VIDEO: स्वर्ग की सीढ़ी तक पहुंचने वाली उस गुफा की रहस्यमय कहानी

एक गुफा, जिसे पांडवों ने बनाया, लेकिन चंद महीने पहले ही दुनिया के सामने आई जिसके दूसरे छोर का, किसी को, कोई अंदाजा नहीं. अगर वो गुफा, प्राकृतिक है, तो अंदर हज़ारों बरस पुराना शिवलिंग किसने बनाया.

News18Hindi
Updated: April 20, 2019, 5:51 PM IST
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आधी हकीकत आधा फसाना. महाभारत के मुताबिक जब कौरवों से युद्ध खत्म हुआ, तो मोक्ष के लिए पांडव स्वर्ग की सीढ़ी की तरफ निकल पड़े. महाभारत में लिखा है कि स्वर्ग की वो सीढ़ियां हिमालय के आखिरी छोर पर बनी हैं. उस कथा के मुताबिक सिर्फ युधिष्ठिर ही स्वर्ग की सीढ़ी तक पहुंच पाए थे. आज की कहानी एक ऐसी गुफा से जुड़ी है, जिसका दूसरा सिरा ठीक उसी पर्वत पर निकलता है, जहां से स्वर्ग की सीढ़ी शुरु होती है.

कई दंतकथाओं के मुताबिक पांडवों ने वाकई एक ऐसी गुफा बनाई थी, जिसके ज़रिए स्वर्ग की सीढ़ी तक पहुंचा जा सके. उस गुफा को बनाने के लिए महादेव का अभिषेक भी किया गया था. कुछ महीने पहले उत्तराखंड के कुछ चरवाहों को पर्वतों पर एक अद्भुत गुफा मिली है. कुछ लोग उस गुफा के अंदर पहुंचे, तो कुछ दूरी पर एक अद्भुत शिवलिंग भी दिखा. ऐसी तमाम निशानियां भी दिखीं, जिसके बाद ये दावा और तेज़ हो गया कि ये वही गुफा है, जिसे पांडवों ने बनाया था और गुफा का दूसरा छोर स्वर्ग की सीढ़ी तक पहुंचता है.

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एक गुफा, जिसे पांडवों ने बनाया, लेकिन चंद महीने पहले ही दुनिया के सामने आई जिसके दूसरे छोर का, किसी को, कोई अंदाजा नहीं. अगर वो गुफा, प्राकृतिक है, तो अंदर हज़ारों बरस पुराना शिवलिंग किसने बनाया. अगर, सबकुछ सिर्फ किस्से-कहानियां हैं, तो उस डमरू का क्या रहस्य है, जो गुफा के भीतर दिखाई देता है. अगर सबकुछ अफवाह है, तो इस गुफा की भौगोलिक स्थिति, उन दिशाओं से मेल कैसे खाती है, जहां स्वर्ग की सीढ़ी का दावा आज भी होता है. इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढने न्यूज 18 की टीम पहुंची ऋषिकेश.

समस्या ये थी कि उस गुफा में बहुत अंदर तक कोई नहीं गया है. जिन गांववालों ने उसकी खोज की थी वो भी चंद मीटर के बाद वापस लौट आए थे. उनके मुताबिक उस रहस्यमयी रास्ते से गुजरना मौत को दावत देने के बराबर है. फिर भी हमने तय किया हम उन रास्तों से गुजरेंगे. जहां से पांडवों के गुजरने का दावा किया जाता है.

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उत्तराखंड के हिमालय के रास्ते पांडवों ने स्वर्ग जाने की कोशिश की थी लेकिन द्रोपदी-सहदेव-नकुल-अर्जुन और भीम एक-एक करके दम तोड़ते गए. एक कुत्ते के साथ केवल युधिष्ठिर ही जीवित स्वर्ग तक पहुंचने में कामयाब रहे थे. महाभारत की इस पौराणिक कथा को सभी जानते और मानते हैं. इस कथा के मुताबिक पांडवों की उस स्वर्ग यात्रा को आज के भौगोलिक नक्शे से देखा जाए तो वे बद्रीनाथ, माणा गांव, सतोपंथ और स्वर्गरोहिणी होते हुए आगे बढ़े थे. इसी रास्ते को आज स्वर्ग की सीढ़ी कहा जाता है. मान्यता है कि पांडवों ने सीधे स्वर्ग की सीढ़ी तक पहुंचने के लिए एक दूसरा रास्ता भी तैयार किया था जिसके बारे में अभी तक कोई नहीं जानता था. वो रास्ता, एक गुफा से होकर गुजरता था जो चंद महीने पहले ही वजूद में आई है.
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अगर पांडवों ने सीधे स्वर्ग की सीढ़ी तक जाने के लिए ये रास्ता तैयार किया था तो गए क्यों नहीं. क्या ये रास्ता अधूरा है. अगर अधूरा है तो क्यों. क्या कोई बड़ा खतरा था. इन सवालों का जवाब हासिल करने के लिए उन रास्तों पर चलना होगा. उस गुफा में जाना होगा जहां 5 हजार साल से शायद कोई नहीं गया और इस सफर की शुरुआत होती है ऋषिकेष से.

सागर के 60 हजार पुत्रों को तारने वाली गंगा जिसके दर्शन मात्र से ही पापों के मिटने का विश्वास पैदा होता है. इस गंगा की तलहटी में कई इतिहास सांस ले रहे हैं और इस गंगा की तलहटी में है पांडवों की एक गुफा. टीम ऋषिकेश से उसी जगह के लिए निकलेगी जिसके बारे में माना जाता है कि न केवल पांडवे उसमें रहे थे बल्कि उसी गुफा से स्वर्ग जाने का रास्ता निकलता है.

महाभारत काल के उस नए रास्ते को हाल ही में तलाशा गया है जिस पर शोध का काम चल रहा है. लिहाजा उसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिली. कहानी के मुताबिक स्वर्ग की यात्रा के लिए वो गुफा पांडवों का पहला पड़ाव था. दावा है कि वहां महाभारत काल के एक या दो नहीं, कई साक्ष्य मौजूद हैं. वो गुफा बहुत बड़ी है जिसका एक हिस्सा लोगों के लिए पहले से ही खुला है. उस गुफा में ही एक नया रास्ता खोजा गया है जिसके अंदर हमें जाना था.

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