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माउंट एवरेस्ट पर बना है दुनिया का सबसे हैरतअंगेज मुर्दाघर

माउंट एवरेस्ट पर बना है दुनिया का सबसे हैरतअंगेज मुर्दाघर

आप सड़क पर चलते हुए अक्सर कई तरह के बोर्ड देखते हैं जो आपको रास्ता दिखाने में मदद करते हैं। पर क्या आपको मालूम है माउंट एवरेस्ट पर भी लैंडमार्क बने हुए हैं।

आप सड़क पर चलते हुए अक्सर कई तरह के बोर्ड देखते हैं जो आपको रास्ता दिखाने में मदद करते हैं। पर क्या आपको मालूम है माउंट एवरेस्ट पर भी लैंडमार्क बने हुए हैं।

आप सड़क पर चलते हुए अक्सर कई तरह के बोर्ड देखते हैं जो आपको रास्ता दिखाने में मदद करते हैं। पर क्या आपको मालूम है माउंट एवरेस्ट पर भी लैंडमार्क बने हुए हैं।

    नई दिल्ली। आप सड़क पर चलते हुए अक्सर कई तरह के बोर्ड देखते हैं जो आपको रास्ता दिखाने में मदद करते हैं। पर क्या आपको मालूम है माउंट एवरेस्ट पर भी लैंडमार्क बने हुए हैं। जो माउंट एवरेस्ट चढ़ने वाले पर्वतारोहियों को रास्ता दिखाते हैं। लेकिन ये ऐसे लैंडमार्क हैं जिन्हें देखकर कई की चीख निकल जाती है तो कई तो बेहोश तक हो जाते हैं।

    जी हां, ये वो दुनिया है जिसे धरती के ऊपर पाताल कहें तो गलत ना होगा। वहां हर कदम पर नया रहस्य है नया रोमांच है। इस चोटी को पाटने में हर कदम पर आपके लिए नया चक्रव्यूह है। हर कदम पर मौत बाहें फैलाए खड़ी है। जरा सी चूक हुई और सांसों की डोर खत्म। मौत के इस आसमान की सैर सबसे पहले 1953 में एडमंड हिलेरी ने की थी।

    आपको बता दें इस चोटी की ऊंचाई 30 हजार फीट है और जेट एयरक्राफ्ट भी 30 हजार फीट की ऊंचाई पर ही उड़ता है। जबकि लाइट एयरक्राफ्ट तो 10 हजार फीट की ऊंचाई को भी पार नहीं कर पाते। परिंदों में भी बस खुले सिर वाला हंस और कुछ खास प्रजाति के सारस ही इस ऊंचाई को छू पाते है। दुनिया के बड़े-बड़े बहादुर सूरमा भी इस रास्ते में आंसुओं से रो देते हैं। इस बुलंदी के रास्ते में कई जगह शमशान भी हैं। ऐसे शमशान जहां लाशें बरसों से आखिरी रस्में पूरी होने का इंतजार कर रही हैं। अब तो ये लाशें नए मुसाफिरों को रास्ता दिखाने लगी हैं। जी हां, ये हकीकत है माउंट एवरेस्ट के रास्ते में तकरीबन 200 लाशें ऐसी हैं जिन्हें नए मुसाफिरों को रास्ता दिखाने के लिए छोड़ा गया है। इन्हें लैंडमार्क कहा जाता है।

    इस रास्ते पर 1924 से लेकर 2013 तक 248 यात्री मौत की नींद सो चुके हैं। इनमें 161 पश्चिमी देशों से आए पर्वतारोही थे जबकि 87 स्थानीय शेरपा थे। हालांकि 2014 में भी यहां बर्फीले तूफान की चपेट में आने से 16 लोगों की मौत हो चुकी है। और ताजा भूकंप के बाद आए बर्फीले तूफान ने इस आंकड़े को और भी बढ़ा दिया है।

    2013 तक मारे गए 248 लोगों में से 200 शव अभी भी वहीं पड़े हैं। यही वजह है लोग कहते हैं कि इस रास्ते में कई शमशान पड़ते हैं। सबसे पहली बड़ी दुर्घटना 1996 में हुई थी तब 8 लोग मौत के इस आसमान को छूने की आस में रास्ते में ही मौत की नींद सो गए थे। इसके अगले ही सीजन में 15 लोगों ने रास्ते में दम तोड़ दिया। जिसने यहां दम तोड़ दिया बस फिर यही उसका शमशान बन गया। क्योंकि यहां से लाशें निकालने की कोशिश करना भी खुदकुशी करने के बराबर है।

    यही नहीं ये वो रास्ता है जहां आप पूरी टीम के साथ चल रहे होते हैं लेकिन जैसे ही आपकी हिम्मत छूटी समझ लीजिए कि आप भी छूट गए। इस सफर के मुसाफिर अपने साथियों को एक ही पल में भूल जाते हैं। जिस साथी की सांसे फूलने लगती है दूसरे साथी उसे छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। 1998 में भी ऐसी ही एक घटना घटी थी। पर्वतारोहियों का एक दल 28 हजार फीट की ऊंचाई को पार कर रहा था जिसमें एक महिला भी शामिल थी। इस दल ने देखा कुछ दूरी पर एक शख्स पड़ा है जो मदद के लिए हाथ हिला रहा है। ये दल उस शख्स के पास पहुंचा तो पता चला कि वो एक महिला थी। उस महिला की सांसे फूल रही थीं उसके पास ऑक्सीजन की एक बोतल पड़ी थी जो बिल्कुल खाली थी। इस दल में मौजूद महिला चाहती थी कि उस महिला की जिंदगी बचाई जाए। लेकिन इस ग्रुप के पास एक्सट्रा ऑक्सीजन मास्क नहीं था। जिससे उस महिला को ऑक्सीजन दी जा सके। इसलिए इन्होंने तय किया कि अगर अपनी जान को खतरे में नहीं डालना है तो उस महिला को मरने के लिए छोड़कर आगे बढ़ा जाए।

    तड़पती हुई महिला को छोड़कर दल आगे बढ़ गया लेकिन उस दल में मौजूद महिला इस गुनाह से बैचेन हो गई। बाद में उसने दुनिया के सामने पश्चाताप भी किया। उसने बताया कि मरने वाली महिला मुझसे पूछ रही थी कि तुम मुझे इस हाल में छोड़कर आगे कैसे जा सकती हो। मरने वाली महिला का नाम फ्रांसिस था और वो अपने पति के साथ बिना ऑक्सीजन के ही माउंट एवरेस्ट को फतह करना चाहती थी। लेकिन डेथ जोन में जाकर सांसे अटक गईं तो पति भी साथ छोड़कर आगे बढ़ गया और जिस दल से उसने मदद मांगी वो भी बिना मदद किए ही आगे चला गया।

    दरअसल ये वो डगर थी जहां अपनी जिंदगी को बचाने के अलावा कोई दूसरा जज्बा दिल में आता ही नहीं है। 30 हजार फीट के इस सफर में सबसे खतरनाक रास्ता शुरू होता है 26 हजार फीट की ऊंचाई से आगे। ये जगह फाइनल बेस कैंप से ऊपर है और इसे डेथ जोन कहा जाता है। ये वो इलाका है जहां ऑक्सीजन बिल्कुल नहीं है। यहां सर्दी की वजह से इंसान की हड्डियां अकड़ जाती हैं। जिसके बाद सांसे थमने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

    हालांकि अब तो दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत पर चढ़ना काफी आसान माना जाता है। क्योंकि मौजूदा दौर में कई तरह के हिफाजती इंतजाम होने लगे हैं। सैटेलाइन फोन्स के जरिये पर्वतारोही बाहरी दुनिया के कॉन्टेक्ट में रहते हैं जिसकी व्रुाह से मुसीबत के वक्त मदद की उम्मीद भी रहती है।

    1996 में 15 लोगों की मौत हुई थी जबकि 98 लोग ही लौटे पाए थे। लेकिन दस साल बाद 2006 में मात्र 11 लोगों की मौत हुई और 400 लोगों ने सफल यात्रा की। बहरहाल अब भले ही आसमान को छूते इस पर्वत के सिर पर चढ़ना पहले से आसान हो गया है लेकिन रास्ते में पड़े ये शव हर वक्त होशियार रहने इशारा करते रहते हैं। उत्तर पूर्वी टीले पर बरसों से एक शव पड़ा है जिसके पैर में हरे रंग के जूते हैं। अब उस जगह को ग्रीन बूट के नाम से जाना जाता है। ऐसे ही जगह-जगह पड़े शवों को अलग-अलग लैंडमार्क के नाम से जाने जाना लगा है।

    Tags: Mount Everest

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