VIDEO: चमगादड़ों से भरी गुफा के उस पार थी स्वर्ग की सीढ़ी! हकीकत या फ़साना

एक-एक कदम जीवन-मरण का सवाल बनता जा रहा था. गुफा आगे बढ़ती नजर आ रही थी लेकिन ऐसा लगा जैसे भूकंप से पैदा हुए भौगोलिक बदलावों से रास्ता बंद हो गया हो.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 22, 2019, 11:13 AM IST
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आधी हकीकत आधा फसाना. एक गुफा, जिसे पांडवों ने बनाया, लेकिन चंद महीने पहले ही दुनिया के सामने आई जिसके दूसरे छोर का, किसी को, कोई अंदाजा नहीं. अगर वो गुफा, प्राकृतिक है, तो अंदर हज़ारों बरस पुराना शिवलिंग किसने बनाया. अगर, सबकुछ सिर्फ किस्से-कहानियां हैं, तो उस डमरू का क्या रहस्य है, जो गुफा के भीतर दिखाई देता है. अगर सबकुछ अफवाह है, तो इस गुफा की भौगोलिक स्थिति, उन दिशाओं से मेल कैसे खाती है, जहां स्वर्ग की सीढ़ी का दावा आज भी होता है. इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढने न्यूज 18 की टीम पहुंची ऋषिकेश.

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अब टीम उन रास्तों पर निकल चुकी थी जहां अभी तक गांव के वही कुछ लोग गए थे जिन्होंने उस रास्ते की तलाश की थी. उसके बाद खौफ के चलते कोई भी उन रास्तों से नहीं गुजरा था. वो रास्ता कैसा है, कहां तक जाता है. उसका कोई दूसरा सिरा है भी की नहीं. कुछ मालूम नहीं था. बस स्वर्ग की सीढ़ी तक पहुंचने वाले रास्ते के रहस्य को सुलझाने के लिए टीम आगे बढ़ती गई. चलते-चलते तंग जगह पहुंची जहां सांस लेना तक मुश्किल हो गया. अंदर और भी कई नए रास्ते दिखाई दिए जिनमें से कुछ बंद थे. सफर कई बार ऐसे मोड़ से गुजरा जहां लगा कि अब आगे बढ़ना मौत को गले लगाने जैसा है और जब उस रहस्यमयी रास्ते के अंतिम सिरे पर कुछ ऐसा था जिसे देख कोई भी चौंक जाए.



कहते हैं द्वापर युग में पांडव इसी रास्ते स्वर्ग की सीढ़ी की ओर रवाना हुए थे लेकिन कुछ कारणों से रुख बदलना पड़ा था. महाभारत के मुताबिक स्वर्ग की सीढ़ी की शुरुआत बद्रीनाथ से हुई थी. पौराणिक ग्रंथ कहते हैं कि बद्रीनाथ जाने के लिए पांडवों ने गंगा नदी के किनारे का रास्ता अपनाया था.
कुछ मीटर अंदर जाने के बाद गुफा में सीधे खड़े होने की जगह मिली. यहां के पुजारी बताते हैं कि ये गुफा सतयुग की है. गुफा के आखिरे सिरे तक पहुंचने के लिए आगे बढ़ना जरुरी था. आगे बढ़ने के लिए चमगादड़ों को शांत करना जरूरी था. अब एक-एक कदम जीवन-मरण का सवाल बनता जा रहा था. गुफा आगे बढ़ती नजर आ रही थी लेकिन ऐसा लगा जैसे भूकंप से पैदा हुए भौगोलिक बदलावों से रास्ता बंद हो गया हो. माना जाता है कि ये गुफा इतनी लंबी है कि इसका छोर कहीं दूर पहाड़ों में जाकर खुलता है. वहां से रास्ते निकलते हैं स्वर्ग की सीढ़ी का रास्ता केदारनाथ का रास्ता बदरीनाथ का रास्ता. लेकिन फिलहाल कलयुग में ये गुफा इतनी ही है. लोगों में बहुत मान्यता है कहा जाता हैं कि यहां पांडव रहते थे यहां शिव की पूजा अर्चना की.

एक और मान्यता है लोगों कि यहां से कुछ आवाजें भी सुनाई देती हैं. बहुत ध्यान से सुनने पर नदी के बहने जैसी कोई हल्की आवाज सुनाई दे रही थी. शायद उसी जगह से आगे गंगा नदी का प्रवाह था. हो सकता हैं पांडवों के लौटने की वजह आगे नदी का बहना रहा हो लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला जो इसे महाभारतकालीन साबित कर सके. हालांकि हमें ये गुफा पौराणिक काल का जरुर लगा लेकिन इसका नाता पांडवों से है या नहीं ये कहना अभी मुश्किल था.

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गुफा से बाहर निकलने के बाद हम सीधे देहरादून में भूगर्भ शास्त्री के पास पहुंचे जिन्होंने साफ बताया कि गुफा के अंदर की आकृतियां कुछ और नहीं, भूगर्भीय हलचल का नतीजा है. हिंदू मेथालॉजी में इसे केदारखंड कहा गया है तो इस इलाके में हर चीज शिव जी से जोड़ी जाती है. जो भी पत्थर शिवलिंग के आकार का मिलता है उसे लोग शिव से जोड़ देते हैं.

जानकार के मुताबिक ये गुफा पूरी तरह प्रकृति निर्मित है. इसे मानवों ने नहीं बनाया. वैसे भी पुरात्तव विज्ञान इसे महाभारत काल का तभी मानेगा जब यहां से 5 हजार साल से भी पुराने बर्तन, कपड़े जैसी कोई चीज़ मिलेगी. यानी ये गुफा तो एक हकीकत है लेकिन इससे जुड़ा दावा कि इसे पांडवों ने बनाया था और यहां से स्वर्ग की सीढ़ी के लिए रास्ता निकलता है ये फिलहाल फसाना ही निकला.

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