खतरनाक साइंस: एक 'पागल' वैज्ञानिक जिसने बना डाला दो सिर वाला कुत्ता!

व्लादिमीर पेत्रोविच डेमीखोव

व्लादिमीर पेत्रोविच डेमीखोव

आज खतरनाक साइंस की सीरीज़ में जानवर पर किए गए एक ऐसे बर्बरतापूर्ण प्रयोग के बारे में जानिए जो आपके रौंगटे खड़े कर देगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 7, 2019, 12:57 PM IST
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1950 के दशक में रूस के एक वैज्ञानिक व्लादिमीर पेत्रोविच डेमीखोव ने एक कुत्ते पर बेहद खतरनाक प्रयोग किया था. अंग प्रत्योपण पर अपने रिसर्च के दौरान उन्होंने एक कुत्ते के सिर पर एक साथ किसी दूसरे कुत्ते का भी सिर प्लांट किया था. इस तरह का प्रयोग इतिहास में पहली बार किया गया था. लेकिन, इसके कुछ दिनों बाद ही उन दोनों कुत्तों की मौत हो गई. आज खतरनाक साइंस की सीरीज़ में जानवर पर किए गए एक ऐसे बर्बरतापूर्ण प्रयोग के बारे में जानिए जो आपके रौंगटे खड़े कर देगा.

13 जनवरी, 1959 में रूस के एक वैज्ञानिक व्लादिमीर डेमीखोव ने एक विचित्र प्रयोग किया था. व्लादिमीर एक अंग प्रत्योपण विशेषज्ञ थे. वह कई सालों से इस विषय पर रिसर्च कर रहे थे. उन्होंने कई जानवरों के अंगों का ट्रांसप्लांट किया था. जिसके बाद साल 1959 में उन्होंने एक बेहद खतरनाक प्रयोग को अंजाम दिया.

व्लादिमीर ने एक जिंदा कुत्ते के सिर पर एक साथ किसी दूसरे कुत्ते का सिर प्लांट किया था. इस तरह का अजीबोगरीब प्रयोग पहली बार किया था. अपनी इस प्रयोग के बाद व्लादिमीर एक दो सिर वाला कुत्ता बनाने में सफल तो रहें पर कुछ ही दिनों बाद उन दोनों की मृत्यु हो गई.



व्लादिमीर इससे पहले करीब 20 बार ऐसा प्रयोग कर चुका था, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली. वह ज्यादातर दो अलग-अलग नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल करता था.इस प्रयोग के लिए भी व्लादिमीर ने दो नस्ल वाले कुत्तों को इस्तेमाल किया था, एक जर्मन शेफर्ड और दूसरा ब्रॉडीगा. उसने जर्मन शेफर्ड के निचले शरीर के नीचे ब्रॉडीगा की गर्दन के समान चीरा लगा दिया था. जिसके बाद प्लास्टिक स्ट्रिंग्स का इस्तेमाल कर ब्रॉडीगा के सिर को जर्मन शेफर्ड के शरीर में प्लांट किया गया.छोटे कुत्ते के सिर को बड़े कुत्ते के पेट से नहीं जोड़ा गया था. जिस वजह से उसे ट्यूब के माध्यम से खिलाया जाता था.
व्लादिमीर को इस ऑपरेशन में साढ़े तीन घंटे लगे थे. इसके बाद उन दोनों कुत्तों के सिर फिर से जीवित हो गए थे. वह दोनों आराम से सुन, देख, सुंघ और निगल सकते थे. हालांकि, ब्रॉडीगा की पेट नहीं होने के वजह से वह जो कुछ भी पीती थी वह ट्यूब से होकर बाहर गिरता था. व्लादिमीर की कड़ी मेहनत और देखभाल के बाद भी ये दोनों कुत्ते केवल 4 दिनों तक ही जिंदा रहे. अपने इस प्रयोग को लेकर व्लादिमीर को दुनियाभर में आलोचना का सामना करना पड़ा.

साल 1968 में भी व्लादिमीर ने इस प्रयोग को दुबारा करने की कोशिश की थी. हालांकि, इस बार दोनों कुत्ते करीब 38 दिनों तक जिंदा रहे थे. साल 1988 में इन दोनों की बॉडी को रीगा म्यूजियम में संजोकर रखा गया.

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