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8 महीने तक मछलियों को बच्चों की तरह पालते हैं छात्र, फिर खुद तय करते हैं उन्हें खाएं या जाने दें !

Class of Education के नाम से चल रहे इस प्रोग्राम में बच्चों को 8 महीने तक पालनी होती हैं मछलियां. (Credit-Pixabay)

Class of Education के नाम से चल रहे इस प्रोग्राम में बच्चों को 8 महीने तक पालनी होती हैं मछलियां. (Credit-Pixabay)

Class of Life नाम के इस प्रोग्राम (Controversial Educational Program) में बच्चों को मछलियां पालने (Raising Fishes) के लिए दी जाती हैं. वे इनका नाम भी रखते हैं और खुद उनके माता-पिता (Children Raising Fishes till Maturity) की भूमिका निभाते हैं.

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    हम अगर किसी को कुछ साल भी पाल लें, तो उससे ऐसा लगाव (Attachment to Pets) हो जाता है कि शख्स को छोड़ना मुश्किल हो जाए. ऐसे में अगर किसी जानवर को आप 8 महीने से पाल रहे हों, तो उससे अटैचमेंट स्वाभाविक है. जापान में बच्चों के इसी अटैचमेंट की परीक्षा (Test of Humanity) Class of Life नाम के प्रोग्राम के तहत ली जाती है. ये इस देश की विवादित शिक्षा (Controversial Educational Program) पद्धति है.
    मिडिल स्कूल के बच्चों के सिलेबस (Japan Education System) में शामिल इस कार्यक्रम के ज़रिये बच्चों को ज़िंदगी का महत्व (Importance of Life) समझाने की कोशिश की जा रही है. जापान के Nippon Foundation की ओर से चलाए जा रहे Sea and Japan Project के साल 2019 से ही बच्चों को समुद्री जिंदगी से जुड़ी चीज़ें समझाई जाती हैं. अब इसमें एक एक्टिविटी जोड़ी गई है, जिसके तहत बच्चों को कुछ मछलियां दी जाती हैं, जिन्हें वे 8 महीने तक पालते हैं. इस दौरान उनकी हर ज़रूरत का ख्याल ये बच्चे ही रखते हैं.

    8 महीने तक मछलियों के माता-पिता बने रहे बच्चे
    जब ये मछलियां बच्चों को दी जाती हैं, तो ये काफी छोटी होती हैं. Shizuoka की Hamamatsu City में चल रहे मिडिल स्कूल में बच्चों को अक्टूबर 2020 में कुछ मछलियां दी गईं. उनसे कहा गया कि वो इनके माता-पिता हैं और अगले 8 महीने तक वे इनकी ही निगरानी में रहेंगी. उनके खाने से लेकर पानी बदलने तक की ज़िम्मेदारी (Children Raising Fishes till Maturity) उन्हीं की है. इस बीच में अलग मछलियों की मौत हो जाती है, तो बच्चों को नई मछलियां दी जाती हैं और उन्हें अपनी गलती से सीखने को मिलता है. 8 महीने के लंबे समय में मछलियां पालने किसी प्यारे पालतू जानवर को पालने जैसा होता है. कई बच्चों ने इनके नाम भी रख लिए और वे इन्हें अपने अच्छे दोस्त की तरह मानने लगे.

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    8 महीने बाद बच्चों को खुद ही ये तय करना था कि वे इन मछलियों को खाएंगे या फिर जाने देंगे. (Credit-YouTube/FNN TV)


    ... फिर आई 'परीक्षा की घड़ी'
    बच्चों को अंदाज़ा भी नहीं था कि इसके बाद कितनी मुश्किल परीक्षा होने वाली है. Class of Life के खत्म होने से दो हफ्ते पहले टीचर ने इन बच्चों से कहा कि - अब मछलियों के भाग्य का फैसला उन्हें ही करना है. वे इन्हें समुद्र में किसी बड़ी मछली या अन्य जानवर के खाने के लिए छोड़ देंगे या फिर वे खुद इन्हें खाना चाहेंगे. बच्चों ने काफी सोचने के बाद बहस करनी शुरू कर दी. एक बच्चे ने कहा कि अपनी मछली को खुद ही खाना ज्यादा बेहतर है, जबकि दूसरे बच्चे का कहना था कि वो उन्हें खाने के बजाय जाने देगा. 11 बच्चों ने मछलियों को खाने के पक्ष में वोट किया, जबकि 6 बच्चे उन्हें छोड़ देना चाहते थे.

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    दिलचस्प बात तो ये थी कि एक शेफ भी स्कूल में बुलाया गया, जिसने उन बच्चों के लिए मछलियां पकाईं, जो इन्हें खाना चाहते थे. अब जिन बच्चों ने मछलियां खाना चुना था, उनमें से तमाम बच्चे अपनी पाली हुई मछली का एक निवाला भी नहीं खा सके. सुनने में काफी क्रूर लग रहा है, लेकिन जापानी स्कूल का कहना है कि वो इस तरीके से छोटे बच्चों में फैसला लेने की क्षमता विकसित कर रहे हैं और ज़िंदगी का महत्व उन्हें समझा रहे हैं.

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