खतरनाक साइंस: जेंडर बदलने के लिए देते थे इलेक्ट्रिक शॉक, सैकड़ों लोगों को बना दिया नपुंसक!

खतरनाक साइंस: जेंडर बदलने के लिए देते थे इलेक्ट्रिक शॉक, सैकड़ों लोगों को बना दिया नपुंसक!
प्रतीकात्मक तस्वीर

समलैंगिकों को बीमार मानकर 'नॉर्मल' करने के लिए उन्हें कई तरह के ट्रीटमेंट दिए जाते थे, जिसमें इलेक्ट्रिक शॉक और केमिकल कैस्ट्रेशन जैसे खौफनाक तरीके शामिल थे.

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साल 1969 में दक्षिण अफ्रीका के एक डॉक्टर ऑब्रे लेविन ने 'द अवर्सियन' नाम का एक प्रोजेक्ट शुरू किया था. इस प्रोजेक्ट का मकसद था समलैंगिकता को समाज से खत्म करना. ऑब्रे लेनिन का दावा था कि समलैंगिकता एक 'मानसिक बिमारी' है, जिसे इलाज से 'नॉर्मल' किया जा सकता है. समलैंगिक लोगों को नॉर्मल करने के लिए उन्हे कई तरह के ट्रीटमेंट दिए जाते थे, जिसमें इलेक्ट्रिक शॉक और केमिकल कैस्ट्रेशन शामिल था. आज खतरनाक साइंस की सीरीज में जानिए कैसे इस प्रयोग ने करीब 1000 लोगों की जान जोखिम में डाल दी थी.

साल 1971 और 1989 के बीच, दक्षिण अफ्रीकी सरकार एक सख्त समलैंगिक विरोधी कानून लेकर आई थी. उस वक्त समलैंगिकता को एक मानसिक बीमारी के रूप में देखा जाता था. इस 'बिमारी' से लोगों को बचाने के लिए दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने एक बचाव दल भी बनाया था, जिसका नाम था दक्षिण अफ्रीकी रक्षा बल (एसएडीएफ) और इस प्रोजेक्ट का नाम रखा गया-  'द अवर्सियन प्रोजेक्ट'. इस बचाव दल में कई मनोचिकित्सक और डॉक्टर शामिल थे. समलैंगिकता को खत्म करने के लिए दक्षिण अफ्रीकी रक्षा बल ने कई तरह की टेक्निक ईजाद की जिसका इस्तेमाल विशेष रूप से कैदियों और सैनिकों पर किया जाता था.

समलैंगिकता को लोगों के अंदर से खत्म करने के लिए बनाई गई इस टीम के प्रमुख डॉक्टर ऑब्रे लेविन थे. उन्होंने ने ही सबसे पहले ये तर्क दिया था कि इस मानसिक बिमारी को ठीक किया जा सकता है, जिसके बाद दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने उन्हें उपचार के लिए 900 से भी अधिक समलैंगिक लोगों को सौंपा था. इसमें ज्यादातार वैसे लोगों को शामिल किया गया था, जो किसी प्रकार का नशा करते थे या सेना में शामिल होने के लिए तैयार नहीं थे. इस प्रयोग को वोरट्रेक्टेरोकोगटे के मिलिट्री अस्पताल में किया गया था. हालांकि, लेविन को सरकार ने लोगों पर ऐसे किसी भी तरह के प्रयोग को करने से मना किया था जिससे मानवाधिकार उल्लंघन होता हो. लेकिन लेविन ने यह दावा किया कि जिन लोगों पर भी यह प्रयोग किया जा रहा है वो सभी अपनी मर्जी से शामिल हुए हैं.



(फोटो सोर्स: क्राइम सीन डाटाबेस)

इस प्रयोग के दौरान एसएडीएफ टीम में शामिल डॉक्टर और शोधकर्ताओं ने पहले समलैंगिक लोगों पर अध्ययन करना शुरू किया. जिन लोगों पर ये प्रयोग किए जाने वाले थे, उनके परिवार वालों से बातचीत की गई. उनके रहन-सहन के तरीकों पर भी अध्ययन किया गया. जिसके बाद उनपर कई तरह के दिल दहला देने वाले प्रयोग किए गए. पीड़ितों को पहले इल्केट्रीक शॉक ट्रीटमेंट दिया जाता था, जिसके बाद उन्हें केमिकल की मदद से नपुंसक कर दिया जाता था. इस प्रोजेक्ट के दौरान समलैंगिक लोगों को कई तरह के ट्रीटमेंट दिए गए. जैसे:

क्रू़ड बिहेवियर थेरेपी:
इस थेरेपी के दौरान समलैंगिकों को एक मैग्ज़ीन दिए जाते थे, जिसमें पुरषों की नग्न तस्वीरें होती थी. उन तस्वीरों को देखने के बाद अगर कोई उत्तेजित हो जाता था, तो उन्हें हाई वोल्टेज के इलेक्ट्रिक शॉक दिए जाते थे. कई बार इस दौरान लोगों की जान भी चली जाती थी.

केमिकल कैस्ट्रेशन:
समलैंगिकों को इस प्रोजेक्ट के दौरान एक पागलखाने में रखा जाता था. उन्हें कई तरह की मानसिक यातनाएं भी दी जाती थी. इसके अलावा उनके शरीर में हार्मोन की मात्रा को एक केमिकल की मदद से बढ़ा दिया जाता था, जिससे वो नपुंसक बन जाएं. इस दौरान कई पीड़ित परेशान होकर आत्महत्या कर लेते थे.

ऑब्रे लेविन


सेक्स चेंज ऑपरेशन:
केमिकल कैस्ट्रेशन और क्रू़ड बिहेवियर थेरेपी के बाद लेविन ने समलैंगिकों को 'नॉर्मल' करने के लिए एक बेहद खतरनाक ट्रीटमेंट का भी सहारा लिया. उसने करीब 900 से भी ज्यादा समलैंगिकों का एकसाथ सेक्स चेंज ऑपरेशन करवाया. किसी भी अस्पताल में इतने बड़े पैमाने में अब तक ऐसा ऑपरेशन नहीं किया गया था. हालांकि इस सर्जरी के दौरान कई लोगों की मौत हो गई और कुछ लोगों ने आत्महत्या कर ली थी. जो सैनिक बच गए थे उन्हें आर्मी से निष्कासित कर नई पहचान दे दी गई. इसके साथ ही उन्हें अपने परिवार वालों से दूर रहने का भी निर्देश दे दिया गया था.

इस पूरे प्रोजेक्ट का खुलासा तब हुआ जब ऑब्रे लेविन ने इसकी पूरी रिपोर्ट दक्षिण अफ्रीकी सरकार को सौंपी. जिसके बाद साल 1995 में, सरकार ने समलैंगिकों के खिलाफ चलाए गए इस तरह के अभियान को मंजूरी देने के लिए माफी मांगी.

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