं हो रहा होता था.

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एक साल बाद ही यहां पर लोबोटॉमी तकनीक का प्रयोग रोगियों पर शुरू हुआ. यह मानसिक रोगों के इलाज की एक बेहद विवादित और अब पूरी तरह से प्रयोग से बाहर हो चुकी तकनीक है. इसे भी उन रोगियों पर अपनाया जाता था, जिनपर दवाओं का असर नहीं हो रहा होता था. इसमें रोगी की आंख से एक पतली सी ब्लेड को दिमाग घुसाकर उसे मस्तिष्क के आगे के भाग में ले जाया जाता था. इससे मस्तिष्क का आगे का काफी हिस्सा क्षतिग्रस्त भी हो जाता था. इसलिए इस तकनीक को लेकर हमेशा ही विवाद रहा. बहरहाल टैल्गर्थ में दो सालों के अंदर ही इस तकनीक को कम से कम 24 रोगियों पर प्रयोग किया गया. इस दौरान कम से कम एक रोगी की मौत हो गई.
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