क्या है संजीवनी बूटी का सच? क्यों इस गांव में हनुमान का नाम लेना भी मना है?

आधी हकीकत आधा फसाना के इस एपिसोड में चलते हैं एक खतरनाक सफर पर. जिस संजीवनी का दावा रामायण में हुआ, जिसकी तलाश में वैज्ञानिक शोध करते हैं, जिसकी खोज में उत्तराखंड सरकार ने मुहिम चलाई, वो संजीवनी बूटी क्या आज भी मौजूद है?

  • News18India
  • Last Updated: September 28, 2018, 6:53 PM IST
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रामायण में लिखा है कि जहां राम हैं, वहां हनुमान भी हैं. तीनों लोक में, चारों दिशाओं में. लेकिन हिमालय की वादियों के बीच एक जगह ऐसी भी है जहां हनुमान के जयकारे सदियों से नहीं गूंजे. शायद रामायण काल से ही. जहां हनुमान का नाम लेना भी मना है, हनुमान को पूजना मना है, हनुमान भक्तों का जाना भी मना है. एक ऐसा गांव जो हनुमान को आज भी अपना गुनहगार मानता है. जो आज भी कोसते हैं उस कहानी को, जो जुड़ी है रामायण से, श्रीराम से, महाबली हनुमान से और उस संजीवनी बूटी से, जिसने लक्ष्मण को जिंदगी दी थी.

आज चलते हैं उस गांव में और तलाशते हैं उन कहानियों को. खोजते हैं उन कहानियों का सच. 4000 फीट की ऊंचाई पर बर्फीले पहाड़ों के उस पार पथरीले रास्तों पर मीलों के सफर के बाद, जहां आज भी होता है संजीवनी बूटी का दावा. तो क्या जिस संजीवनी का दावा रामायण में हुआ जिसकी तलाश में वैज्ञानिक आज भी शोध करते हैं जिसकी खोज में उत्तराखंड सरकार ने लंबी मुहिम चलाई, वो संजीवनी बूटी क्या आज भी मौजूद है? उन्हीं वादियों में, उसी गांव में, उसी द्रोण पर्वत पर, जिसे रामायण की कहानी में हनुमान ने उठाया था?

देवभूमि उत्तराखंड, जिसकी वादियों में दंतकथाओं के न जाने कितने किस्से आज भी तैरते हैं. लेकिन जिस कहानी की तलाश हमें थी, उसे न कभी सुना था, न कभी देखा था. ये सफर कई सवालों के साथ शुरु हुआ कि ये कैसे हो सकता है, कि जिस देश में हनुमान को संकटमोचक माना गया, उसी के एक गांव में हनुमान का नाम लेना भी पाप हो? जहां के लोग हनुमान को भगवान ही न मानते हों? और अगर वाकई ऐसा है, तो क्यों?



थोड़ी जानकारी जुटाई, तो पाया कि उस गांव का नाम है द्रोणागिरी, जो मौजूद है द्रोण पर्वत पर. द्रोण पर्वत, यानी वही पहाड़, जिसका ज़िक्र रामायण में मिलता है. माना जाता है कि लक्ष्मण की जिंदगी बचाने के लिए हनुमान इसी पर्वत का एक हिस्सा लंका ले गए थे. मगर सवाल ये था, कि क्या संजीवनी बूटी सिर्फ पर्वत के उसी हिस्से में थी? अगर नहीं, तो क्या उन पहाड़ों पर आज भी कोई ऐसी जड़ी-बूटी है, जिसे पाकर इंसान मौत को भी मात दे सकता है? जिसे गांव के लोग आज भी संजीवनी बूटी मानते हैं.
आयुष विभाग से पूछा, तो उन्हें भी संजीवनी के अस्तित्व से इनकार नहीं था. वैज्ञानिकों से पूछा, तो पता लगा कि जड़ी-बूटियों का होना तो मुमकिन है लेकिन संजीवनी, सिर्फ लोगों का अंधविश्वास हो सकता है. लेकिन ये सिक्के का सिर्फ एक पहलू है. दूसरा पहलू इस कहानी को और दिलचस्प बना रहा था. कुछ वक्त पहले बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने भी द्रोण पर्वत से संजीवनी जैसी जड़ी-बूटियों को खोजने का दावा किया था.

इसी साल उत्तराखंड सरकार ने भी संजीवनी बूटी की तलाश और उस पर शोध के लिए एक मुहिम चलाई. जिसके चर्चे सिर्फ हिन्दुस्तान ही नहीं, विदेश में भी हुए. ये कहानी एक ऐसे मोड़ पर थी जिस पर न यकीन करना आसान था, न उसे खारिज कर देना. अब एक ही रास्ता था कि हमारी टीम उन दुर्गम रास्तों से होकर द्रोण पर्वत तक जाए. रात को चमकने वाली उस जड़ी-बूटी को खोजे और इन कहानियों का सच देश के सामने लाए. लेकिन बीच सफर में ही हमारा सामना एक बड़ी मुसीबत से हुआ.

चमोली में बादल फटा और लंबी-चौड़ी सड़क हमारी आंखों के सामने बह गई. हमारी टीम लोगों की मदद करती रही. तबाही की तस्वीरें देश के सामने लाती रही. करीब दो दिन के इंतजार के बाद रास्ता साफ हुआ और हम द्रोण पर्वत के लिए आगे बढ़े. द्रोण पर्वत की राह में हमारा पहला पड़ाव था गोपेश्वर, चमोली का जिला मुख्यालय. जहां द्रोण पर्वत की जानकारी तो मिली लेकिन पुराणों की कुछ नई कहानियां भी सुनाई गईं. ऐसी ही एक कहानी जुड़ी थी, महाभारत काल से मौजूद इस गोपीनाथ मंदिर से.

कहते हैं​ कि यहां भगवान शिव एक अद्भुत रूप में विराजमान हैं. यानी लिंग रूप में नहीं, मुख रूप में. मंदिर के गर्भ गृह की तस्वीरें लेने पर मनाही है इसलिए हमने भी मंदिर के नियमों का पूरा पालन किया. इस मंदिर में हमें एक विशालकाय त्रिशूल भी दिखा जिसे देखकर ही इसके वजन का अंदाजा लगाया जा सकता है लेकिन हमें बताया गया कि इस त्रिशूल में कोई ऐसा चमत्कार है, कि इसे इस तर्जनी उंगली के सहारे ही हिलाया जा सकता है.

माना जाता है कि ये त्रिशूल भगवान परशुराम का है लेकिन इसे कब और क्यों स्थापित किया गया? इससे जुड़ी कोई पुख्ता जानकारी किसी के पास नहीं. त्रिशूल से जुड़े इस चमत्कार को भौतिक विज्ञान का एक सिद्धांत मानकर हम आगे बढ़े. मंदिर के पास ही एक कुंड दिखा. हमें बताया गया कि इस कुंड का रिश्ता शिव पुराण की एक अद्भुत कहानी से है जिसके मुताबिक सती के अग्निकुंड में भस्म होने के बाद भगवान शिव ने इसी जगह पर तपस्या की थी. उनकी तपस्या भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने कामदेव को भेजा था और तभी शिव की तीसरी आंख खुली और कामदेव भस्म हुए थे.

लोग दावा कर रहे थे, कि इस कुंड का पानी कभी नहीं सूखता. हालांकि प्राकृतिक स्रोतों के बीच ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं है. ये कहानियां हमारे लिए सिर्फ वो दंतकथाएं थीं जो मान्यता बनकर सदियों से कायम हैं. हमारी असली मंजिल थी द्रोण पर्वत और वहां मौजूद एक गांव द्रोणागिरी. यहां से हमारा सफर शुरू होता है उस इलाके ही ओर जहां के लोग हनुमान को भगवान नहीं मानते, जहां दावा किया जाता है ​कि वही संजीवनी बूटी मिलती है जो मुर्दे में जान डाल सकती है.

द्रोण पर्वत के सफर का अगला पड़ाव जोशीमठ का शायद सबसे खूबसूरत हिस्सा औली. कुदरत की बेपनाह खूबसूरती से सराबोर एक अद्भुत कस्बा. हमें बताया गया कि द्रोण पर्वत का दुर्गम रास्ता यहीं से शुरू होता है. आगे जाने के लिए हमें 14 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी होगी. कुछ ऐसे रास्तों से गुजरना होगा, जहां एक गलती, मौत भी बन सकती है लेकिन उससे पहले हमारी नज़र एक हनुमान मंदिर पर पड़ी.

हमें बताया गया कि इन रास्तों पर बना ये आखिरी हनुमान मंदिर है क्योंकि इससे आगे न हनुमान की पूजा होती है और न हनुमान का ज़िक्र होता है. वैसे इस मंदिर की भी अपनी कहानी है. इस मंदिर की दहलीज से ही हमें अपनी मंजिल की पहली झलक मिली. द्रोण पर्वत हमारी आंखों के सामने था. बर्फीली चादर में ढके पहाड़. हमें बताया गया कि इन पर्वतों के बीच ये कटा हुआ हिस्सा ही महाबलि हनुमान लंका ले गए थे.

मंदिर के पुजारी हमें एक रहस्यमय बंदर की कहानी भी सुनाई. इन बर्फीली वादियों के बीच बंदरों का होना नामुमकिन है लेकिन लोगों के मुताबिक साल के चैत्र के महीने में एक बंदर यहां दिखाई देता है. वो कहां से आता है, कहां जाता है, किसी के पास कोई जानकारी नहीं थी. सदिय़ों से मान्यता है कि वो बंदर, हनुमान का ही रूप है. हमें बताया जा रहा था कि द्रोणागिरी के जंगलों में आज भी संजीवनी बूटी मिलती है जो रात के अंधेरे में चमकती भी है. यानी कुछ वैसी ही जैसी रामायण में बताई गई.

लेकिन वहां तक पहुंचने की एक शर्त भी है. वो ये, कि वहां हनुमान का नाम लेना मना है. ये बड़ी अजीब बात है कि औली के इस इलाके में हनुमान जी की इतनी मान्यता है तो यहां से 60 किलोमीटर दूर उन पहाड़ों में ऐसा क्या हो जाता है कि उनके भक्तों की एंट्री पर भी मनाही है? इन सवालों का जवाब तलाशने अब हमें आगे जाना था.

40 किलोमीटर के सड़क मार्ग के बाद, रास्ते बंद हो जाएंगे और शुरु होगा द्रोण पर्वत की कहानी को देखने का, संजीवनी बूटी का सच तलाशने का एक मुश्किल और खतरनाक सफर.
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