कर्नाटक: बीमार बेटे की दवा के लिए मजदूर पिता ने तय किया 300 किमी का सफर, तपती धूप में चलाई साइकिल

अपने बेटे की दवा के लिए साइकिल के जरिए मैसूर से बेंगलुरु पहुंचे आनंद. (ANI/1 June, 2021)

Karnataka News: राज्य में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिए फिलहाल सात जून तक लॉकडाउन लगा है.

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    बेंगलुरु. कोरोना वायरस की वजह से पिछले वर्ष लगे लॉकडाउन के दौरान हमारे सामने प्रवासी मजदूरों से जुड़ी कई ऐसी कहानियां आई थीं, जिसने हमारी आंखों को नम कर दिया था. दरअसल लॉकडाउन ने शहरों में सारी गतिविधियों को ठप कर दिया था और इसीलिए दूर-दराज के गांवों से कमाने के लिए शहरों में आए मजदूरों को मजबूरी में अपने घर के लिए पलायन करना पड़ा.


    आपको याद होगा कि कैसे एक लड़की ने अपने पिता को साइकिल पर बिठाकर गुरुग्राम से बिहार के दरभंगा तक का 1200 किमी का सफर तय किया था. अब कोरोना की दूसरी लहर में भी ऐसी ही घटना सामने आई है, जहां एक मजदूर पिता ने अपने बेटे की दवा के लिए साइकिल से 300 किमी की दूरी नाप दी.


    कर्नाटक के मैसूर में स्थित कोप्पालु गांव के रहने वाले 45 साल के एक व्यक्ति आनंद ने अपने बेटे की दवा की खातिर बेंगलुरु पहुंचने के लिए साइकिल से 300 किमी का सफर तय किया. उन्होंने कहा, 'मैंने अपने बेटे की दवाओं के लिए यहां कहा, लेकिन ये दवा कहीं नहीं मिली. वह एक दिन के लिए भी दवा लेना नहीं छोड़ सकता. मैं बेंगलुरु गया और मुझे इसमें तीन दिन लगे.' आपको बता दें कि कर्नाटक में फिलहाल सात जून तक लॉकडाउन लगा है.





    पेश से मजदूर आनंद का बेटा बीमार रहता है और बेंगलुरु के निमहंस अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है. आनंद ने बताया कि डॉक्टरों का कहना है कि उसके बेटे को लगातार 18 सालों तक बिना एक भी दिन छोड़े एक दवा खानी है, इसके बाद ही संभव है कि उसका बेटा ठीक हो जाए और इसी दवा को लेने के लिए आनंद ने साइकिल से तपती धूप की परवाह किए बगैर मैसूर के एक गांव से बेंगलुरु तक की 300 किमी की दूरी नाप दी.


    आनंद को अपने इस सफर के दौरान कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. उन्होंने बताया, 'साइकिल से 300 किमी का ये सफर आसान नहीं था. मुझे तपती धूप में साइकिल चलानी पड़ी. राज्य में लॉकडाउन लगे होने की वजह से कई स्थानों पर पुलिस ने मुझे रोका, लेकिन फिर मेरी बात सुनकर मुझे जाने दिया. मेरे पास इतने भी पैसे नहीं थे कि खाना खा सकूं. इसलिए भूखे पेट ही कई किमी तक साइकिल चलानी पड़ी.' बेटे की बीमारी के बारे में आनंद ने कहा कि जब वह छह माह का था, तभी से वह इससे जूझ रहा है. उन्होंने बताया कि बेंगलुरु के निमहंस अस्पताल से उनके बेटे की दवा मुफ्त में मिलती है और हर दो महीनों बाद दवा लेने के लिए वहां जाते हैं, लेकिन लॉकडाउन लागू होने की वजह से इस बार हम नहीं जा सके.