नंदीगढ़ के उस पहाड़ पर आज भी बैठे दिखते हैं नंदी महाराज, देखें VIDEO

क्या वाकई उस धाम में नंदी देव आते हैं, क्या हमें भी निशानी के तौर पर चारा मिलेगा, पैरों के निशान मिलेंगे? अगर सब मिल भी गया तो ये कैसे साबित होगा कि वो निशान शिव के नंदी देव के ही हैं. तमाम सवालों के बीच चढ़ाई की मुसीबतों को झेलते हम उस चोटी पर पहुंच गए.

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आधी हकीकत आधा फसाना. कोई भी माइक्रोस्कोप से देख ले, दुनिया के बड़े से बड़े दूरबीन से देख ले, दूर से देखने पर लगता है कि नन्दी महाराज वहां बैठे हुए हैं. वो जो उनकी अल्पायु थी, दीर्घायु के लिए उन्होने वहां पर आराधना की थी, शिव महापुराण के इतिहास के पन्नों में वो सब बातें शामिल हैं. कहते हैं, वहां महादेव के चमत्कार से आज भी नंदी के आने के निशान मिलते हैं. आज भी वहां चारे आधे खाए मिलेंगे, छोड़े मिलेंगे और नंदी के पैरों के निशान मिलेंगे. लोगों के मुताबिक सतपुड़ा के घने जंगलों में, किसी पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर, वो धाम आज भी मौजूद है.



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वहां जाना मतलब जान का खतरा, वहां इतने सारे हिंसक जानवर हैं, हजारों फुट गहरी खाई, कोई चट्टान खिसक कर उपर आ सकती है. सतपुड़ा की हसीन वादियों में नंदी के आकार का एक पहाड़ है जिसकी सच्चाई जानने के लिए न्यूज़ 18 की टीम पहुंची सतपुड़ा की सबसे ऊंची चोटी नंदीगढ़ पर.





लोगों ने बताया था कि जंगल में बढ़ते चले जाओ, जहां नंदी के आकार का एक पहाड़ नजर आ जाएगा, वहीं से मंजिल नजर आने लगेगी. अब मंजिल तो सामने थी बस वहां पहुंचने के लिए रास्ते का तलाश करना बाकी था. लेकिन ये काम इतना आसान नहीं था.
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इन खतरों से हमें पहले ही आगाह कर दिया गया था. फिलहाल तो जितनी जल्दी हो सके हमें इस नदी के इलाके से दूर जाना था. रास्ता तो कोई था नहीं, बस हमने दूर से उस नंदी के आकार वाले पर्वत की दिशा भांप ली थी और उस तरफ चलते चले जा रहे थे. नंदीगढ़ के उस पहाड़ पर किसी इंसान के पैर नहीं पड़ते इसका सबूत है वहां मौजूद घनघोर झाड़ियां थी. कुछ देर बाद जंगल खत्म हो गया और पहाड़ों की चढ़ाई शुरु हो गई. नंदीगढ़ के इन पहाड़ों की चढ़ाई सही में किसी के बस की बात नहीं है. ज़रा सा पैर फिसला तो सैकड़ों फीट खाई में गिर पड़ेंगे.



ऐसे मुसीबतों का सामना करने के लिए हम तो पहले से तैयार थे लेकिन कहानी कहती है कि उस धाम में नंदी देव ने महादेव की आराधना की थी जिसके बाद भगवान शिव ने उन्हें अपनी सवारी के तौर पर स्वीकार किया था. अगर ये कहानी सच है तो नंदी इतनी ऊंची जगह पर कैसे पहुंचे होंगे और उन्होंने इसी जगह को ही क्या चुना होगा.



क्या वाकई उस धाम में नंदी देव आते हैं, क्या हमें भी निशानी के तौर पर चारा मिलेगा, पैरों के निशान मिलेंगे? अगर सब मिल भी गया तो ये कैसे साबित होगा कि वो निशान शिव के नंदी देव के ही हैं. तमाम सवालों के बीच चढ़ाई की मुसीबतों को झेलते हम उस चोटी पर पहुंच गए.



अब तो चंद मिनटों बाद युगों पुराने रहस्य से पर्दा उठने वाला था. जब हम वहां पहुंचे तो दो चीजों में हमें हैरत में डाल दिया. पहला, बैल के मुंह की आकृति वाली ये शिला और दूसरा, उस शिला के नीचे पड़ा ये चारा. कहते हैं सतपुड़ा की यही सबके ऊंची चोटी है जहां अल्पायु नंदी ने शिव की आराधना की थी. तभी से इस पहाड़ को नंदीगढ़ के नाम से जाना जाने लगा.



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हो सकता है कि पौराणिक कथा के असर से, इस शिला को देखकर, लोग इस धाम को महादेव के चमत्कार से जोड़ कर देखते हों लेकिन इस आकृति के ठीक नीचे पड़े इस चारे को क्या कहा जाए. दावे को माने तो चारा नंदी ने ही खाया है लेकिन आज के युग में कोई भी इस बात को नहीं मानेगा. वैसे भी इस जगह पर किसी जानवर के पैरों के निशान नहीं थे लेकिन सामने जो दिख रहा था उसे नकारे भी तो कैसे. फिर हमने इस पहेली को सुलझाने का एक रास्ता निकाला. हमने चारे को हटाकर उस जगह को अच्छी तरह से साफ कर दिया. अब अगली सुबह भी चारा यहां मिला, तभी कुछ कहा जा सकता है.



अब समस्या रात गुजारने की थी. इस पहाड़ पर हमें रहने का ठिकाना कहां मिलता लेकिन हमारी किस्मत अच्छी थी कि हमें कुछ आदिवासी मिले जो जड़ी-बूटी की तलाश में पहाड़ों में भटकते रहते हैं. रात हमने उन लोगों के साथ ही गुजार ली.



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