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खतरनाक साइंस: विज्ञान के वो खौफनाक 'एक्सपेरिमेंट्स', जो तबाह कर सकते थे पूरी दुनिया !

Vandana Tiwary | News18Hindi
Updated: April 8, 2019, 3:10 AM IST

'खतरनाक साइंस' सीरीज़ की इस पहली कड़ी में हम आपको वैज्ञानिकों द्वारा किए गए ऐसे तमाम एक्सपेरिमेंट्स के बारे में बताएंगे, जिनमें सीधे कुदरत को चुनौती देने की कोशिश की गई.

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आज की दुनिया विज्ञान पर बेहद ज्यादा निर्भर हो चुकी है. हालांकि विज्ञान को हर नामुमकिन को मुमकिन करने वाला हथियार समझ लेना हमारे लिए खतरनाक साबित हो सकता है. इस बात में कोई दो राय नहीं कि विज्ञान को अपनी ढाल बनाकर इंसान ने कई बार प्रकृति से टकराने की कोशिश की है. 'खतरनाक साइंस' सीरीज़ की इस पहली कड़ी में हम आपको वैज्ञानिकों द्वारा किए गए ऐसे तमाम एक्सपेरिमेंट्स के बारे में बताएंगे, जिनमें सीधे कुदरत को चुनौती देने की कोशिश की गई. इन कोशिशों से दुनिया पर तबाही पर संकट तक मंडराने लगा था.

कोला सुपरडीप बोरहोल: 1970 में शीत युद्ध के दौरान अमेरिका को चुनौती देने के लिए रूस ने धरती के बीचो-बीच इतना गहरा गड्ढा किया, जिसने पूरी दुनिया को अंदर तक हिला कर रख दिया था. कोला सुपरडीप बोरहोल के नाम से जाना जाने वाला ये बोरहोल, मानवजाति द्वारा खोदा गया सबसे गहरा गड्ढा है. इस बोरहोल की खुदाई में 19 साल का समय लगा था. हालांकि, 19 साल की कड़ी मेहनत के बाद भी धरती के अंदर केवल 12 किलोमीटर का ही गड्ढा खोदा जा सका. धरती के अंदर की जाने वाली इस खुदाई के दौरान एक ऐसा समय भी आया, जब इंसान द्वारा बनाई हुई मशीन भी फेल हो गई. 12,262 मीटर यानी तकरीबन 40,000 फ़ीट से ज्यादा खुदाई के बाद ज़मीन के अंदर का तापमान 180 डिग्री सेल्शियस था, जो किसी इंसान तो क्या मशीन तक को जलाकर राख करने के लिए काफी था.

इस खुदाई के पीछे का मकसद:
वैज्ञानिकों द्वारा धरती के बीचो-बीच खुदाई करवाने के पीछे पृथ्वी की ऊपरी तह के अंदर छिपे उन रहस्यों को जानना था, जो अबतक पूरी दुनिया से छिपे हुए थे. लेकिन दो देशों के बीच खुद को श्रेष्ठ दिखाने की होड़ के तहत शुरू हुई ये कोशिश पूरी मानव जाति के लिए कितना विनाशकारी हो सकता था, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

तीन बातें जो इस खुदाई के दौरान पता चलीं:
इस खुदाई के बाद वैज्ञानिकों ने बताया कि इस होल की तली में उन्‍होंने तीन खास चीजें पाईं हैं-

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  • पहला, धरती के अंदर इतनी गहराई में ढेर सारा पानी मौजूद है. ऐसा इसलिए, क्‍योंकि यहां पत्‍थर के रूप में मौजूद खनिज पदार्थ नीचे स्‍थित ऑक्‍सीजन और हाइड्रोजन अणुओं को दबाकर पानी निकाल देते हैं

  • दूसरा, यहां 6700 मीटर की गहराई में प्‍लैंक्‍टन फॉसिल्‍स (एक तरह के जीवाश्‍म) भी पाए गए हैं, जो आसानी से नहीं पाए जाते हैं.

  • और तीसरा, धरती के इतनी गहराई में तापमान करीब 350 डिग्री फॉरेनहाइट तक होता है, जो मनुष्य द्वारा झेल पाना नामुमकिन है.


इस प्रयोग से कैसे खत्म हो सकती थी ये दुनिया:
इस प्रयोग को लेकर कुछ एक्सपर्ट्स का मानना था कि पृथ्वी की ऊपरी तह में इससे ज्यादा खुदाई की गई तो ये धरती का संतुलन बिगाड़ सकती है, जिसके बाद भूकंप की स्थिति भी पैदा हो सकती है. हालांकि, इसे ठोस वैज्ञानिक कारण नहीं माना जा सकता है. लेकिन, कुछ धार्मिक लोगों का ये भी मानना था कि पृथ्वी के इस गहरे हिस्से में पाताल है, और इससे ज्यादा खुदाई की गई तो सारे शैतान बाहर आ जाएंगे जिसके बाद दुनिया तबाह हो जाएगी.

न्यूज़ीलैंड सुनामी बम: साल 1944-1955 के मध्य में न्यूज़ीलैंड के वैज्ञानिकों ने बम धमाका कर समुद्र में आर्टिफिशियल सुनामी लाने की कोशिश की थी. उन्हें विश्वास था कि समुद्र में रणनीतिक रूप से बम रखकर अगर विस्फोट किया जाए तो जब चाहे सुनामी लाई जा सकती है. लेकिन कई हज़ार टेस्ट करने के बावजूद भी जब वैज्ञानिक इसमें सफल नहीं हो पाएं तो उन्होंने इस टेस्ट को रोक दिया.



दुनिया में कैसे तबाही ला सकता था ये एक्सपेरिमेंट:
न्यूज़ीलैंड के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया ये एक्सपेरिमेंट अगर सफल हो जाता तो यकीनन बड़ी तबाही ला सकता था. ऐसा इसलिए क्योंकि इसके बाद कोई भी देश या व्यक्ति इस टेक्निक का इस्तेमाल कर कभी भी सुनामी ला सकता था, जो दुनिया तबाह कर देता.

ऑपरेशन साइरस: 1940 के अंत में अमेरिका के वैज्ञानिकों ने ड्राई आइस की मदद से समुद्री तूफ़ान की दिशा मोड़ने की कोशिश की थी. इसी प्रयोग के दौरान जब वैज्ञानिकों ने अटलांटिक महासागर की ओर बह रहे तूफान में 180 पाउंड का ड्राई आइस डाला तो तूफान ने एक अप्रत्याशित मोड़ ले लिया, जिसकी किसी को आशा नहीं थी. तेज़ गति में बह रहे उस तूफान ने अपना रुख जॉर्जिया शहर के सावना शहर की ओर मोड़ लिया. हालांकि, उस वक्त शहर की जनसंख्या कम होने की वजह से केवल 1 व्यक्ति की जान गई, लेकिन करीब 200 मीलियन डॉलर की संपत्ति नष्ट हो गई.

ट्रिनिटी न्यूक्लियर टेस्ट: 16 जुलाई 1945 को सुबह करीब 5:45 बजे दुनिया का सबसे पहला एटॉमिक बम न्यू मेक्सिको के सुकोरो शहर के एक विरान से जगह में विस्फोट किया गया. हालांकि इस टेस्ट को कई सालों से टाला जा रहा था क्योंकि इस विस्फोट के परिणाम और प्रकृति पर पड़ने वाले असर को लेकर कुछ वैज्ञानिक भी डरे हुए थे.  इस टेस्ट का संचालन करने वाले इटैलियन वैज्ञानिक इनरिको फर्मी भी उनमें से एक थे.



हालांकि इसके बाद धरती तो खत्म नहीं हुई लेकिन इस टेस्ट के दौरान 20 किलो टन का धमाका हुआ था, जिसने 2 मीटर गहरा और 10 मीटर लंबा गड्ढा कर दिया. इस टेस्टिंग के दौरान इतनी तेज़ रौशनी हुई थी जिसने करीबी इलाके को दिन से भी ज्यादा रौशन और बेहद गर्म कर दिया था. वहीं इसके झटके 200 किलोमीटर तक महसूस किए गए और मशरूम क्लॉउड 12 किलोमीटर तक आसमान में पहुंच गया था.

कैसे तबाही ला सकता था ये प्रयोग:

ट्रिनिटी न्यूक्लियर टेस्ट का संचालन करने वाले इटैलियन वैज्ञानिक इनरिको फर्मी का मानना था कि इस विस्फोट के बाद पृथ्वी का वायुमंडल पूरी तरह बर्बाद हो सकता है. इसकी वजह ये है कि हमारे वायुमंडल में सबसे ज्यादा नाइट्रोजन गैस मौजूद है, जिसकी वजह से ये एटम बम इस एलिमेंट के न्यूक्लियस के साथ फ्यूस होकर एक चेन रिएक्शन पैदा कर सकता था. ये रिएक्शन पूरी दुनिया तबाह कर सकती थी. हालांकि, इस विस्फोट के बाद ऐसा कुछ तो नहीं हुआ, लेकिन अगर इनरिको फर्मी की बात सच साबित हो जाती तो शायद आज पृथ्वी के हालात कुछ और ही होते.

स्टारफिश प्राइम: 9 जुलाई 1962 को यूनाइटेड स्टेट्स ने पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड के पास 6 न्यूक्लियर बम धमाके किए. इस प्रोजेक्ट का नाम रखा गया स्टारफिश प्राइम. इन धमाकों के दुष्प्रभाव के तौर पर पृथ्वी के वायुमंडल में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स, जिसे आम तौर पर इएमपी कहा जाता है, उत्पन्न हुआ. इस पल्स से निकलने वाले रेडिएशन से रास्ते में आने वाली हर इलेक्ट्रोनिक वस्तु नष्ट हो जाती है. ऐसे रेडिएशन केवल परमाणु विस्फ़ोट या चुम्बकीय क्षेत्र में आए अचानक बदलाव के कारण ही उत्पन्न होती है.



एक्सपर्ट्स का ये भी मानना है कि अगर ये परमाणु बम धमाके वायुमंडल में मौजूद मैग्नेटिक फील्ड को अगर पूरी तरह से नष्ट कर देते तो इससे होने वाले दुष्प्रभाव पृथ्वी को खत्म करने में सक्षम थे.

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First published: March 19, 2019, 12:07 PM IST
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