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जानिए अंडमान निकोबार का दिलचस्प रहस्य

जानिए अंडमान निकोबार का दिलचस्प रहस्य

    अंडमान निकोबार द्वीपों का ऐसा समूह है, जो अंग्रेजी शासन के दौर में ‘काला पानी’ की सजा के लिए चर्चित था. यहां की सेल्युलर जेल आज भी स्वाधीनता संग्राम के नायकों की कहानी कहती है. हालांकि इस जेल को अब राष्ट्रीय स्मारक में बदल दिया गया है.

    आज इसी द्वीप पर हर साल लाखों टूरिस्ट छुट्टियां मनाने आते हैं, लेकिन इस द्वीप के कई ऐसे फैक्ट्स हैं, जिनके बारे में आप शायद नहीं जानते होंगे. हम उन्हीं कुछ रहस्यों पर से पर्दा उठा रहे हैं, जिन्हें लोग नहीं जानते हैं.

    जारवा, आंगे, सेंटलिस और सेम्पियन आदि प्रजाति के आदिवासियों को यहां का मूल निवासी माना जाता है. जो सदियों पहले अफ्रीका से माईगे्रट होकर अंडमान पहुंचे. यहां के निवासी मुख्यतः ‘जार्वा’ जनजाति से हैं. यह 500 से भी कम की संख्या में हैं और बाहरी लोगों से बिल्कुल घुलते मिलते नहीं हैं. ये सरकार के द्वारा संरक्षित जनजाति है.

    इस बेहद चर्चित कुल 572 आइलैंड्स में से 36 जगहें ही जाने या बसने के लायक हैं. निकोबार में जाने के लिए सिर्फ रिसर्च या सर्वे के लिए ही चुनिंदा लोगों को इजाजत मिलती है. टूरिस्ट के लिए भी यहां जाना बेहद मुश्किल है.

    यहां पर सबसे ज्यादा समुद्री कछुआ पाया जाता है. धरती का सबसे बड़ा कछुआ यहीं पाया जाता है. यह साइज में बेहद बड़े होते हैं. धरती का सबसे छोटा कछुआ ओलिव राइडली भी अंडमान पहुंचकर आसरा बनाता है.

    अंडमान में कमर्शियल फिशिंग पूरी तरह से बैन है. यह धरती की उन चुनिंदा जगहों में से हैं जहां मछलियों को उम्र पूरी कर मरने का अवसर मिलता है और वह अपनी जिंदगी जीती है.

    अंडमान में कोकोनट क्रैब बहुत ज्यादा पाए जाते हैं. ये जमीन पर पाए जाने वाले सबसे विशाल क्रेब होते हैं, जिनकी लंबाई 1 मीटर तक हो सकती है. इनका पसंदीदा आहार कोकोनेट होता है. यह अपने मुंह से नारियल के मजबूत खोल को भी तोड़ देते हैं.

    यहां पर पर सबसे ज्यादा बंगाली भाषा बोली जाती है. इसके अलावा हिन्दी, तमिल, तेलगू और मलयालम भाषा बोलने वाले लोग हैं.

    इंडिया में केवल अंडमान में ही आपको वाल्कोनो देखने को मिलता है. भारत में एक ही सक्रिय ज्वालामुखी है और ये अंडमान में स्थित है. ये आइलैंड पोर्ट ब्लेयर से 135 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यहां जाकर आप इस ज्वालामुखी को देख सकते हैं.

    पहला यूरोपीय जिसने अंडमान में अपनी कॉलोनी बनाई वह डेनिश थे. वह साल 1755 में अंडमान पहुंचा था. अंग्रेज पहली बार साल 1789 में अंडमान पहुंचे थे, वह भी चंथम आइलैंड पर. इसके बाद अंग्रेजों ने भी यहां अपनी कॉलोनी और नेवल मिलिट्री बेस बनाया.

    डेनिश कॉलोनियल रूल यहां साल 1868 में खत्म हुआ था. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिशर्स ने इसे खरीद लिया था. इसके बाद आइलैंड का पूरा अधिकार अंग्रेजों के हाथ में चला गया.

    आजादी की लड़ाई के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान के उत्तर और दक्षिणी आइलैंड को शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप नाम दिया था.

    द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंडमान और निकोबार एकमात्र भारत का ऐसा भूमिक्षेत्र था, जिसपर जापान ने कब्जा जमाया था. जापान ने भारत के उत्तर पूर्व के कुछ हिस्सों को भी कब्जे में लिया था लेकिन सिर्फ 6 महीने के लिए. इस आइलैंड पर 3 साल तक जापान का कब्जा रहा था.

    अंडमान के दो आइलैंड्स के नाम ईस्ट इंडिया कंपनी के दो ऑफिसर्स के नाम पर रखा गए हैं. ये आइलैंड हैं हेवलॉक और नील आइलैंड.

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