सेक्स यहां टैबू नहीं है

News18Hindi
Updated: October 13, 2017, 2:18 PM IST
सेक्स यहां टैबू नहीं है
News18Hindi
Updated: October 13, 2017, 2:18 PM IST
छत्तीसगढ़ के बस्तर की एक ऐसी जनजाति है, जहां शादी से पहले सेक्स पर रोक नहीं है. इस प्रथा को गोंड जनजाति पवित्र और शिक्षाप्रद मानती है. इस जनजाति के लोगों का दावा है कि सिर्फ़ इसी प्रथा के कारण मुरिया जाति में आज तक यौन हिंसा का एक भी मामला सामने नहीं आया है.

गोंड भारत की एक प्रमुख जनजाति हैं. ये विंध्यपर्वत, सतपुड़ा पठार, छत्तीसगढ़ के दक्षिणी मैदान से लेकर दक्षिण-पश्चिम में गोदावरी नदी तक फैले हुए पहाड़ों और जंगलों में पाए जाते हैं.

इसी गोंड जनजाति की उपजाति या समुदाय है मुरिया. मुरिया लोगों की एक परंपरा है, जिसे घोटुल नाम दिया गया है. घोटुल बांस या मिट्टी की बनी झोंपड़ी होती है. घोटुल को बस्‍तर के मुरिया आदिवासियों का नाइटक्‍लब कहा जा सकता है, जहां वर्जनाओं के लिए कोई जगह नहीं है.

यह परंपरा दरअसल इस जनजाति के किशोरों को शिक्षा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया अनूठा अभियान है. इसमें दिन में बच्चे शिक्षा से लेकर घर–गृहस्थी तक के पाठ पढ़ते हैं तो शाम के समय मनोरंजन और रात के समय आनंद लिया जाता है.

मुरिया बच्‍चे जैसे ही 10 साल के होते है घोटुल के सदस्‍य बन जाते हैं. घोटुल में शामिल लड़कियों को मोतियारी और लड़कों को चेलिक कहते हैं. लड़कियों के प्रमुख को बेलोसा और लड़कों के प्रमुख को सरदार कहते हैं.

घोटुल में व्यस्कों की भूमिका महज सलाहकार की होती है, जो बच्‍चों को सफाई, अनुशासन व सामुदायिक सेवा के महत्व से परिचित करवाते हैं. घोटुल में किशोर-किशोरियां के अलावा केवल उनके शिक्षक ही प्रवेश कर सकते हैं.

हर शाम बजने वाला नगाड़ा इस बात का संकेत होता है कि मोतियारियों और चेलिकों के घोटुल में जाकर मनोरंजन करने का समय हो गया है. वहां देर रात तक नाचने-गाने, मिलने-जुलने, छेड़छाड़-चुहल, अंत्याक्षरी और दूसरे तरह के खेल चलते रहते हैं. तम्‍बाकू और ताड़ी सबके के लिए उपलब्‍ध होता है.

मनोरंजन और कामकाज की शिक्षा के अलावा घोटुल का उद्देश्य नौजवानों को व्‍यापक गोंड समुदाय का हिस्‍सा बनाना भी होता है, जिससे उन्हें अपनी परंपराओं और जिम्‍मेदारियों का समय रहते अहसास हो सके. अंतिम संस्कार समेत आदिवासी समाज के सभी संस्कारों में घोटुल के सदस्य जरूर शामिल होते हैं.

इसे इन जनजाति का विश्वविद्यालय भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा. दरअसल गोंड जनजाति के बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल या कॉलेज नहीं जाते बल्कि उन्हें सभी तरह की शिक्षा इस घोटुल में ही दी जाती है.

जहां भी इस जनजाति का डेरा होता है, वहीं घोटुल का निर्माण अनिवार्य होता है. दिन के समय यहां पाठ पढ़ाया जाता है, जिसमें आरंभिक शिक्षा से लेकर सामाजिक रहन–सहन, आचार–व्यवहार और रिश्ते–नातों के संबंध में गहन जानकारी दी जाती है. घोटुल की पूरी साफ–सफाई और अन्य कामों का जिम्मा वहां रह रही बालिका पर होता है.

दरअसल यह प्रथा लिंगो पेन यानी लिंगो देव ने शुरू की थी. समस्त गोंड समुदाय को पहांदी कुपार लिंगो ने कोया पुनेम के मध्यम से एक सूत्र में बंधने का काम किया. लिंगो देव को गोंड जनजाति का देवता माना जाता है.

सदियों पहले जब लिंगो देव ने देखा कि गोंड जाति में किसी भी तरह की शिक्षा का कोई स्थान नहीं है तो उन्होंने एक अनोखी प्रथा शुरू की. उन्होंने बस्ती के बाहर बांस की कुछ झोंपडि़यां बनवाई और बच्चों को वहां पढ़ाना शुरू कर दिया. यही झोंपडियां बाद में 'घोंटुल' के नाम से प्रसिद्ध हुईं. इनमें बच्चों को जीवन से जुड़ी हर शिक्षा दी जाती थी.

इस प्रथा में प्रेमी–प्रेमिका जो बाद में जीवनभर के लिए जीवनसाथी भी बनते हैं, उनके चयन का तरीका भी अनूठा है. दरअसल जैसे ही कोई लड़का घोंटुल में आता है और उसे लगता है कि वह शारीरिक रूप से मेच्योर हो गया है, उसे बांस की एक कंघी बनानी होती है. यह कंघी बनाने में वह अपनी पूरी ताकत और कला झोंक देता है, क्योंकि यही कंघी तय करती है कि वह किस लड़की को पसंद आएगा.

घोंटुल में आई लड़की को जब कोई लड़का पसंद आता है तो वह उसकी कंघी चुरा लेती है. यह संकेत होता है कि वह उस लड़के को चाहती है. जैसे ही वह लड़की यह कंघी अपने बालों में लगाकर निकलती है, सबको पता चल जाता है कि वह किसी को चाहने लगी है.

जैसे ही लड़के–लड़की की जोड़ी बन जाती है तो वे दोनों मिलकर अपनी घोंटुल यानी झोंपड़ी को सजाते–संवारते हैं और दोनों एक ही झोंपड़ी में रहने लगते हैं. इस दौरान वे वैवाहिक जीवन से जुड़ी तमाम सीख हासिल करते हैं.

इसमें एक-दूसरे की भावनाओं से लेकर शारीरिक ज़रूरतों को संतुष्ट करना तक शामिल होता है. यहां खास बात यह है कि सिर्फ़ वही लड़के–लड़कियां एक साथ एक झोंपड़ी में जा सकते हैं, जो सार्वजनिक हो चुके हों कि वे एक–दूसरे से प्रेम करते हैं.
First published: October 13, 2017
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर